Archive for February, 2007

My Name


1 comment February 14, 2007

A MOMENT OF SILENCE



1 comment February 13, 2007

A MOMENT OF SILENCE



1 comment February 13, 2007

इस तरह खत्म होते हैं लोग


इस तरह खत्म होते हैं लोग
रेयाज़-उल-ह
यह मेरे घर के सामने के पाकड़ पर
नयी सुलंगियों के आने के दिन थे
और घर के पिछवाड़े के पोखर में
मल्लाहों के उतरने के दिन
जब होली के आस-पास
दिन भर वे काले-कलूटे मल्लाह
पीठ पर पसीना चमकाते
हिंड़ोड़ कर रख देते सारा पोखर
और मार निकालते
टोकरी भर कमसिन मछलियां
…जो बांट दी जातीं
मुहल्ले भर में
मल्लाहों को मेहनताना देने के बाद

उस दिन पूरा मुहल्ला
भर जाता करुआइन गंध से

…और बच्चे
उतने बच्चे तो कभी न हुए मेरे मुहल्ले में
न होंगे कभी
एक साथ,
जिनके खेलों से
फ़ुदक उठता था पूरा मुहल्ला
सचमुच की गली में पिट्टो
आइस-पाइस, चोर-चोर
अंधा टोपी…और चिरैया मेरो
उन नन्हीं-सी लकीरों के निशान
अब भी होंगे कहीं-न-कहीं
किसी ईंट-खपरे के नीचे
…तब क्रिकेट का ज़ोर इतना न था
…और लड़कियां!
पूरे मुहल्ले में भरी पड़ी थीं लड़कियां
जैसे किताबों में भरे रहते हैं शब्द
निश्शब्द, मगर वाचाल
सब साथ मिल कर हंसतीं
तो पोखर में तरंगें उठने लगतीं
सब साथ मिल कर गातीं
तो लगता
आ गया मुहर्रम का महीना
या किसी की शादी का दिन

एक चांद भी था मेरे मुहल्ले की छत पर
जो आता हर तीसवें दिन
पूरा का पूरा
जैसे आते हैं साईं त्योहार के त्योहार
मुंडेरों पर आते हैं कौवे
जैसे आते थे मेहमान
जब-तब, हमेशा

खेत
घर के चौखटे तक बिछे हुए थे
और घर
अपनी छप्पर में खुंसे हुए
हंसुए, खुरपी और छाता के साथ
ताख पर होता शीशा, दंतुअन, सिंदूर की डिब्बी
दीया

था एक पागल भी
महम्मद अली
गाता था जोशीले गीत
और हगता था खुलेआम
लोगों के दरवाज़ों पर
हर घर से मांगता दो रोटियां
इस तरह मानों मांग रहा हो
अपनी खाली कोटरों के लिए
दो आंखें

होतीं और भी कई चीज़ें घरों में
जितनी होतीं घरों से बाहर
तब दीवारें घर की हद नहीं हुआ करती थीं

शाम को धुएं से घिरे छप्परों
और भूसा भरे नांदोंवाला मेरा गांव
जिसके कोने अंतरे से उठती थी हुक्के की गुड़-गुड़

और थे सारे के सारे लोग
मुकम्मल चेहरे के साथ

और एक दिन चिपका दी गयी फ़ेहरिश्त
लोगों की
और कुछ गुनाहों की
जो उन्होंने किये थे

…और फिर
खत्म था सबकुछ
जैसे कभी
रहा ही न हो
एक हरा पत्ता भी
जला दिये गये घर
मानों हों ठूंठ-निकम्मे
राख यूं उड़ती रही
मानों घर से निकाल दिया गया
कुत्ता हो कोई

लोग मारे गये बेआवाज़
जैसे मर जाते हैं घोंघे
बिना चीखे

अपनों ने मारा उन्हें
अपनों ने खत्म किया
और वे चीख नहीं पाये

अब हैं केवल पीले पत्ते
और सन्नाटा.


