जाति आधारित जन गणना के पक्षधर थे मधु लिमये
April 30, 2007
विनोदानंद प्रसाद सिंह
एक मई, १९२२ को समाजवादी नेता मधु रामचंद्र लिमये का जन्म हुआ था. उनका देहावसन ८ जनवरी को हुआ. भारत में समाजवादी आंदोलन की पहली पीढ़ी के नेता आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ राममनोहर लोहिया के बाद सबसे अधिक लेखन मधु लिमये ने कि या. वे के वल लेखक नहीं थे. उन्होंने कि सी से भी क म संघर्ष नहीं कि या. १९८२ में वे दलगत राजनीति से अलग हो गये. दलगत राजनीति छोड़ने का वास्तविक कारण था, राजनीति के चरित्र का उनके माफि क नहीं रह जाना. उन्होंने एक घटना का जिक्र मुझसे कि या था. मधु लिमये पहली बार १९६४ के उपचुनाव में मुंगेर संसदीय क्षेत्र से लोक सभा के लिए निर्वाचित हुए थे. फि र १९६७ मं वहीं से जीते थे. वहीं से १९७७ में जीते. १९८० में वे बांका से चुनाव लड़ रहे थे. दोनों ही क्षेत्र पड़ोसी क्षेत्र हैं. संयोगवश एक ऐसा इलाका है जो पहले मुंगेर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था और बाद में बांका क्षेत्र का हिस्सा हो गया. वहां एक जगह एक सज्जन १९६४ से ही अपना मकान चुनाव कार्यालय के लिए देते थे. क भी उन्होंने कोई कि राय नहीं मांगा. १९८० में भी वहीं उनका चुनाव कार्यालय था. इस बार मालिक ने कि राया मांगा. कार्यक र्ता ने जब मधु जी की साधनहीनता की बात क ही तो मकान मालिक ने क हा कि अब तो वे सत्तारू ढ़ पार्टी के सदस्य हैं तो फिर साधनहीनता क्यों? मधुजी इस उत्तर से मर्माहत हुए थे. ऐसी घटनाएं बड़ा कारण बनीं. मधुजी की इस क थनी-क रनी में अंतर नहीं था. वे सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध थे. इसके अनेक उदाहरण हैं. वर्षों पहले जब अनेक समाजवादी, साम्यवादी और सिद्धांत क ी दुहाई देनेवाले नेता बात तो क रते थे समान शिक्षा क ी, लेकि न अपनी संतानों क ो पढ़ने के लिए भेजते थे अंगरेजी माध्यम के तथाक थित पब्लिक स्कू लों में, उस समय उन्होंने अपने एक लौते पुत्र अनिरुद्ध क ो भेजा था मराठी माध्यम से स्कू ल में. १९५५ में बीमार रहने के बावजूद उन्होंने गोवा मु`ति आंदोलन में भाग लिया, जहां पुर्तगालियों ने उनक ी क स क र पिटाई क ी थी. एक बार तो यह भी अफ वाह उड़ी कि उनक ी मृत्यु हो गयी. पुर्तगाली सैनिक अदालत ने १२ साल क ी क ठोर सजा दी थी. १९५७ में भारत सरक ार और जनमत के दबाव में सारे आंदोलनक ारियों क ो रिहा कि या गया.
