शहाबुद्दीन : इतिहास के कूडेदान में अब भी जगह काफ़ी है
May 9, 2007
साहेब को सजा
रजनीश उपाध्याय बिहार के युवा पत्रकारों की उस पांत से आते हैं जो राजनीतिक रूप से सबसे सचेत और सबसे उर्वर-संभावनाशील है. राज्य की राजनीतिक घटनाओं पर इनकी पैनी नज़र रहती है. फ़िलहाल प्रभात खबर, पटना के ब्यूरो प्रमुख हैं. साथ ही इतिहास और वर्तमान की एक अहम पत्रिका ‘इतिहासबोध’ से भी जुड़े रहे हैं.
रजनीश उपाध्याय
शहाबुद्दीन पर कानून के लंबे हाथ पहुंचने में 22 साल लगे. 11 मई, 1985 को उन पर पहला मुकदमा दर्ज हुआ था, आठ मई को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी अभी कई और मुकदमों में फैसला आना बाकी है. वे ट्रायल की प्रक्रिया में हैं ठीक दो दिन बाद (10 मई को) शहाबुद्दीन 40 के हो जायेंगे. 40 साल की उम्र में उन पर 40 मुकदमे दर्ज हुए. कु छ पहले ही खत्म हो गये, बाकी 31 अभी चल रहे हैं इस अवधि में वे सीवान में पहले शहाब, फिर साहेब और लोक सभा में डॉक्टर शहाबुद्दीन के नाम से जाने जाते रहे. शहाबुद्दीन के खिलाफ पहला मुक दमा 11 मई, 1985 को सीवान नगर थाना में कांड संख्या 134/85 के तहत मारपीट के आरोप में दर्ज हुआ था. तब उनकी उम्र महज 18 साल की थी और वे `शहाब’ के नाम से जाने जाते थे . 1990 के विधानसभा चुनाव में जीरादेई से पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधायक चुने गये . उन्होंने बाहुबली पाल सिंह को हराया था. यहीं से शहाबुद्दीन का राजनीतिक सफर शुरू हुआ. तब बिहार में मंडल की लहर पर सवार होक र लालू प्रसाद सत्ता में पहुंचे थे. शहाबुद्दीन की तत्कालीन जनता दल से निकटता बढ़ी और 1996 में वे जनता दल के प्रत्याशी के रूप में सीवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव में उतरे. चुनाव में उन्हें भारी बहुमत मिला शहाबुद्दीन ने क भी कोई चुनाव नहीं हारा. 1998, 1999 तथा 2004 के लोक सभा चुनावों में वे राजद के टिकट पर सांसद चुने गये. 1990 में जब शहाबुद्दीन विधायक चुने गये थे, तब तक उन पर दर्जन भर मुकदमे हो चुके थे, जिनमें तीन हत्या के थे. 1988 में जमशेदपुर में एक हत्या में भी वह नामजद किये गये थे. 1996 में लोकसभा चुनाव के दिन ही एक बूथ पर गड़बड़ी फैलाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार करने निकले तत्कालीन एसपी एसके सिंघल पर गोलियां चलायी गयीं. आरोप था कि खुद शहाबुद्दीन ने ये गोलियां दागीं और सिंघल को जान बचा कर भागना पड़ा. शहाबुद्दीन का करीब एक दशक तक सीवान पर `राज’ रहा है. इस दौरान सीवान शहर में न तो किसी को उनकी इजाजत के बगैर जुलूस निकालने की इजाजत थी और न ही कोई राजनीतिक गतिविधि संचालित करने की. अपने राजनीतिक विरोधियों से वे अपने अंदाज में निबटते रहे हैं. भाकपा माले के साथ उनका तीखा टकराव रहा. ले-देकर सीवान में दो ही राजनीतिक धुरी थी- एक शहाबुद्दीन, तो दूसरा भाकपा माले. 1993 से लेकर 2001 के बीच सीवान में भाकपा माले के 18 समर्थकों या कार्यकर्ताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी, उनमें जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर और वरिष्ठ नेता श्यामनारायण भी शामिल थे, जिनकी हत्या सीवान शहर में 31 मार्च, 1997 को कर दी गयी थी. इसकी जांच सीबीआइ कर रही है. माले के कार्यालय सचिव संतोष सहर का क हना है कि शहाबुद्दीन के आतंक राज के खिलाफ लड़ाई में ये कार्यकर्ता शहीद हुए. 2001 में शहाबुद्दीन देश भर में चर्चा में आये. सीवान के एक परीक्षा केंद्र पर एक डीएसपी को उन्होंने थप्पड़ जड़ दी. इस पर पुलिसकर्मी बौखला गये. तत्कालीन एसपी बच्च् सिंह मीणा के नेतृत्व में प्रतापपुर में 16 मई, 2001 को छापेमारी के लिए पहुंची पुलिस के साथ शहाबुद्दीन समर्थकों की मुठभेड़ हुई. इसमें 11 लोग मारे गये थे. इस कांड के बाद तत्कालीन मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी और शिवानंद तिवारी ने आरोप लगाया था कि पुलिस शहाबुद्दीन को प्रताड़ित क र रही है. इसके बाद लालू प्रसाद को भी प्रतापपुर गांव का दौरा करना पड़ा था. मीणा वहां से हटा दिये गये. शहाबुद्दीन पर
शिकंजा कसने की शुरुआत 2003 में तब हुई, जब डीपी ओझा डीजीपी बने. उन्होंने शहाबुद्दीन के खिलाफ सबूत इकट्ठे किये क ई पुराने मामले फिर से खोल दिये, जिन मामलों की जांच का जिम्मा सीआइडी को सौंपा गया था, उनकी भी समीक्षा करायी गयी माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण और हत्या के मामले में शहाबुद्दीन पर वारंट जारी हुआ और अंतत: उन्हें अदालत में आत्मसमर्पण करना पड़ा लेकिन, मामला आगे बढ़ता कि डीपी ओझा चलता कर दिये गये सत्ता से टकराव के कारण उन्हें वीआरएस लेना पड़ा.
ओझा अब भी मानते हैं कि ऊंचे राजनीतिक रिश्ते के कारण शहाबुद्दीन अब तक बचते रहे हैं. 2005 में रत्न संजय सीवान के एसपी बने, तो शहाबुद्दीन के खिलाफ एक बार फिर कार्रवाई शुरू हुई. तब राज्य में राष्ट्रपति शासन था 24 अप्रैल, 2005 को शहाबुद्दीन के पैतृक गांव प्रतापपुर में की गयी छापेमारी में भारी संख्या में आग्नेयास्त्र, अवैध हथियार, चोरी की गाड़ियां, विदेशी मुद्रा आदि बरामद किये गये. इससे संबंधित छह मुकदमे अभी चल रहे हैं. लंबे समय तक फरार रहने के बाद सांसद को दिल्ली स्थित उनके निवास से पुलिस ने छह नवंबर, 2005 को गिरफ्तार किया तब से लेकर अभी तक वे न्यायिक हिरासत में ही हैं.
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1.
avinash | May 9, 2007 at 10:01 am
रजनीश सचेत और उर्वर हो सकते हैं, पर सबसे सचेत और सबसे उर्वर कैसे हो सकते हैं… फिर अजय, कमलेश, अशेष, विशेष को कहां रखेंगे…
2.
Reyaz-ul-haque | May 9, 2007 at 11:43 am
सवाल वाजिब है. कर दिया है, एक बार फ़िर से देखेंगे?