Archive for April 26th, 2007

बंगाल में पोंगापंथ

वाकई देश में सीपीएम किस तरह से मार्क्स का नाम लेकर धार्मिक ब्रह्मणों और आर्थिक ब्राह्मणों (अमेरिकनों) के लिए लाल कालीन बिछाये हुए है, यह देखने लायक है. हंस के मार्च अंक से साभार
पलाश विश्वास

बंगाल के शरतचन्द्रीय बंकिमचन्द्रीय उपन्यासों से हिंदी जगत भली-भांति परिचित है, जहां कुलीन ब्राह्मण जमींदार परिवारों की गौरवगाथाएं लिपिबद्ध हैं. महाश्वेता देवी समेत आधुनिक बांग्ला गद्य साहित्य में स्त्राी अस्मिता व उसकी देहमुक्ति का विमर्श और आदिवासी जीवन यंत्राणा व संघर्षों की सशक्त प्रस्तुति के बावजूद दलितों की उपस्थिति नगण्य है. हिंदी, मराठी, पंजाबी, तमिल, कन्नड़ और तेलुगू भाषाओं की तरह बांग्ला में दलित साहित्य आंदोलन की कोई पहचान नहीं बन पाई है और न ही कोई महत्त्वपूर्ण दलित आत्मकथा सामने आई है, बेबी हाल्दार के आलोआंधारि जैसे अपवादों को छोड़कर. आलो आंधारि का भी हिंदी अनुवाद पहले छपा, मूल बांग्ला आत्मकथा बाद में आयी.
यह ब्राह्मणत्व का प्रबल प्रताप ही है कि १९४७ में भारत विभाजन के बाद हुए बहुसंख्य जनसंख्या स्थानांतरण के तहत पंजाब से आनेवाले दंगापीड़ितों को शरणार्थी मानकर उनके पुनर्वास को राष्ट्रीय दायित्व मानते हुए युद्धस्तर पर पुनर्वास का काम पूरा किया गया. जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरू और आधुनिक बंगाल के निर्माता तत्कालीन मुख्यमंत्राी विधानचंद्र राय ने पूर्वी बंगाल के दलित आंदोलन के आधार क्षेत्रा जैशोर, खुलना, फरीदपुर, बरिशाल से लेकर चटगांव, कलकत्तिया सवर्ण वर्चस्व और ब्राह्मणवादी एकाधिकार को चुनौती देने वाली कोई ताकत नहीं है. भारत भर में ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक पिछड़े वर्ग की जनसंख्या चालीस प्रतिशत से ज्य़ादा है. भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बाकी देश में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का जोरदार समर्थन करती है. मलाईदार तबके को प्रोन्नति से अलग रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में ओबीसी कोर ग्रुप की बैठक हुई जिसमें त्रिापुरा के समाज कल्याण मंत्राी कवि अनिल सरकार, जो माकपा की हैदराबाद कांग्रेस में गठित दलित सेल में बंगाल वाममोर्चा चेयरमैन विमान बसु के साथ महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं, शामिल हुए. पार्टी का दलित एजेंडा भी बसु और सरकार ने तय किया. इन्हीं अनिल सरकार ने उस बैठक में दलितों और पिछड़ों के आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमा ५० फ़ीसदी से बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की मांग उठाई, मलाईदार तबक़े को प्रोन्नति से अलग रखने के फ़ैसले की प्रतिक्रिया में उन्होंने सवर्ण मलाईदार तबकेश् को चिन्हित करके उन्हें भी प्रोन्नति के अवसरों से वंचित रखने की सिफ़ारिश की है. उनका दावा है कि त्रिापुरा में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों का आरक्षण लागू किया जा चुका है.
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में अभी तक पिछड़ी जातियों की पहचान का काम पूरा नहीं हुआ है, आरक्षण तो दूर. अनिल सरकार कहते हैं कि पचास फ़ीसद आरक्षण के बावजूद सिर्फ दस प्रतिशत नौकरियां ही दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को मिलती हैं, नब्बे फ़ीसदी नौकरियों पर सवर्ण काबिज़ हैं.
पश्चिम बंगाल में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को प्रोन्नति के अवसर तो सिरे से नहीं हैं. आरक्षित पदों पर रिक्तियां अनंत हैं पर योग्य प्रार्थी न मिलने की वजह दिखाकर अमूमन आरक्षित पदों को सामान्य बनाना आम है. गैर बंगाली नागरिकों को तो किसी भी क़ीमत पर जाति प्रमाण-पत्रा नहीं ही मिलता पर अब दलितों, आदिवासियों की संतानों को भी जाति प्रमाण-पत्रा जारी नहीं किए जाते.
सबसे सदमा पहुंचाने वाली बात यह है कि बाक़ी देश में जहां अखब़ार और मीडिया गैर-ब्राह्मणों की खब़रों को प्रमुखता देते हैं, वहीं बंगाल में ब्राह्मणवादी मीडिया और अखब़ार दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और शरणार्थियों के बारे में एक पंक्ति की खब़र तक नहीं छापते. जबकि कमज़ोर तबकेश् की आवाज़ उठाने वाली माकपा बंगाल में ३५ सालों से सत्ता में हैं.
पिछले दिनों सुभाष चक्रवर्ती के तारापीठ जाकर तारा मां की पूजा पर पार्टी पोलित ब्यूरो, केंद्रीय समिति, राज्य वाम मोर्चा से लेकर मीडिया में काफ़ी बवेला मचा. पार्टी, विचारधारा और धर्म पर वैचारिक बहस छिड़ गई. प्रतिक्रिया में सुभाष चक्रवर्ती ने कहा, ‘पहले मैं हिंदू हूं और फिर ब्राह्मण`. वे दुर्गोत्सव में १२० पंडालों के संरक्षक थे. विवाद से चिढ़कर उन्होंने परिवहनकर्मियों को धूमधाम से विश्वकर्ता पूजा मनाने के निर्देश दिए. हक़ीक़त यह है कि सुभाष चक्रवर्ती और उनके चार भाइयों ने जनेऊ धारण नहीं किया. ब्राह्मण समाज ने आज़ादी से पहले उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था, वे एकमात्रा सवर्ण मंत्राी हैं जो दलितों का साथ देते हैं. पर वे अपनी पहचान और संस्कृति के यथार्थ पर जोर देते हैं. ज़मीनी जड़ें होने के कारण उनका जनाधार मजबूत है. सुभाष चक्रवर्ती के इस विवादास्पद बयान पर बंगाल में धर्म पर बहस तो छिड़ी, मनुस्मृति और उसके अभिशाप पर चर्चा तक नहीं हुई, चक्रवर्ती वाम आंदोलन के बंगाल, त्रिापुरा और केरल तक सिमट जाने की वजह भारतीय संस्कृति और लोक से अलगाव को मानते हैं.
बाक़ी भारत में दलित आंदोलन से अलगाव भी माकपा को राष्ट्रीय नहीं बनाती, यह पार्टी के हैदराबाद कांग्रेस में मानकर बाक़ायदा आज़ादी के इतने सालों बाद दलित एजेंडा भी पास किया गया पर अपने चरित्रा में आज भी माकपा और सारे वामपंथी दल दलित विरोधी हैं. इसीलिए दिनों दिन बंगाल में ब्राह्मणवाद की जडें मजबूत हो रही हैं. इसी हक़ीक़त की ओर बागी मंत्राी सुभाष चक्रवर्ती ने उंगली उठाई है. पूंजीवाद विकास के लिए अधाधुंध, ज़मीन अधिग्रहण के शिकार हो रहे हैं दलित पिछड़े आदिवासी और अल्पसंख्यक, पर इस मुद्दे पर तमाम हो हल्ले के बावजूद बंगाल में दलितों के अधिकार को लेकर लड़ने वाली कोई ताकत कहीं नहीं है.
इधर के वर्षों में बचे-खुचे दलित आंदोलन के तहत खा़सकर कोलकाता और आस-पास विवाह, श्राद्ध जैसे संस्कारों में ब्राह्मणों का बहिष्कार होने लगा है. श्राद्ध की बजाय स्मृति-सभाएं होने लगी है, कई बरस पहले यादवपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी करने वाले एक दलित ने अपढ़ पुरोहित से पिता का श्राद्ध कराने की बजाय कृष्णनगर के पास अपने गांव में स्मृति सभा का आयोजन किया तो पूरे इलाक़े में तनाव फैल गया.
ताजा घटना सुभाष चक्रवर्ती के ब्राह्मणत्व के विवाद के बाद की है.
सुंदरवन इलाक़े में दलितों-पिछड़ों की आबादी ज्य़ादा रही है. इसी इलाक़े में दक्षिण २४ परगना जिले के गोसाबा थाना अंतर्गत सातजेलिया लाक्स़बागान ग्लासखाली गांव के निवासी मदन मोहन मंडल स्थानीय लाक्सबागान प्राथमिक विद्यालय के अवैतनिक शिक्षक हैं. पर चूंकि उन्होंने पुरोहित बुलाकर पिता का श्राद्ध नहीं किया और न ही मृत्युभोज दिया इसलिए पिछले चार महीने से उनका सामाजिक बहिष्कार चल रहा हैं. वे अपवित्रा और अछूत हो गए हैं और पिछले चार महीने से वे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं.
मदनमोहन मंडल के इस स्कूल के विद्यार्थी ज्य़ादातर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के बच्चे हैं. बतौर शिक्षक छात्रा-छात्रााओं में मदनमोहन बाबू अत्यंत लोकप्रिय हैं, पर पवित्रा ब्राह्मणवाद के पुण्य प्रताप से शनि की दशा है उन पर. पिता की मृत्यु पर बंगाली रिवाज़ के मुताबिक सफ़ेद थान कपड़े नहीं पहने उन्होंने. हविष्य अन्न नहीं खाया. सामान्य भोजन किया. नंगे पांव नहीं चले. और न ही पुरोहित का विधान लिया या श्राद्ध कराया.
ब्राह्मणवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस दलित बहुल इलाक़े में, ब्राह्मणों ने नहीं, दलितों और पिछड़ों ने उनके स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी. प्रधानाचार्य शिवपद मंडल का कहना है, ”मदनमोहन बाबू सूतक (अशौच अवस्था में) में हैं. वे स्कूल आएंगे तो यह नन्हें बच्चों के लिए अशुभ होगा. मदनमोहन बाबू को फ़तवा जारी किया गया है कि ब्राह्मणों से विधान लेकर पुरोहित बुलाकर पहले पितृश्राद्ध कराएं, फिर स्कूल आएं.
मदनमोहन मंडल ने हार नहीं मानी और विद्यालय निरीक्षक की शरण में चले गए. उन्होंने लाक्सबागान के पड़ोसी गांव बनखाली प्राथमिक विद्यालय में अपना तबादला करवा लिया पर इस स्कूल में भी उनके प्रवेशाधिकार पर रोक लग गई.
इलाक़े के मातबर लाहिड़ीपुर ग्राम पंचायत के पूर्व सदस्य व वामपंथी आरएसपी के नेता श्रीकांत मंडल का सवाल है, ”जो व्यक्ति अपने पिता का श्राद्ध नहीं करता, वह बच्चों को क्या शिक्षा देगा.“ गौरतलब है कि सुंदरवन इलाके में माकपा के अलावा आरएसपी का असर ज्य़ादा है. अभिभावकों की ओर से कन्हाई सरदार का कहना है, ”जो शिक्षक गीता, शास्त्रा नहीं मानता, उसके यहां बच्चों को भेजने के बजाय उन्हें अपढ़ बनाए रखना ही बेहतर है.“
आखिऱकार अपने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ़ मदनमोहन मंडल गोसाबा थाना पहुंच गए, पर पुलिस ने रपट लिखने से मना कर दिया. मदनमोहन बाबू ने गोसाबा अंचल के विद्यालय निरीक्षक ब्रजेन मंडल से लिखित शिकायत की. ब्रजेन बाबू ने खुद शिक्षक संगठन के प्रतिनिधियों के साथ मौक़े पर गए, पर ब्राह्मणवादी कर्मकांड विरोधी शिक्षक का सामाजिक बहिष्कार खत़्म नहीं हुआ.
मदनमोहन मंडल आरएसपी के कृषक आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं. पर स्थानीय आरएसपी विधायक चित्तरंजन मंडल ने मदनमोहन बाबू के आचरण को ‘अशोभनीय` करार दिया.
दक्षिण चौबीस परगना के वामपंथी शिक्षक संगठन के सभापति अशोक बंद्योपाध्याय का कहना है, ”अगर कोई संस्कार तोड़ना चाहे तो उनका स्वागत है, पर यह देखना होगा कि उसकी इस कार्रवाई को स्थानीय लोग किस रूप में लेते हैं.“ अशोक बाबू ने मदनमोहन मंडल के मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.
मदनमोहन बाबू अब भी स्कूल नहीं जा पाते, वे गोसाबा स्थित अपर विद्यालय निरीक्षक के दफ्त़र में हाज़िरी लगाकर अपनी नौकरी बचा रहे हैं. पर वे किसी क़ीमत पर पितृश्राद्ध के लिए तैयार नहीं हैं.
माकपा के बागी मंत्राी के ब्राह्मणत्व पर विचारधारा का हव्वा खड़ा करने वाले तमाम लोग परिदृश्य से गायब हैं.

