Archive for April 27th, 2007

क्या महाबली लौटेगा अपनी मांद में

एमजे अकबर के लिए अलग से कोई परिचय देने की ज़रूरत नहीं है. आजकल वे अंतररष्ट्रीय मुद्दों,कखासकर अमेरिकी नीतियों, पर लगातार लिख रहे हैं.अपने इस लेख में वे अमेरिका के इराक से लौटने को लेकर अमेरिका में चल रहे राजनीति की चर्चा कर रहे हैं. यह लेख प्रभात खबर में हाल ही में प्रकाशित हो चुका है. वहां से साभार.

पुनर्वापसी की ओर दुनिया
एमजे अकबर
शांति की बात करना क्या देशभक्ति है? अमेरिका आज बहस के इसी मुद्दे से गुजर रहा है. इराक में उसकी हार का निहितार्थ और जीत का अर्थ तलाशा जा रहा है. निश्चय ही युद्ध को सदैव देशभक्ति से जोड़ा गया है. किसी भी नेतृत्व के लिए एक हाथ में बंदूक और दूसरे हाथ में बिगुल जीत का ध्वज माना गया. जो जितना ज्यादा अपनी मातृभूमि का कर्ताधर्ता बनता जाता है, वह अपने लोगों को उतना ही अधिक कब्र की ओर धकेल सकता है. आतंक वादियों की देशभक्ति भी ऐसा ही मजबूत लबादा है, जो अपने पापों को ऐसे ही गैरजिम्मेदार तरीके से घालमेल कर बहाना-बनाना चाहते हैं.
इसी तरह आज कमांडर इन चीफ की महिमा की रक्षा करना भी देशभक्ति का तकाजा बन गया है. भले ही यह कोई बाध्यता नहीं है. राजनीतिज्ञ वोट की तलाश में शांति प्रयासों को युद्ध में तब्दील करने की मंशा रखते हैं. वजह यह कि शांति अस्पष्ट होती है, जबकि युद्ध में बल की प्रधानता दिखती है. यद्यपि आम धारणा यही है कि मतदाता शांति को ही पसंद करते हैं, पर सामान्य अनुभव हमें बताता है कि युद्ध के बाद मतदाता ज्यादा प्रभावित किये जा सकते हैं, जबकि डर की भावना को सर्वाधिक मुखर रू प में युद्ध के माध्यम से व्यक्त कि या जा सक ता है. भावनाओं और तर्क का यही वह शक्तिशाली समिश्रण है, जिसे बुश ने पिछले पांच वर्ष से बनाये रखा है. अमेरिकी चेतना में डर की भावना बुश के कारण नहीं, बल्कि 9/11 की घटना से पैदा हुई. इस पूरे मुद्दे को जॉर्ज बुश ने ब़डी होशियारी से भुनाया है. उन्होंने अमेरिकन एजेंडा के बजाय बुश बजेंडा को सर्वोपरि रखा. यही वह सामान्य कारण है, जिस बिना पर आफ गानिस्तान और इराक युद्ध के बीच अंतर तलाशा जा सकता है. ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौंपने से तालिबानियों के इनकार करने से अमेरिका को उस पर हमला क रने की वैधता मिल गयी, लेकिन सद्दाम हुसैन के खिलाफ युद्ध आतंकवाद के खिलाफ युद्ध जैसा नहीं माना जा सकता.
इराक युद्ध ने इस बात को बार-बार सिद्ध किया कि जॉर्ज बुश और उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने इस पूरे प्रकरण को उपहास का विषय बना दिया. इसके लिए तथ्यों को तोड़ मोड़ कर और अतिशयोक्ति पूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया. सद्दाम हुसैन पर लादेन का सहयोगी होने का झूठा आरोप थोपा गया. आतंक के खिलाफ युद्ध का मुहावरा लोगों में उत्सुकताका विषय बना दिया गया. एक अदृश्य आतंक की सत्ता के खिलाफ किस तरह लड़ा जाये, यह बात अचानक ही नहीं पैदा हुई. अपने शत्रुओं को निशाने पर लेने और व्हाइट हाउस को सशक्त बनाने के लिए इन बातों को जानबूझ कर हवा दी गयी. बुश से जो सबसे बड़ी गलती हुई वह यह थी कि अपने दुश्मनों को सजा देने की उनकी इच्छा इन सबके बावजूद एक अधूरा सपना ही रह गयी. उनकी आशाओं के विपरीत इराक में चरमपंथियों के उभार से यह बात सिद्ध हुई कि उनके लक्ष्य ने उन्हीं के लिए विध्वंसक परिणाम पैदा कि ये. वहां रोज हो रही हिंसक घटनाएं, सेना पर अतिरिक्त दबाव, बढ़ रहे वित्तीय खर्च और जनविरोध बताते हैं कि बुश और उनकी रिपब्लिक न पार्टी के लिए यह पूरा अभियान बहुत महंगा सिद्ध हुआ. फिर भी युद्ध को सही ठहराने की कोशिश से बुश की दृढ़ता का पता चलता है. हालांकि इसकी उपयोगिता खत्म हो गयी है, लेकि न इसका राजनीतिक फ़ायदा तो उठाया ही जा सकता है. अब बुश और डेमोक्रे ट्स के बीच बहस का मुद्दा यह है कि क्या इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की कोई समय सीमा तय होनी चाहिए? डेमोक्रे ट्स चाहते हैं कि अगले 18 महीनों के अंदर, यानी नया राष्ट्रपति चुने जाने से पूर्व सैनिकों की वापसी हो जानी चाहिए. लेकि न बुश का मानना है कि इसकी समय सीमा तय करने से वे युद्ध हार जायेंगे. वस्तुत: बुश की इन बातों से उनका खोखलापन ही उजागर होता है. वह अपनी नयी चरमपंथी पुनरुत्थान रणनीति के तहत इराक में शांति लाने के लिए अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं. ऐसी बातों से जॉर्ज बुश नाराज रिपब्लिक नों का समर्थन पा रहे हैं, क्योंकि इससे कहीं न क हीं एक समय सीमा बंधती है. यदि अक्तूबर-नवंबर माह तक यह रणनीति कारगर नहीं होती है, तो बुश अपनी नीतियों में बदलाव करेंगे. और इस बदलाव से एक प्रकार से इराक से मुक्ति मिल सकेगी. इस तरह डेमोक्रेट की अपेक्षा रिपब्लिक न बुश को और भी कम समय दे रहे हैं. वस्तुत: बुश के लफ्ज कुछ अलग हैं, जबकि अमेरिकी सेना और जनता इराक से मुक्ति चाहती है. पेंटागन ने स्वीकार किया है कि इधर सशस्त्र बलों पर बहुत दबाव रहा है, इस कारण इराक में सैनिकों की सामान्य ड्यूटी सुधार कर उसे 15 महीने कर दिया गया है. वियतनाम युद्ध के काल में भी यह समय सीमा अधिक तम 15 महीने ही थी. सेना का कहना है कि बहुत ऊ़चे वेतन पर पिछले वर्ष 80 हजार लोगों की भर्ती के बावजूद उसने 14 लाख सैनिकों की निर्धारित संख्या को बनाये रखा है. इस संख्या को सामान्य अवकाश का सूचक नहीं माना जा सकता. इससे इराक में सैनिकों की कमश: घटती संख्या का भी पता चलता है. युद्ध के समय अधिकतर युवा अपने बेहतर भविष्य, अधिक लाभ और मिलनेवाले ढेर पैसे की वजह से सेना में भर्ती हुए थे. कुछ डेमोक्रेट राजनीतिज्ञ पहले के मसौदे में बदलाव चाहते हैं, ताकि धनी बच्चें को युद्ध के मैदान में लाया जाये. उनका मानना है कि यदि जॉर्ज बुश की नीतियों के लिए अभिजात्य वर्ग अपने बच्चें को मरने के लिए भेजता है, तो इससे युद्ध बहुत जल्दी समाप्त होगा.
कोई नहीं जानता कि इसका परिणाम अमेरिका की किस पीढ़ी को भुगतना होगा. इस युद्ध की लागत 500 बिलियन डॉलर पार कर चुकी है. इसका सबसे बड़ा नुकसान वित्तीय मोर्चे पर हुआ है. युद्ध में बहाये जा रहे खून की कीमत बिगड़ते बैलेंस सीट के रूप में सामने आया है. इराक में उपयोग में आ रहे हेलिकॉप्टरों को सितंबर में नयी मशीनों द्वारा बदल दिया जायेगा. यह नया बेड़ा वी-22 विमानों का होगा, जो हेलिकॉप्टर की तुलना में अधिक गतिवाला और युद्धक किस्म का होगा. हालांकि चरमपंथियों के विरुद्ध इसकी उपयोगिता के बारे में काफी अनिश्चय की स्थिति है, पर इसकी लागत कम से कम प्रति विमान 20 बिलियन डॉलर तो है ही. इससे सामरिक उद्योगों को बहुत धनी होने का मौका जरूर मिल जायेगा.

देखें फ़ारेनहाइट 9.11. सितंबर 11, 2001 को ट्रेड सेंटर टावरों पर हमले की असली कहानी. इसी घटना को आधार बना कर अफ़गानिस्तान और इराक पर हमला किया गया.

