डॉ आंबेडकर और व्यक्तिगत स्वाधीनता
प्रकाश लुईस
‘एक बहुत ही नई घटना की सूचना जयपुर रियासत में चकवारा से मिली है। समाचार पत्राों में छपी सूचना से पता चलता है कि चकवारा के एक अछूत ने, जो तीर्थ यात्राा के बाद घर लौटा था, अपने धार्मिक अनुष्ठान को पूरा करने के लिए गाँव के अपने अछूत भाईयों को भोज देने की व्यवस्था की थी। मेजबान की इच्छा थी मेहमानों को बहुमूल्य भोजन खिलाया जाए और उसमें घी से युक्त व्यंजन भी परोसे जाएं। किंतु जिस समय अछूत लोग भोजन कर रहे थे, तभी सैकड़ों की संख्या में हिन्दू लाठियाँ लेकर वहाँ आए, भोजन को खराब कर दिया और अछूतों को बुरी तरह पीटा। परोसे गए भोजन को छोड़ मेहमान अपनी जान बचाने के लिए भाग गए। निस्सहाय अछूतों पर ऐसा प्राण घातक आक्रमण क्यों किया गया? इसका कारण जो बताया है, वह यह था कि अछूत मेजबान इतना धृष्ट था कि उसने घी का प्रयोग किया और उसके अछूत मेहमान इतने मूर्ख थे कि वे उसे खा रहे थे।`
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डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा- घी नि:संदेह अमीरों के लिए बिलास की वस्तु है। किंतु कोई भी यह नहीं सोचेगा कि घी ऊंचे सामाजिक स्तर का प्रतीक है। चकवारा के हिन्दुओं ने इसका दूसरा अर्थ लिया और इन अछूतों द्वारा उनके साथ की गई गलती के लिए हिन्दुओं के धार्मिक क्रोध में उनसे बदला लिया, जिन्होंने अपने भोजन में घी परोसकर उनका अपमान किया था। उन्हें यह जानना चाहिए था कि वे हिन्दुओं के सम्मान की बराबरी नहीं कर सकते। इस तरह १९४० में जाति-व्यवस्था का बोलबाला और जाति-उन्मूलन पर लिखते हुए डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय सामाजिक संरचना, व्यक्ति और विभिन्न समूहों का स्थान एवं भूमिका पर प्रकाश डाला था। विशेषकर जातिवाद पर निर्मित भारतीय समाज में व्यक्तिगत स्वाधीनता को कुचलने और कुछेक समूहों की आत्मनिर्भरता को नकारने का घिनौना विचार एवं व्यवहार पर डॉ. अम्बेडकर ने तीखा प्रहार किया था।
यह सर्वविदित है कि डॉ. अम्बेडकर के सिद्धांतों ने पूर्णतया दलित समूह के हर प्रयत्न में प्रभावी भूमिका निभायीं विशेषकर दलित अस्तित्व निर्माण, दलित संघर्ष एवं दलित मुक्ति आन्दोलन। डॉ. अम्बेडकर को यह स्पष्ट रूप से मालूम था कि जाति व्यवस्था पर आधारित भारतीय समाज में व्यक्ति प्रमुख नहीं। यहाँ पर मात्रा समूह की बुनियाद है, यह इसलिए कि हर भारतीय अपनी जाति में जन्म लेता है, जीवनयापन करता है, उसका विवाह उसी जाति के तहत् संभव है और वह उसी जाति में स्वर्गवासी होता है। इसलिए डॉ. आंबेडकर ने व्यक्तिगत स्वाधीनता एवं स्वतंत्राता पर जोर दिया था, ताकि जाति व्यवस्था का नाश हो और हर व्यक्ति अपने बलबूते पर अपना जीवनयापन करें न कि किसी समूह के दबाव से प्रेरित होकर।
यहाँ इस तथ्य को रखने की आवश्यकता यह है कि डॉ. अम्बेडकर ने व्यक्तिगत स्वाधीनता को कोई हवामहल में ढूँढ़ने का प्रयत्न नहीं किया था। कई सारे मनोवैज्ञानिक आदमी की स्वतंत्राता को सामाजिक संरचना से अलग कर देखते हैं। इनकी तुलना में डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय परिवेश में व्यक्तिगत स्वाधीनता को हिन्दू समाज के विभिन्न आयामों के अधीन परखने की कोशिश की थी। इतना ही नहीं, डॉ. अम्बेडकर ने व्यक्तिगत स्वतंत्राता को जाति समूह एवं जाति समूह पर आधारित धंधा-पेशा एवं इससे उत्पन्न सामाजिक संबंध आदि की पृष्ठभूमि में विश्लेषण किया था।
