पार्टनर आपकी पक्षधरता क्या है
इधर बहुत कम लोगों का ध्यान इस खबर की ओर गया कि फ़िल्म ट्रैफ़िक सिग्नल को कुछ राज्यों में प्रतिबंधित कर दिया गया. शर्म की बात तो यह है कि इसके पीछे कुछ लेखकों का ही हाथ है. युवा लेखक-पत्रकार प्रमोद रंजन हाशिये पर पहली बार, इसी प्रसंग पर अपने लेख के साथ. प्रमोद फ़िलहाल जनविकल्प नामक पत्रिका के संपादकों में से एक हैं और पटना में रह रहे हैं.
प्रमोद रंजन
जनविकल्प से साभार
मधुर भंडारकर की फिल्म ट्रैफिक सिगनल पर हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। यह फिल्म मुंबई के एक ट्रैफिक सिग्नल के सहारे रोजी-रोटी कमानेवालों के बारे में है, जिनके जीवन संघर्ष पर सभ्य समाज की नजर तक नहीं जाती। शर्तिया तौर पर फिल्म देखते हुए आपको हैरानी होगी कि इसे प्रतिबंधित करने के पक्षधर हिन्दी के वे लेखक, कवि हैं जो वंचितों के प्रति अपनी पक्षधरता साबित करने के लिए उठक-बैठक करते रहते है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की कसमें खाते जिनकी जुबानें नहीं थकतीं। सिनेमा के व्यवसायिक पर्दे पर ऐसी फिल्म कई वषों बाद आई है जिसमें चिपचिपाती गंदगी से भरे पिचके गालों पर लगातार फोकस रखने का जोखिम लिया गया है। वहां छोटे छोटे शॉर्टस में सैकडो बेनाम जिंदगियां कोलाज की तरह उभरती हैं, जिनके लिए मुंबई का एक ट्रैफिक सिग्नल ही सब कुछ है। सिग्नल के लाल होते ही उनका रोजगार चल पड्ता है। कोई अखबार बेचता है तो कोई कपडे। कोई पागल बनकर भीख मांगता है तो कोई बाप मर जाने का झूठा बहाना कर पैसे मांगता है। रात में इसी सिग्नल के आसपास सेक्स वर्करों को भी काम मिलता है। इस कोलाज में किन्नर भी हैं जो सिग्नल पर रूकी गाडियों में बैठे लोगों से भीख मांग कर पेट पालते हैं।
हिमाचल प्रदेश के लेखकों के एक गुट का कहना है कि हिमाचल प्रदेश में किन्नौर नामक एक जनजातीय जिला है। सो वहां के नागरिक किन्नर कहे जाएंगे। हिजडों को किन्नर कहे जाने से उस स्वर्गतुल्य जिले के सभ्य जनों का अपमान होता है। उनके इस शगूफे के वोट में तब्दील होने की संभावनाओं को देखते हुए हिमाचल की कांग्रेस सरकार ने ट्रैफिक सिग्नल को दो महीने के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। जबकि वास्तविकता है कि उस जिले के लोगों को किन्नौरी अथवा किन्नौरी कहा जाता रहा है। स्थानीय स्तर पर उन्हें सवर्ण जाति सूचक उपाधि नेगी से भी संबांधित किया जाता है। बल्कि यही नाम अधिक प्रचलित है।
