अब भी चमत्कृत करती है ‘माँ’
March 1, 2007
अब भी चमत्कृत करती है ‘माँ’
विष्णु खरे
साहित्यकार और समीक्षक
यह एक सु
खद संयोग है कि इस वर्ष मक्सिम गोर्की की कालजयी कृति ‘माँ’ की प्रकाशन-शती है और मैंने उसे पहली बार आधी सदी पहले पढ़ा था.
मुझे अब यह याद नहीं है कि उसका हिंदी अनुवाद किसने किया था लेकिन उसकी पठनीयता मुझे अब भी चमत्कृत करती है.
यह शायद पहला उपन्यास था जिसमें एक युवक नायक तो था किंतु उसकी नायिका दरअसल इस युवक पावेल की विधवा माँ पेलागेइया निलोव्ना व्लासोबा थी जो पहले तो अपने निकम्मे बेटे से निराश थी और ईश्वर और ईसाइयत में आस्था रखती थी.
लेकिन जब पावेल गुंडागर्दी छोड़कर कम्युनिस्ट बन जाता है तब उसकी यह माँ भी धीरे-धीरे अपने बेटे की राजनीतिक आस्था और उसकी ख़तरनाक गुप्त, क्रांतिकारी गतिविधियों में विश्वास करने लगती है. अनुवाद में भी गोर्की की भाषा अदभुत है.
एक भोली-भाली घरेलू वृद्धा का इस तरह महान रूसी क्रांति की विराट प्रक्रिया में शामिल हो जाना एक रोमांचक, प्रेरक कथानक है. ‘माँ’ गोर्की की कल्पना का अविष्कार नहीं थी-वे अन्ना ज़ातोमोवा नामक एक औरत को जानते थे जो अपने क्रांतिकारी बेटे की गिरफ़्तारी के बाद सारे रूस में बग़ावत के पर्चे बाँटती घूमती थी.
निस्संदेह गोर्की ने अपने बचपन और कैशोर्य के अनुभवों का भी ‘माँ’ में इस्तेमाल किया है. मैं रूसी नहीं जानता लेकिन बाद में मैंने ‘माँ’ का अंग़्रेजी अनुवाद भी पढ़ा किंतु हिंदी अनुवाद ने जो गहरा प्रभाव मुझपर छोड़ा वह अमिट है.
1956-1957 के आसपास प्रकाशित मेरी प्रारंभिक कहानियों में गोर्की का असर बहुत है, बल्कि एक रचना में तो मैंने बाकायदा ‘माँ’ का उल्लेख किया है. यदि आज भी साम्यवाद में मेरी आस्था है तो उसके पीछे गोर्की की कई रचनाएं और विशेषतः ‘माँ’ का योगदान है.
सच तो यह है कि पहली बार ‘माँ’ की अंतिम पंक्तियाँ पढ़कर मैं रो दिया था और आज भी इस अमर माँ के अंतिम शब्द मुझे उसी तरह विचलित करते हैं.यह सच है कि अब पावेल और व्लासोवा जैसे पात्र वास्तविक जीवन में नहीं हैं और सामाजिक परिस्थितियाँ भी बहुत बदली हैं लेकिन मानव संघर्ष का अंत अब भी नहीं हुआ है.
गोर्की की ‘माँ’ मुझे हमेशा भारत की लाखों-करोड़ों माँएं लगी है और कहीं यह भारत और रूस के संस्कृति-साम्य की ओर भी संकेत करता है. हॉवर्ड फ़ास्ट आजीवन ‘माँ’ के भक्त रहे और स्वयं लेनिन ने इसे ‘बहुत ज़रूरी’ और ‘बहुत मौज़ूँ’ किताब कहा था.
मुझे नहीं मालूम आज कितने पाठक ‘माँ’ पढ़ते हैं किंतु यह अकारण नहीं है कि ‘आर्तामोनोफ़’, ‘मेरे विश्वविद्यालय’ और विशेषतः ‘माँ’ को विश्व-संहिता में कालजयी कृति का दर्ज़ा दिया जाता है. मेरे लिए तो वह वैसी ही है.
