ठेके के दौर में मज़दूर आंदोलन : सब रस ले गयी पिंजडेवाली मुनिया
April 27, 2007
कुमार अनिल भाकपा माले लिबरेशन से जुडे़ रहे हैं. अभी प्रभात खबर में हैं. मई दिवस को देखते हुए आज के हालात में मज़दूर संगठनों पर उनकी चिंताएं इस लेख के माध्यम से सामने आयी हैं. आगे भी वे कुछ लिखेंगे इस मसले पर. हमारा इरादा आज के राजनीतिक-आर्थिक हालात में मज़दूर आंदोलन पर एक बहस चलाने का है. आइए आप भी इसमें हिस्सा लीजिए.
कब चेतेगा मजदूर वर्ग
कुमार अनिल
बड़ी अजीब स्थिति है. सीपीएम से जुड़ी सीटू पटना में इस बार अलग से मजदूर दिवस मनायेगी. पिछले क ई वर्षों से क म-से-क म पहली मई को सारी ट्रेड यूनियनें एक मंच पर आती रही हैं. इस बार मामला नंदीग्राम को लेकर उलझ गया. नंदीग्राम में कि सानों पर हुए दमन को जहां अन्य संगठन मुद्दा बनाना चाहते हैं, वहीं सीपीएम अपनी सरकार की आलोचना को तैयार नहीं है. वाम मोरचे में फूट पड़ गयी. एटक, यूटीयूसी(लेस), यूटीयूसी, ए टू व एचएमएस एक मंच पर होंगे व दूसरी ओर होगी सीटू . बहुत दिनों के बाद कि सानों के मुद्दे पर ट्रेड यूनियनों में बहस हुई.
आजादी के बाद से ही कि सानों व दूसरे तबकों के आंदोलनों से मजदूर वर्ग का आंदोलन कटता चला गया. आज मजदूर वर्ग का आंदोलन पूरी तरह अपनी ही मांगों में सिमट क र रह गया है. वेतन, बोनस, प्रोन्नति, भत्ता ही उसके लिए सब कुछ है. आंदोलन अपनी राष्ट्रीय भूमिका खोता चला गया.
एक समय ट्रेड यूनियन आंदोलन ने देश की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज क रायी थी. क म्युनिस्ट पार्टी के बनने से पहले 1921 में एटक के दूसरे अधिवेशन में 50 हजार से ज्यादा मजदूर झरिया में जुटे थे. अधिवेशन का पहला प्रस्ताव स्वराज के लिए था. जोरदार शब्दों में घोषणा की गयी कि स्वराज पाने का सही समय आ गया है. दूसरा प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय भाईचारे को लेकर था. सूखे व अकाल से पीड़ित रूसियों के प्रति संवेदना प्रकट की गयी. अधिवेशन ने देश के मजदूरों का आह्वान किया कि वे रूसी भाइयों के लिए अपना एक दिन का वेतन दान करें. साइमन कमीशन जब मुंबई पहुंचा तो 20 हजार मजदूरों ने सड़क पर उतर कर विरोध कि या.
कम्युनिस्ट पार्टी की उदासीनता के बावजूद नौ अगस्त, 1942 को जब महात्मा गांधी गिरफ्तार हुए, तो देश भर के मजदूरों ने हड़ताल की. 1946 के नौसैनिक हड़ताल के समर्थन में मजदूरों की हड़ताल को भला कौन भुला सकता है.
वैश्वीकरण के इस युग में इकाई, विभाग व संवर्ग में बंटे मजदूर वर्ग को न सिर्फ अपनी एकता बनानी होगी, वरन अपनी सामाजिक भूमिका को फिर से परिभाषित भी करना होगा.
बिहार में सेवा क्षेत्र के कर्मियों की बड़ी तादाद है. अब तब उन्होंने सैक ड़ों हड़तालें की हैं. उनका वेतनमान भी काफ़ी आक र्षक है, लेकिन उन्होंने कभी जनता से जुड़ने की कोशिश नहीं की. बीपीएल(गरीबी रेखा से नीचे रहनेवालों की सूची, जो तैयार हो रही है) में धांधली को लेकर बिहार के ग्रामीण गरीब आंदोलित हैं. उन्होंने अपने दम पर सरकार को पीछे धकेला. आज हर जिले में सरकारी महकमा सूची में सुधार के लिए रतजगा कर रहा है. नीतीश सरकार ने मामले की गंभीरता को समझा, पर मजदूर वर्ग की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी. पंचायत स्तर पर धांधली में सरकारी सेवकों के नाम धड़ल्ले से आ रहे हैं, पर किसी कर्मचारी संगठन ने अपने सहकर्मियों की घूसखोरी की प्रवृत्ति को मुद्दा नहीं बनाया. नरेगा(राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का बिहार में बुरा हाल है, पर इसे संगठित क्षेत्र के कर्मियों ने मुद्दा नहीं बनाया. बिहार में मजदूर वर्ग का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है. सबसे बड़ी संख्या खेत मजदूरों की है. निर्माण मजदूरों की भी बड़ी तादाद है. बिहार की आबादी के एक तिहाई इस हिस्से से मुंह मोड़ कर किसी आंदोलन का विकास नहीं हो सकता.