अब अमेरिका की जनता को एहसास होने लगा है कि पैसे या सुंदर लफ्जों के छद्म से जमीनी युद्ध नहीं जीता जा सकता. बुश के लफ्जों के छद्म की रणनीति के बने रहने की सामान्य वजह यह है कि यहां युद्ध की कोई परिभाषा नहीं है. इसलिए हासिल किये गये निश्चित लक्ष्यों की बात भी नहीं की जाती. वास्तव में देखा जाये, तो इराक युद्ध के दोनों घोषित उद्देश्य पूरे हो चुके हैं. अब यह निश्चित हो चुका है कि वहां न तो सामूहिक विनाश के हथियार हैं और न ही सद्दाम हुसैन. इराक अगले सौ वर्ष तक उन्हें पाने की सामर्थ्य भी नहीं रखता है. अब सद्दाम मर चुके हैं और उनकी सत्ता नष्ट हो चुकी है. इसलिए अब अमेरिका और ब्रिटेन की सेना बगदाद में पुलिस मैन के रूप में क्यों बनी हुई है? यदि यही उनका मिशन है, तो यह असंभव मिशन है. इससे किसी भी दिन पता चलेगा कि अमेरिका और ब्रिटेन की मुख्य जगहों पर जवाबी हमला किया गया. जब तक इराकी धरती पर विदेशी सैन्य टुकड़ियां बनी रहेंगी, तब तक वहां से उग्रवाद को नहीं मिटाया जा सकता. जब कोई प्रशासन बिखरना शुरू होता है, तो केवल एक खंभा ही नहीं गिरता; विश्वास के क्षरण का प्रभाव पूरी संरचना पर पड़ता है. इस सरकार के सभी महत्वाकांक्षी लोग गलत कारणों से पहले पन्ने पर छाये हुए हैं. इस विजय के सूत्रधार कार्ल रावे यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि व्हाइट हाउस के अभिलेखागार से लाखों करोड़ों ई-मेल क्यों हटाये गये. इराक के मुख्य मस्तिष्क पॉल वोल्फोविट्ड अब विश्व बैंक के अध्यक्ष हैं. वह अभी अपने गर्ल फ्रेंड को बहुत ऊंचे वेतनमान पर नौकरी देने के मामले में अपने प्रभाव के दुरुपयोग मामले में सफाई दे रहे हैं. उन पर आरोप लगोनवालों का मानना है कि वह विश्व बैंक की परवाह नहीं करते. वास्तव में पॉल वोल्फोविट्ज, कार्ल रावे, डिक चेनी और जार्ज बुश विश्व बैंक की बहुत ज्यादा परवाह करते हैं. यदि वह किसी की परवाह नहीं करते तो शेष पूरे विश्व की. इस तरह दुनिया पुनर्वापसी की राह पर है.

अनुवादक - योगेंद्र/कमलेश

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ठेके के दौर में मज़दूर आंदोलन : सब रस ले गयी पिंजडेवाली मुनिया

कुमार अनिल भाकपा माले लिबरेशन से जुडे़ रहे हैं. अभी प्रभात खबर में हैं. मई दिवस को देखते हुए आज के हालात में मज़दूर संगठनों पर उनकी चिंताएं इस लेख के माध्यम से सामने आयी हैं. आगे भी वे कुछ लिखेंगे इस मसले पर. हमारा इरादा आज के राजनीतिक-आर्थिक हालात में मज़दूर आंदोलन पर एक बहस चलाने का है. आइए आप भी इसमें हिस्सा लीजिए.

कब चेतेगा मजदूर वर्ग
कुमार अनिल
बड़ी अजीब स्थिति है. सीपीएम से जुड़ी सीटू पटना में इस बार अलग से मजदूर दिवस मनायेगी. पिछले क ई वर्षों से क म-से-क म पहली मई को सारी ट्रेड यूनियनें एक मंच पर आती रही हैं. इस बार मामला नंदीग्राम को लेकर उलझ गया. नंदीग्राम में कि सानों पर हुए दमन को जहां अन्य संगठन मुद्दा बनाना चाहते हैं, वहीं सीपीएम अपनी सरकार की आलोचना को तैयार नहीं है. वाम मोरचे में फूट पड़ गयी. एटक, यूटीयूसी(लेस), यूटीयूसी, ए टू व एचएमएस एक मंच पर होंगे व दूसरी ओर होगी सीटू . बहुत दिनों के बाद कि सानों के मुद्दे पर ट्रेड यूनियनों में बहस हुई.
आजादी के बाद से ही कि सानों व दूसरे तबकों के आंदोलनों से मजदूर वर्ग का आंदोलन कटता चला गया. आज मजदूर वर्ग का आंदोलन पूरी तरह अपनी ही मांगों में सिमट क र रह गया है. वेतन, बोनस, प्रोन्नति, भत्ता ही उसके लिए सब कुछ है. आंदोलन अपनी राष्ट्रीय भूमिका खोता चला गया.
एक समय ट्रेड यूनियन आंदोलन ने देश की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज क रायी थी. क म्युनिस्ट पार्टी के बनने से पहले 1921 में एटक के दूसरे अधिवेशन में 50 हजार से ज्यादा मजदूर झरिया में जुटे थे. अधिवेशन का पहला प्रस्ताव स्वराज के लिए था. जोरदार शब्दों में घोषणा की गयी कि स्वराज पाने का सही समय आ गया है. दूसरा प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय भाईचारे को लेकर था. सूखे व अकाल से पीड़ित रूसियों के प्रति संवेदना प्रकट की गयी. अधिवेशन ने देश के मजदूरों का आह्वान किया कि वे रूसी भाइयों के लिए अपना एक दिन का वेतन दान करें. साइमन कमीशन जब मुंबई पहुंचा तो 20 हजार मजदूरों ने सड़क पर उतर कर विरोध कि या.
कम्युनिस्ट पार्टी की उदासीनता के बावजूद नौ अगस्त, 1942 को जब महात्मा गांधी गिरफ्तार हुए, तो देश भर के मजदूरों ने हड़ताल की. 1946 के नौसैनिक हड़ताल के समर्थन में मजदूरों की हड़ताल को भला कौन भुला सकता है.
वैश्वीकरण के इस युग में इकाई, विभाग व संवर्ग में बंटे मजदूर वर्ग को न सिर्फ अपनी एकता बनानी होगी, वरन अपनी सामाजिक भूमिका को फिर से परिभाषित भी करना होगा.
बिहार में सेवा क्षेत्र के कर्मियों की बड़ी तादाद है. अब तब उन्होंने सैक ड़ों हड़तालें की हैं. उनका वेतनमान भी काफ़ी आक र्षक है, लेकिन उन्होंने कभी जनता से जुड़ने की कोशिश नहीं की. बीपीएल(गरीबी रेखा से नीचे रहनेवालों की सूची, जो तैयार हो रही है) में धांधली को लेकर बिहार के ग्रामीण गरीब आंदोलित हैं. उन्होंने अपने दम पर सरकार को पीछे धकेला. आज हर जिले में सरकारी महकमा सूची में सुधार के लिए रतजगा कर रहा है. नीतीश सरकार ने मामले की गंभीरता को समझा, पर मजदूर वर्ग की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी. पंचायत स्तर पर धांधली में सरकारी सेवकों के नाम धड़ल्ले से आ रहे हैं, पर किसी कर्मचारी संगठन ने अपने सहकर्मियों की घूसखोरी की प्रवृत्ति को मुद्दा नहीं बनाया. नरेगा(राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का बिहार में बुरा हाल है, पर इसे संगठित क्षेत्र के कर्मियों ने मुद्दा नहीं बनाया. बिहार में मजदूर वर्ग का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है. सबसे बड़ी संख्या खेत मजदूरों की है. निर्माण मजदूरों की भी बड़ी तादाद है. बिहार की आबादी के एक तिहाई इस हिस्से से मुंह मोड़ कर किसी आंदोलन का विकास नहीं हो सकता.
आज का दौर ठेके और निजीक रण का दौर है. ठेके पर शिक्षक, कर्मचारी और यहां तक की डॉक्टर-इंजीनियर
की भी बहाली हो रही है. मजदूर वर्ग के समक्ष यह बिल्कुल नयी परिस्थिति है. जब कुछ भी स्थायी न हो, तो मजदूरों को संगठित करना और भी मुश्किल है. ब्रिटेन व अमेरिका की ट्रेड यूनियनें विलय के लिए वार्ता चला रही हैं. भारत के ट्रेड यूनियन नेताओं को भी कुनबों की राजनीति से जल्दी ही बाहर आ जाना चाहिए.

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क्या महाबली लौटेगा अपनी मांद में

एमजे अकबर के लिए अलग से कोई परिचय देने की ज़रूरत नहीं है. आजकल वे अंतररष्ट्रीय मुद्दों,कखासकर अमेरिकी नीतियों, पर लगातार लिख रहे हैं.अपने इस लेख में वे अमेरिका के इराक से लौटने को लेकर अमेरिका में चल रहे राजनीति की चर्चा कर रहे हैं. यह लेख प्रभात खबर में हाल ही में प्रकाशित हो चुका है. वहां से साभार.