संपर्क : द्वारा श्रीमती आरती राय, गोस्टोकानन, सोदपुर, कोलकाता-७००११०
फोन : ०३३-२५६५९५५१


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इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान

ऐसे समय में, जब हिंदीब्लाग में घमसान मचा हुआ हो और निहायत सतही और निरर्थक बातों पर (वेब) पन्ने काले किये जा रहे हों, एक गंभीर और शोधपरक लेख देना खतरे से खाली नहीं है. खतरा इस बात का कि पाठक नहीं मिलेंगे. सारा ध्यान तो भड़काऊ चिट्ठों पर ही चला जाता है. फिर भी एक बात ज़रूर है कि जो बहस चल रही है वह इतिहास और तथ्यों की ही है. इसी संदर्भ में वैभव सिंह का लेख, तद्भव से साभार.

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान
(सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन)

वैभव सिंह

भारत में परम्परागत रूप से इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों के अभाव में पौराणिक मिथकीय कथाओं और शास्त्राों ने ही इतिहास की भूमिका का निर्वाह किया है। हिन्दू धर्म की कतिपय धर्मशास्त्राीय मान्यताओं जैसे अवतारवाद , वर्णधर्म और कर्मकाण्ड को सामाजिक आदर्श का दर्जा प्राप्त था और विभिन्न पौराणिक मिथकीय पात्रां एवं घटनाओं को इन्हीं सामाजिक आदर्शों की प्राप्ति या इनसे विचलित होने के आधार पर व्याख्यायित किया जाता था। धार्मिक मान्यताओं द्वारा अनुमोदित इन सामाजिक आदर्शों को विभिन्न रोचक कथाओं के जरिए वैधता दिलाने का काम पुराणों ने इतनी कुशलता के साथ किया कि इतिहास की जरूरत ही नहीं रह गयी।

18 वीं और 19 वीं सदी में एक आधुनिक अकादमिक विषय के रूप में इतिहास लेखन को मान्यता मिलनी प्रारम्भ हुई और पश्चिम के साथ साथ पूर्वी देशों में भी विभिन्न धमोर्ं, संस्कृतियों और समुदायों के इतिहास पर शोध करने का काम शुरू हुआ। एक ओर राजनीतिक सामाजिक स्थितियां बदलने से इतिहास लेखन की आवश्यकता का अनुभव किया गया तो दूसरी ओर इतिहास के निर्माण और व्याख्या के विभिन्न दृष्टिकोणों के जरिए विभिन्न समुदायों की राजनीतिक सामाजिक आकांक्षाओं को नया रूप मिलना आरम्भ हुआ।

19 वीं सदी में ही साम्राज्यवाद का भी अभूतपूर्व विस्तार हुआ और उसने मध्य एशिया व पूर्वी एशिया के अनेक पिछड़े देशों की अर्थव्यस्था को नियन्त्राण में लेने के लिए उन्हें राजनैतिक रूप से गुलाम बनाना आरम्भ कर दिया। इस साम्राज्यवाद ने निहित स्वाथोर्ं और व्यावहारिक जरूरतों के लिए इतिहास लेखन को भी अपना माध्यम बनाया। जब इतिहास लिखने का काम उन्होंने भारत में आरम्भ किया तब उन्होंने यहां के स्थानीय स्रोतों का भी पता लगाने की कोशिश की। प्रामाणिक इतिहास लेखन के स्थानीय स्रोतों के अभाव को देख कर तो वे भी आश्चर्य चकित हो गये। लोग अपने ही इतिहास की मौर्यकालीन और गुप्तकालीन घटनाओं एवं शासकों के नाम से अनभिज्ञ थे। इस स्थिति के बारे में 18 वीं सदी में भारत आने वाले एक यात्राी अमारी डी राएनकोर्ट ने अपनी किताब ÷ सोल ऑफ इण्डिया’ में लिखा :

÷÷ आर्य भारत में कोई स्मृति नहीं क्योंकि उसका ध्यान शाश्वतता पर है, न कि समय पर… भारतीयों के लिए आध्यात्मिक वास्तविकता ÷ स्थान’ है न कि समय, प्रकृति है न कि इतिहास।” 1

यह भी एक अजीब विडम्बना थी कि इतिहास के प्रति अरुचि को हिन्दुओं की आध्यात्मिकता के प्रति अपवाद रूप से अत्याधिक रुचि के आधार पर व्याख्यायित किया गया। सीधे सीधे यह तर्क दिया गया कि दुनिया की अन्य सभ्यताओं व संस्कृतियों की तुलना में विशिष्ट रूप से लोकोत्तर जीवन और पारलौकिक विश्वासों पर उनके जीवन और समस्त बौद्धिक चिन्तन के केन्द्रित होने के कारण ही भारत में इतिहास लेखकों एवं इतिहास की प्रामाणिक रचनाओं का अभाव रहा है। यह एक कोरा सरलीकरण था और भारत में इतिहास के प्रति अरुचि के कारणों को सही ढंग से सामने रखने के स्थान पर उस समय आने वाले योरोपीय यात्रियों की भारत के सांस्कृतिक अतीत के सम्बन्ध में नासमझी को अधिक प्रकट करता है। कौटिल्य , वात्स्यायन, अश्वघोष और चार्वाक आदि की रचनाएं जिस देश में मौजूद रही हों वहां आध्यात्मिकता को उसका केन्द्रीय सांस्कृतिक मूल्य बताना यथार्थपरक दृष्टि का सूचक कम और राजनीतिक दृष्टि का सूचक ज्यादा था। हालांकि विलियम जोन्स के समय से ही भारत के बारे में इस साम्राज्यवादी निष्कर्ष का खण्डन भी होने लगा था कि पश्चिमी पुनर्जागरणकालीन मूल्यों के गर्भ से उपजी जिस आधुनिकता का संवाहक यूरोप है, उसके सामने भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा उपलब्धियां कहीं नहीं ठहरतीं। विलियम जोन्स ने भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों के रेखांकन के बहाने पश्चिमी पुनर्जागरण और एशियाई जड़ता की रूढ़ दृष्टियों पर आधारित द्वन्द्व के बारे में लिखा :

