17 घुड़सवार और बांग्ला नववर्ष : कुछ लोग काफ़ी भ्रम में हैं

April 15, 2007

बांगला नववर्ष : वैश्वीक रण और स्थानीयता के बीच नए सिरे से उभरते संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में

विश्वजीत सेन
यह भी एक संयोग क ी ही बात है, कि नन्दीग्राम में घटित नरसंहार के विरोध में जब संपूर्ण बंगाल उफ ान पर है, तभी बांगला नववर्ष (बैसाख क ी पहली तारीख से शुरू होनेवाला मनाए जाने क ी तैयारियां चल रही है. इस एक घटना नन्दीग्राम के माध्यम से, वैश्वीक रण और स्थानीयता के बीच क ा संघर्ष जिस स्पष्ट से उभरता है, वैसा और कि सी घटना से नहीं.
दन्तेवाड़ा के आदिवासियों के बीच वर्ग विभाजन उस सीमा तक नहीं हुआ है, जिस सीमातक पश्चिम बंगाल के बांगलाभाषियों के बीच में. इसक ा मूल क ारण यह है कि बांगला भाषी आर्य आभामंडल के अंश हैं, और आदिवासी, जैसा कि सभी जानते हैं. अनार्य थे और आज भी हैं. बांगलाभाषियों के खून में भी द्रविड़, ऑस्ट्रो-मंगोलयेड, आदि तत्व संमिश्रित होते रहे. क र्णाटक के चंद्रवंशी क्षत्रिय सेन राज-परिवार ने बंगाल पर लंबे समय तक राज कि या. असम के वर्मा राज-परिवार ने बंगाल पर लंबे समय तक राज कि या. असम के वर्मा राज-परिवार जो मंगोल नस्ल के थे भी बंगाल पर राज कि ए. फि र भी, बंगाल ने सनातन हिन्दूधर्म के आगे पुरी श्रद्धा के साथ अपने क ो समर्पित कि या और बंगाल में वर्ग-विभाजन क ी शुरू आत उसी दिन से हुई, इसे मान लेने में क ोई हर्ज नहीं है. बांगला वर्षावली, लक्षण-संवत के नाम से जानी जाती है. लक्षण-संवत के अनुसार यह वर्ष १४१३ है. बांगला नव वर्ष जिस तर्ज पर मनाया जाता है, उसमें नए व्यवसायिक खाते क ी शुरू आत क ी प्रमुखता होती है. इसके अलावे इसी दिन बांगलाभाषी आपस में मिलते जुलते भी है तथा मिष्टान्न क ा विनिमय होता है. आम तौर पर, और खासक र ग्रामीण बंगाल में यह खुशीयाली क ा दिन है.
लक्षण सेन के शासनक ाल क ो बंगाल क ी उन्नति क ा क ाल माना जाता है. अनुमान कि या जा सक ता है, उन दिनों व्यवसाय में बंगाल ने हौले-हौले डेग भरना शुरू कि या था. व्यवसाय क ा माध्यम बिक ाऊ वस्तु होता है. वर्ग विभाजित समाज क ी एक खास बिडंबना यह होती है कि क ामोडीटी क ी लेनदेन में जितनी बढ़त होती है, क ामोडीटी के उत्पादक ों क ी बदहाली उतनी ही बढ़ती है. अत: इस बात पर आश्चर्यचकि त नहीं होना चाहिए कि लक्षण सेन के शासनक ाल क ा अंत, बंगाल पर बख्तियार खिलजी के आक्रमण से हुआ, जो के वल सत्रह घुड़सवार लेक र आए और लक्षण सेन क ी राजधानी लक्षणावती गौड़ पर क ब्जा क र लिए. जनता क ी बात दुर रही, सैनिक ों ने भी राजा क ा साथ नहीं दिया. लक्षण सेन अपने कि ले के पिछले दरवाजे से भाग पराए. बख्तियारपुर खिलजी क ा उद्देश्य बंगाल पर विजय पाना था. वह, निश्चितरू प से बंगाल में समता के सन्देशवाहक के रू प में नहीं आए थे. लेकि न उनक ी चढ़ाई के दौरान जनता तथा सेना क ी निष्क्रियता ने बख्तियार खिलजी क ी जीत क ो सहज बना डाला. आज क ा परिप्रेक्ष्य यह है कि बांगला नववर्ष मनाने क ा उत्साह दिनों दिन घटता जा रहा है. आज बांगला भाषियों के , खासक र उनके पढ़े लिखे तबके के बीच इसाई कै लेंडर अधिक लोक प्रिय है. वैसाख क ी पहली तारीख क ब गुजर गई होती है, कि सी क ो पता भी नहीं चलता. हां, चुकि वैसाख महीने क ी २५ वीं तारीख रवींद्रनाथ टैगोर के जन्मदिन के रू प में मनाई जाती है, और उस दिन क ाफ ी चहल-पहल रहती है, इसलिए दोनों दिवसों क ो एक ही साथ मना लेने क