अपने अनगिनत लेखों और वक्तव्यों में डॉ. अम्बेडकर ने यह दर्शाया कि दलितों की व्यक्तिगत स्वाधीनता नामक कोई चीज नहीं। दलितों का जीवन एवं अस्तित्व मात्रा सवर्णों के लिए है। सवर्ण जाति ही तय करती है दलितों के व्यवसाय, धंधा, जीवन-मरण, खान-पान, विचार-व्यवहार आदि। दलितों के जीवन के हर आयामों की सीमा सवर्ण ही निर्धारित करते हैं। इस विषय में कि दलित क्यों मरे हुए पशुओं की खाल निकालते हैं और उसका माँस खाते हैं? सवाल का उत्तर देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने विश्लेषण किया था- “दलितों के इस व्यवहार से घृणा करने वाले सवर्ण जाति कई बुनियादी सवाल नहीं उठाता है। अस्पृश्य सड़ा-गला माँस क्यों खाते हैं? क्या अस्पृश्यों को हिन्दू इस बात की छूट देंगे कि वे उनके मृत पशुओं को उठाना और उनकी खाल उतारना बंद कर दें?” इन सवालों के जवाब में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, यदि ताजा माँस उपलब्ध हो तो कोई भी सड़ा-गला माँस खाना पसन्द नहीं करेगा। अस्पृश्य सड़ा-गला माँस खाकर जिंदा रहते हैं, इसका कारण यह नहीं है कि वे इसे पसन्द करते हैं। सड़ा-गला माँस इसलिए खाते हैं कि उनके पास जिन्दा रहने के लिए कोई साधन नहीं है। सभी धंधों के द्वार उनके लिए बन्द होते हैं। दूसरा, यदि अस्पृश्य लोग हिन्दुओं के मृत पशुओं को उठाते हैं, तो उन्हें विवश होकर ऐसा करना पड़ता है। यदि वे ऐसा करने से इन्कार करते हैं तो उन पर जुर्माना किया जाता है। कुछ प्रांतों में इस घिनौना काम को करने से इन्कार करना दंडनीय अपराध है और जुर्माना किया जा सकता है।
अपने विश्लेषण को आगे जारी रखते हुए डॉ. अम्बेडकर ने लिखा था कि महाड़ में अस्पृश्यों के सम्मेलन में संकल्प लिया गया था कि न तो अस्पृश्य हिन्दुओं के मृत पशुओं की खाल उतारेगा, न ही उसे उठाएगा और न उसके सड़े-गले माँस को खाएगा। इन संकल्पों का दोहरा उद्देश्य था। एक तो यह था कि अस्पृश्यों में आत्म-सम्मान और आत्म-प्रतिष्ठा का भाव जगाया जाए। यह गौण उद्देश्य था। प्रमुख उद्देश्य था, हिन्दू समाज-व्यवस्था पर करारा प्रहार। हिन्दू समाज-व्यवस्था श्रम के विभाजन पर टिकी है। वह हिन्दुओं के लिए स्वच्छ और सम्मानजनक धंधे आरक्षित करती है और धिनौने तथा घटिया धंधा अस्पृश्यों के मत्थे मढ़ती है। अपने इस विश्लेषण से डॉ. अम्बेडकर ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक संरचना लोगों के स्थान एवं भूमिका तय करती है। दूसरा, जहाँ कुछ लोग समाज के हर आयामों पर कब्जा जमाकर संसाधन, सत्ता और शक्ति के बल पर दूसरों को वंचित रखते हैं, तब यह वंचित समूह हर प्रकार के घटिया एवं घिनौना काम करने के लिए बाध्य किए जाते हैं। चूंकि यह वंचित समूह समाज में सबसे ज्यादा तिरस्कृत और घिनौने काम में लगे रहने को बाध्य किए जाता है, उनका व्यक्तित्व कुंठित एवं निकृष्ट हो जाता है। इस प्रकार के कुंठित एवं निकृष्ट व्यक्तित्व में स्वाधीनता या स्वतंत्राता की गुंजाईश नाममात्रा भी नहीं है। जब सारी के सारी व्यवस्थाओं ने अस्पृश्यों के कुंठित व्यक्तित्व को उनका स्वभाव माना था, डॉ. अम्बेडकर ने इस प्रकार के विचार और व्यवहार का कारण सामाजिक संरचना में ढूंढ़ निकाली थी।