÷÷ हमें एशियाई लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, जिनकी प्रकृति, कला, आविष्कार से अपने विकास और लाभ के लिए अनेक महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते हैं।” 2

इस तरह से 14-15 वीं सदी में विश्व भर में योरोपीय यात्रियों के फैलाव, आर्थिक राजनीतिक उपनिवेशों की स्थापना एवं साम्राज्यवादियों की स्थानीय संस्थाओं के अनुरूप प्रशासन चलाने की बाध्यता, इन सबके बीच 18 वीं सदी के अन्त और 19 वीं सदी में भारतीय इतिहास के निर्माण एवं व्याख्या का काम व्यापक रूप से आरम्भ हुआ। इस काम को अधिक व्यवस्थित और संस्थागत रूप से 1784 ई. में स्थापित रायल एशियाटिक सोसायटी के द्वारा शुरू किया गया। इसमें सिक्कों, अभिलेखों व प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों की खोज के बावजूद अधिक महत्व धर्मशास्त्र, साहित्य, भूगोल, संगीत और ज्योतिष की रचनाओं को दिया गया और उन्हीं के आधार पर ऐसी भारतीय सभ्यता के प्राचीन अतीत का निर्माण किया गया जो अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सके। इन साहित्यिक धार्मिक स्रोतों की व्याख्या करते हुए यह प्रश्न नहीं किया गया कि इन माध्यमों से अतीत की जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह समग्र समाज के यथार्थ को व्यक्त करती है या फिर किसी खास समूह की अभिरुचियों व सामाजिक गतिविधियों को। इस बारे में रोमिला थापर का मत है :

÷÷ प्राचीन समय के बचेखुचे साहित्यिक स्रोतों में ज्यादातर राजा, महत्वपूर्ण पुजारी वर्ग, मठों और सम्पन्न व्यापारियों की जिन्दगी का पता चलता है। इस प्रकार समाज के उच्च वर्ग के बारे में अधिक सूचनाएं मिलती हैं। इसके अलावा परम्परागत समाजों में शिक्षा प्रायः केवल अभिजन समूहों को ही मिल पाती है। इसलिए केवल वही अपनी गतिविधियों को साहित्य के माध्यम से व्यक्त कर पाते हैं। कालिदास के नाटक उदाहरण के तौर पर शासन और दरबार के अध्ययन की दृष्टि से शानदार ऐतिहासिक सामग्री हैं, लेकिन यह कहना कि इनमें पूरे भारतीय समाज का वर्णन है, अतीत की गलत तस्वीर बनाना है।” 3

एक ओर विलियम जोन्स , चार्ल्स विलकिन्स, एच.एच. विलसन, मैक्समुलर, मारिज विण्टरनित्ज और रूडोल्फ रॉय आदि अंग्रेज और जर्मन प्राच्याविद वेदों, उपनिषदों और साहित्यिक कृतियों के आधार पर भारतीय अतीत पर मुग्ध होने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे थे, तो दूसरी ओर मिशनरियों ने अपने ढंग से भारत में औपनिवेशिक शासन को सही ठहराने के लिए भारतीय इतिहास के निर्माण और व्याख्या का काम किया। विलियम कैरे (1761-1834), अलेक्जेण्डर डफ (1806-1878), जॉन मुअर (1810-82) और चार्ल्स ग्राण्ट (1746-1823) ने भारत के इतिहास को अंधकारग्रस्त और हिन्दू धर्म को समस्त पाखण्ड और झूठ का पर्याय बताया। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक और ईसाइयत के प्रचारक थामस बैबिंजटन मैकाले (1800-59) ने अपने 1835 ईसवी के शिक्षा सम्बन्धी मिनट्स में यहां तक कहा कि ÷ भारत और अरब के सम्पूर्ण साहित्य का मुकाबला करने के लिए एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी ही काफी है।’ यानी 19 वीं सदी में एक ओर प्राच्याविद थे, जो मुख्य रूप से प्राचीन कृतियों की खोज और उनके अनुवाद तैयार करके शेष विश्व को भारत की साहित्यिक और धार्मिक विशेषताओं से परिचित करा रहे थे, दूसरी ओर मिशनरी लेखक भारतीयों के अंधविश्वास, मूर्तिपूजा और बहुदेववाद की अवधारणा की आलोचना कर रहे थे, क्योंकि वे ईसाइयत की संसार की उत्पत्ति सम्बन्धी धारणा, ईश्वर के स्वरूप और उपासना पद्धति के अनुरूप नहीं थीं।

इतिहास के निर्माण और व्याख्या के इन प्रयत्नों से अलग अलग निष्कर्ष उभर कर सामने आये। प्राच्यविदों , मिशनरियों और जेम्स मिल जैसे उपयोगितावादियों ने भारतीय अतीत की रूढ़ छवियों के निर्माण में अपने अपने ढंग से योगदान दिया। ऐसे भारतीय समाज की छवि बनी जो हमेशा ही वेदों उपनिषदों वाले आध्यात्मिक चिन्तन में लीन रहता है या संस्कृत नाटकों की रचना में ही हर समय खोया रहता है। इस छवि के केन्द्र में ऐसे हिन्दू मनीषी उपस्थिति थे जो हर समय ब्रह्माण्ड की पहेलियों को सुलझाने के लिए पारलौकिक सत्ता से संवाद कायम करते रहने की चेष्टा करते रहते थे।

19 वीं सदी में ही जेम्स मिल की हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इण्डिया (1817), कर्नल टाड की एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान (1820), इलियट डाउसन की हिस्ट्री ऑफ इण्डिया ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस (1849) जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना हुई जिसने अतीत के बारे में दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। मिल ने समूचे भारतीय इतिहास का हिन्दू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में विभाजन कर इतिहास की साम्प्रदायिक व्याख्या की पृष्ठभूमि तैयार की। उनके ऐतिहासिक अध्ययन की विषयवस्तु एवं निष्कर्ष ठोस तथ्यों पर आधारित होने के स्थान पर सभ्यता के विकास और उपयोगितावाद से सम्बन्धित सामान्य अवधारणाओं पर निर्भर थे, जैसा कि उन्होंने खुद लिखा भीः

÷÷ अच्छी समझदारी रखने वाला कोई भी इंसान बिना इतिहास की प्रामाणिक जानकारी जुटाए प्राचीन ग्रन्थों एवं कृतियों को पढ़ कर लोगों की प्रवृत्तियों को जान सकता है।” 4

मिल ने भारतीय अतीत की कटु आलोचना के आधार पर भारत के अंग्रेजों के हाथों पराधीन होने को तर्कसंगत साबित करने का प्रयास किया। इतिहासकार जे.एस. ग्रेवाल के शब्दों में:

÷÷ मिल ने हिन्दुओं को उनके अतीत या वर्तमान में सभ्य मानने से इंकार कर दिया।” 5

उधर प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों और वैदिक सभ्यता को हिन्दू अतीत संस्कृति की धुरी बताने वाले विलियम जोन्स , मानियर विलियम्स और मैक्समुलर जैसे प्राच्यविदों ने हिन्दू स्वर्णकाल के रूप में ऐतिहासिक कालखण्ड की कल्पना की। उनके द्वारा समस्त विश्वासों और उपासना पद्धति के सभी पहलुओं को आत्मसात करने वाले हिन्दू धर्म की कल्पना की गयी और इस कल्पना के माध्यम से हिन्दू धर्म को भी ईसाइयत की तर्ज पर एक ऐतिहासिक रूप से विकसित धर्म के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। इन प्राच्यविदों में बुनियादी समानता के बावजूद कुछ दृष्टिकोण सम्बन्धी भेद भी थे। जैसे आरम्भिक प्राच्यविदों कोलब्रुक, विल्सन, प्रिन्सेप और टीएस बर्ट ने हिन्दू अतीत की ऐतिहासिकता के निर्धारण के लिए प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का सहारा लिया, साथ ही शोध के आधुनिक तरीकों जैसे अभिलेखों, सिक्कों, स्थापत्य आदि के संग्रह और अध्ययन पर भी बल दिया। प्रिन्सेप के योगदान के बारे में केजरीवाल का कहना हैः

÷÷ प्रिन्सेप ने भारत में पुरावशेषों और मुद्राओं के अध्ययन की नींव डाली और इस प्रक्रिया में प्राचीन भारत के कई प्रमुख शासकों और राजवंशों की खोज की।” 6

