बंगाल में पोंगापंथ

April 27, 2007

वाकई देश में सीपीएम किस तरह से मार्क्स का नाम लेकर धार्मिक ब्रह्मणों और आर्थिक ब्राह्मणों (अमेरिकनों) के लिए लाल कालीन बिछाये हुए है, यह देखने लायक है. हंस के मार्च अंक से साभार
पलाश विश्वास

बंगाल के शरतचन्द्रीय बंकिमचन्द्रीय उपन्यासों से हिंदी जगत भली-भांति परिचित है, जहां कुलीन ब्राह्मण जमींदार परिवारों की गौरवगाथाएं लिपिबद्ध हैं. महाश्वेता देवी समेत आधुनिक बांग्ला गद्य साहित्य में स्त्राी अस्मिता व उसकी देहमुक्ति का विमर्श और आदिवासी जीवन यंत्राणा व संघर्षों की सशक्त प्रस्तुति के बावजूद दलितों की उपस्थिति नगण्य है. हिंदी, मराठी, पंजाबी, तमिल, कन्नड़ और तेलुगू भाषाओं की तरह बांग्ला में दलित साहित्य आंदोलन की कोई पहचान नहीं बन पाई है और न ही कोई महत्त्वपूर्ण दलित आत्मकथा सामने आई है, बेबी हाल्दार के आलोआंधारि जैसे अपवादों को छोड़कर. आलो आंधारि का भी हिंदी अनुवाद पहले छपा, मूल बांग्ला आत्मकथा बाद में आयी.
यह ब्राह्मणत्व का प्रबल प्रताप ही है कि १९४७ में भारत विभाजन के बाद हुए बहुसंख्य जनसंख्या स्थानांतरण के तहत पंजाब से आनेवाले दंगापीड़ितों को शरणार्थी मानकर उनके पुनर्वास को राष्ट्रीय दायित्व मानते हुए युद्धस्तर पर पुनर्वास का काम पूरा किया गया. जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरू और आधुनिक बंगाल के निर्माता तत्कालीन मुख्यमंत्राी विधानचंद्र राय ने पूर्वी बंगाल के दलित आंदोलन के आधार क्षेत्रा जैशोर, खुलना, फरीदपुर, बरिशाल से लेकर चटगांव, कलकत्तिया सवर्ण वर्चस्व और ब्राह्मणवादी एकाधिकार को चुनौती देने वाली कोई ताकत नहीं है. भारत भर में ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक पिछड़े वर्ग की जनसंख्या चालीस प्रतिशत से ज्य़ादा है. भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बाकी देश में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का जोरदार समर्थन करती है. मलाईदार तबके को प्रोन्नति से अलग रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में ओबीसी कोर ग्रुप की बैठक हुई जिसमें त्रिापुरा के समाज कल्याण मंत्राी कवि अनिल सरकार, जो माकपा की हैदराबाद कांग्रेस में गठित दलित सेल में बंगाल वाममोर्चा चेयरमैन विमान बसु के साथ महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं, शामिल हुए. पार्टी का दलित एजेंडा भी बसु और सरकार ने तय किया. इन्हीं अनिल सरकार ने उस बैठक में दलितों और पिछड़ों के आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमा ५० फ़ीसदी से बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की मांग उठाई, मलाईदार तबक़े को प्रोन्नति से अलग रखने के फ़ैसले की प्रतिक्रिया में उन्होंने सवर्ण मलाईदार तबकेश् को चिन्हित करके उन्हें भी प्रोन्नति के अवसरों से वंचित रखने की सिफ़ारिश की है. उनका दावा है कि त्रिापुरा में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों का आरक्षण लागू किया जा चुका है.
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में अभी तक पिछड़ी जातियों की पहचान का काम पूरा नहीं हुआ है, आरक्षण तो दूर. अनिल सरकार कहते हैं कि पचास फ़ीसद आरक्षण के बावजूद सिर्फ दस प्रतिशत नौकरियां ही दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को मिलती हैं, नब्बे फ़ीसदी नौकरियों पर सवर्ण काबिज़ हैं.
