नंदीग्राम की कसम
नरेंद्र कुमार
मैं लाल झंडे की कसम खाता हूं
नंदीग्राम के बारे में मैं कोई बहस नहीं करुंगा
क्योंकि कामरेडों ने नंदीग्राम पर बहस पर रोक लगा दी है।
आज मैं मुक्तिबोध पर बहस करुंगा
जिन्होंने लिखा था कि अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए
उठाने ही होंगे खतरे तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब
आज मैं सफदर हाशमी की हत्या के बारे में बहस करुंगा
जो मार दिये गये उस समय,
जब वे बोल रहे थे साम्राज्य की शक्तियों के खिलाफ।
आज मैं गुजरात के बारे में बहस करुंगा
जहां राजसत्ता और हिंदूवादी गुंडों ने
गोधरा के बहाने मचाया था कत्लेआम।
आज मैं जालियांवाला बाग के बारे में बहस करुंगा
जहाँ देश के लोग मारे गये थे विदेशी राजसत्ता की गोलियों से जब वे उनकी गुलामी स्वीकार करने से
मना करने लगे थे।
आज मैं भगत के बारे में बहस करुंगा
जिन्होंने इन तमाम तरह की फासीवादी ताकतों के खिलाफ
लड़ने का आह्उाान किया था।
लेकिन मैं नंदीग्राम के बारे में कोई बहस नहीं करुंगा
क्योंकि नंदीग्राम में मैंने
जालियांवाला बाग, गुजरात और सफदर की हत्या का दृश्य
एक साथ देखा है।
नंदीग्राम के बारे में बहस करना
अब बेमानी है
नंदीग्राम के बाद सिर्फ पक्ष चुनना बाकी है
कि तुम किसकी तरफ से लड़ोगे।
और मैंने अपना पक्ष चुन लिया है।
इसलिए नंदीग्राम के बारे में मैं कोई बहस नहीं करुंगा।
नरेंद्र कुमार युवा एक्टिविस्ट और सामाजिक सरोकारोंवाले लेखक है. उनके दो उपन्यास ’20वीं सदी के नायक’ तथा ’चुनाव’ आ चुके हैं और चर्चा में भी रहे हैं.
बुलावा
विश्वजीत सेन
विकास रोकने के लिए विदेश से पैसे आ रहे हैं
बिमान बसु, राज्य सचिव, सीपीआइ एम
दैनिक स्टेट्समैन बांग्ला
इतना दूर हो गये हैं वे
जन-जागृति से कि
जब-जब जनता जागती है
तब तब फुसफुसाने लगते हैं
एक दूसरे के कानों में
विदेशी पैसे का ही करतब है यह सब कुछ
विदेशी… विदेशी…
इस बरताव को क्या हम कह सकते हैं? स्वदेशी ?
पंजे उठाये, नाखून निकाले
चारों दिशा से दौड़ते आ रहे हैं
‘विदेशी लफड़े`
यह देखते ही वे तेल तथा घी में नहलाने लगते हैं
कैडरों को,
उनके हाथों में जबरन ठूंस देते हैं-कट्टे, बम,
कैडर्स होने लगते हैं पहलवानों जैसे तगड़े, और भी तगड़े
उधर ‘दर्शन` के खाली कमरे में भटकती है हवा
पीटती छाती ‘हाय, हाय, हाय`
बुलाती है बहुराष्ट्रीय संस्थाएं
बस पहंुच ही चुके हैं आप, आगे बढ़ें
आयें, आयें, आयें
1 comment April 18, 2007