जज़ साहब, मुसलमान एक आबादी नहीं, एक दर्द का नाम है!

April 8, 2007

मित्र अविनाश के मोहल्ले पर अल्पसंख्यकों को लेकर बहस छिडी़ हुई है. हाशिया के पाठकों के लिए यह बहस मोहल्ला से साभार. आप भी इसमें हिस्सा लें.

आरफा ख़ानम शेरवानी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज़ के फैसले पर बात करने को बहुत कुछ है, जिसने एक जज़ की तरह नहीं, बीजेपी के एजेंट की तरह फ़ैसला सुनाया। आज न्‍यूज़ रूम में काम करते हुए एक ज़ि‍म्‍मेदार पत्रकार की ज़बान से सुनने को मिला कि ये वही जज़ हैं, जिनके बेटे को बीजेपी की सरकार के वक्‍त पेट्रोल पंप मिला था। बहरहाल इस अंतर्कथा में फिर खिलौना मुसलमान ही हैं और खिलाड़ी राजनीतिज्ञ। एनडीटीवी इंडिया की एंकर-पत्रकार आरफा भी ये बता रही हैं कि इस मुल्‍क़ में मुसलमान होने का मतलब एक खिलौना होना ही तो है।

उत्तर प्रदेश के एक मामूली से मदरसे के मुक़दमे ने राख में दबी उस चिंगारी को फिर से हवा दे दी… और एक बड़ी बहस को फिर से ताज़ा कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदरणीय न्‍यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के 11 जज़ों की बात को ग़लत बताते हुए फ़ैसला सुनाया, कि आज से मुसलमान अल्‍पसंख्‍यक नहीं रहेंगे। हालांकि फ़ैसले पर तो 24 घंटे के अंदर ही रोक लग चुकी है, लेकिन बहस पर नहीं।

ये अल्‍पसंख्‍यक है क्‍या? अल्‍पसंख्‍यक अपने आप में कोई ओहदा नहीं, जिसको सज़ा के तौर पर जज़ साहब ने छीन लिया, जिसके छीन लिये जाने पर मुसलमान खुदकुशी कर ले। बल्कि ये एक दर्द है, एक कसक, एक ऐसी टीस जो आज़ादी के 60 सालों बाद भी उसी तरह सालती है। इसी राष्‍ट्र के 17 करोड़ बाशिंदों ने अपना बचपन, अपनी जवानी, अपना बुढ़ापा, अपना ख़ून, अपना पसीना और अपनी मोहब्‍बत इस माटी को दिया, लेकिन ऐसा ही एक फ़ैसला उन्‍हें पराया-सा बना देता है। अपने ही मुल्‍क में बेगाना।

सवाल यहां ये पैदा होता है कि ये एक शब्‍द क्‍या इस समुदाय के उन तमाम लोगों को एक साथ जोड़ देता है, जिनका एक दूसरे से कभी कोई सरोकार नहीं रहा? जिन्‍होंने कभी एक दूसरे को देखा तक नहीं और शायद कभी न देखें। या‍ फिर उन पड़ोसियों, उन दोस्‍तों से एकदम बेगाना, जिनसे हर पल का साथ है, जिनसे सुख-दुख का साथ है।

अगर मुसलमान उत्तर प्रदेश में अल्‍पसंख्‍यक बने रहते, तो ऐसा नहीं‍ कि इसमें उनका कोई बहुत बड़ा फायदा है। यूपी की किसी भी सरकार ने उन्‍हें वोट बैंक से ज़्यादा कभी कुछ नहीं समझा। कभी सद्दाम हुसैन के मुद्दे पर भड़काया, तो कभी मोहम्‍मद साहब के कार्टून पर रुलाया। लेकिन कभी उनके घरों में जाकर नहीं देखा कि चूल्‍हा जला या नहीं। पढ़ते हुए बच्‍चों के लिए बिजली है या नहीं। या फिर पढ़ने के लिए किताबें हैं या नहीं।

अल्‍पसंख्‍यक के नाम पर मुसलमानों को अपने शैक्षिक संस्‍थान खोलने की इजाज़त है, जिसमें सरकार की तरफ से नाम को ही मदद मिलती है। माइनॉरिटी फाइनांसियल कॉर्पोरेशन के तहत छोटे-मोटे कारोबार करने के लिए क़र्ज़ मिलता है। स्‍कूल में पढ़ने वाले बच्‍चों को छात्रवृत्ति मिलती है।

