शहाबुद्दीन और उसके बाद का बिहार
May 9, 2007
समाज की अपनी एक गति होती है. वह बुरी चीज़ों को बहुत देर तक स्वीकर नहीं करता. उसमें अच्छे को बुरे से अलग करने की एक प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. इतिहास का कूडे़दान यहीं आकर प्रासंगिक बनता है. एक समय था जब डान और अपराधी अपने समाज में बडी़ प्रतिष्ठा के साथ सामने आये. कुछ जातियों ने उनमें अपनी जातिगत पहचान भी तलाश की. मगर अब वह दौर लगता है कुछ कम हो रहा है. अब वह स्वीकृति उतने निर्बाध तरीके से नहीं मिल रही है बाहुबलियों को. मगर यह भी नहीं है कि यह एकदम खत्म ही हो गया है. वे अब भी हैं और अपनी जगहों पर मज़बूती से जमे हुए हैं. शहाबुद्दीन को सज़ा सिर्फ़ उनके घटते रुतबे को दरसाती है. मगर हमारा यह कहना भी है कि इस सज़ा से ज़्यादा उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है. हमारी व्यवस्था का जो चरित्र है उसमें अंतत: वे बच निकलेंगे. यह व्यवस्था सिर्फ़ अपने विरोधियों को सज़ा देने में यकीन रखती है, ‘अपनों’ को नहीं. शहाबुद्दीन जो भी हों, उसके अपने ही हैं. वह उसका बाल भी बांका नहीं होने देगी, जैसे वह पंढेर का नहीं होने दे रही है. खैर देखते हैं अनिल जी क्या कह रहे हैं.
कुमार अनिल
सब दिन होत न एक समाना. एक समय था जब शहाबुद्दीन की मरजी के बिना सीवान में एक पत्ता भी नहीं हिलता था. चुनावों में उनके पोस्टर व झंडे के अलावा किसी और का पोस्टर लगाना जुर्म था. चपरासी से अफसर तक हां-में-हां- मिलाते रहते. जिसने विरोध क रने की कोशिश की, वह मारा गया. कई अफसर अपमानित हुए. क इयों ने तबादला करा लिया. शहाबुद्दीन को साहेब कहा जाता था. मगर लगता है अब समय का एक चक्र पूरा हो गया है. 1990 के बाद का समय बिहार की राजनीति में काफी उथल-पुथल भरा रहा है. इसी दौर में लालू ने सामाजिक न्याय का नारा दिया. गरीबों में अभूतपूर्व सक्रियता देखने को मिली. पुरानी सामंती व ब्राह्मणवादी शक्तियों में हड़कंप मच गया. 1993-94 के दौर में ही गंगा के दक्षिणी हिस्से में रणवीर सेना का उदय हुआ. इसी समय उत्तर बिहार में शहाबुद्दीन चमके . देखते-देखते रणवीर सेना का कई जिलों में विस्तार हो गया. उसने एक -के -बाद एक कत्लेआम करके बिहार की राजनीति में भारी उलट-फेर कर दिया. उधर शहाबुद्दीन से प्रेरणा पाकर क ई-क ई शहाबुद्दीन राजनीतिक पटल पर चमकने लगे. शहाबुद्दीन ने राजनीति की परिभाषा बदल कर रख दी. यह माना जाने लगा कि नेता बनना है, तो बाहुबली बनना होगा. पैसा व हथियार बुनियादी अवयव बन गये. मूल्य व विचार फालतू चीजें बन गये. ऐसे नेताओं को अपनी जाति का भरपूर समर्थन मिलने लगा. वे खुद को जाति विशेष का हीरो जतलाने लगे. शहाबुद्दीन ने अपनी यात्रा को यहीं समाप्त नहीं किया. उन्होंने माले को उखाड़ फेंक ने का नारा देकर पुरानी सामंती शक्तियों को आकर्षित कि या. इसीलिए हम देखते हैं कि बाद के दौर में जब राज्य स्तर पर `माय’ समीकरण में बिखराव आया, तब भी शहाबुद्दीन चुनाव जीतने में सफल रहे. ग्रामीण गरीब जब `साहेब’ से दूर हुए, तो उन्होंने चट
सामंती शक्तियों से गंठबंधन बना लिया. राजनीतिक दलों ने इस दौर में अवसरवादिता दिखायी. हर दल में शहाबुद्दीन की कार्बन कॉपी तैयार की जाने लगी. शहाबुद्दीन के घर प्रतापपुर में जब पुलिस ने छापेमारी की, तब सभी, पक्ष-विपक्ष के, प्रमुख दल `साहेब’ के बचाव में आ गये. विधानसभा की कार्यवाही पुस्तिका इसकी गवाह है. राजनीतिक दलों का यह तर्क था कि केवल मुकदमा हो जाने से कोई अपराधी नहीं हो जाता. चंद्रशेखर की हत्या के बाद से `साहेब’ पर उंगलियां उठने लगीं. यह टर्निंग प्वाइंट था. 2005 के बाद बिहारी समाज का मिजाज तेजी से बदलने लगा. अपराधियों को मिल रहा सामाजिक समर्थन कमजोर पड़ने लगा.समाज में रुतबा घटते ही दलों में भी पूछ घटने लगी. साहेब को सजा मिलने के बाद अब देखना यह है कि बिहारी समाज व राजनीति किस दिशा में किस तेवर से आगे बढ़ती है.
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1.
अनुनाद सिंह | May 9, 2007 at 8:16 am
अब आशा कर सकते हैं कि उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर-प्रदेश में माफियाराज के पाँव उखड़ेंगे।
न्याय की जय हो!