वसंत की गवाही

April 19, 2007

रेयाज-उल-हक

कुछ शब्द
उनके लिए
जो नंदीग्राम में मार दिये गये
कि मैं गवाह हूं उनकी मौत का.

मैं गवाह हूं कि नयी दिल्ली, वाशिंगटन
और जकार्ता की बदबू से भरे गुंडों ने
चलायीं गोलियां
निहत्थी भीड़ पर
अगली कतारों में खड़ी औरतों पर.

मैं गवाह हूं उस खून का
जो अपनी फसल
और पुरखों की हड्डी मिली अपनी जमीन
बचाने के लिए बहा.

मैं गवाह हूं उन चीखों का
जो निकलीं गोलियों के शोर
और राइटर्स बिल्डिंग के ठहाकों को
ध्वस्त करतीं.

मैं गवाह हूं
उस गुस्से का
जो दिखा
स्टालिनग्राद से भागे
और पश्चिम बंगाल में पनाह लिये
हिटलर के खिलाफ.

मैं गवाह हूं
अपने देश की भूख का
पहाड़ की चढ़ाई पर खडे
दोपहर के गीतों में फूटते
गड़ेरियों के दर्द का
अपनी धरती के जख्मों का
और युद्ध की तैयारियों का.

पाकड़ पर आते हैं नये पत्ते
सुलंगियों की तरह
और होठों पर जमी बर्फ साफ होती है.

यह मार्च
जो बीत गया
आखिरी वसंत नहीं था
मैं गवाह हूं.

Entry Filed under: मेरी कविताएं. .

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