पश्चिम बंगाल में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को प्रोन्नति के अवसर तो सिरे से नहीं हैं. आरक्षित पदों पर रिक्तियां अनंत हैं पर योग्य प्रार्थी न मिलने की वजह दिखाकर अमूमन आरक्षित पदों को सामान्य बनाना आम है. गैर बंगाली नागरिकों को तो किसी भी क़ीमत पर जाति प्रमाण-पत्रा नहीं ही मिलता पर अब दलितों, आदिवासियों की संतानों को भी जाति प्रमाण-पत्रा जारी नहीं किए जाते.
सबसे सदमा पहुंचाने वाली बात यह है कि बाक़ी देश में जहां अखब़ार और मीडिया गैर-ब्राह्मणों की खब़रों को प्रमुखता देते हैं, वहीं बंगाल में ब्राह्मणवादी मीडिया और अखब़ार दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और शरणार्थियों के बारे में एक पंक्ति की खब़र तक नहीं छापते. जबकि कमज़ोर तबकेश् की आवाज़ उठाने वाली माकपा बंगाल में ३५ सालों से सत्ता में हैं.
पिछले दिनों सुभाष चक्रवर्ती के तारापीठ जाकर तारा मां की पूजा पर पार्टी पोलित ब्यूरो, केंद्रीय समिति, राज्य वाम मोर्चा से लेकर मीडिया में काफ़ी बवेला मचा. पार्टी, विचारधारा और धर्म पर वैचारिक बहस छिड़ गई. प्रतिक्रिया में सुभाष चक्रवर्ती ने कहा, ‘पहले मैं हिंदू हूं और फिर ब्राह्मण`. वे दुर्गोत्सव में १२० पंडालों के संरक्षक थे. विवाद से चिढ़कर उन्होंने परिवहनकर्मियों को धूमधाम से विश्वकर्ता पूजा मनाने के निर्देश दिए. हक़ीक़त यह है कि सुभाष चक्रवर्ती और उनके चार भाइयों ने जनेऊ धारण नहीं किया. ब्राह्मण समाज ने आज़ादी से पहले उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था, वे एकमात्रा सवर्ण मंत्राी हैं जो दलितों का साथ देते हैं. पर वे अपनी पहचान और संस्कृति के यथार्थ पर जोर देते हैं. ज़मीनी जड़ें होने के कारण उनका जनाधार मजबूत है. सुभाष चक्रवर्ती के इस विवादास्पद बयान पर बंगाल में धर्म पर बहस तो छिड़ी, मनुस्मृति और उसके अभिशाप पर चर्चा तक नहीं हुई, चक्रवर्ती वाम आंदोलन के बंगाल, त्रिापुरा और केरल तक सिमट जाने की वजह भारतीय संस्कृति और लोक से अलगाव को मानते हैं.
बाक़ी भारत में दलित आंदोलन से अलगाव भी माकपा को राष्ट्रीय नहीं बनाती, यह पार्टी के हैदराबाद कांग्रेस में मानकर बाक़ायदा आज़ादी के इतने सालों बाद दलित एजेंडा भी पास किया गया पर अपने चरित्रा में आज भी माकपा और सारे वामपंथी दल दलित विरोधी हैं. इसीलिए दिनों दिन बंगाल में ब्राह्मणवाद की जडें मजबूत हो रही हैं. इसी हक़ीक़त की ओर बागी मंत्राी सुभाष चक्रवर्ती ने उंगली उठाई है. पूंजीवाद विकास के लिए अधाधुंध, ज़मीन अधिग्रहण के शिकार हो रहे हैं दलित पिछड़े आदिवासी और अल्पसंख्यक, पर इस मुद्दे पर तमाम हो हल्ले के बावजूद बंगाल में दलितों के अधिकार को लेकर लड़ने वाली कोई ताकत कहीं नहीं है.
इधर के वर्षों में बचे-खुचे दलित आंदोलन के तहत खा़सकर कोलकाता और आस-पास विवाह, श्राद्ध जैसे संस्कारों में ब्राह्मणों का बहिष्कार होने लगा है. श्राद्ध की बजाय स्मृति-सभाएं होने लगी है, कई बरस पहले यादवपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी करने वाले एक दलित ने अपढ़ पुरोहित से पिता का श्राद्ध कराने की बजाय कृष्णनगर के पास अपने गांव में स्मृति सभा का आयोजन किया तो पूरे इलाक़े में तनाव फैल गया.
ताजा घटना सुभाष चक्रवर्ती के ब्राह्मणत्व के विवाद के बाद की है.
सुंदरवन इलाक़े में दलितों-पिछड़ों की आबादी ज्य़ादा रही है. इसी इलाक़े में दक्षिण २४ परगना जिले के गोसाबा थाना अंतर्गत सातजेलिया लाक्स़बागान ग्लासखाली गांव के निवासी मदन मोहन मंडल स्थानीय लाक्सबागान प्राथमिक विद्यालय के अवैतनिक शिक्षक हैं. पर चूंकि उन्होंने पुरोहित बुलाकर पिता का श्राद्ध नहीं किया और न ही मृत्युभोज दिया इसलिए पिछले चार महीने से उनका सामाजिक बहिष्कार चल रहा हैं. वे अपवित्रा और अछूत हो गए हैं और पिछले चार महीने से वे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं.
