स्वनिर्मित चुनाव समीक्षक : एक्जिट पोल?

May 16, 2007

एक्जिट पोल?
एमजे अकबर
आप मिराज जहाज बेचकर कितना पैसा बना सकते हैं? शायद बहुत ज्यादा. फिर भी इसे टेलीविजन कैमरे के सामने छद्म तरीके से गंभीर मुखाकृति बनाकर ही साबित करने की कोशिश की जाती है. जब वास्तविक तथ्य सामने आते हैं, तो सबसे आसान तरीका होता है, वहां से बचकर निकल जाना. क्योंकि इससे आपके मोटे चेक पर कोई असर नहीं पड़ता. चुनाव समीक्षकों के भी वास्तविक बैंक बैलेंस पर अब तक नजर नहीं रखी गयी है. कोई यह अंदेशा लगा सकता है कि इन सारे उच्च् वेतनभोगी स्वनिर्मित चुनाव समीक्षक, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की थी, अपने लैंपपोस्ट से लटक गये होंगे. लेकिन इसमें मुझे संदेह ही है. इस तरह के जीवों की यह खासियत होती है कि वे कब्र से उठकर भी वापस आ सकते हैं. ये लोग इस बात से फायदा उठाते हैं कि ओपिनियन पोल दो तरह के होते हैं. दोनों पैसे बनाते हैं. सौभाग्य से धोखेबाज बहुत कम हंै, लेकिन लोगों की पहुंच से दूर भी नहीं है. राजनीतिज्ञों के साथ उनका गुप्त समझौता रहता है. वे ओपिनियन पोल के पीछे के रिसर्च को पैसा लगानेवालों के योग्य बनाते हैं और नतीजे को मोटी फीस लेकर प्रसारित करते हैं. राजनीतिज्ञ पैसा इसलिए देते हैं कि ओपिनियन पोल द्वारा मतदान के दौरान सकारात्मक माहौल बनाया जा सके.
चुनाव पैसा बनाने का खेल हो गया है. जबसे एक्जिट पोल और ओपिनियन पोल टेलीविजन पर आने लगे हैं, न्यूज चैनलों को विज्ञापन बहुत ज्यादा मिलने लगा है. हमलोग यानी प्रिंट मीडिया ओपिनियन पोल से सबसे ज्यादा बुद्धू बने हैं, क्योंकि हम बिना किसी विज्ञापन के इसके नतीजे छापते हैं. चुनाव आयोग अब चुनाव के छोटे से छोटे विवरण को कंट्रोल में रखता है. उत्तर प्रदेश का चुनाव जो कि एक माह से ज्यादा खिंचा, एक तरीके से दृढ़ता और धैर्य का ही प्रतीक था. चुनाव परिणाम का प्रबंधन पारदर्शिता और ईमानदारी से घोषित किया गया, हालांकि कभी-कभी इसमें चुनाव आयोग का अनाधिकार प्रवेश भी था. कोई नहीं कह सकता है कि वोटिंग में तिकड़म हुआ या सत्ताधारी पार्टी द्वारा प्रशासन के सहयोग से बूथ लूटा गया. यद्यपि जनवरी में चुनाव में धांधली किये जाने के आरोप के आधार पर मुलायम की सरकार को बर्खास्त करने की कोशिशंे हुई थीं. लेकिन चुनाव आयोग भी ओपिनियन पोल के मुद्दे पर लाचार है. हाल ही में फ्रांस में आम चुनाव हुए हैं. एक्जिट पोल और ओपिनियन पोल को चुनाव पूर्व संध्या या चुनाव के दौरान प्रतिबंधित कर दिया गया था. जबसे यह खुद को ज्यादा सही साबित करने लगा है, एक्जिट पोल बहुत खतरनाक हो रहे हैं. लेकिन भ्रामक सूचनाआें को लगातार ये विश्वसनीय बनाने पर तुले रहते हैं. एक्जिट पोल में महारत हासिल करनेवाले चैनल का एक उदाहरण लेते हैं.
एनडीटीवी ने अपने अंतिम एक्जिट पोल के बाद बसपा को 117 से 127 सीटें दी थीं. एक्जिट पोल में तीन फीसदी गलती को लोग स्वीकार करते हैं, मगर 403 सीटोंवाली विधानसभा में 80 से 90 सीटों का अंतर आना बहुत ही आश्चर्यजनक है. दूसरी तरफ इसने कांग्रेस को 35 से 45 सीटें एक्जिट पोल में दी थीं,पर उसे पूर्वानुमान से आधी सीटें ही मिलीं. शायद एनडीटीवी ने उत्तर प्रदेश के बजाय दूसरे राज्य में अपना रिसर्च किया था. उसने भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 108 से 118 सीटें मिलने का अनुमान किया था. भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह बहुत खुश होते यदि भाजपा को एनडीटीवी के अनुमान के मुताबिक सीटें मिलतीं. वास्तविकता यह है कि भाजपा को अनुमान से आधी सीटें ही मिलीं. दूसरे चैनल भी अच्छे नहीं रहे. स्टार टीवी ने भाजपा को 108 सीटें दी थीं.