आगे चल कर मैक्समुलर , अलब्रेख्त वेबर, विण्टरनित्ज और रूडोल्फ रॉय के रूप में प्राच्यवाद का जिस प्रकार से विकास हुआ, उसमें प्राच्यवाद पूरी तरह से वैदिक साहित्य, उपनिषदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों तक सीमित हो गया। इनमें अधिसंख्य प्राच्यविद जर्मनी और इंग्लैण्ड के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इण्डॉलोजी और संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते भी थे। जर्मन प्राच्यविदों के हाथों जिस प्रकार से वेदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों तक प्राच्यविद्या को सीमित करके भारतीय अतीत का अध्ययन हुआ, उसमें ठोस ऐतिहासिक जानकारियों का उतना महत्व नहीं रहा जितना अमूर्त गौरव और महानता को इन संस्कृत ग्रन्थों के माध्यम से स्थापित करने का। संस्कृत ग्रन्थों का इतनी गहराई से अध्ययन होने लगा कि जर्मन राष्ट्रवाद और योरोपीय सभ्यता की उच्चता की भावना रखने वाले जर्मन प्राच्यविद रूडोल्फ राय ने यहां तक कहा कि ÷ एक शिक्षित यूरोपियन भारत के ब्राह्मणों की तुलना में वेदों के सार को ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकता है।’7

हिन्दी नवजागरण के लेखक प्राच्यविद्या व उसकी इतिहास दृष्टि से गहराई से प्रभावित होने के कारण और कुछ ब्रिटिश उपनिवेशवाद से उपजी आत्महीनता के कारण वर्तमान को अस्वीकार्य मान कर उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे और अतीत या भविष्य को महत्वपूर्ण मान कर उसमें अपने आत्म गौरव की कल्पना करते थे। सुधीर चन्द्र ने उन्नीसवीं सदी के शिक्षित बुद्धिजीवियों और लेखकों के इसी अनुभव को ÷ उत्पीड़क वर्तमान से संघर्ष’7 का नाम दिया है। और लिखा

÷ वर्तमान की व्याख्या केवल अतीत अथवा भविष्य के सन्दर्भों के सहारे ही की जा सकती थी।’ 8

इस समय अगर प्राच्यविदों ने ÷ आध्यात्मिक भारत’ की एक आकर्षक और चमकदार तस्वीर खड़ी की तो, भारतीयों के प्रबुद्ध वर्ग ने भी न सिर्फ आध्यात्मिक अतीत बल्कि आध्यात्मिकता की भी नयी छवियां और परिभाषाएं गढ़ी। इसलिए आध्यात्मिकता की नयी व्याख्याओं और राष्ट्रवादी विवेचन के लिए उसे नये सन्दर्भों और अभिप्रायों से किस प्रकार जोड़ा गया, इसका अध्ययन भी कम रोचक नहीं होगा। यहां तक कि समूचा भक्तिकाल, जिसके साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक योगदान की काफी चर्चा होती है, वह भी बुरी तरह से विवादास्पद बना दिया गया। उस समय के एक महत्वपूर्ण लेखक बालकृष्ण भट्ट ने आध्यात्मिकता को भक्ति, आस्था, विश्वास और आत्मसमर्पण का विषय कम, देशभक्ति और मुल्की जोश का विषय अधिक बना डाला। उनके लेखन में हिन्दू आध्यात्मिकता का अतिशय उल्लेख ही नहीं बल्कि उसकी पुनर्परिभाषित व्याख्या भी महत्वपूर्ण हो गयी। उनके मुताबिक :

÷÷ आध्यात्मिक उन्नति ( स्पिरिचुअल प्रोग्रेस) और जातीयता ( नेशनैलिटी) या ( पॉलिटिक्स) मुल्की जोश साथ साथ चलते हैं।” 9

हिन्दू आध्यात्मिकता की पुनर्व्याख्या की सबसे स्पष्ट मिसाल मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के विवेचन के सन्दर्भ में मिलती है। इस विवेचन में भक्ति आन्दोलन की सराहना और सख्त आलोचना दोनों ही एक साथ उपस्थित है। बालकृष्ण भट्ट के लिए भक्तिकाल की उपयोगिता अनुपयोगिता का प्रश्न मुस्लिम चुनौती का सामना करने से सीधे सीधे जुड़ गया था। इस दृष्टिकोण के कारण भट्ट जी ने मध्यकाल के भक्त कवियों का काफी कठोरता से विरोध किया और उन्हें हिन्दुओं को कमजोर करने का जिम्मेदार भी ठहराया। भक्त कवियों की कविताओं के आधार पर उनके मूल्यांकन के बजाय उनके राजनीतिक सन्दर्भों के आधार पर मूल्यांकन का तरीका अपनाया गया। भट्ट जी ने मीराबाई व सूरदास जैसे महान कवियों पर हिन्दू जाति के पौरुष पराक्रम को कमजोर करने का आरोप मढ़ दिया। उनके मुताबिक समूचा भक्तिकाल मुस्लिम चुनौती के समक्ष हिन्दुओं में ÷ मुल्की जोश’ जगाने में नाकाम रहा। भक्त कवियों के गाये भजनों ने हिन्दुओं के पौरुष और बल को खत्म कर दिया। उन्होंने भक्त कवियों की इसी कमजोरी और नाकामी के विषय में लिखा :

÷÷ मीराबाई, सूरदास, कुम्भनदास, सनातन गोस्वामी आदि कितने महापुरुष जिनके बनाये भजन और पदों का कैसा असर है जिसे सुन कर चित्त आर्द्र हो जाता है। मुल्की जोश की कोई बात तो इन लोगों में भी न थी उसकी जड़ तो न जानिये कब से हिन्दू जाति के बीच से उखड़ गयी।” 10

भक्तिकाल सम्बन्धी अपने विवेचन में भट्ट जी ने मुस्लिम शासन के राजनीतिक सन्दर्भों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया और वल्लभाचार्य व चैतन्य महाप्रभु के भक्ति स्वरूप की व्याख्या करने के स्थान पर तत्कालीन परिस्थितियों पर अधिक जोर देते हुए लिखा :

÷÷ ये लोग ऐसे समय में हुए जब देश का देश म्लेच्छाक्रान्त हो रहा था और मुसलमानों के अत्याचारों से नाकों में प्राण आ लगे थे। इससे आध्यात्मिकता पर इन्होंने बिलकुल जोर न दिया।” 11

भक्तिकालीन सन्तों पर इल्जाम लगाना कि उन्होंने आध्यात्मिकता पर जोर नहीं दिया , अजीबोगरीब बात थी। जाहिर है कि भट्ट जी के मस्तिष्क में आध्यामिकता ईश्वरीय भक्ति व चिन्तन के बजाय लौकिक शक्ति व सम्पन्नता का पर्याय बन चुकी थी। मूल्यांकन की कसौटियां अगर काल्पनिक धारणाओं से निर्मित की जाती हैं तब वस्तुगत यथार्थ की व्याख्या भी वैज्ञानिक और वस्तुगत नहीं रह पाती। इतिहास के एक विशिष्ट चरण के आधार पर इतिहास की समूची प्रक्रिया के विषय में निष्कर्ष निकाले जाते हैं। भव्य और श्रेष्ठ की तुलना में पतन तथा विकार से भरे ऐतिहासिक युग, चरण तथा घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। बालकृष्ण भट्ट ने भी इतिहास की व्याख्या ऐसे नजरिये से की जो यह जानने और बताने के लिए अधिक उत्सुक था कि हिन्दुओं की शक्ति और आत्मगौरव में कब उन्नति हुई और कब गिरावट आयी। मध्यकाल में उन्होंने भक्ति भावना के विकास के साथ ही यह भी शिकायत कीः

÷÷ हमारी आध्यात्मिक उन्नति के सुधार पर किसी की दृष्टि न गयी।” 12

इसके अतिरिक्त आध्यात्मिकता पर बिल्कुल जोर न देने के कारण भक्त कवियों व आचायोर्ं की निन्दा करते हुए लिखा :

÷÷ ऋषि प्रणीत प्रणाली को हाल के इन आचार्यों ने सब भांति तहस नहस कर डाला।” 13

जाहिर है कि बालकृष्ण भट्ट ने भक्ति और अध्यात्म के मध्य अपनी मर्जी से एक विभाजन खड़ा कर दिया था। उनके अनुसार भक्ति का सम्बन्ध रसीली और हृदयग्रहिणी प्रवृत्तियों , विमलचित्त अकुटिल भाव और सेवक सेव्य भाव से है जबकि अध्यात्म का सम्बन्ध ज्ञान, कुशाग्र बुद्धि और अन्ततः जातीयता ( नेशनैलिटी) से होता है। इसी आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला :

÷÷ भक्ति ऐसी रसीली और हृदयग्रहिणी हुई कि इसका सहारा पाय लोग रूखे ज्ञान को अवज्ञा और अनादर की दृष्टि से देखने लगे और साथ ही जातीयता नेशनैलिटी को भी विदाई देने लगे जिसके रफूचक्कर हो जाने से भारतीय प्रजा में इतनी कमजोरी आ गयी कि पश्चिमी देशों से यवन तथा तुरुक और मुसलमानों के यहां आने का साहस हुआ।” 14