मदनमोहन मंडल के इस स्कूल के विद्यार्थी ज्य़ादातर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के बच्चे हैं. बतौर शिक्षक छात्रा-छात्रााओं में मदनमोहन बाबू अत्यंत लोकप्रिय हैं, पर पवित्रा ब्राह्मणवाद के पुण्य प्रताप से शनि की दशा है उन पर. पिता की मृत्यु पर बंगाली रिवाज़ के मुताबिक सफ़ेद थान कपड़े नहीं पहने उन्होंने. हविष्य अन्न नहीं खाया. सामान्य भोजन किया. नंगे पांव नहीं चले. और न ही पुरोहित का विधान लिया या श्राद्ध कराया.
ब्राह्मणवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस दलित बहुल इलाक़े में, ब्राह्मणों ने नहीं, दलितों और पिछड़ों ने उनके स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी. प्रधानाचार्य शिवपद मंडल का कहना है, ”मदनमोहन बाबू सूतक (अशौच अवस्था में) में हैं. वे स्कूल आएंगे तो यह नन्हें बच्चों के लिए अशुभ होगा. मदनमोहन बाबू को फ़तवा जारी किया गया है कि ब्राह्मणों से विधान लेकर पुरोहित बुलाकर पहले पितृश्राद्ध कराएं, फिर स्कूल आएं.
मदनमोहन मंडल ने हार नहीं मानी और विद्यालय निरीक्षक की शरण में चले गए. उन्होंने लाक्सबागान के पड़ोसी गांव बनखाली प्राथमिक विद्यालय में अपना तबादला करवा लिया पर इस स्कूल में भी उनके प्रवेशाधिकार पर रोक लग गई.
इलाक़े के मातबर लाहिड़ीपुर ग्राम पंचायत के पूर्व सदस्य व वामपंथी आरएसपी के नेता श्रीकांत मंडल का सवाल है, ”जो व्यक्ति अपने पिता का श्राद्ध नहीं करता, वह बच्चों को क्या शिक्षा देगा.“ गौरतलब है कि सुंदरवन इलाके में माकपा के अलावा आरएसपी का असर ज्य़ादा है. अभिभावकों की ओर से कन्हाई सरदार का कहना है, ”जो शिक्षक गीता, शास्त्रा नहीं मानता, उसके यहां बच्चों को भेजने के बजाय उन्हें अपढ़ बनाए रखना ही बेहतर है.“
आखिऱकार अपने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ़ मदनमोहन मंडल गोसाबा थाना पहुंच गए, पर पुलिस ने रपट लिखने से मना कर दिया. मदनमोहन बाबू ने गोसाबा अंचल के विद्यालय निरीक्षक ब्रजेन मंडल से लिखित शिकायत की. ब्रजेन बाबू ने खुद शिक्षक संगठन के प्रतिनिधियों के साथ मौक़े पर गए, पर ब्राह्मणवादी कर्मकांड विरोधी शिक्षक का सामाजिक बहिष्कार खत़्म नहीं हुआ.
मदनमोहन मंडल आरएसपी के कृषक आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं. पर स्थानीय आरएसपी विधायक चित्तरंजन मंडल ने मदनमोहन बाबू के आचरण को ‘अशोभनीय` करार दिया.
दक्षिण चौबीस परगना के वामपंथी शिक्षक संगठन के सभापति अशोक बंद्योपाध्याय का कहना है, ”अगर कोई संस्कार तोड़ना चाहे तो उनका स्वागत है, पर यह देखना होगा कि उसकी इस कार्रवाई को स्थानीय लोग किस रूप में लेते हैं.“ अशोक बाबू ने मदनमोहन मंडल के मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.
मदनमोहन बाबू अब भी स्कूल नहीं जा पाते, वे गोसाबा स्थित अपर विद्यालय निरीक्षक के दफ्त़र में हाज़िरी लगाकर अपनी नौकरी बचा रहे हैं. पर वे किसी क़ीमत पर पितृश्राद्ध के लिए तैयार नहीं हैं.
माकपा के बागी मंत्राी के ब्राह्मणत्व पर विचारधारा का हव्वा खड़ा करने वाले तमाम लोग परिदृश्य से गायब हैं.

संपर्क : द्वारा श्रीमती आरती राय, गोस्टोकानन, सोदपुर, कोलकाता-७००११०
फोन : ०३३-२५६५९५५१

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