भारत के बारे में सबसे बड़ा भ्रम है कि यहां लोकतंत्र है : अरुंधति राय
May 11, 2007
हम इस बातचीत का पहला हिस्सा पढ़ चुके हैं. प्रस्तुत है दूसरा हिस्सा. प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय से बात की है वैभव सिंह ने.
भारत का लोकतंत्र किन सीमाओं और खतरों का शिकार है? क्या जनमत निर्मित कर इस लोकतंत्र को कामयाब बनाया जा सकता है?
दरअसल, भारत के बारे में सबसे बड़ा भ्रम है कि यहां लोकतंत्र है और इस भ्रम को साम्राज्यवादी चिंतन के प्रभाव में रहनेवाली मीडिया भी दिन-रात प्रचारित करती है. यहां विरोध को भी बड़ी आसानी से पचा लिया जाता है. जिस तरह ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्च्न को मीडिया भुनाती है उसी तरह अरुंधति राय को भी स्टूडियो में बुला कर उसे अपने विचारों को रखने का मौका दिया जाता है, क्योंकि दुनिया को दिखाना है कि देखिए हम कितने लोक तांत्रिक हैं. हम एक क्रू ड नहीं बल्कि सॉफिस्टिके टेड समय से गुजर रहे हैं, जहां हर विरोध को खूबसूरती से पहले दिखाया जाता है और फिर उसे दुत्कार दिया जाता है. उन्हें बिग स्टोरीज चाहिए अपने बिजनेस के लिए और बदकिस्मती से लोगों के रोजाना के संघर्षों में उन्हें कुछ भी नया और सनसनीखेज नजर ही नहीं आता. गरीबों के नाम पर जतायी जानेवाली हमदर्दी (पॉलिटिक्स ऑफ पिटी) भी बड़ी खतरनाक होती है और एनजीओ व मिशनरीज इस हमदर्दी जताने की घटिया राजनीति का सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं. उनके द्वारा कई बार एम्पावरमेंट शब्द का इस्तेमाल होता है, जिसके राजनीतिक निहितार्थ बड़े खतरनाक हैं. एम्पावरमेंट के जरिये कमजोर वर्गों को रिप्रजेंट करने का दावा किया जाता है और पैसा कमाया जाता है, जबकि हमें सही अर्थों में लोगों को पावरफुल बनाने की ओर ध्यान देना चाहिए. प्राइवेट सेक्टर लोगों को खुश रखने के लिए पीपुल्स कार तो बना रहा है, लेकिन लोगों को पीने का पानी और खाना कहां से मिलेगा, इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है.
अब कहीं उम्मीद है तो सताये और शोषित लोगों से ही है, जो अपनी भारी संख्या बल का लाभ विरोध करने के लिए उठा सकते हैं. इस संख्या बल का फ़ायदा उठा कर लोग गलत चीजों को खुद आगे बढ़ कर रोक सकते हैं. इसके अलावा पीपुल्स मीडिया विकसित करने के बारे में भी हमें सोचना चाहिए. पीपुल्स वॉयस के नाम पर सारे ही अखबार-चैनल अपना धंधा चमकाने की कोशिश करते हैं और बहुत बड़ा फ्रॉड करते हैं. इससे लड़ते हुए हमें कम्युनिटी रेडियो, सिनेमा और पत्रिकाओं का विकास करना चाहिए. मुख्यधारा की मीडिया के पीछे भागने की आदत छोड़नी होगी. नर्मदा बचाओ आंदोलन को मीडिया में सबसे ज्यादा कवरेज मिला, लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ. दूसरी ओर झारखंड में कोयलकारो में आदिवासियों ने सुवर्णरेखा पर बन रहे बांधों का निर्माण रोक दिया, जबकि वहां मीडिया का ध्यान भी नहीं गया था. इसी तरह ओड़िशा