एक और उदाहरण के जरिए डॉ. अम्बेडकर ने दलितों को मान-सम्मान से किस प्रकार वंचित रखा जाता है, इसका जिक्र किया। अम्बेडकर का कहना है मनु की धर्म व्यवस्था इन्हें मान-सम्मान से जीने से वंचित रखती है। मनु के धर्म के दैनिक प्रचार-प्रसार की विषैली छूत, पुरूष हो या स्त्राी, बच्चा हो या बूढ़ा, सबके मानस में घुस गई है। यह न्यायाधीशों के मानस में भी घुस गई है। कलकत्ता के एक समाचार के अनुसार, नौबिन नामक एक अस्पृश्य पर बकरी की चोरी करने के इल्जाम में मुकदमा चलाया गया। उसका दोष सिद्ध नहीं हुआ। उसने वादी के खिलाफ मानहानि के लिए फरियाद की। मजिस्ट्रेट ने उसकी फरियाद को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह तो निम्न जाति का है, उसका कोई मान है ही नहीं। इस पर उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि उसका दृष्टिकोण गलत है और दंड प्रक्रिया के अधीन सभी व्यक्ति समान हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि मजिस्ट्रेट को कहाँ से यह भान हुआ कि अस्पृश्य का कोई मान नहीं होता है? निश्चय ही ‘मनुस्मृति` के उपदेश से। इस तरह दलितों को हिन्दू समाज के तहत् कोई सम्मान नहीं है। हिन्दू धर्म के ग्रंथों ने इस आशय की वकालत की थी। हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म में दलितों और वंचितों को गुलाम, निर्बल एवं निचला बनाए रखने के ऐतिहासिक षड्यंत्रा पर डॉ. अम्बेडकर ने लगातार वार किया था। इतना ही नहीं, जब सब कोई जाति व्यवस्था में सुधार लाने की जरूरत पर जोर दे रहे थे, तो डॉ. अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था को जड़-मूल उखाड़ फेंकने की पेशकश की थी।
यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. अम्बेडकर ही भारतीय इतिहास में पहला ऐसा शक्स है, जिसने जाति प्रथा के प्रभाव को उसके बहुआयामी स्वरूप में पहचाना था। उन्होंने कहा -”हिन्दुओं की नीति और आचार पर जाति प्रथा का प्रभाव अत्याधिक सोचनीय है। जाति प्रथा ने जन-चेतना को नष्ट कर दिया है। उसने सार्वजनिक धर्मार्थ की भावना को भी नष्ट कर दिया है। जाति प्रथा के कारण किसी भी विषय पर सार्वजनिक सहमति का होना असंभव हो गया है। हिन्दुओं के लिए उनकी जाति ही जनता है। उनका उत्तरदायित्व अपनी जाति तक सीमित है। उनकी निष्ठा अपनी जाति तक सीमित है। गुणों का आधार भी जाति ही है और नैतिकता का आधार भी जाति ही है। जो व्यक्ति उनकी जाति के नहीं होते तो उनके प्रति सहानुभूति नहीं होती। दुखियों की पुकार का कोई जवाब नहीं है। आदमी कैसा भी हो, सही या गलत, अच्छा या बुरा, बस अपनी जाति का होना चाहिए।”
इस तरह डॉ. अम्बेडकर ने जाति प्रथा को हिन्दू समाज पर लगाम कसती जंजीर के रूप में देखा। अपने इस विश्लेषण को आगे जारी रखते हुए उन्होंने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया, ‘क्या हिन्दुओं ने अपनी जाति के हितों-स्वार्थों की रक्षा करने में अपने देश के प्रति विश्वासघात नहीं किया है?`
डॉ. अम्बेडकर ने अपने मन में व्यक्तिगत स्वाधीनता को रखकर ही हिन्दू समाज पर वार किया था। उनके लिए व्यक्तिगत स्वतंत्राता मूलभूत अधिकार की बुनियाद थी। इसलिए व्यक्तिगत स्वाधीनता को भी राष्ट्रीय मूल्य के लिए वे बलि चढ़ाना नहीं चाहते थे। इसी तरह एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. अम्बेडकर ने दलितों और दबे हुए के दृष्टिकोण से न केवल व्यक्तिगत स्वाधीनता की वकालत की, अपितु इन वंचित वर्गों की स्वाधीनता एवं स्वतंत्राता पर भी विशेष जोर दिया था। भारतीय परिवेश में उन्हें यह अनुभव था कि व्यक्तिगत स्वाधीनता भले सवर्णों के लिए हो सकती है, गरीब-गुर्बा के लिए नहीं।
