Archive for April 22nd, 2007

कहीं और चटका लगाने से पहले यहां आयें, यह बेहद ज़रूरी है.

क्या किसी ने एलेन जांस्टन के बारे में पूछा?
जब भारत का मीडिया बाज़ार के दो देवताओं की एक आडंबरपूर्ण शादी के पीछे पगलाया हुआ था उन्हीं दिनों फ़लस्तीन में उस साहसी युवा पत्रकार के बारे में चिंताएं गहराने लगीं थीं, जिसे लगभग एक माह पहले कुछ अनजान लोगों ने अगवा कर लिया था. वह अकेला पश्चिमी पत्रकार था जो उस इलाके में पिछले तीन सालों से काम कर रहा था जहां कोई पश्चिमी पत्रकार रहने को तैयार नहीं था, जहां हर पश्चिमी को शक की निगाहों से देखा जाता है. बीबीसी में कार्यरत एलेन जांस्टन नाम के इस पत्रकार को उस समय अगवा किया गया जब वह गज़ा में अपनी तीन साल की पोस्टिंग खत्म करने ही वाला था.
आज फ़लस्तीन एक ऐसी जगह बन गया है जहां आप न शांति की बात कर सकते हैं न युद्ध की. वहां घोषित तौर पर युद्ध नहीं चल रहा पर रोज हज़ारों लोग युद्ध की त्रासदी से दो चार होते हैं, फ़लस्तीन की दो से अधिक नस्लें इस युद्ध के दौरान जवान हुईं और लाखों लोग बेघरबार हुए, अपने ही मुल्क में अपनी ही जमीन से खदेड़ दिये गये. फ़लस्तीन अपने समय के एक दुखांत महाकाव्य की तरह है, जिसका हरेक पात्र एक तेज़ नफ़रत की ज़द में है. उस नफ़रत का नाम है-इसराइल.
और हम अपने देश में यों रहते हैं मानों इस दुनिया से एकदम अलग हों. हममें से कितनों ने एलेन के लिए कोई अपील की? कितनों ने उनके लिए एक मिनट भी सोचा? स्थिति और अजीब इसलिए लगती है क्योंकि अधिकतर चिट्ठाकार पत्रकारिता से जुडे़ हैं. क्या यह हमारे लिए सिचने का समय नहीं है कि हम कितने वाहियात होते जा रहे हैं. क्या हम वास्तव में अपने समय के ज़रूरी लोग रह गये हैं?
ग़ज़ा के दो फ़लस्तीनियों ने लापता बीबीसी संवाददाता एलेन जॉन्स्टन की रिहाई की मांग करते हुए एक वेबसाइट शुरू की है. हम यहां अपना क्षोभ व्यक्त कर सकते हैं, एलेन को छोडने की अपील कर सकते हैं. आप यहां ज़रूर आयें.
पढें फ़लस्तीन-इसराइल विवाद के बारे में.


2 comments April 22, 2007

कहीं और चटका लगाने से पहले यहां आयें, यह बेहद ज़रूरी है.

क्या किसी ने एलेन जांस्टन के बारे में पूछा?
जब भारत का मीडिया बाज़ार के दो देवताओं की एक आडंबरपूर्ण शादी के पीछे पगलाया हुआ था उन्हीं दिनों फ़लस्तीन में उस साहसी युवा पत्रकार के बारे में चिंताएं गहराने लगीं थीं, जिसे लगभग एक माह पहले कुछ अनजान लोगों ने अगवा कर लिया था. वह अकेला पश्चिमी पत्रकार था जो उस इलाके में पिछले तीन सालों से काम कर रहा था जहां कोई पश्चिमी पत्रकार रहने को तैयार नहीं था, जहां हर पश्चिमी को शक की निगाहों से देखा जाता है. बीबीसी में कार्यरत एलेन जांस्टन नाम के इस पत्रकार को उस समय अगवा किया गया जब वह गज़ा में अपनी तीन साल की पोस्टिंग खत्म करने ही वाला था.
आज फ़लस्तीन एक ऐसी जगह बन गया है जहां आप न शांति की बात कर सकते हैं न युद्ध की. वहां घोषित तौर पर युद्ध नहीं चल रहा पर रोज हज़ारों लोग युद्ध की त्रासदी से दो चार होते हैं, फ़लस्तीन की दो से अधिक नस्लें इस युद्ध के दौरान जवान हुईं और लाखों लोग बेघरबार हुए, अपने ही मुल्क में अपनी ही जमीन से खदेड़ दिये गये. फ़लस्तीन अपने समय के एक दुखांत महाकाव्य की तरह है, जिसका हरेक पात्र एक तेज़ नफ़रत की ज़द में है. उस नफ़रत का नाम है-इसराइल.
और हम अपने देश में यों रहते हैं मानों इस दुनिया से एकदम अलग हों. हममें से कितनों ने एलेन के लिए कोई अपील की? कितनों ने उनके लिए एक मिनट भी सोचा? स्थिति और अजीब इसलिए लगती है क्योंकि अधिकतर चिट्ठाकार पत्रकारिता से जुडे़ हैं. क्या यह हमारे लिए सिचने का समय नहीं है कि हम कितने वाहियात होते जा रहे हैं. क्या हम वास्तव में अपने समय के ज़रूरी लोग रह गये हैं?
ग़ज़ा के दो फ़लस्तीनियों ने लापता बीबीसी संवाददाता एलेन जॉन्स्टन की रिहाई की मांग करते हुए एक वेबसाइट शुरू की है. हम यहां अपना क्षोभ व्यक्त कर सकते हैं, एलेन को छोडने की अपील कर सकते हैं. आप यहां ज़रूर आयें.
पढें फ़लस्तीन-इसराइल विवाद के बारे में.


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