Archive for March 2nd, 2007
होली के कुछ प्रसिद्ध गीत
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की

परियों के रंग दमकते हों
खूँ शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे में छकते हों
तब देख बहारें होली की
नाच रंगीली परियों का
कुछ भीगी तानें होली की
कुछ तबले खड़कें रंग भरे
कुछ घुँघरू ताल छनकते हों
तब देख बहारें होली की
मुँह लाल गुलाबी आँखें हों
और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को
अंगिया पर तककर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों
तब देख बहारें होली की
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की
- नज़ीर अकबराबादी
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बहुत दिन बाद कोयल
पास आकर बोली है
पवन ने आके धीरे से
कली की गाँठ खोली है.
लगी है कैरियां आमों में
महुओं ने लिए कूचे,
गुलाबों ने कहा हँस के
हवा से अब तो होली है.
-त्रिलोचन
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गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ए यार होली में.
नहीं यह है गुलाले सुर्ख़ उड़ता हर जगह प्यारे,
ये आशिक ही है उमड़ी आहें आतिशबार होली में.
गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो,
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में.
है रंगत जाफ़रानी रुख़ अबीरी कुमकुम कुछ है,
बने हो ख़ुद ही होली तुम ए दिलदार होली में.
रसा गर जामे-मय ग़ैरों को देते हो तो मुझको भी,
नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में.
-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
Add comment March 2, 2007
फलस्तीन के बारे में एक छोटी सी भूमिका
रेयाज़-उल-हक
इसे नक्शे पर खोजने का मतलब है
खोजना खून और मांस के लोथड़े
जो सड़कों पर जम गये हैं
और बदबू दे रहे हैं.
शब्दकोशों में यह शब्द
एक अपमान की तरह आता है
दस्तावेज़ इसे दरसाते हैं
एक वेदना के रूप में
इतिहास निरंतर सिमटती जाती
किन्हीं लकीरों के बारे में बताता है.
मत खोजो
मत खोजो फलस्तीन को
बाहर
यह मौज़ूद है
फलस्तीनियों के दिमाग में
वहां पल रह है
यह एक स्वप्न की तरह
अंतहीन संघर्ष
और विजय के संकल्प के साथ
आज़ादी के लिए.
Add comment March 2, 2007