साहित्यकार और समीक्षक
यह एक सु
खद संयोग है कि इस वर्ष मक्सिम गोर्की की कालजयी कृति ‘माँ’ की प्रकाशन-शती है और मैंने उसे पहली बार आधी सदी पहले पढ़ा था.मुझे अब यह याद नहीं है कि उसका हिंदी अनुवाद किसने किया था लेकिन उसकी पठनीयता मुझे अब भी चमत्कृत करती है.
यह शायद पहला उपन्यास था जिसमें एक युवक नायक तो था किंतु उसकी नायिका दरअसल इस युवक पावेल की विधवा माँ पेलागेइया निलोव्ना व्लासोबा थी जो पहले तो अपने निकम्मे बेटे से निराश थी और ईश्वर और ईसाइयत में आस्था रखती थी.
लेकिन जब पावेल गुंडागर्दी छोड़कर कम्युनिस्ट बन जाता है तब उसकी यह माँ भी धीरे-धीरे अपने बेटे की राजनीतिक आस्था और उसकी ख़तरनाक गुप्त, क्रांतिकारी गतिविधियों में विश्वास करने लगती है. अनुवाद में भी गोर्की की भाषा अदभुत है.
एक भोली-भाली घरेलू वृद्धा का इस तरह महान रूसी क्रांति की विराट प्रक्रिया में शामिल हो जाना एक रोमांचक, प्रेरक कथानक है. ‘माँ’ गोर्की की कल्पना का अविष्कार नहीं थी-वे अन्ना ज़ातोमोवा नामक एक औरत को जानते थे जो अपने क्रांतिकारी बेटे की गिरफ़्तारी के बाद सारे रूस में बग़ावत के पर्चे बाँटती घूमती थी.
निस्संदेह गोर्की ने अपने बचपन और कैशोर्य के अनुभवों का भी ‘माँ’ में इस्तेमाल किया है. मैं रूसी नहीं जानता लेकिन बाद में मैंने ‘माँ’ का अंग़्रेजी अनुवाद भी पढ़ा किंतु हिंदी अनुवाद ने जो गहरा प्रभाव मुझपर छोड़ा वह अमिट है.
1956-1957 के आसपास प्रकाशित मेरी प्रारंभिक कहानियों में गोर्की का असर बहुत है, बल्कि एक रचना में तो मैंने बाकायदा ‘माँ’ का उल्लेख किया है. यदि आज भी साम्यवाद में मेरी आस्था है तो उसके पीछे गोर्की की कई रचनाएं और विशेषतः ‘माँ’ का योगदान है.
सच तो यह है कि पहली बार ‘माँ’ की अंतिम पंक्तियाँ पढ़कर मैं रो दिया था और आज भी इस अमर माँ के अंतिम शब्द मुझे उसी तरह विचलित करते हैं.यह सच है कि अब पावेल और व्लासोवा जैसे पात्र वास्तविक जीवन में नहीं हैं और सामाजिक परिस्थितियाँ भी बहुत बदली हैं लेकिन मानव संघर्ष का अंत अब भी नहीं हुआ है.
गोर्की की ‘माँ’ मुझे हमेशा भारत की लाखों-करोड़ों माँएं लगी है और कहीं यह भारत और रूस के संस्कृति-साम्य की ओर भी संकेत करता है. हॉवर्ड फ़ास्ट आजीवन ‘माँ’ के भक्त रहे और स्वयं लेनिन ने इसे ‘बहुत ज़रूरी’ और ‘बहुत मौज़ूँ’ किताब कहा था.
मुझे नहीं मालूम आज कितने पाठक ‘माँ’ पढ़ते हैं किंतु यह अकारण नहीं है कि ‘आर्तामोनोफ़’, ‘मेरे विश्वविद्यालय’ और विशेषतः ‘माँ’ को विश्व-संहिता में कालजयी कृति का दर्ज़ा दिया जाता है. मेरे लिए तो वह वैसी ही है.
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