भक्तिकाल की यह पूर्वग्रहपूर्ण आलोचना आज शायद ही किसी को स्वीकार हो। लेकिन कमाल की बात है कि रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद दिवेदी तक के भक्तिकाल सम्बन्धी मतों का बारीक विवेचन करने वाली हिन्दी आलोचना बालकृष्ण भट्ट की भक्तिकाल से जुड़ी धारणाओं पर ध्यान नहीं दे सकी। हकीकत यह है कि अध्यात्म और जातीयता का यह सम्बन्ध धर्म और राजनीति के सम्बन्धों की वकालत करता था। हिन्दी का समूचा नवजागरणकालीन चिन्तन कुरीतियों और आडम्बरों को समाप्त करने की दृष्टि से हिन्दू धर्म की आन्तरिक संरचना में सुधार की बात तो कहता था , लेकिन हिन्दुओं की सांस्कृतिक धार्मिक अस्मिता का उपयोग किये बगैर हिन्दुओं के राजनीतिक पुनरुत्थान को असम्भव मानता था। भक्ति आन्दोलन में चूंकि राजनीतिक ढांचे को धार्मिक संस्थाओं व विचारों से नियन्त्रित करने का स्पष्ट सरोकार नहीं मिलता, इसलिए भट्ट जी जैसे लेखकों ने उसकी आलोचना की। यह आलोचना इस कल्पना से प्रेरित थी कि प्राचीनकाल में धर्म और अध्यात्म राजनीति से विलग नहीं हुए थे इसलिए हिन्दू जाति के शौर्य, मानसिक शक्ति और वीर्य जैसे गुण भी बने रहे और जातीयता का भावबोध भी।

सांस्कृतिक शुद्धता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पक्ष में आह्मवान केवल हिन्दू लेखकों की ओर से ही नहीं बल्कि अठारवीं और उन्नीसवीं सदी के मुस्लिम लेखकों की ओर से भी किया जाता रहा था। शाहवली उल्लाह (17.3-62), शाह अब्दुल अजीज (1764-1824), सैय्यद अहमद शाहिद (1786-1831) मौलाना इनायत अली (1794-185 8) और अल्ताफ हुसैन हाली (1831-1914) ने मुस्लिम धर्म संस्कृति के लुटे हुए गौरव और राजनीतिक सत्ता के छिन्न भिन्न हो जाने के विषय में शोकपूर्ण ढंग से वर्णन किया। शाह वली उल्लाह ने अपनी किताब वसीयतनामा में लिखाः

÷÷ हम यहां के लिए अजनबी हैं। हमारे पूर्वज यहां रहने के लिए बाहर से आये। हमारे लिए अरब होना और अरब भाषा का इस्तेमाल करना सबसे अधिक गौरव की बात है।” 15

मुस्लिम पुनरुत्थान और विशुद्ध मुस्लिम संस्कृति के निर्माण के सबसे प्रसिद्ध प्रवक्ता अल्ताफ हुसैन हाली ने 1879 ई. में छपे संग्रह मुसद्दस ए हाली में इस्लाम के उत्थान और पतन को अपनी कविताओं के माध्यम से उभारा। इसमें इस्लाम के पतन की दशा का चित्रण इस प्रकार से किया गयाः

÷÷ न हमारी धमनियों में, न खून में, न हमारी ख्वाहिशों में और न खोज में, हमारे दिल जबान और लफ्जों में, हमारी आदतों, तबियत जेहन और रवायतों में अब वह ऊंचाई नहीं मिलती। गर वह है भी तो महज इत्तिफाक है।” 16

लेकिन इस्लाम के पतन का जिक्र और सांस्कृतिक शुद्धता का पक्ष लेते हुए भी शाह वली उल्लाह से लेकर हाली तक , सभी ने किसी न किसी हद तक इस्लाम में तर्क और आधुनिक ज्ञानविज्ञान के प्रवेश को जरूरी माना। अल्ताफ हुसैन हाली तो सर सैय्यद अहमद खान (1811-9 8) के इस्लाम को आधुनिक शिक्षा और ज्ञान विज्ञान के नजदीक लाने के प्रयासों के पूरी तरह से कायल थे और

÷÷ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने इस्लाम के पुनर्जागरण के लिए सैय्यद अहमद खान के रास्ते पर चलने की सलाह दी।” 17

पर इन सारे प्रयासों के बावजूद अन्ततः इस्लाम की राजनीतिक ताकत और मजहबी पहचान ही उनके लिए प्रमुख थी जो हिन्दू पुनरुत्थान की चेतना से टकराती थी। 1867 ईसवी में देवबन्द में मोहम्मद वासिम नानौवती और शेख अहमद गंगोही द्वारा स्थापित संस्था ने इस्लामिक मतों का और जोर शोर से प्रचार किया। ऐसे ही दौर में उलेमाओं के द्वारा हिन्दू सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त और कुरान का विशुद्ध रूप से पालन करने वाली मुस्लिम अस्मिता के निर्माण की चेष्टा हुई। साम्प्रदायिकता के उदय और साम्प्रदायिक प्रतीकों के निर्माण की चेष्टाओं में किसी भी धर्म मजहब के भद्र वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। 19 वीं सदी में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही धर्मों के भद्रवर्ग धार्मिक प्रतीकों के गठन की कोशिशें कर रहे थे। बंगाल और महाराष्ट्र में भी इस समय हिन्दी क्षेत्र की तरह कई सवालों का साम्प्रदायिकीकरण किया गया था। जैसे बंगाल में हिन्दू भूस्वामी और मुस्लिम काश्तकारों के बीच के आर्थिक विभाजन को साम्प्रदायिक संघर्ष की शक्ल देने के लिए इस्तेमाल किया गया। विपिन चन्द्रा के अनुसार 1773 ईसवी के स्थायी बन्दोबस्त के फलस्वरूप बंगाल में पुराने हिन्दू और मुसलमान जमींदारों के परिवार विस्थापित हुए और उनकी जगह नये हिन्दू व्यावसायिक वर्ग का उदय हुआ। गांवों की जमीन पर कब्जा जमाये बैठे इस व्यापारिक साहूकार वर्ग से जब गरीब मुसलमानों का टकराव हुआ तो इसमें ÷ इन्होंने सामूहिक संघर्षों में अपने सह धर्मावलम्बियों को शरीक करने के लिए साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल किया।’18 पर अन्य प्रान्तों की तुलना में इस समय पश्चिमोत्तर प्रान्त में हिन्दू मुस्लिम सम्बन्ध सामाजिक आर्थिक धरातल पर किस तरह से अलग थे, इसका वर्णन पॉल ब्रास ने किया है। उन्होंने संयुक्त प्रान्त में 19 वीं सदी में पनपने वाली मुस्लिम साम्प्रदायिकता के सामजिक कारणों का विस्तार से अध्ययन करते हुए इन मतों को गलत ठहराया है कि 1857 ईसवी के विद्रोह के बाद अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार, हिन्दुओं द्वारा अंग्रेजी शासन का अधिक कुशलतापूर्वक इस्तेमाल, मुस्लिमों का पारम्परिक पिछड़ापन या हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों की बदहाली जैसे कारण मुस्लिम साम्प्रदायिकता के उदय के जिम्मेदार बने। मुस्लिम पिछड़ेपन को इस समय की मुस्लिम साम्प्रदायिकता से जोड़ने के मिथ का खण्डन करने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरियों और प्रशासन में मुसलमानों की संख्या प्रस्तुत करने के लिए आंकड़े प्रस्तुत किये और लिखा :

÷÷ मुसलमानों के पिछड़ेपन का तर्क और धारणा संयुक्त प्रान्त पर लागू नहीं होती।” 19

अपने मत के पक्ष में आंकड़े पेश करते हुए उन्होंने लिखा है :

÷÷ अवध और पश्मिोत्तर प्रान्त की सरकार के द्वारा मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में स्थित पर की गयी टिप्पणियों से जाहिर होता है कि सरकारी दफ्तरों में मुसलमानों की कम संख्या होने की बात गलत है, बल्कि सरकार के आधिकारिक सचिव के मुताबिक उन्हें अपनी जनसंख्या के अनुपात से अधिक नौकरियां मिली हुई थीं। रिपोर्ट से पता चलता है सरकार के कुल 54,130 देसी अधिकारियों में 35,302 हिन्दू और 18,828 मुसलमान यानी 65.22 फीसदी हिन्दू और 34.78 फीसदी मुसलमान थे। जबकि कुल जनसंख्या में हिन्दुओं और मुसलमानों का अनुपात 86.75 फीसदी और 13.25 फीसदी था।” 20