1 comment February 12, 2007

इस तरह खत्म होते हैं लोग


इस तरह खत्म होते हैं लोग
रेयाज़-उल-ह
यह मेरे घर के सामने के पाकड़ पर
नयी सुलंगियों के आने के दिन थे
और घर के पिछवाड़े के पोखर में
मल्लाहों के उतरने के दिन
जब होली के आस-पास
दिन भर वे काले-कलूटे मल्लाह
पीठ पर पसीना चमकाते
हिंड़ोड़ कर रख देते सारा पोखर
और मार निकालते
टोकरी भर कमसिन मछलियां
…जो बांट दी जातीं
मुहल्ले भर में
मल्लाहों को मेहनताना देने के बाद

उस दिन पूरा मुहल्ला
भर जाता करुआइन गंध से

…और बच्चे
उतने बच्चे तो कभी न हुए मेरे मुहल्ले में
न होंगे कभी
एक साथ,
जिनके खेलों से
फ़ुदक उठता था पूरा मुहल्ला
सचमुच की गली में पिट्टो
आइस-पाइस, चोर-चोर
अंधा टोपी…और चिरैया मेरो
उन नन्हीं-सी लकीरों के निशान
अब भी होंगे कहीं-न-कहीं
किसी ईंट-खपरे के नीचे
…तब क्रिकेट का ज़ोर इतना न था
…और लड़कियां!
पूरे मुहल्ले में भरी पड़ी थीं लड़कियां
जैसे किताबों में भरे रहते हैं शब्द
निश्शब्द, मगर वाचाल
सब साथ मिल कर हंसतीं
तो पोखर में तरंगें उठने लगतीं
सब साथ मिल कर गातीं
तो लगता
आ गया मुहर्रम का महीना
या किसी की शादी का दिन

एक चांद भी था मेरे मुहल्ले की छत पर
जो आता हर तीसवें दिन
पूरा का पूरा
जैसे आते हैं साईं त्योहार के त्योहार
मुंडेरों पर आते हैं कौवे
जैसे आते थे मेहमान
जब-तब, हमेशा

खेत
घर के चौखटे तक बिछे हुए थे
और घर
अपनी छप्पर में खुंसे हुए
हंसुए, खुरपी और छाता के साथ
ताख पर होता शीशा, दंतुअन, सिंदूर की डिब्बी
दीया

था एक पागल भी
महम्मद अली
गाता था जोशीले गीत
और हगता था खुलेआम
लोगों के दरवाज़ों पर
हर घर से मांगता दो रोटियां
इस तरह मानों मांग रहा हो
अपनी खाली कोटरों के लिए
दो आंखें

होतीं और भी कई चीज़ें घरों में
जितनी होतीं घरों से बाहर
तब दीवारें घर की हद नहीं हुआ करती थीं

शाम को धुएं से घिरे छप्परों
और भूसा भरे नांदोंवाला मेरा गांव
जिसके कोने अंतरे से उठती थी हुक्के की गुड़-गुड़

और थे सारे के सारे लोग
मुकम्मल चेहरे के साथ

और एक दिन चिपका दी गयी फ़ेहरिश्त
लोगों की
और कुछ गुनाहों की
जो उन्होंने किये थे

…और फिर
खत्म था सबकुछ
जैसे कभी
रहा ही न हो
एक हरा पत्ता भी
जला दिये गये घर
मानों हों ठूंठ-निकम्मे
राख यूं उड़ती रही
मानों घर से निकाल दिया गया
कुत्ता हो कोई

लोग मारे गये बेआवाज़
जैसे मर जाते हैं घोंघे
बिना चीखे

अपनों ने मारा उन्हें
अपनों ने खत्म किया
और वे चीख नहीं पाये

अब हैं केवल पीले पत्ते
और सन्नाटा.


1 comment February 11, 2007

उठ शहरज़ाद


उठ शहरज़ाद
रेयाज़-उल-हक
हज़ार रातों के किस्से
अब सो चुके हैं
और ज़ालिम बादशाह
एक बार फिर जग पड़ा है


बेबीलोन के पुराने खंडहरों पर
काली परछाइयां नाच रही हैं

दज़ला और फ़ुरात का रंग
हो चुका है रक्तिम
लहज़ीब और तमद्दुन के शहर को
तहज़ीब और
तमद्दुन की दुहाई देनेवालों ने
बरबाद करने की ठान ली है

तेरी कदीम गलियों में अब
माओं की लोरियां नहीं
भूखे और बीमार बच्चों की चीखें गूंजती हैं
तेरी फ़िज़ा में लोकगीतों की पुरकैफ़ सरगम
नहीं गूंजती अब
इनकी जगह बमबार हवाई जहाजों के सायरन
और तोपों की गरज ने ले ली है
यहां की हवा में ज़िन्दगी की खुशबू नहीं
बारूद और मौत की बदबू है
लोग अब जीने के लिए नहीं जीते
बल्कि मरने के लिए,
तेरी खुद्दार और आज़ाद ज़मीं
सात समन्दर पार से आये लुटेरे ज़ालिमों की कैद में है

और शहज़ाद
तू कहां है?