डॉ. अम्बेडकर के विषय में लिखते हुए डॉ. रामविलास शर्मा यह कहते हैं- “दिसम्बर १९४२ के रेडियो भाषण में अम्बेडकर ने स्वाधीनता, समानता और भाईचारा इन तीन सूत्राों का उद्भव फ्रांसीसी क्रांति में देखा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये नारे अमल में नहीं लाए गए, इसलिए मजदूर वर्ग घाटे में रह गया। उन्होंने कहा कि मजदूर के लिए स्वाधीनता का अर्थ है जनता के द्वारा शासन, मजदूर वर्ग के लिए समानता का अर्थ है सबको काम करने के लिए समान अवसर मिले और राज्य सत्ता का कर्त्तव्य है, प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकताओं के अनुसार विकास के लिए सारी सुविधाएं प्रदान करंे। मजदूरों के लिए समानता का अर्थ है, नागरिक सेवाओं और फौज से लेकर व्यापार और उद्योग धंधों तक हर तरह के विशेषाधिकार खत्म किए जाएं, वे सारी चीजें खत्म हो जाएं जिनसे असमानता पैदा होती है।”
लेकिन यह कहकर रूक जाना कि डॉ. अम्बेडकर ने जाति उन्मूलन की बात की, ताकि दलितों, दबे-कुचलों को स्वाधीनता मिले, वास्तविकता को तोड़-मरोड़ करने के बराबर होगा। डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनगिनत लेख एवं भाषणों में वैकल्पिक समाज बनाने के लिए जो बुनियादी मानवीय मूल्य हैं, उनकी भी जोरदार वकालत की थी।
अपने लेखन में एक और जगह पर डॉ. अम्बेडकर ने यह तर्क दिया था- “जिस समाज में कुछ वर्गों के लोग जो कुछ चाहें वह सब कुछ कर सकें और बाकी वह सब भी न कर सकें जो उन्हें करना चाहिए, उस समाज के अपने गुण होते होंगे, लेकिन इनमें स्वतंत्राता शामिल नहीं होगी। अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आम तौर पर स्वतंत्राता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना अधिक उचित होगा।” इस भांति डॉ. अम्बेडकर ने न केवल व्यक्तिगत स्वाधीनता एवं स्वतंत्राता पर जोर दिया, बल्कि वंचित वर्ग के दृष्टिकोण से वंचित समूहों की स्वाधीनता पर भी बल दिया था। यह इसीलिए कि भारतीय सामाजिक संरचना के तहत् शासक वर्ग के लिए न केवल व्यक्तिगत स्वाधीनता प्राप्त है, बल्कि उनके पास सत्ता और संसाधन हैं । उन्होंने अपने समाज को भी शक्तिशाली बना दिया, जिससे यह समूह जो चाहे उसे कर सकता है। साथ ही साथ यह समूह दूसरे समूहों को स्वतंत्राता से वंचित भी रख सकता है।
राजनीतिक लोकतंत्रा पर डॉ. अम्बेडकर की विवेचना से व्यक्तिगत स्वाधीनता के विषय में उनके विचारों को जाना जा सकता है। उनके अनुसार “;१द्ध व्यक्ति अपने आप में एक सिद्धी है, ;२द्ध व्यक्ति के कुछ अहरणीय अधिकार होते हैं, जिनकी गारंटी उसे संविधान द्वारा दी जाए, ;३द्ध कोई विशेषाधिकार प्राप्त करने की पूर्व शर्त के रूप में किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा न की जाए कि वह अपने संवैधानिक अधिकारों में से किसी अधिकार का परित्याग करे, ;४द्ध राज्य लोगों पर शासन करने के लिए गैर-सरकारी लोगों को शक्तियां प्रदान न करें।” इस तरह डॉ. अम्बेडकर ने व्यक्तिगत स्वतंत्राता पर विशेष जोर दिया था। लेकिन वे यहीं तक रूक नहीं गए, अगर किसी व्यक्ति को जीवन जीने की आवश्यक वस्तुएं प्रचुर मात्राा में उपलब्ध नहीं होतीं, तो स्वाधीनता के अधिकार ज्यादा मायने नहीं रखता है।
डॉ. अम्बेडकर राजनैतिक लोकतंत्रा तक ही अपना विचार सीमित नहीं रखते हैं। वास्तव में वे राजनैतिक लोकतंत्रा से ज्यादा सामाजिक लोकतंत्रा पर जोर देते हैं। उनके मुताबिक- “हमें अपने राजनैतिक लोकतंत्रा को सामाजिक लोकतंत्रा में तब्दील करना चाहिए। राजनैतिक लोकतंत्रा अधिक समय तक चल नहीं सकता अगर इसके आधार में सामाजिक लोकतंत्रा नहीं होता। सामाजिक प्रजातंत्रा का अर्थ क्या है? इसका मायने वे बुनियादी विचार और व्यवहार जो स्वतंत्राता, समानता और बन्धुत्व के मूल्यों पर आधारित हैं, ये तीनों अलग-अलग मूल्य नहीं हैं बल्कि प्रजातंत्रा को