१९७५ में इंदिरा गांधी ने आपातक ाल लागू क र लोक तंत्र क ा गला घोंटा था और तानाशाही स्थापित क ी थी. उसी के तहत लोक सभा क ी मियाद भी पांच साल से छह साल क र दी गयी थी. आम चुनाव १९७१ में हुआ था और १९७६ में उसक ी मियाद पूरी हो रही थी. अनेक विपक्षी सांसद जेलों में बंद थे. के वल मधु लिमये ने १९७६ में संसद क ी मियाद पूरी होने पर इस्तीफ ा दिया था. उन्हीं से प्रभावित हो क र उनके साथी सह बंदी शरद यादव ने भी इस्तीफ ा दिया था. १९७७ के चुनाव में जनता पार्टी क ी जीत हुई और मोरारजी भाई प्रधानमंत्री बने. मधु लिमये एक प्रमुख घटक के नेता थे. वे स्वयं मंत्रिमंडल में जा सक ते थे. लेकि न इसके बदले उन्होंेने मधु दंडवते, जार्ज फ र्नांडीस और पुरुषोत्तम क ौशिक क ो मंत्रिमंडल में भेजा. मधु लिमये क ो १९८० में बांक ा चुनाव हारने के बाद चौधरी चरण सिंह ने राज्य सभा क ा सदस्य बनने क ा आग्रह कि या. लेकि न उन्होंने पिछले दरवाजे से सांसद में जाना स्वीक ार नहीं कि या. मधु लिमये प्रखर राष्टवादी थे. आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या थी एक राष्टराज्य बनाने क ी. ७० और ८० के दशक में जब पंजाब, असम जैसे राज्यों में अस्मिता के सवाल पर आंदोलन शुरू हुए, उस समय बहुत सारे समाजवादी भी उसके पक्षधर थे. मैं भी उनमंे से एक था. उस समय भी मधु जी ने उसक ा समर्थन नहीं कि या था. जब पंजाब से पानी के सवाल पर संघर्ष शुरू होक र स्वायत्तता क ी मांग तक पहुंच रहा था तो मधु जी ने एक लंबा शोधपरक लेख लिखा और क हा कि वास्तव में अन्याय तो राजस्थान के साथ हो रहा है. इसक ा यह मतलब नहीं कि मधु जी सिखों या असम के छात्रों के खिलाफ थे. १९८४ में इंदिरा गांधी क ी हत्या के तत्क ाल बाद सिखों क ा क त्ल कि या जा रहा था. उन दिनों मधु जी वेस्टर्न क ोर्ट के एक क मरे में रहते थे. वेस्टर्न क ोर्ट के अहाते के बाहर एक टै`सी पड़ाव था, जहां अधिक तर गाड़ी चलानेवाले सिख थे. उन पर हमला हुआ था और गाड़ियों में आग लगा दी गयी थी. प्रतिकू ल स्वास्थ्य के बावजूद वे बाहर निक लने के लिए छटपटा रहे थे और बार बार क ह रहे थे कि `या यही देखने के लिए मैंे जिंदा हूं.
उन्होंने क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल क ो श`ति और सत्ता के विकेें द्रीक रण से जोड़ा और चौखंभा राज्य क ी अवधारणा क ी पुनर्व्याख्या क ी. वे मानते थे कि राष्ट तभी मजबूत हो सक ता है जब देश में समता के मूल्यों पर आधारित समाज क ा निर्माण हो. इसलिए वे क मजोर तबक ोंक ो विशेष अवसर देने क ी वक ालत क रते रहे. जब १९९० में मंडल क मीशन के एक हिस्से क ो लागू क रने के सवाल पर पूरे देश में बवाल मचा तो भी उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर अपनी बात क हनी नहीं छोड़ी. उस समय उन्होंेने एक लंबा लेख लिखा था, जिसक ा शीर्षक था-आरक्षण क ी स्वत: समापनीय योजना. उन्होंने क हा कि जनगणना द्वारा विभिन्न जातियों क ी संख्या क ा पता लगाना जरू री है. जातियों क ी जनगणना क रने में जातीयता नहीं बढ़ती. १९३१ के बाद जाति आधारित जनगणना खत्म क र दी गयी. उससे जातीयता खत्म हो गयी? या बढ़ी? उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अन्य पिछड़े वर्गों एवं उच्च् जातियों के गरीब तबक ों क ो उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और ऐसा न हो कि आरक्षित क ोटे पर के वल पुरुषों क ा एक ाधिक ार हो. उस समय ही उन्होंने सुझाव दिया था कि सुझाव में आरक्षण लागू होने पर विचार क रना चाहिए, `योंकि अन्य पिछड़े वर्गों में शिक्षा क ा प्रसार नहीं होगा तब तक सेवाओं मेंे आरक्षण दिखावे क ी वस्तु होगी. यह भी क हा था कि उच्च् जातियों-वर्गों के आर्थिक दृष्टि से क मजोर तबक ों क ो भी आरक्षण मिले. आरक्षण क ी सीमा ५० प्रतिशत तक ही रहने क ा क ोई औचित्य नहीं है. उन्होंने एक महत्वपूर्ण सुझाव यह भी दिया था कि जिन जातियों क ो सरक ारी नौक रियोंे मंे उनक ी जनसंख्या के अनुपात मंे क म-से-क म ५० प्रतिशत हिस्सा मिल चुक ा है, उन पर आर्थिक क सौटी लगायी जाये. अगर उनक ा प्रतिनिधित्व क म हो तो उन पर आर्थिक क सौटी नहीं लगायी जाये.