आज का दौर ठेके और निजीक रण का दौर है. ठेके पर शिक्षक, कर्मचारी और यहां तक की डॉक्टर-इंजीनियर
की भी बहाली हो रही है. मजदूर वर्ग के समक्ष यह बिल्कुल नयी परिस्थिति है. जब कुछ भी स्थायी न हो, तो मजदूरों को संगठित करना और भी मुश्किल है. ब्रिटेन व अमेरिका की ट्रेड यूनियनें विलय के लिए वार्ता चला रही हैं. भारत के ट्रेड यूनियन नेताओं को भी कुनबों की राजनीति से जल्दी ही बाहर आ जाना चाहिए.
कुमार अनिल
बड़ी अजीब स्थिति है. सीपीएम से जुड़ी सीटू पटना में इस बार अलग से मजदूर दिवस मनायेगी. पिछले क ई वर्षों से क म-से-क म पहली मई को सारी ट्रेड यूनियनें एक मंच पर आती रही हैं. इस बार मामला नंदीग्राम को लेकर उलझ गया. नंदीग्राम में कि सानों पर हुए दमन को जहां अन्य संगठन मुद्दा बनाना चाहते हैं, वहीं सीपीएम अपनी सरकार की आलोचना को तैयार नहीं है. वाम मोरचे में फूट पड़ गयी. एटक, यूटीयूसी(लेस), यूटीयूसी, ए टू व एचएमएस एक मंच पर होंगे व दूसरी ओर होगी सीटू . बहुत दिनों के बाद कि सानों के मुद्दे पर ट्रेड यूनियनों में बहस हुई.
आजादी के बाद से ही कि सानों व दूसरे तबकों के आंदोलनों से मजदूर वर्ग का आंदोलन कटता चला गया. आज मजदूर वर्ग का आंदोलन पूरी तरह अपनी ही मांगों में सिमट क र रह गया है. वेतन, बोनस, प्रोन्नति, भत्ता ही उसके लिए सब कुछ है. आंदोलन अपनी राष्ट्रीय भूमिका खोता चला गया.
एक समय ट्रेड यूनियन आंदोलन ने देश की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज क रायी थी. क म्युनिस्ट पार्टी के बनने से पहले 1921 में एटक के दूसरे अधिवेशन में 50 हजार से ज्यादा मजदूर झरिया में जुटे थे. अधिवेशन का पहला प्रस्ताव स्वराज के लिए था. जोरदार शब्दों में घोषणा की गयी कि स्वराज पाने का सही समय आ गया है. दूसरा प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय भाईचारे को लेकर था. सूखे व अकाल से पीड़ित रूसियों के प्रति संवेदना प्रकट की गयी. अधिवेशन ने देश के मजदूरों का आह्वान किया कि वे रूसी भाइयों के लिए अपना एक दिन का वेतन दान करें. साइमन कमीशन जब मुंबई पहुंचा तो 20 हजार मजदूरों ने सड़क पर उतर कर विरोध कि या.
कम्युनिस्ट पार्टी की उदासीनता के बावजूद नौ अगस्त, 1942 को जब महात्मा गांधी गिरफ्तार हुए, तो देश भर के मजदूरों ने हड़ताल की. 1946 के नौसैनिक हड़ताल के समर्थन में मजदूरों की हड़ताल को भला कौन भुला सकता है.
वैश्वीकरण के इस युग में इकाई, विभाग व संवर्ग में बंटे मजदूर वर्ग को न सिर्फ अपनी एकता बनानी होगी, वरन अपनी सामाजिक भूमिका को फिर से परिभाषित भी करना होगा.
बिहार में सेवा क्षेत्र के कर्मियों की बड़ी तादाद है. अब तब उन्होंने सैक ड़ों हड़तालें की हैं. उनका वेतनमान भी काफ़ी आक र्षक है, लेकिन उन्होंने कभी जनता से जुड़ने की कोशिश नहीं की. बीपीएल(गरीबी रेखा से नीचे रहनेवालों की सूची, जो तैयार हो रही है) में धांधली को लेकर बिहार के ग्रामीण गरीब आंदोलित हैं. उन्होंने अपने दम पर सरकार को पीछे धकेला. आज हर जिले में सरकारी महकमा सूची में सुधार के लिए रतजगा कर रहा है. नीतीश सरकार ने मामले की गंभीरता को समझा, पर मजदूर वर्ग की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी. पंचायत स्तर पर धांधली में सरकारी सेवकों के नाम धड़ल्ले से आ रहे हैं, पर किसी कर्मचारी संगठन ने अपने सहकर्मियों की घूसखोरी की प्रवृत्ति को मुद्दा नहीं बनाया. नरेगा(राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का बिहार में बुरा हाल है, पर इसे संगठित क्षेत्र के कर्मियों ने मुद्दा नहीं बनाया. बिहार में मजदूर वर्ग का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है. सबसे बड़ी संख्या खेत मजदूरों की है. निर्माण मजदूरों की भी बड़ी तादाद है. बिहार की आबादी के एक तिहाई इस हिस्से से मुंह मोड़ कर किसी आंदोलन का विकास नहीं हो सकता.
आज का दौर ठेके और निजीक रण का दौर है. ठेके पर शिक्षक, कर्मचारी और यहां तक की डॉक्टर-इंजीनियर
की भी बहाली हो रही है. मजदूर वर्ग के समक्ष यह बिल्कुल नयी परिस्थिति है. जब कुछ भी स्थायी न हो, तो मजदूरों को संगठित करना और भी मुश्किल है. ब्रिटेन व अमेरिका की ट्रेड यूनियनें विलय के लिए वार्ता चला रही हैं. भारत के ट्रेड यूनियन नेताओं को भी कुनबों की राजनीति से जल्दी ही बाहर आ जाना चाहिए.
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