में गंधमर्दन में स्थानीय लोगों के विरोध के चलते बाल्को को वहां से भागना पड़ा और नंदीग्राम में सालेम को प्रचंड विरोध के आगे पसीने छूट गये. मीडिया के हालात को देखते हुए मैं खुद भी टीवी चैनलों की बहस में हिस्सा लेने नहीं जाती हूं, क्योंकि वहां लगता है कि मैं भी सर्कस की जानवरों में से एक हो गयी हूं. वहां मुझे एक शोपीस की तरह सजा कर खड़ा कर दिया जायेगा और जो मैं वास्तव में कहना चाहती हूं, वह कहने के लिए समय नहीं दिया जायेगा. हमें सिनेमा तकनीक की ओर इसलिए भी ध्यान देना होगा, क्योंकि मुख्यधारा का सिनेमा अब इंटरनेशनल एलीट के कब्जे में है. हाल में आयी गुरु फि ल्म को देखिए, जिसमें खुल कर साम्राज्यवाद का पक्ष लिया गया है. धीरू भाई अंबानी की जिंदगी से प्रेरित इस फि ल्म में शक्तिशाली बिजनेसमैनों को ऐसे दिखाया गया है जैसे वे बंधुआ मजदूर हों और राज्य के सताये हुए हों. जबकि हकीकत में यह फ़िल्म लोकल कैपिटलिज्म के पक्ष में बनायी गयी है और ऐसे उद्योगपतियों को हीरो बनाया गया है जो किसी भी तरह की जवाबदेही से बचना चाहते हैं. यानी फिल्मकार भी अब साम्राज्यवाद के सबसे बड़े कारिंदे के रूप में उभर रहे हैं और उन्हें देश के हितों की चिंता नहीं रह गयी है. फिल्मों के अलावा अब सिनेमा हॉल भी ऐसे बनाये जा रहे हैं, जहां सिर्फ अमीरों के लिए ही फिल्में चलतीं और दिखायी जाती हैं. बड़े-बड़े सिनेमा हॉलों को तोड़ कर मल्टीप्लेक्स हॉल बनाये जा रहे हैं, जहां दो-ढाई सौ रुपये से कम का टिकट नहीं होता है. यानी सिनेमा हॉलों और फिल्म निर्माताओं ने अपने दर्शक वर्ग का चुनाव क र लिया है. जो लोग इतना पैसा देकर फिल्में देखेंगे, वे कभी आम जनों की जिंदगी पर बनी फ़िल्में पसंद नहीं करेंगे. वे उन्हीं फ़िल्मों को पसंद करेंगे जो उनकी शानो शौकत और ग्लैमर में डूबी ज़िंदगी को नाटकीय अंदाज में पेश करेंगी. न्यूज चैनल भी आम सच्चाइयों से कटते जा रहे हैं, भले ही वे दिनोंदिन कितने ही बड़े होते जा रहे हों. इसीलिए मैं कहती हूं जनांदोलनों को मीडिया को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए, हमारी सारी ऊर्जा वहीं खप जाती है. हमें अब मीडिया को दिखाने के लिए कोई आंदोलन नहीं करना है, बल्कि किसी मुद्दे के प्रति गंभीरता से प्रेरित होकर आंदोलन करना चाहिए. वैसे भी, मीडिया की आदत ही किसी मुद्दे को चबा कर उसे थूक देने की है. निठारी केस में जिस गैरराजनीतिक तरीके से सारी रिपोर्टिंग हुई वह भी मीडिया के निकम्मेपन को दरसाता है. हमें अपने संघर्ष के लिए अन्य भाषाओं में लिखे साहित्य व उनके अनुवादों की मदद लेनी चाहिए.
साहित्य और संस्कृति की किसी भी समाज में दोहरी जिम्मेदारी होती है. एक ओर वे राष्ट्र के आंतरिक स्वरूप को ज्यादा लोकतांत्रिक और समानतापरक बनाने के लिए संघर्ष करते हैं, दूसरी ओर साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने का काम करते हैं. इन जिम्मेदारियों से रचनाकारों के विचलन की वजह क्या है?
