Archive for March 22nd, 2007

फांसी लाहौर की

भगत सिंह की फांसी पर विदेशों में क्या प्रतिक्रिया हुई थी, इसकी एक झलक डेली वर्कर की इस रिपोर्ट से मिल जाती है.


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बसंती चोले का बसंत

भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत के दिन हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उन सबकी याद में कहां क्या हो रहा है और उन के लिए देश के दिल में कितनी तड़प है. पेश है प्रो चमनलाल का आलेख, प्रभात खबर से साभार


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हमें भगत की शहादत पर गर्व है

भगत सिंह की 76 वें शहादत दिवस पर पढें उनकी शहादत पर लिखी पेरियार की टिप्पणी. इसमें गांधी की मूर्ति, जिन्होंने बना रखी हो उनकी, टूटती है और गांधी का बदसूरत रूप सामने आता है. भगत सिंह पर एक बहस लेकर हम जल्दी ही हाजिर होंगे, मगर उसके पहले कुछ अहम दस्तावेज़.


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एक कवि जिहादी की अंतिम दिनलिपि


पढें पहली किस्त.
दूसरी किस्त
केन सारो वीवा
मूवमेंट फॉर द सर्वाइवल ऑफ़ द ओगोनी पीपुल (मोसप) के नेतृत्‍व में ओगोनी ने चुनाव का बहिष्कार किया था. लापरवाही से कागज़ पर कुछ लिखने से पहले मैंने अपने वकील से मिलने देने के लिए कहा. यह आग्रह, जैसी मुझे उम्मीद थी, अस्वीकर कर दिया गया. यह अच्छी तरह जानते हुए कि यह कभी इस्तेमाल नहीं होगा, बगैर बतंगड़ के मैंने कलम संभाला और वह आवश्यक बयान लिख दिया. मैंने घुमा कर दस्तखत कर दिया.
एक खूबसूरत जवान औरत, जो एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थी, मैंने जो बयान दिया था, जल्दी ही उसे देखने आयी. उसने उसे पढा़, लगा कि वह संतुष्ट नहीं हुई है और फिर बगलवाले अपने परदेदार दफ़्तर में, उसने मुझे लकडी़ की एक जर्जर कुरसी पेश की. कितनी भली है, मैंने सोचा. बयान लेकर वह गायब हो गयी. मुझे पाइप के साथ रहने दिया. मैंने उसे झाडा़, जलाया और गहरा कश खींचा. मेरा मन पंख के सहारे उड़नेवाले पंछी की तरह उड़ने लगा.
युवा महिला कमरे में वापस आयी और उसने मुझे अपने साथ मुख्य इमारत में चलने के लिए कहा. जैसे ही मैंने खुले अहाते को पार किया, मैंने एक फुसफुसाहट सुनी कि मुझे कारावास के लिए लागोस ले जाया जायेगा. यह ऐसी कोई बात नहीं थी, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी. संभाव्य घटना के लिए मैं अपने को मजबूत बनाने लगा. उसी समय मुझे ख्याल आया कि दिन भर मैंने खाना नहीं खाया.
हम मुख्य इमारत की पहली मंज़िल की अंधेरी, गंदली सीढ़ियां चढ़ कर आये. लटकते हुए सूती कपड़े पहने हुए एक वरिष्ठ अधिकारी के सामने मुझे ले जाया गया. अपने काम के टेबुल से काफ़ी दूर उन्होंने मुझे एक सीट दी. मैं वहां बैठा रहा, जबकि वहां काफ़ी दूसरे पुलिस अधिकारियों की आवाजाही बनी रही. साज़िशाना ढंग से उन्होंने वरिष्ठ अधिकारी के कान में फुसफुसाया और उन्होंने भी फुसफुसा कर आदेश दिया. प्रसन्न होकर मैं उन्हें देखता रहा. वे लोग क्या योजना बना रहे हैं, उसका अगर मुझे पता होता तो वह मुझे मज़ाकिया लगता इसमें मुझे शक है.
मानों अनंतकाल तक इंतज़ार के बाद, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने मुझे बताया कि चुनाव के दिन ओगोनी में उपद्रव हुआ है. मैंने कहा, यह मेरे लिए खबर है, क्योंकि उस दिन मैं वहां से 1000 मील दूर रहा और ओगोनी के आसपास कहीं नहीं था. मैंने उन्हें उस सूचना के लिए धन्यवाद दिया. उसके बाद जब मैं पचा रहा था तो लंबी चुप्पी बनी रही. मैंने कमरे के चारों ओर देखा. एक बड़ा-सा लिखने को टेबुल पूरा गद्देदार कुरसी का परिपूरक तथा दो-तीन फ़ाइल रखनेवाली आल्मारियों लायक ही वह बड़ा था. डेस्क पर बैठा आदमी, पेंसिल की तरह छरहरा और टेढे़मेढे़ नाक-नक़्शवाला था. यह काफ़ी भद्दा दिख रहा था और उसका आचरण काफ़ी अशोभनीय था. समय काटने के लिए मैं उससे बातचीत करने की कोशिश करने लगा.
‘मैं समझता हूं आप मुझे लागोस भेज रहे हैं.’
‘आपको किसने कहा?’
‘एक चिड़िया ने.’
‘क्या?’
‘हवा ने.’
‘मैं आपको लागोस नहीं भेज रहा हूं.’
झूठा कहीं का. उसके झूठ बोले होठों पर मैं घूंसा मारना चाहता था. मैंने अपनी पाइप निकाली, एक तीली जलायी और खींचने लगा. हवा में धुआं नाचने लगा और ऊपर छत की ओर बढ़ा.
‘दिन भर मैंने कुछ भी नहीं खाया’- मैंने कहा.
उसने अपने कपड़े के भीतर से गरी का एक टुकडा़ निकाला, उसे दो टुकडा़ किया और मुझे आधा दिया. मैंने उसे अस्वीकार कर किया. उसने अपने आधे में दांत गड़ाया और चबाता रहा.
पढें अगली बार अगली किस्त.


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