इसी तरह सबसे ऊंची तनख्वाहों वाली और सम्मानजनक नौकरियां जैसे डिप्टी कलेक्टर और तहसीलदार की नौकरियों के मामले में भी मुसलमान हिन्दुओं से कहीं अधिक आगे थे। पॉल ब्रास के मुताबिक मुसलमानों खासकर उच्च तथा मध्यवर्गीय मुसलमानों की दशा उपरोक्त आंकड़ों के आलोक में ऐसी नहीं थी कि यह मान लिया जाए कि वे सामाजिक पिछड़ेपन की प्रतिक्रिया में हिन्दुओं से अलगाव का रास्ता अख्तियार कर रहे थे। बल्कि फारसी की ओर झुकी उर्दू की मांग , अलीगढ़ आन्दोलन और मुस्लिम लीग जैसे संगठनों की स्थापना ÷ मुसलमानों के अपेक्षाकृत सम्पन्न तबके द्वारा राजनीतिक वर्चस्व को बरकरार रखने’21 को कोशिशों का परिणाम थी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं का विकास हो रहा था साथ ही विविध वैचारिक प्रवृत्तियों का भी उदय हो रहा था। यह समय था जब हिन्दी क्षेत्र के साथ साथ भारत के बंगाल और महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों में भी राष्ट्रीय एकीकरण , प्रशासनिक विकास, व्यापारिक पूंजी के विस्तार ओर शैक्षिक विकास के फलस्वरूप एक राष्ट्रीय चेतना उभरने लगी थी। यह राष्ट्रीय चेतना भारत की व्यापक पहचान को अपने भीतर समाये रखने के साथ ही एक जातीयता के बोध को भी सुरक्षित रखने और उसे व्यक्त करने का प्रयास कर रही थी। चूंकि किसी राष्ट्रीय चेतना को विकसित होने के लिए राष्ट्रीय गौरव के विगत यथार्थ की स्मृतियों की आवश्यकता होती है, इसलिए उसमें अपने इतिहास के तलाश की कोशिशें भी साफ साफ मौजूद होती हैं। हिन्दी लेखन में भी ऐतिहासिक गौरव के स्मरण के बहाने ही इतिहास के निर्माण और राजनीतिक उद्देश्यों को साधने वाली उपयोगी व्याख्याओं पर ध्यान दिया जाना आरम्भ हुआ। इस प्रक्रिया में अनेक प्रवृत्तियां सामने आयीं। पहली प्रवृत्ति में बड़ी ही गहराई और आस्थापरक रूप से यह मान लिया गया कि मध्यकाल में मुसलमानी आतंक और वर्तमान में औपनिवेशिक दमन के नीचे पिस रहे भारत की तुलना में प्राचीन काल में देश अत्यन्त सुसमृद्ध और उच्च संस्कृति वाला था। दूसरी कि अपने ही ऐतिहासिक गौरव से हिन्दुओं के अनभिज्ञ रह जाने की वजह ये है कि उन्होंने अपना इतिहास खुद लिखने की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। अपने निबन्ध ÷ बादशाह दर्पण’ में भारतेन्दु किसी समय पूरे भारत को ÷ सारी पृथ्वी का मुकुटमणि’ मानते थे और आशा जता रहे थे कि ÷ कोई माई का लाल ऐसा होगा जो बहुत सा परिश्रम स्वीकार करके एक बेर अपने ÷ बाप दादों’ का पूरा इतिहास लिख कर उनकी कीर्ति चिरस्थायी करेगा।’ भारतेन्दु ने कश्मीरकुसुम, महाराष्ट्र देश का इतिहास, बूंदी का राजवंश, अगरवालों की उत्पत्ति, बादशाह दर्पण, उदयपुरोदय, पुरावृत्त संग्रह और चरितावली जैसी अनेक ऐतिहासिक रचनाएं लिखीं और हिन्दी में शिवप्रसाद सितारे हिन्द के बाद इतिहास के ज्ञान को बौद्धिक चेतना का अंग बनाने की दृष्टि में महत्वपूर्ण कार्य किया।

भारतेन्दु और उनके सहयोगी जिस समय हिन्दी लेखन के माध्यम से एक विशिष्ट इतिहास चेतना को हिन्दू राष्ट्रवाद के लिए इस्तेमाल कर रहे थे , उस समय प्राच्यविद्या का इतिहास दृष्टि के रूप में गहरा प्रभाव बुद्धिजीवियों की चेतना को मथ रहा था। बौद्धिक जिज्ञासा के साथ साथ प्राच्यविद्या को बढ़ावा देने वाले विद्वान ईसाइयत पर केन्द्रित पश्चिमी सभ्यता और वैदिक पौराणिक संस्कृति पर केन्द्रित हिन्दू संस्कृति की समानता पर जोर दे रहे थे। इस समानता पर जोर देते समय दो चीजें एक साथ सामने आयीं। पहली यह कि इस बात का श्रेय प्राच्यविदों ने स्वयं अपने को प्रदान किया कि उन्होंने ऐसी संस्कृति की विगत महानता को खोजा है जिससे यूरोपवासी तो क्या स्वयं उसी देश के लोग परिचित नहीं थे। दूसरी यह कि उन्होंने उस विगत सांस्कृतिक महानता से यूरोपियनों का परिचय कराते समय उसकी इस ढंग से व्याख्या की कि ईसाइयत के सिद्धान्तों के अभ्यस्त यूरोपियन लोग उसे आसानी से समझ सकें। यूरोप में ईसाइयत की धार्मिक अवधारणा में बहुदेववाद, अवतार पूजा और उपास्य की लौकिक लीलाओं का स्थान नहीं था और आरम्भ में यही मान्यताएं प्राच्यविदों के लिए कौतूहल का विषय बनीं। भारतेन्दुयुगीन लेखकों ने हिन्दुओं के प्राचीन गौरव और उनके मध्यकाल में मुसलमानों के द्वारा होने वाले दमन की स्मृतियों के जरिए एक सुसंगत हिन्दू धार्मिक समुदाय के निर्माण का प्रयत्न किया और इस काम में प्राचीनकाल के सम्बन्ध में प्राच्यविदों की इतिहास दृष्टि की सबसे अधिक मदद मिली। प्राच्यविदों ने एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं को कसौटी बना कर एक ओर हिन्दू धार्मिक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों की व्याख्या की, तो दूसरी ओर हिन्दी नवजागरण के लेखकों ने भी इतिहास के विवरण देकर हिन्दुओं के आन्तरिक भेदभाव को उनकी कमजोरी बताया और एकजुटता के राजनीतिक लक्ष्य को अपनाने पर बल दिया गया। प्राच्यविदों के द्वारा इतिहास के निर्माण एवं ऐतिहासिक अध्ययन के लिए प्रयुक्त कसौटियों के बारे में रोमिला थापर के मत को ही लें:

÷÷ प्राच्यविद्या ने धार्मिक विश्वासों तथा कर्मकाण्डों को हिन्दू धर्म नाम के एक सुसंगत धर्म तथा एक तर्कसंगत विश्वास से बांधने की जो कोशिश की वे सब सभी धर्मों के नजरिये से की गयी थी, क्योंकि प्राच्यविद्या उन्हीं से ज्यादा परिचित थी। उन्नीसवीं सदी तथा बीसवीं सदी के आरम्भ के सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलनों पर इन विचारों का किसी न किसी रूप में प्रभाव अवश्य पड़ा था। हिन्दू धर्म की आज की अनेक प्रस्तुतियां उसे, कुछ कुछ अस्पष्ट रूप से समझे गये, किसी सामी धर्म के समानान्तर मान कर चलने से ही निकली हैं। लेकिन यह तस्वीर घरेलू स्रोतों से निकलने वाली तस्वीर से बहुत भिन्न है।” 22

अपने उन्नीसवीं सदी के अध्ययन में वसुधा डालमिया ने राजेन्द्रलाल मित्र और आर.जी. भण्डारकर जैसे विद्वानों द्वारा प्राच्यविदों की धारणाओं को थोड़े फेरबदल के साथ अपनाये जाने और उनसे हिन्दू आत्मबोध का पुनर्निमाण होने की परिस्थितियों का जिक्र किया है। ब्रिटिश अधिकारी जैसे ग्रियर्सन व ग्रीव्ज द्वारा ईसाईयत और हिन्दू धर्म की तुलना को उन्होंने ईसाईयत के खिलाफ हिन्दू प्रतिरोध की धार को कुन्द करने की राजनीति के रूप में भी देखा है। वसुधा का महत्वपूर्ण योगदान ये है कि उन्होंने भारतेन्दु और उनके समकालीन लेखकों द्वारा हिन्दू धर्म में वैष्णव मत को महत्व देने और हिन्दू उपास्यों की प्राचीन यूरोपीय देवी देवताओं से तुलना करने के प्रयासों के प्राच्यविदीय स्रोतों की गहराई से पड़ताल की है। इसके लिए 1808 ईसवी में फ्रैडरिख श्लेगल द्वारा विष्णु को सूर्य का पर्यायवाची बताते हुए वैदिक एकेश्वरवाद पर बल देने, 1868 ईसवी में अलब्रेख्त वेबर द्वारा कृष्ण के मिथक का ईसाइयत से सम्बन्ध स्थापित करने, 1852 ईसवी में एफएस ग्राव्जे द्वारा बल्लभ सम्प्रदाय की गतिविधियों की ईसाई धर्म से समानता तलाशने और मानियर विलियन्स के द्वारा बहुदेववाद के भीतर छिपी समस्त ईश्वरों की एकता का सिद्धान्त प्रतिपादित करने का वसुधा डालमिया ने हवाला दिया हैः

÷÷ व्यक्तिगत ईश्वर में विश्वास को धर्म की अनिवार्य विशेषता के रूप में देखा गया। उपनिषदों एवं अद्वैत वेदान्त में मौजूद अवैयक्तिक ईश्वर की धारणा को दर्शन के रूप में समझा गया। फिर वैष्णववाद को भारत के एकेश्वरवादी धर्म के रूप में पहचाना गया क्योंकि वह व्यक्तिगत ईश्वर की धारणा पर आधारित था और विष्णु या उनके अवतार कृष्ण के रूप में व्यक्तिगत उपास्य की भक्ति या पूजा पर केन्द्रित था”23

प्राच्यविदों की इतिहास दृष्टि ने भारतेन्दु को किस गहराई से प्रभावित किया , इसे भारतेन्दु के ÷ वैष्णवता और भारतवर्ष’ और ÷ इशूखृष्ट वा ईशकृष्ण’ जैसे लेखों में देखा जा सकता है। भारतेन्दु ने अपने नाटक ÷ भारत जननी’ में भारत माता की सेवा कर रहे प्राच्यविदों के योगदान को स्वीकार करते हुए ही लिखा है,

÷÷ माता! तुमने क्या ग्लैडस्टन फासेट व मानियर विलियन्स इत्यादि महात्माओं का नाम नहीं सुना! ये लोग तो अभागे भारत सन्तानों के शोकनिवारण के हेतु तन मन सब अर्पण कर चुके हैं और रात दिन उसी का प्रयत्न किया करते हैं।” 24