पुनर्वापसी की ओर दुनिया
एमजे अकबर
शांति की बात करना क्या देशभक्ति है? अमेरिका आज बहस के इसी मुद्दे से गुजर रहा है. इराक में उसकी हार का निहितार्थ और जीत का अर्थ तलाशा जा रहा है. निश्चय ही युद्ध को सदैव देशभक्ति से जोड़ा गया है. किसी भी नेतृत्व के लिए एक हाथ में बंदूक और दूसरे हाथ में बिगुल जीत का ध्वज माना गया. जो जितना ज्यादा अपनी मातृभूमि का कर्ताधर्ता बनता जाता है, वह अपने लोगों को उतना ही अधिक कब्र की ओर धकेल सकता है. आतंक वादियों की देशभक्ति भी ऐसा ही मजबूत लबादा है, जो अपने पापों को ऐसे ही गैरजिम्मेदार तरीके से घालमेल कर बहाना-बनाना चाहते हैं.
इसी तरह आज कमांडर इन चीफ की महिमा की रक्षा करना भी देशभक्ति का तकाजा बन गया है. भले ही यह कोई बाध्यता नहीं है. राजनीतिज्ञ वोट की तलाश में शांति प्रयासों को युद्ध में तब्दील करने की मंशा रखते हैं. वजह यह कि शांति अस्पष्ट होती है, जबकि युद्ध में बल की प्रधानता दिखती है. यद्यपि आम धारणा यही है कि मतदाता शांति को ही पसंद करते हैं, पर सामान्य अनुभव हमें बताता है कि युद्ध के बाद मतदाता ज्यादा प्रभावित किये जा सकते हैं, जबकि डर की भावना को सर्वाधिक मुखर रू प में युद्ध के माध्यम से व्यक्त कि या जा सक ता है. भावनाओं और तर्क का यही वह शक्तिशाली समिश्रण है, जिसे बुश ने पिछले पांच वर्ष से बनाये रखा है. अमेरिकी चेतना में डर की भावना बुश के कारण नहीं, बल्कि 9/11 की घटना से पैदा हुई. इस पूरे मुद्दे को जॉर्ज बुश ने ब़डी होशियारी से भुनाया है. उन्होंने अमेरिकन एजेंडा के बजाय बुश बजेंडा को सर्वोपरि रखा. यही वह सामान्य कारण है, जिस बिना पर आफ गानिस्तान और इराक युद्ध के बीच अंतर तलाशा जा सकता है. ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौंपने से तालिबानियों के इनकार करने से अमेरिका को उस पर हमला क रने की वैधता मिल गयी, लेकिन सद्दाम हुसैन के खिलाफ युद्ध आतंकवाद के खिलाफ युद्ध जैसा नहीं माना जा सकता.
इराक युद्ध ने इस बात को बार-बार सिद्ध किया कि जॉर्ज बुश और उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने इस पूरे प्रकरण को उपहास का विषय बना दिया. इसके लिए तथ्यों को तोड़ मोड़ कर और अतिशयोक्ति पूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया. सद्दाम हुसैन पर लादेन का सहयोगी होने का झूठा आरोप थोपा गया. आतंक के खिलाफ युद्ध का मुहावरा लोगों में उत्सुकताका विषय बना दिया गया. एक अदृश्य आतंक की सत्ता के खिलाफ किस तरह लड़ा जाये, यह बात अचानक ही नहीं पैदा हुई. अपने शत्रुओं को निशाने पर लेने और व्हाइट हाउस को सशक्त बनाने के लिए इन बातों को जानबूझ कर हवा दी गयी. बुश से जो सबसे बड़ी गलती हुई वह यह थी कि अपने दुश्मनों को सजा देने की उनकी इच्छा इन सबके बावजूद एक अधूरा सपना ही रह गयी. उनकी आशाओं के विपरीत इराक में चरमपंथियों के उभार से यह बात सिद्ध हुई कि उनके लक्ष्य ने उन्हीं के लिए विध्वंसक परिणाम पैदा कि ये. वहां रोज हो रही हिंसक घटनाएं, सेना पर अतिरिक्त दबाव, बढ़ रहे वित्तीय खर्च और जनविरोध बताते हैं कि बुश और उनकी रिपब्लिक न पार्टी के लिए यह पूरा अभियान बहुत महंगा सिद्ध हुआ. फिर भी युद्ध को सही ठहराने की कोशिश से बुश की दृढ़ता का पता चलता है. हालांकि इसकी उपयोगिता खत्म हो गयी है, लेकि न इसका राजनीतिक फ़ायदा तो उठाया ही जा सकता है. अब बुश और डेमोक्रे ट्स के बीच बहस का मुद्दा यह है कि क्या इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की कोई समय सीमा तय होनी चाहिए? डेमोक्रे ट्स चाहते हैं कि अगले 18 महीनों के अंदर, यानी नया राष्ट्रपति चुने जाने से पूर्व सैनिकों की वापसी हो जानी चाहिए. लेकि न बुश का मानना है कि इसकी समय सीमा तय करने से वे युद्ध हार जायेंगे. वस्तुत: बुश की इन बातों से उनका खोखलापन ही उजागर होता है. वह अपनी नयी चरमपंथी पुनरुत्थान रणनीति के तहत इराक में शांति लाने के लिए अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं. ऐसी बातों से जॉर्ज बुश नाराज रिपब्लिक नों का समर्थन पा रहे हैं, क्योंकि इससे कहीं न क हीं एक समय सीमा बंधती है. यदि अक्तूबर-नवंबर माह तक यह रणनीति कारगर नहीं होती है, तो बुश अपनी नीतियों में बदलाव करेंगे. और इस बदलाव से एक प्रकार से इराक से मुक्ति मिल सकेगी. इस तरह डेमोक्रेट की अपेक्षा रिपब्लिक न बुश को और भी कम समय दे रहे हैं. वस्तुत: बुश के लफ्ज कुछ अलग हैं, जबकि अमेरिकी सेना और जनता इराक से मुक्ति चाहती है. पेंटागन ने स्वीकार किया है कि इधर सशस्त्र बलों पर बहुत दबाव रहा है, इस कारण इराक में सैनिकों की सामान्य ड्यूटी सुधार कर उसे 15 महीने कर दिया गया है. वियतनाम युद्ध के काल में भी यह समय सीमा अधिक तम 15 महीने ही थी. सेना का कहना है कि बहुत ऊ़चे वेतन पर पिछले वर्ष 80 हजार लोगों की भर्ती के बावजूद उसने 14 लाख सैनिकों की निर्धारित संख्या को बनाये रखा है. इस संख्या को सामान्य अवकाश का सूचक नहीं माना जा सकता. इससे इराक में सैनिकों की कमश: घटती संख्या का भी पता चलता है. युद्ध के समय अधिकतर युवा अपने बेहतर भविष्य, अधिक लाभ और मिलनेवाले ढेर पैसे की वजह से सेना में भर्ती हुए थे. कुछ डेमोक्रेट राजनीतिज्ञ पहले के मसौदे में बदलाव चाहते हैं, ताकि धनी बच्चें को युद्ध के मैदान में लाया जाये. उनका मानना है कि यदि जॉर्ज बुश की नीतियों के लिए अभिजात्य वर्ग अपने बच्चें को मरने के लिए भेजता है, तो इससे युद्ध बहुत जल्दी समाप्त होगा.
कोई नहीं जानता कि इसका परिणाम अमेरिका की किस पीढ़ी को भुगतना होगा. इस युद्ध की लागत 500 बिलियन डॉलर पार कर चुकी है. इसका सबसे बड़ा नुकसान वित्तीय मोर्चे पर हुआ है. युद्ध में बहाये जा रहे खून की कीमत बिगड़ते बैलेंस सीट के रूप में सामने आया है. इराक में उपयोग में आ रहे हेलिकॉप्टरों को सितंबर में नयी मशीनों द्वारा बदल दिया जायेगा. यह नया बेड़ा वी-22 विमानों का होगा, जो हेलिकॉप्टर की तुलना में अधिक गतिवाला और युद्धक किस्म का होगा. हालांकि चरमपंथियों के विरुद्ध इसकी उपयोगिता के बारे में काफी अनिश्चय की स्थिति है, पर इसकी लागत कम से कम प्रति विमान 20 बिलियन डॉलर तो है ही. इससे सामरिक उद्योगों को बहुत धनी होने का मौका जरूर मिल जायेगा.

देखें फ़ारेनहाइट 9.11. सितंबर 11, 2001 को ट्रेड सेंटर टावरों पर हमले की असली कहानी. इसी घटना को आधार बना कर अफ़गानिस्तान और इराक पर हमला किया गया.