कभी अपने शहर को बचाने की खातिर तुमने
हज़ार रातों तक जग कर
एक ज़ालिम बादशाह को सुनायी थीं हज़ार कहानियां
और संवार दी थी तकदीर अपने शहर की

आज इन मासूम ज़िंदगियों का नवश्ता तेरे हाथ में है
आज फिर एक ज़ालिम बदशाह उठ खड़ा हुआ है
और खून में डुबो रहा है तेरे शहर को
उठ शहरज़ाद उठ
और छेड़ फिर से हज़ार रातों के नयी किस्से
ताकि बच सकें ये मासूम ज़िन्दगियां
इन मासूम होठों पर हंसी
ममता की लोरियां
मांओं के सीनों में दूध
धरती की कोख में अनाज
दज़ला-फ़ुरात में पानी
बेबीलोन की तहज़ीब
कदीम खंडहर
और अलिफ़ लैला की कहानियां

…इससे पहले कि देर हो जाये
शहरज़ाद.


Add comment February 2, 2007

उठ शहरज़ाद


उठ शहरज़ाद
रेयाज़-उल-हक
हज़ार रातों के किस्से
अब सो चुके हैं
और ज़ालिम बादशाह
एक बार फिर जग पड़ा है


बेबीलोन के पुराने खंडहरों पर
काली परछाइयां नाच रही हैं

दज़ला और फ़ुरात का रंग
हो चुका है रक्तिम
लहज़ीब और तमद्दुन के शहर को
तहज़ीब और
तमद्दुन की दुहाई देनेवालों ने
बरबाद करने की ठान ली है

तेरी कदीम गलियों में अब
माओं की लोरियां नहीं
भूखे और बीमार बच्चों की चीखें गूंजती हैं
तेरी फ़िज़ा में लोकगीतों की पुरकैफ़ सरगम
नहीं गूंजती अब
इनकी जगह बमबार हवाई जहाजों के सायरन
और तोपों की गरज ने ले ली है
यहां की हवा में ज़िन्दगी की खुशबू नहीं
बारूद और मौत की बदबू है
लोग अब जीने के लिए नहीं जीते
बल्कि मरने के लिए,
तेरी खुद्दार और आज़ाद ज़मीं
सात समन्दर पार से आये लुटेरे ज़ालिमों की कैद में है

और शहज़ाद
तू कहां है?

कभी अपने शहर को बचाने की खातिर तुमने
हज़ार रातों तक जग कर
एक ज़ालिम बादशाह को सुनायी थीं हज़ार कहानियां
और संवार दी थी तकदीर अपने शहर की

आज इन मासूम ज़िंदगियों का नवश्ता तेरे हाथ में है
आज फिर एक ज़ालिम बदशाह उठ खड़ा हुआ है
और खून में डुबो रहा है तेरे शहर को
उठ शहरज़ाद उठ
और छेड़ फिर से हज़ार रातों के नयी किस्से
ताकि बच सकें ये मासूम ज़िन्दगियां
इन मासूम होठों पर हंसी
ममता की लोरियां
मांओं के सीनों में दूध
धरती की कोख में अनाज
दज़ला-फ़ुरात में पानी
बेबीलोन की तहज़ीब
कदीम खंडहर
और अलिफ़ लैला की कहानियां

…इससे पहले कि देर हो जाये
शहरज़ाद.


Add comment February 2, 2007

Next Posts


RSS news from bbchindi.com

Recent Posts

Calendar

February 2007
M T W T F S S
    Mar »
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728  

Links

Archives

Recent Comments

बंगाल म… on यह ठीक-ठीक ए…
क्रिके… on बंगाल में…
चन्द्र… on आइए, हम अंधे…
चन्द्र… on आइए, हम अंधे…
चन्द्र… on क्या पंत और …