ी एक परम्परा भी चल पड़ी है. लेकि न, दूर-दराज के देहाती इलाक ों के ग्रामीण बंगालियों के बीच वैसाख महीने क ी पहली तारीख क ी वैधता आज भी बनी हुई है. छोटे-छोटे व्यवसायी, परचन के दुक ानदार तथा अन्य प्रक ार के लेनदेन क रनेवालों के बीच यह तारीख आज भी वैध है. इसी दिन विगत वर्ष के सारे बक ाए चुक ता क र दिये जाते हैं और नए खाते क ी शुरू आत क ी जाती है. ग्रामीण बंगाल, आर्थिक रू प से क मजोर लोगों क ा बंगाल, आज भी प्राचीन पर पहले ही जैसा अडिग है. यह एक दिलचस्प स्थिति है. एक ही भाषा-समूह के बीच दो कि स्म क ी वर्षगणनाएं एक ही भाषा-समूह के बीच व्यवसायिक लेनदेन क ो दुरू स्त क रने क ी दो तारीखें.उपर से यह बहुत ही साधारण घटना लगती होगी, लेकि न अगर हम आवरण के नीचे झोंेकेें , तो वैश्वीक रण और स्थानीयता के बीचएक द्वंद दिखाई देता है. ऐसी बात नहीं है कि ऐसा द्वंद पूर्व में अनुपस्थित था. इसी द्वंद क ा एक प्राचीन स्वरू प उसी दिन प्रगट हो गया, जिस दिन लक्षण सेन के पूर्वज बल्लासेन ने बंबाल में कु लीन-प्रथा क ा प्रचलन कि या. कु लीन प्रथा के अनुसार, हर जाति में कु छ खास पदवी वाले लोग कु लीन, माने जाने लगे और उसी जाति में बाक ी लोगों क ो उस पैदान से नीचे रखा गया. यह वर्णाश्रम के भीतर एक और वर्णाश्रम या, और निश्चित रू प से बिक ाऊ वस्तुओं के उत्पादन क ो बेरोक टोक चलने देना ही इसक ा मुख्य उद्देश्य था. अगर अभी भी कि सी व्यक्ति क ो इस बात से आश्चर्य होता है कि एक बाहरी व्यक्ति सत्रह घुड़सवारों क ो साथ लिए कै से संपूर्ण बंगाल क ो जीत लिया, तब मेरे पास आगे क हने के लिए कु छ बचता नहीं है. या शायद कु छ बचता भी है? नन्दीग्राम में हाल के दिनों जो घटना घटित हुई, उसे साधारण क हना शब्दों के साथ कं जूसी बरतनी होगी, लेकि न पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री, इस घटना क ी सारी जबाबदेही अपने उपर लेने के बावजूद पदत्याग नहीं क रेंगे. जी नहीं, वह पदत्याग नहीं क रेंगे. चुंकि एक मात्र वही हैं, जिन्हें ईश्वर ने यह सिंहासन बख्शा है, ताकि पश्चिम बंगाल क ा औद्योगीक रण हो सके . उनसे यह पूछने क ा अधिक ार कि सी क ो नहीं है कि टाटा और सलेम से गलबांही क रने के बजाय वह पश्चिम बंगाल के बंद पड़े क ल क ारखानों क ो क्यों नहीं खुलबाते?
वैश्वीक रण क ा रथ आगे क ी ओर अग्रसर है. इस रथ के चक्के के नीचे जो भी आएगा, उसे क ई दफे कु चला जाएगा. रथ क ो आगे बढ़ाने में जो लोग कं धा लगा रहे हैं, उनमें स्वयं क ो मार्क्सवादी क हने वाले लोग भी हैं, क्या यह एक चौंक ाने वाली बात नहीं हैं? लेकि न अगर उन्हें यह उम्मीद है कि स्थानीयता इतनी जल्दी मर जाएगी, तो इस सोच के एक जीते जागते क ाट के रू प में नन्दीग्राम क ा प्रतिरोध उठ खड़ा हुआ है. इसलिए, यह उम्मीद क रना अनुचित नहीं होगा कि पहली जनवरी के विरुद्ध वैसाख महीने क ी पहली तारीख जीवित रहेगी. ग्रामीण लोगों क ा, छोटे-छोटे व्यवसाय क रने वाले लोगों क ा खेत क ी आरी पर हाथ में लालटेन लटक ाए चलते लोगों क ा बंगाल जीवित रहेगा. वैश्वीक रण के अग्रसर होते रथ क ो वह सलाम नहीं क रेगा. खुद्दीराम बोस और सूर्य सेन क ा बंगाल वैश्वीक रण से समझौता नहीं क रने जा रहा है. क भी, सत्रह घुड़सवारों ने संपूर्ण बंगाल क ो जीत लिया था. आज यह क ाम उतना आसान नहीं रह गया है.
लेखक चर्चित बांग्ला कवि हैं और संप्रति बिहार बांग्ला अकादेमी के निदेशक हैं.

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