अब अमेरिका की जनता को एहसास होने लगा है कि पैसे या सुंदर लफ्जों के छद्म से जमीनी युद्ध नहीं जीता जा सकता. बुश के लफ्जों के छद्म की रणनीति के बने रहने की सामान्य वजह यह है कि यहां युद्ध की कोई परिभाषा नहीं है. इसलिए हासिल किये गये निश्चित लक्ष्यों की बात भी नहीं की जाती. वास्तव में देखा जाये, तो इराक युद्ध के दोनों घोषित उद्देश्य पूरे हो चुके हैं. अब यह निश्चित हो चुका है कि वहां न तो सामूहिक विनाश के हथियार हैं और न ही सद्दाम हुसैन. इराक अगले सौ वर्ष तक उन्हें पाने की सामर्थ्य भी नहीं रखता है. अब सद्दाम मर चुके हैं और उनकी सत्ता नष्ट हो चुकी है. इसलिए अब अमेरिका और ब्रिटेन की सेना बगदाद में पुलिस मैन के रूप में क्यों बनी हुई है? यदि यही उनका मिशन है, तो यह असंभव मिशन है. इससे किसी भी दिन पता चलेगा कि अमेरिका और ब्रिटेन की मुख्य जगहों पर जवाबी हमला किया गया. जब तक इराकी धरती पर विदेशी सैन्य टुकड़ियां बनी रहेंगी, तब तक वहां से उग्रवाद को नहीं मिटाया जा सकता. जब कोई प्रशासन बिखरना शुरू होता है, तो केवल एक खंभा ही नहीं गिरता; विश्वास के क्षरण का प्रभाव पूरी संरचना पर पड़ता है. इस सरकार के सभी महत्वाकांक्षी लोग गलत कारणों से पहले पन्ने पर छाये हुए हैं. इस विजय के सूत्रधार कार्ल रावे यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि व्हाइट हाउस के अभिलेखागार से लाखों करोड़ों ई-मेल क्यों हटाये गये. इराक के मुख्य मस्तिष्क पॉल वोल्फोविट्ड अब विश्व बैंक के अध्यक्ष हैं. वह अभी अपने गर्ल फ्रेंड को बहुत ऊंचे वेतनमान पर नौकरी देने के मामले में अपने प्रभाव के दुरुपयोग मामले में सफाई दे रहे हैं. उन पर आरोप लगोनवालों का मानना है कि वह विश्व बैंक की परवाह नहीं करते. वास्तव में पॉल वोल्फोविट्ज, कार्ल रावे, डिक चेनी और जार्ज बुश विश्व बैंक की बहुत ज्यादा परवाह करते हैं. यदि वह किसी की परवाह नहीं करते तो शेष पूरे विश्व की. इस तरह दुनिया पुनर्वापसी की राह पर है.

अनुवादक - योगेंद्र/कमलेश

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बंगाल में पोंगापंथ

वाकई देश में सीपीएम किस तरह से मार्क्स का नाम लेकर धार्मिक ब्रह्मणों और आर्थिक ब्राह्मणों (अमेरिकनों) के लिए लाल कालीन बिछाये हुए है, यह देखने लायक है. हंस के मार्च अंक से साभार
पलाश विश्वास

बंगाल के शरतचन्द्रीय बंकिमचन्द्रीय उपन्यासों से हिंदी जगत भली-भांति परिचित है, जहां कुलीन ब्राह्मण जमींदार परिवारों की गौरवगाथाएं लिपिबद्ध हैं. महाश्वेता देवी समेत आधुनिक बांग्ला गद्य साहित्य में स्त्राी अस्मिता व उसकी देहमुक्ति का विमर्श और आदिवासी जीवन यंत्राणा व संघर्षों की सशक्त प्रस्तुति के बावजूद दलितों की उपस्थिति नगण्य है. हिंदी, मराठी, पंजाबी, तमिल, कन्नड़ और तेलुगू भाषाओं की तरह बांग्ला में दलित साहित्य आंदोलन की कोई पहचान नहीं बन पाई है और न ही कोई महत्त्वपूर्ण दलित आत्मकथा सामने आई है, बेबी हाल्दार के आलोआंधारि जैसे अपवादों को छोड़कर. आलो आंधारि का भी हिंदी अनुवाद पहले छपा, मूल बांग्ला आत्मकथा बाद में आयी.
यह ब्राह्मणत्व का प्रबल प्रताप ही है कि १९४७ में भारत विभाजन के बाद हुए बहुसंख्य जनसंख्या स्थानांतरण के तहत पंजाब से आनेवाले दंगापीड़ितों को शरणार्थी मानकर उनके पुनर्वास को राष्ट्रीय दायित्व मानते हुए युद्धस्तर पर पुनर्वास का काम पूरा किया गया. जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरू और आधुनिक बंगाल के निर्माता तत्कालीन मुख्यमंत्राी विधानचंद्र राय ने पूर्वी बंगाल के दलित आंदोलन के आधार क्षेत्रा जैशोर, खुलना, फरीदपुर, बरिशाल से लेकर चटगांव, कलकत्तिया सवर्ण वर्चस्व और ब्राह्मणवादी एकाधिकार को चुनौती देने वाली कोई ताकत नहीं है. भारत भर में ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक पिछड़े वर्ग की जनसंख्या चालीस प्रतिशत से ज्य़ादा है. भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बाकी देश में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का जोरदार समर्थन करती है. मलाईदार तबके को प्रोन्नति से अलग रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में ओबीसी कोर ग्रुप की बैठक हुई जिसमें त्रिापुरा के समाज कल्याण मंत्राी कवि अनिल सरकार, जो माकपा की हैदराबाद कांग्रेस में गठित दलित सेल में बंगाल वाममोर्चा चेयरमैन विमान बसु के साथ महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं, शामिल हुए. पार्टी का दलित एजेंडा भी बसु और सरकार ने तय किया. इन्हीं अनिल सरकार ने उस बैठक में दलितों और पिछड़ों के आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमा ५० फ़ीसदी से बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की मांग उठाई, मलाईदार तबक़े को प्रोन्नति से अलग रखने के फ़ैसले की प्रतिक्रिया में उन्होंने सवर्ण मलाईदार तबकेश् को चिन्हित करके उन्हें भी प्रोन्नति के अवसरों से वंचित रखने की सिफ़ारिश की है. उनका दावा है कि त्रिापुरा में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों का आरक्षण लागू किया जा चुका है.
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में अभी तक पिछड़ी जातियों की पहचान का काम पूरा नहीं हुआ है, आरक्षण तो दूर. अनिल सरकार कहते हैं कि पचास फ़ीसद आरक्षण के बावजूद सिर्फ दस प्रतिशत नौकरियां ही दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को मिलती हैं, नब्बे फ़ीसदी नौकरियों पर सवर्ण काबिज़ हैं.
पश्चिम बंगाल में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को प्रोन्नति के अवसर तो सिरे से नहीं हैं. आरक्षित पदों पर रिक्तियां अनंत हैं पर योग्य प्रार्थी न मिलने की वजह दिखाकर अमूमन आरक्षित पदों को सामान्य बनाना आम है. गैर बंगाली नागरिकों को तो किसी भी क़ीमत पर जाति प्रमाण-पत्रा नहीं ही मिलता पर अब दलितों, आदिवासियों की संतानों को भी जाति प्रमाण-पत्रा जारी नहीं किए जाते.
सबसे सदमा पहुंचाने वाली बात यह है कि बाक़ी देश में जहां अखब़ार और मीडिया गैर-ब्राह्मणों की खब़रों को प्रमुखता देते हैं, वहीं बंगाल में ब्राह्मणवादी मीडिया और अखब़ार दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और शरणार्थियों के बारे में एक पंक्ति की खब़र तक नहीं छापते. जबकि कमज़ोर तबकेश् की आवाज़ उठाने वाली माकपा बंगाल में ३५ सालों से सत्ता में हैं.
पिछले दिनों सुभाष चक्रवर्ती के तारापीठ जाकर तारा मां की पूजा पर पार्टी पोलित ब्यूरो, केंद्रीय समिति, राज्य वाम मोर्चा से लेकर मीडिया में काफ़ी बवेला मचा. पार्टी, विचारधारा और धर्म पर वैचारिक बहस छिड़ गई. प्रतिक्रिया में सुभाष चक्रवर्ती ने कहा, ‘पहले मैं हिंदू हूं और फिर ब्राह्मण`. वे दुर्गोत्सव में १२० पंडालों के संरक्षक थे. विवाद से चिढ़कर उन्होंने परिवहनकर्मियों को धूमधाम से विश्वकर्ता पूजा मनाने के निर्देश दिए. हक़ीक़त यह है कि सुभाष चक्रवर्ती और उनके चार भाइयों ने जनेऊ धारण नहीं किया. ब्राह्मण समाज ने आज़ादी से पहले उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था, वे एकमात्रा सवर्ण मंत्राी हैं जो दलितों का साथ देते हैं. पर वे अपनी पहचान और संस्कृति के यथार्थ पर जोर देते हैं. ज़मीनी जड़ें होने के कारण उनका जनाधार मजबूत है. सुभाष चक्रवर्ती के इस विवादास्पद बयान पर बंगाल में धर्म पर बहस तो छिड़ी, मनुस्मृति और उसके अभिशाप पर चर्चा तक नहीं हुई, चक्रवर्ती वाम आंदोलन के बंगाल, त्रिापुरा और केरल तक सिमट जाने की वजह भारतीय संस्कृति और लोक से अलगाव को मानते हैं.
बाक़ी भारत में दलित आंदोलन से अलगाव भी माकपा को राष्ट्रीय नहीं बनाती, यह पार्टी के हैदराबाद कांग्रेस में मानकर बाक़ायदा आज़ादी के इतने सालों बाद दलित एजेंडा भी पास किया गया पर अपने चरित्रा में आज भी माकपा और सारे वामपंथी दल दलित विरोधी हैं. इसीलिए दिनों दिन बंगाल में ब्राह्मणवाद की जडें मजबूत हो रही हैं. इसी हक़ीक़त की ओर बागी मंत्राी सुभाष चक्रवर्ती ने उंगली उठाई है. पूंजीवाद विकास के लिए अधाधुंध, ज़मीन अधिग्रहण के शिकार हो रहे हैं दलित पिछड़े आदिवासी और अल्पसंख्यक, पर इस मुद्दे पर तमाम हो हल्ले के बावजूद बंगाल में दलितों के अधिकार को लेकर लड़ने वाली कोई ताकत कहीं नहीं है.
इधर के वर्षों में बचे-खुचे दलित आंदोलन के तहत खा़सकर कोलकाता और आस-पास विवाह, श्राद्ध जैसे संस्कारों में ब्राह्मणों का बहिष्कार होने लगा है. श्राद्ध की बजाय स्मृति-सभाएं होने लगी है, कई बरस पहले यादवपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी करने वाले एक दलित ने अपढ़ पुरोहित से पिता का श्राद्ध कराने की बजाय कृष्णनगर के पास अपने गांव में स्मृति सभा का आयोजन किया तो पूरे इलाक़े में तनाव फैल गया.
ताजा घटना सुभाष चक्रवर्ती के ब्राह्मणत्व के विवाद के बाद की है.
सुंदरवन इलाक़े में दलितों-पिछड़ों की आबादी ज्य़ादा रही है. इसी इलाक़े में दक्षिण २४ परगना जिले के गोसाबा थाना अंतर्गत सातजेलिया लाक्स़बागान ग्लासखाली गांव के निवासी मदन मोहन मंडल स्थानीय लाक्सबागान प्राथमिक विद्यालय के अवैतनिक शिक्षक हैं. पर चूंकि उन्होंने पुरोहित बुलाकर पिता का श्राद्ध नहीं किया और न ही मृत्युभोज दिया इसलिए पिछले चार महीने से उनका सामाजिक बहिष्कार चल रहा हैं. वे अपवित्रा और अछूत हो गए हैं और पिछले चार महीने से वे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं.
मदनमोहन मंडल के इस स्कूल के विद्यार्थी ज्य़ादातर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के बच्चे हैं. बतौर शिक्षक छात्रा-छात्रााओं में मदनमोहन बाबू अत्यंत लोकप्रिय हैं, पर पवित्रा ब्राह्मणवाद के पुण्य प्रताप से शनि की दशा है उन पर. पिता की मृत्यु पर बंगाली रिवाज़ के मुताबिक सफ़ेद थान कपड़े नहीं पहने उन्होंने. हविष्य अन्न नहीं खाया. सामान्य भोजन किया. नंगे पांव नहीं चले. और न ही पुरोहित का विधान लिया या श्राद्ध कराया.
ब्राह्मणवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस दलित बहुल इलाक़े में, ब्राह्मणों ने नहीं, दलितों और पिछड़ों ने उनके स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी. प्रधानाचार्य शिवपद मंडल का कहना है, ”मदनमोहन बाबू सूतक (अशौच अवस्था में) में हैं. वे स्कूल आएंगे तो यह नन्हें बच्चों के लिए अशुभ होगा. मदनमोहन बाबू को फ़तवा जारी किया गया है कि ब्राह्मणों से विधान लेकर पुरोहित बुलाकर पहले पितृश्राद्ध कराएं, फिर स्कूल आएं.
मदनमोहन मंडल ने हार नहीं मानी और विद्यालय निरीक्षक की शरण में चले गए. उन्होंने लाक्सबागान के पड़ोसी गांव बनखाली प्राथमिक विद्यालय में अपना तबादला करवा लिया पर इस स्कूल में भी उनके प्रवेशाधिकार पर रोक लग गई.
इलाक़े के मातबर लाहिड़ीपुर ग्राम पंचायत के पूर्व सदस्य व वामपंथी आरएसपी के नेता श्रीकांत मंडल का सवाल है, ”जो व्यक्ति अपने पिता का श्राद्ध नहीं करता, वह बच्चों को क्या शिक्षा देगा.“ गौरतलब है कि सुंदरवन इलाके में माकपा के अलावा आरएसपी का असर ज्य़ादा है. अभिभावकों की ओर से कन्हाई सरदार का कहना है, ”जो शिक्षक गीता, शास्त्रा नहीं मानता, उसके यहां बच्चों को भेजने के बजाय उन्हें अपढ़ बनाए रखना ही बेहतर है.“
आखिऱकार अपने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ़ मदनमोहन मंडल गोसाबा थाना पहुंच गए, पर पुलिस ने रपट लिखने से मना कर दिया. मदनमोहन बाबू ने गोसाबा अंचल के विद्यालय निरीक्षक ब्रजेन मंडल से लिखित शिकायत की. ब्रजेन बाबू ने खुद शिक्षक संगठन के प्रतिनिधियों के साथ मौक़े पर गए, पर ब्राह्मणवादी कर्मकांड विरोधी शिक्षक का सामाजिक बहिष्कार खत़्म नहीं हुआ.
मदनमोहन मंडल आरएसपी के कृषक आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं. पर स्थानीय आरएसपी विधायक चित्तरंजन मंडल ने मदनमोहन बाबू के आचरण को ‘अशोभनीय` करार दिया.
दक्षिण चौबीस परगना के वामपंथी शिक्षक संगठन के सभापति अशोक बंद्योपाध्याय का कहना है, ”अगर कोई संस्कार तोड़ना चाहे तो उनका स्वागत है, पर यह देखना होगा कि उसकी इस कार्रवाई को स्थानीय लोग किस रूप में लेते हैं.“ अशोक बाबू ने मदनमोहन मंडल के मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.
मदनमोहन बाबू अब भी स्कूल नहीं जा पाते, वे गोसाबा स्थित अपर विद्यालय निरीक्षक के दफ्त़र में हाज़िरी लगाकर अपनी नौकरी बचा रहे हैं. पर वे किसी क़ीमत पर पितृश्राद्ध के लिए तैयार नहीं हैं.
माकपा के बागी मंत्राी के ब्राह्मणत्व पर विचारधारा का हव्वा खड़ा करने वाले तमाम लोग परिदृश्य से गायब हैं.