आदरणीय जज़ साहब ने शायद फ़ैसला सुनाने से पहले ये भी नहीं सोचा कि ये एक मुजरिम को सुनायी गयी कोई सज़ा नहीं, बल्कि सवाल है इसी मुल्‍क में सांस लेने वाले तीन करोड़ लोगों का। देश के सबसे ग़रीब तबके के उन लाखों बच्‍चों के कल का, जिनकी जेब में भले ही कुछ न हो, लेकिन दिल में चाहत है। किसी बहुसंख्‍यक बच्‍चे की ही तरह एक शमां जलती है पढ़-लिख कर कुछ कर दिखाने की। हो सकता है वो एक मामूली सी स्‍कॉलरशिप चाहत की इस शमां को और रौशन कर दे। या फिर ये मदद न मिलने की हालत में फिर से बन जाएं कुछ और अनपढ़ बच्‍चे, बेरोज़गार-सहमी हुईं नस्‍लें, जिनकी 21वीं सदी के हिंदुस्‍तान की कामयाबी में कोई हिस्‍सेदारी नहीं। जो सिर्फ दुनिया के नक़्शे पर भारत को एक बहुत बड़ी आबादी वाला देश बनाते हैं, बड़ी कामयाबी वाला देश नहीं। वो सिर्फ एक तादाद हैं, इंसान नहीं।

तकनीकी तौर पर देखा जाए, तो

- अल्‍पसंख्‍यक के दर्जे को तय करना सरकार का काम है, न कि अदालतों का।

- अदालत के सामने मुक़दमा ये नहीं था कि मुसलमान अल्‍पसंख्‍यक हैं या नहीं। बल्कि एक छोटे से मदरसे की ग्रांट का मामला था, इसलिए इस तरह की टिप्‍पणी करना अपने आप में ग़ैरज़रूरी था।

- और ऐसा करने की अगर कोई ज़रूरत भी आन पड़ी थी तो इस तरह के गंभीर मसलों को एक जज के फ़ैसला देने के बजाय मामले को कंस्‍टीट्यूशन बेंच को रेफर करना चाहिए था।

- सुप्रीम कोर्ट के पढ़े-लिखे तजुर्बेकार 11 जज़ एक बार ये फ़ैसला दे चुके थे और सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग मानने के लिए तमाम लोअर और हाई कोर्ट बाध्‍य होते हैं।

- और इस सबसे कहीं महत्‍वपूर्ण है वो वक़्त जब ये फ़ैसला सुनाया गया। असली मुद्दों से ध्‍यान हटाने के लिए इससे बेहतर मौक़ा हमारी मौक़ापरस्‍त पार्टियों को नहीं मिल सकता था।

जज़ साहब का कहना था कि सरकार मुसलमानों के साथ वही सुलूक करे जो बाक़ी सबके साथ किया जाता है। हमें जज़ साहब की अक़्ल पर कोई शक़ नहीं, तो क्‍या शक़ करें प्रधानमंत्री की अक़्ल पर, जिन्‍होंने मुसलमानों की बदतरीन हालत देखते हुए सच्‍चर कमेटी का गठन किया! क्‍या शक़ करें इस कमेटी के नतीजों पर, जो कहते हैं कि मुसलमान दलितों से भी पिछड़े हैं! और मुसलमानों की तो कोई रफ्तार ही नहीं! क्‍या करें अब उन सिफारिशों का, जिनमें हर मंत्रालय और हर सरकारी विभाग में 15 फीसद बजट अलग करने की बात कही गयी है!

शायद जल्‍दबाज़ी में जज़ साहब ये सब नहीं सोच पाये, क्‍योंकि इलाहाबाद अदालत में उनका ये आख़‍िरी दिन था। 9 अप्रैल से उन्‍हें लखनऊ की अदालत में कुछ ऐसे ही फ़ैसले सुनाने होंगे।

मैंने इस फ़ैसले का एक अच्‍छा पहलू भी देखने की कोशिश की। मान लें अगर मुसलमान अल्‍पसंख्‍यक नहीं… और सरकार और समाज उनके साथ्‍ज्ञ वैसा ही सुलूक करे, जो बहुसंख्‍यकों के साथ किया जाता है, तो क्‍या फिर से नहीं बनेगा असम नल्‍ली शहर, जहां 48 घंटे अंदर 3000 लोगों का क़त्‍ल हुआ… और नहीं देखनी पड़ेगी गुजरात जैसी त्रासदी! क्‍या फिर से नहीं जलेंगे घर, नहीं होंगे राहत शिविर, नहीं होना पड़ेगा अपने ही देश में शरणार्थी!

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