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	<title>Comments on: मजदूर आंदोलन, कै सी है दशा, क्या होगी दिशा</title>
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	<description>Just another WordPress.com weblog</description>
	<pubDate>Wed, 20 Aug 2008 04:58:05 +0000</pubDate>
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		<title>By: Reyaz-ul-haque</title>
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		<dc:creator>Reyaz-ul-haque</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 06 May 2007 18:06:48 +0000</pubDate>
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		<description>सर्जक भाई,&lt;br/&gt;आपके विचार अच्छे लगे. इस दिन को जिस तरह आडंबर पूर्ण बना दिया गया है वह विचलित करता है. किस तरह लाखों मज़दूरों के खून को यग्य का हवन बना दिया गया है. मगर यह सिर्फ़ एक ही पहलू है. काफ़ी लोग हैं जो दूसरे तरीके से सोच रहे हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सर्जक भाई,<br />आपके विचार अच्छे लगे. इस दिन को जिस तरह आडंबर पूर्ण बना दिया गया है वह विचलित करता है. किस तरह लाखों मज़दूरों के खून को यग्य का हवन बना दिया गया है. मगर यह सिर्फ़ एक ही पहलू है. काफ़ी लोग हैं जो दूसरे तरीके से सोच रहे हैं.</p>
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		<title>By: sarjak</title>
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		<dc:creator>sarjak</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 May 2007 17:43:10 +0000</pubDate>
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		<description>आज, यानी 1 मई, 2007 को, दुनियाभर में मई दिवस के नाम पर कई आनु‍ष्‍ठानिक कार्रवाईयां की जाएंगी और भारत के संसदीय ”कॉमरेड” भी हर साल की तरह मई दिवस पर नीरस-बेजान आनुष्‍ठानिक कार्रवाईयां करेंगे। धार्मिक कथा की तरह शिकागो के मजदूरों के संघर्ष की कथा सुनाएंगे, झण्‍डा फहराएंगे और लड्डू आदि बांटकर इतिश्री कर लेंगे। लेकिन ‘समाजवाद के अंत’ की तमाम चीख-पुखार के बीच, इन संसदीय वामपंथियों द्वारा इस दिन को अनुष्‍ठान-सा बनाने के तमाम प्रयासों के बीच,  देशभर के मजदूर और उनके हरावल और तमाम संवेदनशील लोग भारत के मजदूर आंदोलन की दशा-दिशा के बारे में लगातार गंभीरता से सोच रहे हैं। यह महज थोथा विश्‍वास नहीं है, बल्कि जगह-जगह इसके उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। कुछ प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं को पढ़कर, मजदूरों के बीच लीक से हट कर चलती कुछ कार्रवाईयों को देखकर तो यही अंदाजा लगता है, यही नहीं आज के हिंदी-अंग्रेजी के कुछ ब्‍लॉग, जैसे हाशिया, को देखकर भी यही लगता है। इसी दिशा में कुछ गंभीर चिंतन मुझे मज़दूरों के एक क्रांतिकारी अखबार बिगुल के सद्य-प्रकाशित सम्‍पादकीय में नजर आया। इसलिए इस सम्‍पाकीय को मैंने पीडीएफ फाइल बना कर यहां जोड़ दिया है। इसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें:&lt;br/&gt;http://shabdsangharsh.files.wordpress.com/2007/05/may_day_article.pdf</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज, यानी 1 मई, 2007 को, दुनियाभर में मई दिवस के नाम पर कई आनु‍ष्‍ठानिक कार्रवाईयां की जाएंगी और भारत के संसदीय ”कॉमरेड” भी हर साल की तरह मई दिवस पर नीरस-बेजान आनुष्‍ठानिक कार्रवाईयां करेंगे। धार्मिक कथा की तरह शिकागो के मजदूरों के संघर्ष की कथा सुनाएंगे, झण्‍डा फहराएंगे और लड्डू आदि बांटकर इतिश्री कर लेंगे। लेकिन ‘समाजवाद के अंत’ की तमाम चीख-पुखार के बीच, इन संसदीय वामपंथियों द्वारा इस दिन को अनुष्‍ठान-सा बनाने के तमाम प्रयासों के बीच,  देशभर के मजदूर और उनके हरावल और तमाम संवेदनशील लोग भारत के मजदूर आंदोलन की दशा-दिशा के बारे में लगातार गंभीरता से सोच रहे हैं। यह महज थोथा विश्‍वास नहीं है, बल्कि जगह-जगह इसके उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। कुछ प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं को पढ़कर, मजदूरों के बीच लीक से हट कर चलती कुछ कार्रवाईयों को देखकर तो यही अंदाजा लगता है, यही नहीं आज के हिंदी-अंग्रेजी के कुछ ब्‍लॉग, जैसे हाशिया, को देखकर भी यही लगता है। इसी दिशा में कुछ गंभीर चिंतन मुझे मज़दूरों के एक क्रांतिकारी अखबार बिगुल के सद्य-प्रकाशित सम्‍पादकीय में नजर आया। इसलिए इस सम्‍पाकीय को मैंने पीडीएफ फाइल बना कर यहां जोड़ दिया है। इसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें:<br /><a href="http://shabdsangharsh.files.wordpress.com/2007/05/may_day_article.pdf" rel="nofollow">http://shabdsangharsh.files.wordpress.com/2007/05/may_day_article.pdf</a></p>
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		<title>By: अनुनाद सिंह</title>
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		<dc:creator>अनुनाद सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 May 2007 03:55:16 +0000</pubDate>
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		<description>आज मजदूर आन्दोलन के भूत पर दृष्टिपात करने पर यही लगता है कि मजदूर अन्दोलन के प्रणेता अदूरदर्शी थे, इन्होने मजदूरों को बर्गला कर मजदूरों का, समाज का और अनेक देशों को जबरजस्त अहित किया। &lt;br/&gt;&lt;br/&gt;अब भी समय है कि मजदूर अन्दोलनो की दिशा पर विवेकपूर्ण दृष्टि से विचार कर सही दिशा तय की जाय।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज मजदूर आन्दोलन के भूत पर दृष्टिपात करने पर यही लगता है कि मजदूर अन्दोलन के प्रणेता अदूरदर्शी थे, इन्होने मजदूरों को बर्गला कर मजदूरों का, समाज का और अनेक देशों को जबरजस्त अहित किया। </p>
<p>अब भी समय है कि मजदूर अन्दोलनो की दिशा पर विवेकपूर्ण दृष्टि से विचार कर सही दिशा तय की जाय।</p>
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