संपर्क : द्वारा श्रीमती आरती राय, गोस्टोकानन, सोदपुर, कोलकाता-७००११०
फोन : ०३३-२५६५९५५१


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इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान

ऐसे समय में, जब हिंदीब्लाग में घमसान मचा हुआ हो और निहायत सतही और निरर्थक बातों पर (वेब) पन्ने काले किये जा रहे हों, एक गंभीर और शोधपरक लेख देना खतरे से खाली नहीं है. खतरा इस बात का कि पाठक नहीं मिलेंगे. सारा ध्यान तो भड़काऊ चिट्ठों पर ही चला जाता है. फिर भी एक बात ज़रूर है कि जो बहस चल रही है वह इतिहास और तथ्यों की ही है. इसी संदर्भ में वैभव सिंह का लेख, तद्भव से साभार.

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान
(सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन)

वैभव सिंह

भारत में परम्परागत रूप से इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों के अभाव में पौराणिक मिथकीय कथाओं और शास्त्राों ने ही इतिहास की भूमिका का निर्वाह किया है। हिन्दू धर्म की कतिपय धर्मशास्त्राीय मान्यताओं जैसे अवतारवाद , वर्णधर्म और कर्मकाण्ड को सामाजिक आदर्श का दर्जा प्राप्त था और विभिन्न पौराणिक मिथकीय पात्रां एवं घटनाओं को इन्हीं सामाजिक आदर्शों की प्राप्ति या इनसे विचलित होने के आधार पर व्याख्यायित किया जाता था। धार्मिक मान्यताओं द्वारा अनुमोदित इन सामाजिक आदर्शों को विभिन्न रोचक कथाओं के जरिए वैधता दिलाने का काम पुराणों ने इतनी कुशलता के साथ किया कि इतिहास की जरूरत ही नहीं रह गयी।

18 वीं और 19 वीं सदी में एक आधुनिक अकादमिक विषय के रूप में इतिहास लेखन को मान्यता मिलनी प्रारम्भ हुई और पश्चिम के साथ साथ पूर्वी देशों में भी विभिन्न धमोर्ं, संस्कृतियों और समुदायों के इतिहास पर शोध करने का काम शुरू हुआ। एक ओर राजनीतिक सामाजिक स्थितियां बदलने से इतिहास लेखन की आवश्यकता का अनुभव किया गया तो दूसरी ओर इतिहास के निर्माण और व्याख्या के विभिन्न दृष्टिकोणों के जरिए विभिन्न समुदायों की राजनीतिक सामाजिक आकांक्षाओं को नया रूप मिलना आरम्भ हुआ।