जिला किन्नौर कोई समानता का स्वर्ग नहीं है। यह इन्हीं विशेषाधिकार प्राप्त नेगी लोगों का स्वर्ग है, जिन्होंने वर्ण व्यवस्था द्वारा प्रदत्त अधिकारों के बूते वहां प्रकृति द्वारा मुक्तहस्त होकर लुटाए गए वरदानों पर अपना अधिपत्य कायम रखा है। उस जनजातीय इलाके की समृद्धि के पीछे दलितों के अनवरत शोषण की कहानियां रही है। छुआछूत वहां अब भी मुखर रूप से कायम है। यहां तक कि उस इलाके के कुछ त्योहारों में दलितों की प्रतीकात्मक रूप से बलि भी दी जाती है कैसी विडंबना है कि इस प्रतिबंध के सूत्रधार लेखक ने इसी विषय पर एक उपन्यास भी लिखा है। किन्नर शब्द के हिजडों के लिए प्रयुक्त होने से कथित रूप अपमानित वे नेगी ही हो रहे हैं। वहां के दलितों की तो अपनी कोई पहचान ही विकसित नहीं हो पाई है। उस दुर्गम इलाके में मैदानी लोगों का आना जाना बढा तो उन्होंने भ्रमवश वहां के दलितों को भी नेगी संबांधित करना शुरू कर दिया। अब दलित स्वयं भी नेगी सरनेम रखने लगे हैं। नई हवा के चपेट में आए दलितों की इस प्रवति से भी वहां के असली नेगी अपमानित महसूस करते हैं।
अब जरा इस तथ्य पर गौर करें कि भारत में उभयलिंगी लोगों की तादाद लगभ्ाग 5 लाख है जबकि जिला किन्नौर की आबादी 80 हजार से भी कम है। प्रकति का क्रूरतम मजाक झेल रहे इन 5 लाख लोगों के लिए इन संवेदशील लेखक कवियों को अपमानजनम ध्वनि वाला हिजडा शब्द उचित लगता है। उनके लिए कतिपय सम्मानजनक किन्नर संज्ञा उन्हें नागवार गुजर रही है।
वास्तविक्ता यह भी हे कि किन्नौर के सवर्णों अथवा दलितों ने कभी भी स्वयं को किन्नर नहीं कहा। दूसरों ने भी हमेशा उन्हें किन्नौरी, किन्नौरा अथवा नेगी नाम से ही पुकारा है। यह शगूफा पहले पहल लगभग 5 वर्ष पूर्व हिमाचल के एक लेखक ने भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक के साथ मिलकर छोडा था। आत्म-चर्चा लोभ से शुरू की गई इस कवायद ने इन वर्षों में कीडिया के सहयोग से किन्नौर वासियों में एक कृत्रिम अपमान बोध पैदा करने में आंशिक सफलता भी हासिल कर ली हैं मूल प्रकृति में यह विवाद वाटर,परजानिया आदि से अलग नहीं है। यह हिमाचली बिग्रेड इन दिनों किन्नौरियों को किन्नर साबित करने के लिए पुराणों को खंगाल रही है। नंगी सच्चाईयों को मिथ्या साबित करने वाले इन ग्रंथों की व्याख्याओं के भाषाई खेल में उलझने का अर्थ पहले मुर्गी या पहले अंडा जैसी पहेलियों को सुलझाने से अधिक कुछ नहीं होता। यहां सिर्फ इतना बता देना पर्याप्त होगा कि पुराणों में किन्नरों को घोडे जैसे लम्बे चेहरे और आदमी जैसे शरीर-सौष्ठव वाला बताया गया है, जो नाच-बजा कर राजा को प्रसन्न करते हैं। महाभारत में भी किन्नरों को अंत:पुर में भृत्यों के रूप में नियुक्त किए जाने का विवरण आता है। आप स्वयं तय करें कि यह साक्ष्य भी किसी दुर्भाग्यशाली जाति की ओर संकेत करते हैं। किन्नौर जिले के वासी तो कोमल, गौरवर्ण और सुदर्शन चेहरे वाले होते हैं। साहुल सांकतयायन ने भी एकाध जगह भाषा लोभ में पडकर किन्नौरवासियों के लिए किन्नर शब्द का इस्तेमाल किया है। फिल्म का विरोध कर रहे लेखक, कविगण अपने पक्ष में उन्हें भी उद्धत कर रहे हैं। राहुल जी के विचारों में आस्था रखने वालों को इन उद्धरणों को पढते हुए इन लेखकों के इतर अर्थों पर भी गौर करना चाहिए। उन्होंने उनके नाम से ‘राहुल’ गायब कर दिया है। इस विवाद के