दूसरा सिंगूर न बन जाये लोहंडीगुड़ा

March 24, 2007

आलोक देश के उन प्रतिबद्ध और संवेदनशील पत्रकारों में से हैं जिनके लिए कोई घटना सिर्फ़ घटना नहीं होती, प्रक्रियाओं का एक समुच्च्य होती है. आलोक अपने समय के प्रति बेहद चिंतित रहनेवाले लेखक हैं. बीबीसी के लिए लिखते रहे हैं. अभी बस्तर पर लिख रहे हैं. हाशिया के पाठकों के लिए भी अब निरंतर लिखेंगे. इस सिलसिले में पहली कडी़, बस्तर से ही. इसमें हम सिंगुर और नंदीग्राम की आहटें सुन सकते हैं.

लोहण्डीगुड़ा से लौटकर आलोक प्रकाश पुतुल

बस्तर के लोहण्डीगुड़ा में टाटा स्टील की भट्ठियां चाहे जब जलें, इस इलाके के गांव अभी से धधक रहे हैं. टाटा की प्रस्तावित स्टील प्लांट के लिए बंदूक की नोक पर ही सही भूविस्थापितों की कथित ग्रामसभा के बाद लगता था कि अब टाटा का रास्ता साफ हो गया है लेकिन विरोध के स्वर लगातार तेज होते जा रहे हैं. टाटा स्टील प्लांट के पक्ष में सब कुछ ठीक-ठाक होने के लाख दावे किये जायें, लेकिन सच यह है कि जगदलपुर से लोहंडीगुड़ा तक टाटा के खिलाफ सिंगुर जैसा माहौल बन रहा रहा है, जहां लोग मरने-मारने के लिए तैयार हैं.
सरकार की पहल पर पिछले साल 20 जुलाई और 3 अगस्त को भी लोहंडीगुड़ा के 10 ग्राम पंचायतों की ग्रामसभा करवायी गयी थी, लेकिन गांव वालों की मानें तो ऐसी कोई ग्रामसभा गांव में हुई ही नहीं. ग्रामसभा के दिन इलाके को पुलिस छावनी में बदल दिया गया और प्रस्तावित टाटा स्टील प्लांट का विरोध करनेवालों को पहले पुलिस ने अपनी हिरासत में ले लिया.
कुम्हली, छींदगांव के एक चौराहे पर अपने बुजुर्ग साथियों के साथ अपना दुख-सुख बांटते हुए गांव के नड़गू कहते हैं-’ग्रामसभावाले दिन हमें बुलाया गया और एक-एक परची दे कर एक डब्बे में डालने को कह दिया गया. इसके बाद हमारे अंगूठे के निशान ले लिये गये.’
नड़गू दावा करते हैं कि उन्हें टाटा के प्रस्तावित संयंत्र की स्थापना की शर्तों को लेकर कोई बात नहीं बतायी गयी और न ही उनकी कोई राय ली गयी.
गांव के ही बेनूधर बताते हैं कि गांव में सबको बताया गया कि जिनके भी नाम वोटर लिस्ट में हैं, वे सभी लोग ग्राम सभावाली जगह पर पहुंच जायें. इसके बाद वोट डालने की तरह पूरी ग्राम सभा की प्रक्रिया निपटा दी गयी. इस वोट डालने की कार्रवाई में वैसे लोग भी शामिल थे, जिनकी जमीन इस प्रस्तावित स्टील प्लांट के लिए लेने का कोई प्रस्ताव ही नहीं था. गांव के बुजुर्ग इस मुद्दे पर एकजुट हैं और उनकी सीधी मांग है कि टाटा स्टील सबसे पहले तो प्रस्तावित 2161 हेक्टेयर जमीन में से जो कृषि भूमि है, उसका उचित मुआवजा तय करे, प्रभावितों को नौकरी दे और इन सब से बढ़ कर यह कि इस प्रस्तावित स्टील प्लांट में उन्हें भी शेयर दे. प्रभावित गांववालों ने कथित ग्रामसभा के समय ही अपनी 13 सूत्री मांग सौंप दी थीं, लेकिन सरकार शायद इन मांगों पर गौर करने के मूड में नहीं है और अब जमीन अधिग्रहण करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी है. जाहिर है, गांववाले सरकार के इस कदम से नाराज हैं और आक्रोशित भी और आक्रोश भी ऐसा वैसा नहीं. लोहंडीगुड़ा विद्रोह में अपनी जान देनेवाले अजंबर सिंह ठाकुर के बेटे बल्देव सिंह ठाकुर अपने सफेद बालों में उंगलिया फिराते हुए कहते हैं- ‘जान दे
देंगे लेकिन टाटा को जमीन नहीं देंगे.’
सिंगूर से आनेवाली बयार को महसूस करनेवालों के लिए यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि बलदेव सिंह की चेतावनी के निहितार्थ क्या-क्या हो सकते हैं.
………………………………………………………..

भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया प्रारंभ

जिला प्रशासन द्वारा लोहंडीगुड़ा क्षेत्र में टाटा स्टील प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही प्रारंभ कर दी गयी है. रायपुर से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक में धारा 4 के प्रकाशन के उपरांत दाबापाल, बेलयापाल, धुरागांव व छिंदगांव में भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई प्रारंभ हो गयी है. दाबापाल में 213.59 हेक्टेयर, बेलर 213.95 हे. बेलियापाल में 141.68 हे., धुरागांव में 276.45 हे. व छिंदगांव 57.29 हे. भूमि के अधिग्रहण के लिए धारा-4 का प्रकाशन किया गया है. अनुसूचित क्षेत्र होने के कारण यह माना जा रहा है कि प्रदेश के राज्यपाल द्वारा भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई को स्वीकृति प्रदान की गयी होगी.
…………………………………….
क्या कहता है टाटा

सीमित विकल्पों के बावजूद इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि आवश्कताओं को न्यूनतम स्तर पर रख कर, भूखंड को सही स्वरूप देकर एवं भूखंड की सीमा के यथोचित निर्धारण के जरिये विस्थापन को न्यूनतम किया जाये.
इसके अनुरूप ही संयंत्र, जलाशय, स्लैग प्रबंधन स्थल एवं आवासीय क्षेत्र से संबंधित जरूरतों को पूरा करने के लिए कुल 2161 हेक्टेयर जमीन के लिए आवेदन किया गया।
यद्यपि परियोजना से प्रभावित परिवारों या लोगों की पहचान के लिए सर्वेक्षण किया जाना अभी बाकी है, खसरा अभिलेखों एवं बीपीएल-सर्वेक्षण के आधार पर प्रोजेक्ट से प्रभावित होनेवाले लोगों के संबंध में एक आकलन किया गया है. उपलब्ध आंकड़ों के प्रारंभिक विश्लेषण से यह अनुमान होता है कि अपनी 75 % से ज्यादा जमीन से वंचित होनेवाले प्रभावित जमीन मालिकों की संख्या लगभग 840 है और प्रभावित होनेवाले घरों की संख्या लगभग 225 है. यह पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास पैकेज छत्तीसगढ़ सरकार के पुनर्वास विभाग की मॉडल नीति 2005 के दिशानिर्देशों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है.
पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास का यह पैकेज माननीय मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ के समक्ष विगत 15 दिसंबर, 2005 को एवं जिला पुनर्वास समिति के सदस्यों के समक्ष 26 दिसंबर, 2005 को प्रस्तुत किया गया था.
जिला पुनर्वास समिति के सुझाव को ध्यान में रखते हुए, प्रशिक्षण एवं नियोजन से संबंधित प्रावधानों की यथासंभव व्याख्या की गयी है.
……………………………………..
जमीन का मुआवजा

भू-अधिग्रहण कानून के प्रावधानों के अनुरुप मुआवजा जिसमें तोषण, ब्याज तथा छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति, 2005 के अनुसार अनुग्रह राशि भी सम्मिलित है.
ऊसर जमीन- रु 50,000 प्रति एकड़, एकल फसलवाली असिंचित जमीन- रु. 75,000 प्रति एकड़, दोहरी फसलवाली सिंचित जमीन- रु. 100,000 प्रति एकड़.

(पैनोस साउथ एशिया अध्ययन का हिस्सा)


Entry Filed under: आओ बहसियाएं, खबर पर नज़र. .


RSS news from bbchindi.com

Recent Posts

calander

March 2007
M T W T F S S
« Feb   Apr »
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031  

Blogroll

Archives

Recent Comments

विरोधी दंगों की आंच … on नंदीग्राम नरसंहार के साक्…
बंगाल में वाममोर्चा … on यह ठीक-ठीक एक युद्ध है और हर प…
क्रिकेट कार्निवाल मे… on बंगाल में पोंगापंथ
चन्द्रिका on आइए, हम अंधेरे समय से बाहर…
चन्द्रिका on आइए, हम अंधेरे समय से बाहर…