19 वीं सदी में ही साम्राज्यवाद का भी अभूतपूर्व विस्तार हुआ और उसने मध्य एशिया व पूर्वी एशिया के अनेक पिछड़े देशों की अर्थव्यस्था को नियन्त्राण में लेने के लिए उन्हें राजनैतिक रूप से गुलाम बनाना आरम्भ कर दिया। इस साम्राज्यवाद ने निहित स्वाथोर्ं और व्यावहारिक जरूरतों के लिए इतिहास लेखन को भी अपना माध्यम बनाया। जब इतिहास लिखने का काम उन्होंने भारत में आरम्भ किया तब उन्होंने यहां के स्थानीय स्रोतों का भी पता लगाने की कोशिश की। प्रामाणिक इतिहास लेखन के स्थानीय स्रोतों के अभाव को देख कर तो वे भी आश्चर्य चकित हो गये। लोग अपने ही इतिहास की मौर्यकालीन और गुप्तकालीन घटनाओं एवं शासकों के नाम से अनभिज्ञ थे। इस स्थिति के बारे में 18 वीं सदी में भारत आने वाले एक यात्राी अमारी डी राएनकोर्ट ने अपनी किताब ÷ सोल ऑफ इण्डिया’ में लिखा :

÷÷ आर्य भारत में कोई स्मृति नहीं क्योंकि उसका ध्यान शाश्वतता पर है, न कि समय पर… भारतीयों के लिए आध्यात्मिक वास्तविकता ÷ स्थान’ है न कि समय, प्रकृति है न कि इतिहास।” 1

यह भी एक अजीब विडम्बना थी कि इतिहास के प्रति अरुचि को हिन्दुओं की आध्यात्मिकता के प्रति अपवाद रूप से अत्याधिक रुचि के आधार पर व्याख्यायित किया गया। सीधे सीधे यह तर्क दिया गया कि दुनिया की अन्य सभ्यताओं व संस्कृतियों की तुलना में विशिष्ट रूप से लोकोत्तर जीवन और पारलौकिक विश्वासों पर उनके जीवन और समस्त बौद्धिक चिन्तन के केन्द्रित होने के कारण ही भारत में इतिहास लेखकों एवं इतिहास की प्रामाणिक रचनाओं का अभाव रहा है। यह एक कोरा सरलीकरण था और भारत में इतिहास के प्रति अरुचि के कारणों को सही ढंग से सामने रखने के स्थान पर उस समय आने वाले योरोपीय यात्रियों की भारत के सांस्कृतिक अतीत के सम्बन्ध में नासमझी को अधिक प्रकट करता है। कौटिल्य , वात्स्यायन, अश्वघोष और चार्वाक आदि की रचनाएं जिस देश में मौजूद रही हों वहां आध्यात्मिकता को उसका केन्द्रीय सांस्कृतिक मूल्य बताना यथार्थपरक दृष्टि का सूचक कम और राजनीतिक दृष्टि का सूचक ज्यादा था। हालांकि विलियम जोन्स के समय से ही भारत के बारे में इस साम्राज्यवादी निष्कर्ष का खण्डन भी होने लगा था कि पश्चिमी पुनर्जागरणकालीन मूल्यों के गर्भ से उपजी जिस आधुनिकता का संवाहक यूरोप है, उसके सामने भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा उपलब्धियां कहीं नहीं ठहरतीं। विलियम जोन्स ने भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों के रेखांकन के बहाने पश्चिमी पुनर्जागरण और एशियाई जड़ता की रूढ़ दृष्टियों पर आधारित द्वन्द्व के बारे में लिखा :

÷÷ हमें एशियाई लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, जिनकी प्रकृति, कला, आविष्कार से अपने विकास और लाभ के लिए अनेक महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते हैं।” 2

इस तरह से 14-15 वीं सदी में विश्व भर में योरोपीय यात्रियों के फैलाव, आर्थिक राजनीतिक उपनिवेशों की स्थापना एवं साम्राज्यवादियों की स्थानीय संस्थाओं के अनुरूप प्रशासन चलाने की बाध्यता, इन सबके बीच 18 वीं सदी के अन्त और 19 वीं सदी में भारतीय इतिहास के निर्माण एवं व्याख्या का काम व्यापक रूप से आरम्भ हुआ। इस काम को अधिक व्यवस्थित और संस्थागत रूप से 1784 ई. में स्थापित रायल एशियाटिक सोसायटी के द्वारा शुरू किया गया। इसमें सिक्कों, अभिलेखों व प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों की खोज के बावजूद अधिक महत्व धर्मशास्त्र, साहित्य, भूगोल, संगीत और ज्योतिष की रचनाओं को दिया गया और उन्हीं के आधार पर ऐसी भारतीय सभ्यता के प्राचीन अतीत का निर्माण किया गया जो अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सके। इन साहित्यिक धार्मिक स्रोतों की व्याख्या करते हुए यह प्रश्न नहीं किया गया कि इन माध्यमों से अतीत की जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह समग्र समाज के यथार्थ को व्यक्त करती है या फिर किसी खास समूह की अभिरुचियों व सामाजिक गतिविधियों को। इस बारे में रोमिला थापर का मत है :

÷÷ प्राचीन समय के बचेखुचे साहित्यिक स्रोतों में ज्यादातर राजा, महत्वपूर्ण पुजारी वर्ग, मठों और सम्पन्न व्यापारियों की जिन्दगी का पता चलता है। इस प्रकार समाज के उच्च वर्ग के बारे में अधिक सूचनाएं मिलती हैं। इसके अलावा परम्परागत समाजों में शिक्षा प्रायः केवल अभिजन समूहों को ही मिल पाती है। इसलिए केवल वही अपनी गतिविधियों को साहित्य के माध्यम से व्यक्त कर पाते हैं। कालिदास के नाटक उदाहरण के तौर पर शासन और दरबार के अध्ययन की दृष्टि से शानदार ऐतिहासिक सामग्री हैं, लेकिन यह कहना कि इनमें पूरे भारतीय समाज का वर्णन है, अतीत की गलत तस्वीर बनाना है।” 3

एक ओर विलियम जोन्स , चार्ल्स विलकिन्स, एच.एच. विलसन, मैक्समुलर, मारिज विण्टरनित्ज और रूडोल्फ रॉय आदि अंग्रेज और जर्मन प्राच्याविद वेदों, उपनिषदों और साहित्यिक कृतियों के आधार पर भारतीय अतीत पर मुग्ध होने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे थे, तो दूसरी ओर मिशनरियों ने अपने ढंग से भारत में औपनिवेशिक शासन को सही ठहराने के लिए भारतीय इतिहास के निर्माण और व्याख्या का काम किया। विलियम कैरे (1761-1834), अलेक्जेण्डर डफ (1806-1878), जॉन मुअर (1810-82) और चार्ल्स ग्राण्ट (1746-1823) ने भारत के इतिहास को अंधकारग्रस्त और हिन्दू धर्म को समस्त पाखण्ड और झूठ का पर्याय बताया। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक और ईसाइयत के प्रचारक थामस बैबिंजटन मैकाले (1800-59) ने अपने 1835 ईसवी के शिक्षा सम्बन्धी मिनट्स में यहां तक कहा कि ÷ भारत और अरब के सम्पूर्ण साहित्य का मुकाबला करने के लिए एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी ही काफी है।’ यानी 19 वीं सदी में एक ओर प्राच्याविद थे, जो मुख्य रूप से प्राचीन कृतियों की खोज और उनके अनुवाद तैयार करके शेष विश्व को भारत की साहित्यिक और धार्मिक विशेषताओं से परिचित करा रहे थे, दूसरी ओर मिशनरी लेखक भारतीयों के अंधविश्वास, मूर्तिपूजा और बहुदेववाद की अवधारणा की आलोचना कर रहे थे, क्योंकि वे ईसाइयत की संसार की उत्पत्ति सम्बन्धी धारणा, ईश्वर के स्वरूप और उपासना पद्धति के अनुरूप नहीं थीं।

इतिहास के निर्माण और व्याख्या के इन प्रयत्नों से अलग अलग निष्कर्ष उभर कर सामने आये। प्राच्यविदों , मिशनरियों और जेम्स मिल जैसे उपयोगितावादियों ने भारतीय अतीत की रूढ़ छवियों के निर्माण में अपने अपने ढंग से योगदान दिया। ऐसे भारतीय समाज की छवि बनी जो हमेशा ही वेदों उपनिषदों वाले आध्यात्मिक चिन्तन में लीन रहता है या संस्कृत नाटकों की रचना में ही हर समय खोया रहता है। इस छवि के केन्द्र में ऐसे हिन्दू मनीषी उपस्थिति थे जो हर समय ब्रह्माण्ड की पहेलियों को सुलझाने के लिए पारलौकिक सत्ता से संवाद कायम करते रहने की चेष्टा करते रहते थे।

19 वीं सदी में ही जेम्स मिल की हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इण्डिया (1817), कर्नल टाड की एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान (1820), इलियट डाउसन की हिस्ट्री ऑफ इण्डिया ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस (1849) जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना हुई जिसने अतीत के बारे में दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। मिल ने समूचे भारतीय इतिहास का हिन्दू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में विभाजन कर इतिहास की साम्प्रदायिक व्याख्या की पृष्ठभूमि तैयार की। उनके ऐतिहासिक अध्ययन की विषयवस्तु एवं निष्कर्ष ठोस तथ्यों पर आधारित होने के स्थान पर सभ्यता के विकास और उपयोगितावाद से सम्बन्धित सामान्य अवधारणाओं पर निर्भर थे, जैसा कि उन्होंने खुद लिखा भीः