बनाए रखने में ये तीनों बराबर की भागीदारी निभाते हैं। समानता के अभाव में कुछ अपनी स्वतंत्राता का उपयोग कर दूसरों पर हुकूमत चलाने लगेंगे। जहाँ स्वाधीनता नहंीं है वहाँ समानता हर प्रकार की व्यक्तिगत प्रेरणा पर लगाम लगाता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बन्धुत्व के बिना स्वाधीनता और समानता अपने आप में सार्थक सिद्ध नहीं हो सकती हैं। इनको क्रियान्वित रखने के लिए किसी एजेंट या ताकत की जरूरत है। २६ जनवरी, १९५० के दिन हम विरोधाभास से भरी परिस्थिति में प्रवेश करेंगे। राजनैतिक क्षेत्रा में हम समानता पर चर्चा करेंगे, मगर सामाजिक और आर्थिक आयामों में हमें असमानता का सामना करना है। राजनीति में हम एक व्यक्ति और एक मत का पालन करेंे, मगर आर्थिक और सामाजिक क्षेत्राों में एक व्यक्ति और एक मूल्य को निरंतर नकारते रहेंगे। अब यह सवाल उठता है कि कब तक हम इन विरोधाभासों के साथ जीते रहेंगे? कब तक हम समाज के वंचित वर्ग को सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रा में समानता से वंचित रखते रहेंगे?”
डॉ. भीमराव अम्बेडकर का यह कथन अपने आप में स्पष्ट है और इस पर कोई टीका-टिप्पणी करने की जरूरत भी नहीं है। इस तथ्य को पुन: एक बार दुहराने की जरूरत है कि डॉ. अम्बेडकर ने प्रजातंत्रा को किसी सरकार के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक सामाजिक गठन के मार्फत देखा। इस सामाजिक गठन के तहत् इन्सान सभी प्रकार के बन्धन से मुक्त किए जाएंगे। इस लिहाज से डॉ. अम्बेडकर का व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वाधीनता की खोज बुर्जुआ राजनैतिक-सामाजिक सुधारकों से भिन्न है। उन्होंने दलित एवं पिछड़ों के दृष्टिकोण से व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वाधीनता की वकालत की थी। सवर्णों के लिए व्यक्तिगत स्वाधीनता अवश्य दूसरों पर हुकूमत चलाने का हथकंडा हो सकता है। लेकिन दलितों के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्राता तब ही सार्थक होगी, जब सम्पूर्ण दलित समुदाय आजाद हांे, छुआछूत, जाति प्रथा, निर्धनता, निर्बलता आदि सामाजिक बन्धनों से मुक्त हों।
अंत में यह कहना उचित है कि डॉ. अम्बेडकर से प्रेरित दलित व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वाधीनता का संघर्ष दोनों भौतिक एवं वैचारिक आयामों से निर्मित होते हैं। चूंकि दलित समूह रोजाना जिन्दगी के भौतिक क्षेत्रा से हू-ब-हू संलग्न है, इनकी स्वतंत्राता का संग्राम किसी दर्शन से प्रेरित नहीं होता। व्यवहार से उत्पन्न विचारों के सिद्धान्त पुन: उनके व्यवहारों को प्रेरित करता है। इसके फलस्वरूप भी क्यों दलित मुक्ति अब भी एक सपना ही रह गया है। इसका कोई सरल उत्तर नहीं है। बस यह अवश्य कहा जा सकता है कि दलित स्वाधीनता तब ही संभव है जब सवर्ण भी जाति प्रथा, सामन्ती विचार और व्यवहार, पुरूष प्रधान सोच एवं कार्य से मुक्त होंगे। दलित और सवर्ण कोई दो समाज के नहीं हैं भले जाति के आधार पर दो खेमों के क्यों न हो। इस लिहाज से सम्पूर्ण भारत के मुक्ति संग्राम तब ही संभव है जब व्यक्ति एवं पूरा समाज स्वाधीनता प्राप्त नहीं करते। डॉ. अम्बेडकर के कथनानुसार जब भारत के हर नागरिक और सम्पूर्ण समाज स्वतंत्राता, समानता और बन्धुत्व के आधार पर समाज और देश का निर्माण करेगा तब व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वाधीनता कारगर सिद्ध होगी। डॉ अम्बेडकर की जयंति इस दिशा की ओर समर्पित रहने के लिए आहवान करता है ।
Add comment April 14, 2007