साहित्य-संस्कृति के बारे में आपकी मान्यताएं सहीं हैं, लेकिन विचारधारा पर निष्ठा कायम रख पाना काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन जो लेखक , खासतौर पर भारत के अंगरेजी लेखक यूरोप में रह रहे हैं, वे साम्राज्यवाद के खिलाफ क्या लिखेंगे? उन्हें अभी छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा जिले में रहना पड़ जाये, जहां रोज जीवन-मौत का संघर्ष होता है, तो फिर से विचारधारा और साहित्य के रिश्ते समझ में आने लगेंगे. ऐसे लेखकों की जब अंतरराष्ट्रीय मीट आयोजित होती है, तो वे अपने इंडोनेशिया, कोरिया और हांगकांग के अनुभवों के बारे में बात करते हैं, लेकिन भारत के गांवों में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी उन्हें कम ही रहती है. हम क्रांतिकारी साहित्य की बात तो करते हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि सभी क्रांतियों ने अंत में पूंजीवाद को ही बढ़ावा नहीं दिया है? यानी सभी क्रांतियों का अंत एडवांस्ड कैपिटलिज्म में ही हुआ है, लेकिन यह सभी सही होते हुए भी लेखक के लिए क्रांतियों का आकर्षण हमेशा बना रहेगा. उसे किसी भी तरह के फासीवाद के खिलाफ लिखना और बोलना होगा, क्योंकि उसकी चुप्पी का अर्थ होगा फासीवाद को समर्थन देना, उसके खेमे का हिस्सा बन जाना. लेकिन कई बार लेखक ही समाज में लेखक के क्रांतिकारी रोल को चुनौती देता है. मुझ पर न जाने कितनी बार यह कह कर हमले हुए हैं कि मैं बांध, परमाणु बम और सांप्रदायिक दंगों जैसे विषयों पर क्यों लिखती हूं. यहां तक कहा गया कि मैं अपने सेलेब्रिटी स्टेटस का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश क र रही हूं और अपनी लेखन प्रतिभा व ऊर्जा का दुरुपयोग कर रही हूं. इन सारे हमलों के बाद मैंने अपने आलोचकों से कहा था कि तुम लोग लेखन के विषयों की एक लिस्ट बना कर मुझे दे दो, मैं बस उन्हीं पर लिखती रहूंगी. ऐसी आलोचना करनेवाले सिर्फ दक्षिणपंथी लेखक ही नहीं, लिबरल छविवाले लेखक भी थे और तब मुझे महसूस होता था कि क भी-क भी उदारपंथी लेखक कि सी फासिस्ट लेखक से ज्यादा धूर्त और कट्टर होते हैं. वे सीधे किसी का दमन करने का पक्ष नहीं लेते, लेकिन लेखन के कई विषयों के खिलाफ एक लिटरेरी सेंसरशिप के लिए माहौल निर्मित करने का काम क रते हैं.
देखें संसद पर हमले की सरकारी कहानी पर सवाल करती किताब ‘13 दिसंबर : ए रीडर’ के विमोचन पर बोलतीं अरुंधति राय .
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1.
अभिनव | May 11, 2007 at 10:42 am
अरुंधति की बातों में लाजिक तो होता है पर न जाने क्यों ऐसा लगता है कि बस विरोध करना और कोई आप्शन न सुझाना क्या कुछ भला करता है। ये ग़लत है, वो ग़लत है पर ठीक कैसे होगा यह सबकुछ इसपर भी चर्चा होनी चाहिए। हमें कठिन प्रश्न पूछने चाहिए यह ठीक है पर यदि उत्तर में सब खाली कापी छोड़ दें तो हमारे पास उन कठिन प्रश्नों के जवाब भी तो होने चाहिए। आपको क्या लगता है।
2.
Reyaz-ul-haque | May 12, 2007 at 11:20 pm
मैं आपसे सहमत होता अगर मैंने यह(लिंक नीचे) बातचीत नहीं पढी होती. संयोग से जिसका लिंक नीचे दिया गया है वह बाद का इंटरव्यू है और पहले छप गया, जबकि यह (जिस पर आपने टिप्पणी की है) बाद में सामने आया. आप भी पढें, इसमें शायद आपको कुछ हल मिले, जवाब मिले. बताइयेगा कैसी लगी यह बातचीत.
http://hashiya.blogspot.com/2007/04/blog-post.html