÷÷ अच्छी समझदारी रखने वाला कोई भी इंसान बिना इतिहास की प्रामाणिक जानकारी जुटाए प्राचीन ग्रन्थों एवं कृतियों को पढ़ कर लोगों की प्रवृत्तियों को जान सकता है।” 4

मिल ने भारतीय अतीत की कटु आलोचना के आधार पर भारत के अंग्रेजों के हाथों पराधीन होने को तर्कसंगत साबित करने का प्रयास किया। इतिहासकार जे.एस. ग्रेवाल के शब्दों में:

÷÷ मिल ने हिन्दुओं को उनके अतीत या वर्तमान में सभ्य मानने से इंकार कर दिया।” 5

उधर प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों और वैदिक सभ्यता को हिन्दू अतीत संस्कृति की धुरी बताने वाले विलियम जोन्स , मानियर विलियम्स और मैक्समुलर जैसे प्राच्यविदों ने हिन्दू स्वर्णकाल के रूप में ऐतिहासिक कालखण्ड की कल्पना की। उनके द्वारा समस्त विश्वासों और उपासना पद्धति के सभी पहलुओं को आत्मसात करने वाले हिन्दू धर्म की कल्पना की गयी और इस कल्पना के माध्यम से हिन्दू धर्म को भी ईसाइयत की तर्ज पर एक ऐतिहासिक रूप से विकसित धर्म के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। इन प्राच्यविदों में बुनियादी समानता के बावजूद कुछ दृष्टिकोण सम्बन्धी भेद भी थे। जैसे आरम्भिक प्राच्यविदों कोलब्रुक, विल्सन, प्रिन्सेप और टीएस बर्ट ने हिन्दू अतीत की ऐतिहासिकता के निर्धारण के लिए प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का सहारा लिया, साथ ही शोध के आधुनिक तरीकों जैसे अभिलेखों, सिक्कों, स्थापत्य आदि के संग्रह और अध्ययन पर भी बल दिया। प्रिन्सेप के योगदान के बारे में केजरीवाल का कहना हैः

÷÷ प्रिन्सेप ने भारत में पुरावशेषों और मुद्राओं के अध्ययन की नींव डाली और इस प्रक्रिया में प्राचीन भारत के कई प्रमुख शासकों और राजवंशों की खोज की।” 6

आगे चल कर मैक्समुलर , अलब्रेख्त वेबर, विण्टरनित्ज और रूडोल्फ रॉय के रूप में प्राच्यवाद का जिस प्रकार से विकास हुआ, उसमें प्राच्यवाद पूरी तरह से वैदिक साहित्य, उपनिषदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों तक सीमित हो गया। इनमें अधिसंख्य प्राच्यविद जर्मनी और इंग्लैण्ड के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इण्डॉलोजी और संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते भी थे। जर्मन प्राच्यविदों के हाथों जिस प्रकार से वेदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों तक प्राच्यविद्या को सीमित करके भारतीय अतीत का अध्ययन हुआ, उसमें ठोस ऐतिहासिक जानकारियों का उतना महत्व नहीं रहा जितना अमूर्त गौरव और महानता को इन संस्कृत ग्रन्थों के माध्यम से स्थापित करने का। संस्कृत ग्रन्थों का इतनी गहराई से अध्ययन होने लगा कि जर्मन राष्ट्रवाद और योरोपीय सभ्यता की उच्चता की भावना रखने वाले जर्मन प्राच्यविद रूडोल्फ राय ने यहां तक कहा कि ÷ एक शिक्षित यूरोपियन भारत के ब्राह्मणों की तुलना में वेदों के सार को ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकता है।’7

हिन्दी नवजागरण के लेखक प्राच्यविद्या व उसकी इतिहास दृष्टि से गहराई से प्रभावित होने के कारण और कुछ ब्रिटिश उपनिवेशवाद से उपजी आत्महीनता के कारण वर्तमान को अस्वीकार्य मान कर उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे और अतीत या भविष्य को महत्वपूर्ण मान कर उसमें अपने आत्म गौरव की कल्पना करते थे। सुधीर चन्द्र ने उन्नीसवीं सदी के शिक्षित बुद्धिजीवियों और लेखकों के इसी अनुभव को ÷ उत्पीड़क वर्तमान से संघर्ष’7 का नाम दिया है। और लिखा

÷ वर्तमान की व्याख्या केवल अतीत अथवा भविष्य के सन्दर्भों के सहारे ही की जा सकती थी।’ 8

इस समय अगर प्राच्यविदों ने ÷ आध्यात्मिक भारत’ की एक आकर्षक और चमकदार तस्वीर खड़ी की तो, भारतीयों के प्रबुद्ध वर्ग ने भी न सिर्फ आध्यात्मिक अतीत बल्कि आध्यात्मिकता की भी नयी छवियां और परिभाषाएं गढ़ी। इसलिए आध्यात्मिकता की नयी व्याख्याओं और राष्ट्रवादी विवेचन के लिए उसे नये सन्दर्भों और अभिप्रायों से किस प्रकार जोड़ा गया, इसका अध्ययन भी कम रोचक नहीं होगा। यहां तक कि समूचा भक्तिकाल, जिसके साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक योगदान की काफी चर्चा होती है, वह भी बुरी तरह से विवादास्पद बना दिया गया। उस समय के एक महत्वपूर्ण लेखक बालकृष्ण भट्ट ने आध्यात्मिकता को भक्ति, आस्था, विश्वास और आत्मसमर्पण का विषय कम, देशभक्ति और मुल्की जोश का विषय अधिक बना डाला। उनके लेखन में हिन्दू आध्यात्मिकता का अतिशय उल्लेख ही नहीं बल्कि उसकी पुनर्परिभाषित व्याख्या भी महत्वपूर्ण हो गयी। उनके मुताबिक :

÷÷ आध्यात्मिक उन्नति ( स्पिरिचुअल प्रोग्रेस) और जातीयता ( नेशनैलिटी) या ( पॉलिटिक्स) मुल्की जोश साथ साथ चलते हैं।” 9

हिन्दू आध्यात्मिकता की पुनर्व्याख्या की सबसे स्पष्ट मिसाल मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के विवेचन के सन्दर्भ में मिलती है। इस विवेचन में भक्ति आन्दोलन की सराहना और सख्त आलोचना दोनों ही एक साथ उपस्थित है। बालकृष्ण भट्ट के लिए भक्तिकाल की उपयोगिता अनुपयोगिता का प्रश्न मुस्लिम चुनौती का सामना करने से सीधे सीधे जुड़ गया था। इस दृष्टिकोण के कारण भट्ट जी ने मध्यकाल के भक्त कवियों का काफी कठोरता से विरोध किया और उन्हें हिन्दुओं को कमजोर करने का जिम्मेदार भी ठहराया। भक्त कवियों की कविताओं के आधार पर उनके मूल्यांकन के बजाय उनके राजनीतिक सन्दर्भों के आधार पर मूल्यांकन का तरीका अपनाया गया। भट्ट जी ने मीराबाई व सूरदास जैसे महान कवियों पर हिन्दू जाति के पौरुष पराक्रम को कमजोर करने का आरोप मढ़ दिया। उनके मुताबिक समूचा भक्तिकाल मुस्लिम चुनौती के समक्ष हिन्दुओं में ÷ मुल्की जोश’ जगाने में नाकाम रहा। भक्त कवियों के गाये भजनों ने हिन्दुओं के पौरुष और बल को खत्म कर दिया। उन्होंने भक्त कवियों की इसी कमजोरी और नाकामी के विषय में लिखा :

÷÷ मीराबाई, सूरदास, कुम्भनदास, सनातन गोस्वामी आदि कितने महापुरुष जिनके बनाये भजन और पदों का कैसा असर है जिसे सुन कर चित्त आर्द्र हो जाता है। मुल्की जोश की कोई बात तो इन लोगों में भी न थी उसकी जड़ तो न जानिये कब से हिन्दू जाति के बीच से उखड़ गयी।” 10

भक्तिकाल सम्बन्धी अपने विवेचन में भट्ट जी ने मुस्लिम शासन के राजनीतिक सन्दर्भों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया और वल्लभाचार्य व चैतन्य महाप्रभु के भक्ति स्वरूप की व्याख्या करने के स्थान पर तत्कालीन परिस्थितियों पर अधिक जोर देते हुए लिखा :

÷÷ ये लोग ऐसे समय में हुए जब देश का देश म्लेच्छाक्रान्त हो रहा था और मुसलमानों के अत्याचारों से नाकों में प्राण आ लगे थे। इससे आध्यात्मिकता पर इन्होंने बिलकुल जोर न दिया।” 11