अनन्त अन्धविश्वासों , कर्मकान्डों और सामाजिक वर्जनाओं के पक्ष की अवहेलना करके हिन्दू धर्म को विगत गौरव याद दिलाने में प्राच्यविदों ने अपनी भूमिका निभायी और साथ ही ईसाई धार्मिक सिद्धान्तों से उसके कुछ पहलुओं की तुलना कर हिन्दुओं और अंग्रेजों की धार्मिक निष्ठाओं में समानता होने के एक व्यापक भ्रम का सृजन किया।

समाज के किसी वर्ग या समूह को जब उन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जिनमें राष्ट्र के गठन और उसकी पहचान के निर्धारण के प्रश्न केन्द्र में हों तो उन्हें ( वर्ग या समूह को) पीछे पलट कर अपने इतिहास को खंगालने और उसे पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता का भी अनुभव होता है। इतिहास की खोज का अर्थ यह नहीं होता कि कोई सच्चा, तटस्थ अथवा वस्तुनिष्ठ इतिहास खोज लिया जाएगा और उसे राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता और उससे सन्बन्धित चुनौतियां जिस प्रकार इतिहास के एक खास दौर में पैदा होती हैं उसी प्रकार इतिहास निर्माण के प्रयत्न भी किसी खास वर्ग, समूह या जाति की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसी विशेष कालखण्ड में आरम्भ किये जाते हैं। उन्नीसवीं सदी में देश के विभिन्न क्षेत्रों में इतिहास के शोध के प्रयत्न जारी थे और इतिहास के विभिन्न चरणों की व्याख्या हिन्दू राष्ट्रीयता के गठन व उसे ऐतिहासिक वैधता दिलाने के लिए की जा रही थी।

भारत में आधुनिक अथोर्ं में राष्ट्र की अवधारणा का विकास 19 वीं सदी के आरम्भ में होना आरम्भ हुआ जब अंग्रेजों ने उद्योग व्यापार और प्रशासन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने विराट तन्त्र का निर्माण किया। भारत में इससे पहले भी बाहर से आये लोगों ने यहां राजनीतिक, प्रभुत्व स्थापित किया था, पर उस समय भी देश का राजनीतिक एकीकरण का काम पूरा न हो पाने के कारण लोग देश के विभिन्न भूभागों, राजाओं, छोटे बड़े सामन्तों और जमींदारों के बीच बंटे रहे। पहले के आक्रमणों और भारत में अंग्रेजों के आगमन के बीच में फर्क के बारे में मार्क्स ने अपने भारत सम्बन्धी लेखों में लिखाः

÷÷ अरब, तुर्क, तातार, मुगल जिन्होंने एक के बाद एक हिन्दुस्तान पर चढ़ाई की, खुद बहुत जल्द हिन्दुस्तानी बन गये। इतिहास के एक शाश्वत नियम के अनुसार बर्बर विजेताओं को उनकी प्रजा की ऊंची सभ्यता ने जीत लिया। अंग्रेज पहले विजेता थे जिनकी सभ्यता हिन्दुस्तानियों से ऊंची थी और इसलिए जिन तक हिन्दुस्तानी सभ्यता की पहुंच न थी।” 25

अंग्रेजों के अधीन जब राष्ट्र निर्माण की कोशिशें शुरू हुईं तब जिस चीज की सबसे अधिक आवश्यकता पड़ी वह थी राष्ट्र निर्माण के प्रतीकों की आवश्यकता। चूंकि राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना 19 वीं सदी में किसी धर्मनिरपेक्ष अथवा वर्गीय एकता के दायरे में न रह कर एक मुस्लिम विरोधी और हिन्दूवादी दृष्टि से प्रभावित होने के लिए बाध्य हो गयी थी इसीलिए हिन्दू स्वाभिमान व शौर्य के प्रतीकों का इस काल में सावधानी से चुनाव किया गया और उनके अपने राजनीतिक सामाजिक सन्दर्भों से मुक्त करके उन्हें समूचे देश की प्रतीकात्मक संघर्ष और विजय में बदल दिया गया। प्रतीकों के इस चयन में प्राचीन और मध्यकाल दोनों कालों के मिथकीय चमत्कार और ऐतिहासिक वीरता का परिचय देने वाले प्रतीकों को विभिन्न विधाओं में रचित साहित्य के माध्यम से याद किया गया। 1882 ई. में रचित कवित विजयिनी विजय वैजयन्ती में भारतेन्दु ने ऐतिहासिक गौरत्व को तब याद किया जब इस वर्ष भारतीय सेना ब्रिटिश सरकार की ओर से लड़ती हुई मिस्र की जीतने में कामयाब रही। 22 सितम्बर 1882 को शाम छह बजे बनारस के टाउन हाल में इस जीत का स्वागत करने के लिए एक सभा हुई थी जिसमें भारतेन्दु ने अपनी ÷ विजयिनी विजय वैजयन्ती’ का पाठ किया था।

इसमें भारत के अतीत की तुलना में उसकी वर्तमान हीन दशा पर क्षोभ व्यक्त किया गया। एक ओर अर्जुन , भीम, कर्ण, नकुल सहदेव, पुरु, रघु और परशुराम आदि मिथकों का भाववेगपूर्ण स्मरण किया, दूसरी ओर मध्यकालीन नायकों पृथ्वीराज और हम्मीर जैसे चरित्रों का स्मरण किया। इसके अलावा हिन्दी नवजागरण के लेखन में प्रतीकों के निर्माण की प्रक्रिया केवल ऐतिहासिक मिथकीय चरित्रों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि इसका दायरा वृहद समाज में भावात्मक उत्तेजना भरने की दृष्टि से अन्य विषयों जैसे भाषा, धर्म, गाय और स्त्री तक भी फैल गया।

हिन्दी भाषा कैसे उर्दू का विरोध करती हुई और उसके प्रभाव से अपने को मुक्त करके हिन्दू अस्मिता के प्रतीक में ढाली गयी इसका सबसे सटीक उदाहरण 1892 में प्रतापनारायण मिश्र द्वारा ÷ ब्राह्मण पत्र’ के विदाई अंक में दिया गया ÷ हिन्दू हिन्दी हिन्दुस्तान’ का मंत्र था। इसके अलावा उन्होंने अपने लेख ÷ नागरी महिमा की एक चीज’ में अगर नागरी को ÷ सब गुण का छोटा सागर’ और संस्कृत को ÷ ईश्वर की महिमा’ या ÷ ऋषियों की उदार बुद्धि का अंश’ के रूप में याद किया तो उर्दू बीबी की पूंजी में उर्दू को ऐसी भाषा में रूप में याद जिसे ÷ जन्म भर पढ़ा कीजिए, तेली के बैल की तरह एक ही जगह घूमते रहोगे।’26 इसी प्रकार इस समय के गोरखपुर के एक अन्य लेखक सोहन प्रसाद मुदर्रिस ने ÷ हिन्दी और उर्दू की लड़ाई’ नामक पद्य नाटक लिख कर हिन्दी उर्दू के बीच की कट्टर दुश्मनी को सामने रखा। इसमें उर्दू एक पात्र है और हिन्दी एक अन्य पात्र। उर्दू अपनी उपयोगिता यह कह कर साबित करने की कोशिश कर रही है कि उसकी वजह से लोगों को तहसीलदार जैसी नौकरियां मिल सकती हैं। वह कहती हैं:

÷ पढ़ब जो उर्दू प्रेम से होइब तहसिलदार।’ 27

उधर हिन्दी का तर्क है कि उर्दू हत्यारिन और नीच जाति की है और आर्यों के हाथ में ताकत न रह जाने से वह सिर पर चढ़ गयी है। उर्दू के लिए नफरत को बयां करते हुए हिन्दी कहती है :

÷ आर्य राज है आज नहिं देतौ मुंह पर थूक।’ 28

इस पद्य नाटक में उर्दू को इस सीमा तक मुस्लिम अस्मिता का अंग बताया गया कि उर्दू सीखने पढ़ने का मतलब ही मुस्लिम धार्मिक संस्कृति को अपनाना हो गया।

18 अप्रैल 1900 ई. तत्कालीन लेफ्टिनेण्ट गवर्नर सर एण्टनी मैकडॉनल के आदेश के तहत प्रान्तीय स्तर पर सरकारी दफ्तरों और अदालतों में फारसी के साथ नागरी लिपि में कामकाज को मंजूरी दे दी गयी। इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ और 23 मई 1900 ई. में भारतमित्र में छपे अपने लेख में बालमुकुन्द गुप्त ने इस मौके पर हिन्दुओं खासकर नागरीप्रचारिणी सभा के लोगों द्वारा झूठमूठ के आनन्द में उन्मत्त होने की जगह उन्हें संयम रखने की सलाह दी। लेकिन बालमुकुन्द ने केवल मुसलमानों के अखबारों को इस बात का दोषी ठहराया कि वे भाषा के मुद्दे को ÷ महजबी रंग में रंगकर इसे हिन्दू उर्दू की लड़ाई बता रहे हैं।’29 इसके अतिरिक्त यह सीख केवल मुसलमानों के लिए ही थी कि उन्हें:

÷ यह जानना चाहिए कि जिस भाषा को वे उर्दू कह रहे हैं, वह हिन्दी से अलग नहीं है। उर्दू के आदि कवियों ने उस भाषा को हिन्दवी कह कर पुकारा है।’ 30