आज मलाईदार तबके क ी बहस के संदर्भ में यह सुझाव बहुत ही प्रांसगिक है. उनक ा अनुमान था कि अगर ईमानदारी से यह लागू कि या जाये तो अगले चार-पांच दशक ों में आरक्षण क ी जरू रत स्वत: समाप्त् हो जायेगी. इन दिनों सच्च्र क मेटी क ी रिपोर्ट बड़ी चर्चा में है. प्रत्येक दल अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार उसक ी व्याख्या क र रहा है. अब सच्च्र क मेटी के रिपोर्ट क ा उपयोग इसलिए कि या जा रहा है कि इस तरीके से वोट बैंक क ो अक्षुण्ण बनाया जाये या रखा जाये. जो लोग चिल्लाते हंै कि अल्पसंख्यक ों और खास क र मुसलमानों के प्रति तुष्टीक रण क ी नीति चलायी जा रही है. इसमें साफ -साफ क हा गया है कि मुसलमानों क ी सामाजिक , आर्थिक स्थिति अन्य वर्गों से बदतर है. इस सच्चई क ो क ौन नहीं जानता कि उच्च् सेवाओं के मामले में यहां तक कि निम्न सेवाओं के मामलों में, संपत्ति के मामले में मुसलमानों क ी स्थिति तुलनात्मक रू प से खराब है? दूसरी ओर धर्म के आधार पर आरक्षण देने क ी वक ालत क रनेवाले लोगों के लिए भी सच्च्र क मेटी क ी रिपोर्ट क ी अनुशंसा क ोई मदद नहीं क रती. सच्च्र क मेटी ने धर्म पर आधारित आरक्षण क ो नक ारा है. इस संबंध में अपनी मृत्यु के कु छ ही दिनों पहले मधु जी ने चेतावनी भरे शब्दों में क हा था कि धर्म आधारित आरक्षण क ा खतरनाक खेल न खेलंे.
आज मधु जी नहीं हैं. कु छ अखबारों या संस्थानों क ो छोड़ उन पर लेख नहीं लिखे जायेेंगे, गोष्ठियां नहीं होंगी, `योंकि जब राजनीति में वोट बैंक बनाने क ी रणनीति ही प्रमुख है तो जातिविहीन समाज और राजनीति क ी वक ालत क रनेवाले लोग उन्हें कै से याद क रेंगे? उनक ो याद क रने से क ोई वोट बैंेक शायद ही बने.
मधु जी क ो क ई मामलांे में गलत समझा गया. वे स्वभावत: अंतर्मुखी थे, पर कु छ लोग उन्हें घमंडी मानते थे. फि र भी जो लोग कु छ समय के लिए भी उनके संपर्क मंे आये, उन्होंेने उनक ी सादगी, उनक ी सरलता, उनक ी विद्वता क ो महसूस कि या. सबसे बड़ी विडंबना तो यह रही कि जिस मधु लिमये ने हर मोड़ पर समाजवादी आंदोलन क ी एक ता क ो क ायम रखने क ी क ोशिश क ी, उन्हें ही तोड़क क हा गया, दूसरे के द्वारा नहीं, अपनों के द्वारा ही.
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1.
Srijan Shilpi | May 1, 2007 at 7:57 am
मधु लिमये के जन्म दिन पर बहुत अच्छी श्रद्धांजलि। सामाजिक न्याय को ठोस हकीकत के रूप में परिणत करने की दिशा में मधु लिमये जी के विचार बहुत अधिक प्रासंगिक हैं। उनके विचार गहन शोध और तथ्यों पर आधारित होते थे। लोकतंत्र एवं समाजवाद को व्यावहारिक एवं वास्तविक धरातल पर लाने के लिए उनके विचार हमेशा अनुकरणीय रहेंगे।
लेखक विनोदानंद जी को साधुवाद।
कृपया लेख में टंकण की त्रुटियां दूर कर लें, अक्षरों के बीच अतिरिक्त स्पेस की वजह से पढ़ने में दिक्कत हो रही है।