भक्तिकालीन सन्तों पर इल्जाम लगाना कि उन्होंने आध्यात्मिकता पर जोर नहीं दिया , अजीबोगरीब बात थी। जाहिर है कि भट्ट जी के मस्तिष्क में आध्यामिकता ईश्वरीय भक्ति व चिन्तन के बजाय लौकिक शक्ति व सम्पन्नता का पर्याय बन चुकी थी। मूल्यांकन की कसौटियां अगर काल्पनिक धारणाओं से निर्मित की जाती हैं तब वस्तुगत यथार्थ की व्याख्या भी वैज्ञानिक और वस्तुगत नहीं रह पाती। इतिहास के एक विशिष्ट चरण के आधार पर इतिहास की समूची प्रक्रिया के विषय में निष्कर्ष निकाले जाते हैं। भव्य और श्रेष्ठ की तुलना में पतन तथा विकार से भरे ऐतिहासिक युग, चरण तथा घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। बालकृष्ण भट्ट ने भी इतिहास की व्याख्या ऐसे नजरिये से की जो यह जानने और बताने के लिए अधिक उत्सुक था कि हिन्दुओं की शक्ति और आत्मगौरव में कब उन्नति हुई और कब गिरावट आयी। मध्यकाल में उन्होंने भक्ति भावना के विकास के साथ ही यह भी शिकायत कीः

÷÷ हमारी आध्यात्मिक उन्नति के सुधार पर किसी की दृष्टि न गयी।” 12

इसके अतिरिक्त आध्यात्मिकता पर बिल्कुल जोर न देने के कारण भक्त कवियों व आचायोर्ं की निन्दा करते हुए लिखा :

÷÷ ऋषि प्रणीत प्रणाली को हाल के इन आचार्यों ने सब भांति तहस नहस कर डाला।” 13

जाहिर है कि बालकृष्ण भट्ट ने भक्ति और अध्यात्म के मध्य अपनी मर्जी से एक विभाजन खड़ा कर दिया था। उनके अनुसार भक्ति का सम्बन्ध रसीली और हृदयग्रहिणी प्रवृत्तियों , विमलचित्त अकुटिल भाव और सेवक सेव्य भाव से है जबकि अध्यात्म का सम्बन्ध ज्ञान, कुशाग्र बुद्धि और अन्ततः जातीयता ( नेशनैलिटी) से होता है। इसी आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला :

÷÷ भक्ति ऐसी रसीली और हृदयग्रहिणी हुई कि इसका सहारा पाय लोग रूखे ज्ञान को अवज्ञा और अनादर की दृष्टि से देखने लगे और साथ ही जातीयता नेशनैलिटी को भी विदाई देने लगे जिसके रफूचक्कर हो जाने से भारतीय प्रजा में इतनी कमजोरी आ गयी कि पश्चिमी देशों से यवन तथा तुरुक और मुसलमानों के यहां आने का साहस हुआ।” 14

भक्तिकाल की यह पूर्वग्रहपूर्ण आलोचना आज शायद ही किसी को स्वीकार हो। लेकिन कमाल की बात है कि रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद दिवेदी तक के भक्तिकाल सम्बन्धी मतों का बारीक विवेचन करने वाली हिन्दी आलोचना बालकृष्ण भट्ट की भक्तिकाल से जुड़ी धारणाओं पर ध्यान नहीं दे सकी। हकीकत यह है कि अध्यात्म और जातीयता का यह सम्बन्ध धर्म और राजनीति के सम्बन्धों की वकालत करता था। हिन्दी का समूचा नवजागरणकालीन चिन्तन कुरीतियों और आडम्बरों को समाप्त करने की दृष्टि से हिन्दू धर्म की आन्तरिक संरचना में सुधार की बात तो कहता था , लेकिन हिन्दुओं की सांस्कृतिक धार्मिक अस्मिता का उपयोग किये बगैर हिन्दुओं के राजनीतिक पुनरुत्थान को असम्भव मानता था। भक्ति आन्दोलन में चूंकि राजनीतिक ढांचे को धार्मिक संस्थाओं व विचारों से नियन्त्रित करने का स्पष्ट सरोकार नहीं मिलता, इसलिए भट्ट जी जैसे लेखकों ने उसकी आलोचना की। यह आलोचना इस कल्पना से प्रेरित थी कि प्राचीनकाल में धर्म और अध्यात्म राजनीति से विलग नहीं हुए थे इसलिए हिन्दू जाति के शौर्य, मानसिक शक्ति और वीर्य जैसे गुण भी बने रहे और जातीयता का भावबोध भी।

सांस्कृतिक शुद्धता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पक्ष में आह्मवान केवल हिन्दू लेखकों की ओर से ही नहीं बल्कि अठारवीं और उन्नीसवीं सदी के मुस्लिम लेखकों की ओर से भी किया जाता रहा था। शाहवली उल्लाह (17.3-62), शाह अब्दुल अजीज (1764-1824), सैय्यद अहमद शाहिद (1786-1831) मौलाना इनायत अली (1794-185 8) और अल्ताफ हुसैन हाली (1831-1914) ने मुस्लिम धर्म संस्कृति के लुटे हुए गौरव और राजनीतिक सत्ता के छिन्न भिन्न हो जाने के विषय में शोकपूर्ण ढंग से वर्णन किया। शाह वली उल्लाह ने अपनी किताब वसीयतनामा में लिखाः

÷÷ हम यहां के लिए अजनबी हैं। हमारे पूर्वज यहां रहने के लिए बाहर से आये। हमारे लिए अरब होना और अरब भाषा का इस्तेमाल करना सबसे अधिक गौरव की बात है।” 15

मुस्लिम पुनरुत्थान और विशुद्ध मुस्लिम संस्कृति के निर्माण के सबसे प्रसिद्ध प्रवक्ता अल्ताफ हुसैन हाली ने 1879 ई. में छपे संग्रह मुसद्दस ए हाली में इस्लाम के उत्थान और पतन को अपनी कविताओं के माध्यम से उभारा। इसमें इस्लाम के पतन की दशा का चित्रण इस प्रकार से किया गयाः

÷÷ न हमारी धमनियों में, न खून में, न हमारी ख्वाहिशों में और न खोज में, हमारे दिल जबान और लफ्जों में, हमारी आदतों, तबियत जेहन और रवायतों में अब वह ऊंचाई नहीं मिलती। गर वह है भी तो महज इत्तिफाक है।” 16

लेकिन इस्लाम के पतन का जिक्र और सांस्कृतिक शुद्धता का पक्ष लेते हुए भी शाह वली उल्लाह से लेकर हाली तक , सभी ने किसी न किसी हद तक इस्लाम में तर्क और आधुनिक ज्ञानविज्ञान के प्रवेश को जरूरी माना। अल्ताफ हुसैन हाली तो सर सैय्यद अहमद खान (1811-9 8) के इस्लाम को आधुनिक शिक्षा और ज्ञान विज्ञान के नजदीक लाने के प्रयासों के पूरी तरह से कायल थे और

÷÷ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने इस्लाम के पुनर्जागरण के लिए सैय्यद अहमद खान के रास्ते पर चलने की सलाह दी।” 17

पर इन सारे प्रयासों के बावजूद अन्ततः इस्लाम की राजनीतिक ताकत और मजहबी पहचान ही उनके लिए प्रमुख थी जो हिन्दू पुनरुत्थान की चेतना से टकराती थी। 1867 ईसवी में देवबन्द में मोहम्मद वासिम नानौवती और शेख अहमद गंगोही द्वारा स्थापित संस्था ने इस्लामिक मतों का और जोर शोर से प्रचार किया। ऐसे ही दौर में उलेमाओं के द्वारा हिन्दू सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त और कुरान का विशुद्ध रूप से पालन करने वाली मुस्लिम अस्मिता के निर्माण की चेष्टा हुई। साम्प्रदायिकता के उदय और साम्प्रदायिक प्रतीकों के निर्माण की चेष्टाओं में किसी भी धर्म मजहब के भद्र वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। 19 वीं सदी में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही धर्मों के भद्रवर्ग धार्मिक प्रतीकों के गठन की कोशिशें कर रहे थे। बंगाल और महाराष्ट्र में भी इस समय हिन्दी क्षेत्र की तरह कई सवालों का साम्प्रदायिकीकरण किया गया था। जैसे बंगाल में हिन्दू भूस्वामी और मुस्लिम काश्तकारों के बीच के आर्थिक विभाजन को साम्प्रदायिक संघर्ष की शक्ल देने के लिए इस्तेमाल किया गया। विपिन चन्द्रा के अनुसार 1773 ईसवी के स्थायी बन्दोबस्त के फलस्वरूप बंगाल में पुराने हिन्दू और मुसलमान जमींदारों के परिवार विस्थापित हुए और उनकी जगह नये हिन्दू व्यावसायिक वर्ग का उदय हुआ। गांवों की जमीन पर कब्जा जमाये बैठे इस व्यापारिक साहूकार वर्ग से जब गरीब मुसलमानों का टकराव हुआ तो इसमें ÷ इन्होंने सामूहिक संघर्षों में अपने सह धर्मावलम्बियों को शरीक करने के लिए साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल किया।’18 पर अन्य प्रान्तों की तुलना में इस समय पश्चिमोत्तर प्रान्त में हिन्दू मुस्लिम सम्बन्ध सामाजिक आर्थिक धरातल पर किस तरह से अलग थे, इसका वर्णन पॉल ब्रास ने किया है। उन्होंने संयुक्त प्रान्त में 19 वीं सदी में पनपने वाली मुस्लिम साम्प्रदायिकता के सामजिक कारणों का विस्तार से अध्ययन करते हुए इन मतों को गलत ठहराया है कि 1857 ईसवी के विद्रोह के बाद अंग्रेजों द