बालमुकुन्द ने मुस्लिम लेखकों पर तो उर्दू के साम्प्रदायिकीकरण का इल्जाम मढ़ दिया , पर खुद हिन्दी लेखकों को भी ठीक यही सलाह दी जा सकती थी हिन्दी भाषा और लिपि के सवाल को हिन्दू मुसलमान झगड़े के रूप में पेश करना अतार्किक प्रयास है।

इस दौरान गाय के संरक्षण और उससे हिन्दू पहचान के जुड़ाव पर भी कई तीखीं बहसें और विवाद उठ खड़े हुए। मसलन , शिवप्रसाद सितारेहिन्द ने अपनी काफी आधुनिक व वैज्ञानिक तरीके से लिखी किताब ÷ इतिहासतिमिरनाशक’ में प्राचीन वैदिक समाज में गोमांस खाने और यज्ञ में पशुओं की बलि देने से सम्बन्धित इतिहास के विवादास्पद विषय को गम्भीरता से उठाया, लेकिन पतली तनी पर नटचाल की तरह उन्होंने कई तरह के सन्तुलन साधने की कोशिशें कीं। प्राचीन काल में गोमांस सेवन के बारे में वे लिखते हैं, ÷ ब्राम्हण यज्ञ में बलि देकर स्वच्छन्दता से गोमांस भक्षण करते थे।’

जब उन्हें लगता है कि यह कथन हिन्दू धार्मिक आस्थाओं के प्रतिकूल है और काफी चुभने वाला हो सकता है , तो आगे यह भी जोड़ देते हैं ÷ फिर वह उस गौ को जिला भी देते थे।’ यानी वैदिक युग के ब्राह्मण पहले तो गाय को मार कर खा लेते थे और बाद में गाय से जुड़ी धार्मिक आस्थाओं के कारण उसे फिर से जिन्दा भी कर देते थे। ब्राह्मणों की मौज हो गयी और गाय भी बच गयी। अपने ही तर्कपूर्ण चिन्तन से घबरा कर पीछे हटने और फिर हवा में हाथ पैर मारने से शायद ऐसी ही हास्यास्पद बातों का जन्म होता है। यही नहीं, जब शिवप्रसाद को लगता है कि इससे भी काम नहीं चल रहा तो यह लिखने के लिए मजबूर हो जाते हैं :

÷÷ वह ऐसी अथवा इतनी गायें उसके वास्ते कभी न लेते होंगे जिससे खेतीबारी इत्यादि का हर्जाना हो और कौन जाने ऐसी ही लेते हों जो न दूध देने के काम की हों न बच्चा जनने के काम की।” 31

इस तरह शिवप्रसाद इतिहासतिमिरनाशक में एक ओर बौद्वों की तुलना में ब्राह्मणों के पाखण्ड की हंसी उड़ाते हैं , दूसरी ओर गोमांस भक्षण जैसे मुद्दे पर खुल कर उनका बचाव करते नजर आते हैं।

आर्यों के मूल स्थान का सवाल शिवप्रसाद के समय भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन चुका था और शिवप्रसाद ने इस विषय पर भी बड़ा ही नपातुला दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने आर्य आक्रमण की अवधारणा का सामना बड़ी ही बुद्धिमानी से करने के लिए एक नया सिद्धान्त गढ़ दिया। वह यह कि भारत में सरस्वती नदी के तट पर स्थित पंजाब , सिन्धु के इलाके और ईरान देश, दोनों ही आर्यों के मूल स्थान रहे हैं। भारत के प्राचीन आर्यों के बारे में उन्होंने लिखाः

÷÷ ये हिन्दू आर्य लोग उस समय सुख चैन से सारस्वत देश में अर्थात सरस्वती के किनारे पंजाब और उसके आसपास निवास करते थे। ज्यों ज्यों सन्तान बढ़ते गये पूर्व की ओर फैलने लगे और भारी भारी जंगलों में आग लगा कर जैसा कि अब उत्तरी अमेरिका में करते हैं रास्ते निकाले। यहां तक कि जमुना और गंगा पार होकर कोशल और मिथिला अर्थात अवध और उसके समीपी इलाकों में चले आये पश्चिमोत्तर हम लोगों का मूल स्थान होने में किसी तरह का सन्देह नहीं पाया जाता है।” 32

इसी प्रकार ईरान को भी आर्यों का उद्भव स्थल दिखाने के लिए लिखा :

÷÷ पारस देश वाले भी आर्य थे वरन इसी कारण उस देश को अब भी ईरान कहते हैं। यूनान वाले उसे अरिआन पुकारते थे।” 33

जाहिर है कि पूर्वी एशिया के बारे में अठारवीं सदी में यूरोप में विकसित आर्य आक्रमण की धारणा से निपटने के लिए शिवप्रसाद ने खास तरीका ईजाद किया था। उन्होंने एक साथ आर्यों के दो मूल स्थान खोज निकाले। ईरान के अलावा सरस्वती तट पर बसा पंजाब क्षेत्र भी आर्यों की जन्मस्थली बन गया। बिना लाठी तोड़े सांप मार देने का यह अद्भुत उदाहरण था। एक समय बाल गंगाधर तिलक ने भी आर्यों की जन्मस्थली उत्तरी धु्रव मानी थी। बाद में जब आर्यों के मूल स्थान को लेकर तीखी बहसें हुईं तो एक संघ विचारक विष्णुकान्त शास्त्री ने यह कह कर अपनी ही हंसी उड़वायी थी कि उत्तरी धु्रव पहले भारत का ही अंग था और वह बाद में खिसक कर दूर चला गया , जबकि आर्य यहीं रह गये।

इसी प्रकार गोकुशी के मुद्दे को भी हिन्दुओं की आस्था और परम्परागत धर्म पर प्रहार के रूप में उछाला गया। 1877 ई. में जब दिल्ली दरबार हुआ तब भारतेन्दु ने गोरक्षा के मुद्दे की अहमियत देते हुए इसके पक्ष में 60 हजार लोगों के दस्तखत वाला एक मेमोरियल सरकार को दिया। साहित्यिक स्तर पर भारतेन्दु की किताब गोमहिमा (1881), अम्बिकादत्त का नाटक ÷ गोसंकट’ (1882) और प्रताप नारायण मिश्र का लेख आलमे तस्वीर इत्यादि कृतियां यह दिखाती हैं कि राष्ट्रनिर्माण की कल्पना पूरी तरह से आधुनिक, समावेशी ओर धर्मनिरपेक्ष नहीं हुई थी और राजनीतिक वर्चस्व के लिए कई बार धार्मिक आस्थाओं को पूरे राष्ट्र के जटिल प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करने की भी चेष्टा की जाती थी। गोरक्षा के प्रश्न को उभार कर हिन्दुओं के निर्दयी स्वभाव के मुसलमानों के आगे निरीहता को प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती थी। अम्बिका दत्त व्यास के नाटक ÷ गो संकट’ में लाला गोबरधन दास नामक पात्र सारे मुसलमानों को गोकुशी का अपराधी ठहराते हुए कहता है :

÷ हम लोगों की तो यह भलमनसी कि निज मन्दिरों के पास इनको मस्जिद बना लेने दें, रात दिन बड़े मियां बड़े मियां कह कर बातें करते हैं, और इनके यह कर्म कि हम लोगों की माता सदृश गौ को…। 34

÷ गो महिमा’ में भारतेन्दु ने गाय की पौराणिक शास्त्रीय महिमा का बखान करने के लिए इसमें प्राचीन पुराणों और अन्य हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में गाय के बारे में वर्णित श्लोकों के हिन्दी अनुवाद का संग्रह किया। बाइस पृष्ठों की इस किताब के अन्त में किताब छपाने के मकसद को स्पष्ट करते हुए लिखा :

÷÷ उसी आर्यतेजोमय रक्त को सतेज करने ही को यह संग्रह प्रकाशित होता है।” 35

उधर प्रताप नारायण मिश्र ने गौ माता की महिमा की तारीफ करते हुए उसे ÷ पूज्य ब्राह्मण के नाम से भी पहले स्मरण की जाने वाली’36 कहा और लिखा कि ÷ पवित्रता यह कि उनका मल मूत्र तलक खाया जाता है।’37 गाय से जुड़े हिन्दू धार्मिक विश्वासों की चर्चा करने के साथ ही प्रतापनारायण ने उनके व्यावहारिक उपयोग पर भी बल दिया। उन्होंने अफसोस जाहिर किया कि लोग आतिशबाजी और अदालतों में सैकड़ों रुपया फूंक देते हैं पर ÷ गऊ माता के नाम पर कुछ भी नहीं निकलेगा।’38

प्राचीन हिन्दू कथा नायकों का स्मरण कविताओं में ही हुआ है जबकि मध्यकालीन हिन्दू राजाओं के कृत्यों को प्रेरणास्रोत की तरह प्रस्तुत करने के लिए उन पर बड़े बड़े नाटक , जीवनियां और लेख लिखे गये। इन महान पराक्रमी और आर्य धर्म के रक्षक हिन्दू राजाओं के चरित्र चित्रण का यह लाभ भी था कि इन्हीं के माध्यम से गाय, ब्राह्मण, स्त्री रक्षा और धर्म जैसे विषयों को ऐतिहासिकता का आवरण प्रदान कर दिया जाता था। यहां तक कि सभी ऐतिहासिक राजाओं की गाय ब्राह्मण रक्षक और स्त्री रक्षा के आधार पर ही प्रशंसा की जाती थी। भारतेन्दु के ÷ नीलदेवी’ नाटक में राजा सूर्यदेव और उसकी र