प्रवक्तओ द्वारा समाचार पत्रों में उन्हें ‘महापंडित’ सांस्कृत्यायन का यह नामाकरण इन लेखकों के अचेतन उद्देश्यों का तो पता देता ही है। पता नहीं कैसे अब तक उनके हाथ नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता बादल को घिरते देखा है नहीं लगी है। इस कविता में उन्होंने भी हिमालय के शिखरों पर बसे किन्नर-किन्नरियों का उल्लेख किया है। कविता के नाद को ध्यान में रखते हुए वह लिखते है ‘मदिरारूण आंखों वाले उन/उन्मद किन्नर-किन्न्रियों की मृदुल मनोरम अंगुलियों को वंशी पर फिरते देखा है..।‘ यह बस नजर नहीं पडने का मामला है अन्यथा वे भी पंडित नागार्जुन हो गए होते। ट्रैफिक सिग्नल पर प्रतिबंध का जश्न मनाने वाली चौकडी के अधिकांश सदस्य अपनी जातिगत और राजनीतिक पक्षधरताओं को स्वीकारने में शायद ना-नुकुर की गुंजाईश निकल लें क्योंकि इसके सूत्रधार लेखक जन्मना दलित हैं। लेकिन सवाल लेखकीय पक्षधरता का भी है। वह इस पूरे प्रकरण में प्रकृति की भीषणतम दुर्घटना का शिकार होकर हाशिए पर पडे भीख मांगने को विवश हिजडों के पक्ष में रही है या प्रभु वर्गों के पक्ष में। कृष्णमोहन झा की हिजडे शीर्षक कविता के पंक्तियां याद आती हैं: ‘उनकी गालियों और तालियों से भी उडते हैं खून के छींटे/और यह जो गाते-बजाते उधम मचाते/हर चौक-चौराहे पर/वे उठा देते हैं अपने कपड उपर/दरअसल उनकी अभद्रता नहीं/उस ईश्वर से प्रतिशोध लेने का उनका एक तरीका है/जिसने उन्हें बनाया है/या फिर नहीं बनाया….।‘ फिल्म के अंत में गंदी बस्ती का अन्नदाता ट्रैफिक सिग्नल तोड दिया जाता है। मधुर भंडारकर ने इस दृश्य को इतनी रचनात्मकता से फिलमाया हे कि लगता है महानगरपालिका क्रेन किसी निर्जीव सिग्नल को नहीं, बल्कि उस गंदी बस्ती के किसी महान बुर्जुग की लाश का खींच ले रहा हो। पक्षधरता की तो बात छोडिए, क्या इस फिल्म अथवा उपरोक्त कविता जैसी संवेदनशीलता भी इन लेखकों में है, जो स्वयं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर कहते नहीं अघाते। एक ओर वे हाशिए पर फेंक दिए गए लोगों के पक्ष में जाने वाली फिलम का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी ओर प्रकृति के क्रूरतम अभिशाप के साथ-साथ समाज का वहिष्कार भी झोल रहे उभ्यलिंगियों का अपमान करने में भी कोई कसर नहीं छोड रहे। इतना ही नहीं। आपको यह जानना भी बेहद रोचक लगेगा कि उन्होंने जिस किन्नर शब्द के कारण ट्रैफिक सिग्नल को प्रतिबंधित करवाया है, उसका उच्चारण तक फिल्म में नहीं हुआ है। इस शब्द का प्रयोग मधुर भंडारकर ने महज एक इंटरव्यू में किया था। लेकिन वे रट लगाए हैं कि फिल्म से किन्नर शब्द को हटाए बिना इसे चलने नहीं देंगे। चूंकि यह रट विद्वान लेखकों की है इसलिए यह उजबक-प्रश्न व्यर्थ है कि उन्हेंने फिल्म देखी है अथवा नहीं। बेहतर होगा कि हम सिर्फ उनके बारीक निहितार्थों पर ध्यान केंद्रित रखें।
1 comment March 30, 2007