भाजपा और कांग्रेस खुद को राष्ट्रीय पार्टी मानती हैं, जिसे दिल्ली में बैठे कुछ लोग भी हवा देते रहते हैं. दोनों पार्टियां सपने देखा करती हैं कि देश में दो पार्टी सिस्टम हो, जिसमें सिर्फ वे दोनों ही हों. उत्तर प्रदेश में इन पार्टियों की स्थिति देखें. भाजपा के पास डेढ़ जिलों पर एक विधायक है, जबकि कांग्रेस के पास तीन जिलों पर एक. यदि आप रायबरेली और अमेठी को हटा दें, तो औसत और भी कम हो जायेगा. दोनों राष्टीय पार्टियां अपने अपने खेल रही थीं. भाजपा मुसलिमों के विरुद्ध घृणा फैलानेवाली सीडी बांट रही थी, जबकि कांग्रेस अपनी सभी ताकतों का इस्तेमाल एक परिवार के करिश्मे को भुनाने पर कर रही थी. यह जानना दिलचस्प है कि कैसे एलिट क्लास मायावती और मुलायम को पिछड़ा और एंटी मॉडर्न बता रहा था, जबकि कांग्रेस और भाजपा द्वारा मध्यकालीन राजनीति की जा रही थी. हिंदू और मुसलिम वोटर मायावती के चुनावी योजनाआें में शामिल थे. भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टी इस योग्य भी नहीं है कि वे उत्तर प्रदेश में नंबर दो की हैसियत रखें. मौलाना मुलायम आसानी से नंबर दो बनें. क्या उत्तर प्रदेश भाजपा को बढ़ाने में मदद करेगा? पांच साल तक यूपी में विपक्ष में रहने तथा तीन साल से दिल्ली में सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस परिवार पिछली बार से तीन सीटें कम ही निकाल पाया. आप खुद ही निष्कर्ष निकाल सकते हैं, राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव में एक दिलचस्प पैटर्न देखने को मिल रहा है, जो राष्ट्रीय पार्टियों के लिए बुरी खबर हो सकती है, अगर यह आगामी आम चुनावों तक मौजूद रह जाता है. कांग्रेस और भाजपा, ज्यादातर जगहों पर जहां दूसरी पार्टियां नहीं हंै, एक-दूसरे से सीटों की अदला-बदली करती रहती हैं. मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और कुछ हद तक महाराष्ट्र जहां सहयोगी दलों के बीच लड़ाई चलती रहती है. उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, तमिलनाडु जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां काफी मजबूत हैं और राष्ट्रीय पार्टियां वहां पिछलग्गू बनी रहती हंै. बिहार में भाजपा को नीतीश कुमार की जरूरत होती है और कांग्रेस अगर झारखंड और हरियाणा में क्षेत्रीय पार्टियों को ज्यादा सीटें नहीं देगी, तो उसे हार का सामना करना पड़ेगा. कांग्रेस पार्टी पंजाब में शायद ही उभरकर सामने आये, यदि अकाली दल के अलावा किसी दूसरी क्षेत्रीय पार्टी का उदय वहां हो. महाराष्ट्र में कांग्रेस और शरद पवार को एक-दूसरे की आवश्यकता है. देवगौडा की पकड़ कर्नाटक में मजबूत है और एम करुणानिधि तमिलनाडु में कांग्रेस के वोटों पर अपनी सरकार बनाते हैं. भारतीय जनता पार्टी नवीन पटनायक के बिना ओड़िशा में मृतप्राय है. अगर पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादियों को कोई टक्कर दे रही है तो यह ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस है, जो कि एक क्षेत्रीय पार्टी ही है. भाजपा और कांगे्रस के लिए दायरे सिमट रहे हैं, जिसके लिए वे खुद ही दोषी हैं. कांग्रेस पार्टी आश्चर्यजनक रूप से एक ऐसी आर्थिक नीति को लागू करने की कोशिश कर रही है, जो कभी-कभी लगता है कि ये नीति वर्ल्ड बैंक के लिए है, न कि भारतीय मतदाताआें के लिए. भारतीय मतदाताआें की दो मांगें हैं- आर्थिक न्याय और सामाजिक सहयोग. यह दोनों भारत के लिए बेहद जरूरी है, अगर भारत को उम्मीद के मुताबिक विकास करना है. राजनीतिक दल अब मतदाताआें का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं, बल्कि मतदाता उनकी सफलता के लिए मानक का निर्धारण कर रहे हैं. अब मतदाता राजनीतिक दलों से ज्यादा परिपक्व हो गये हैं और यह बेहतरीन खबर है. यद्यपि इससे ज्यादा खुशी की बात कुछ नहीं हो सकती कि आम मतदाता भी ओपिनियन पोल करनेवालों को मूर्ख बनाने लगे हैं. मैं मानता हूं कि ओपिनियन पोल के लिए हजारों लोगों से बात की जाती होगी, जैसा कि प्रचार में भी बार-बार इसकी विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए कहा जाता है. फिर भी यह कैसे बिना रुके हुए और हास्यास्पद ढंग से चल रहा है? बहुत ही साधारण बात है. मतदाता एक जवान लड़के को हाथ में प्रश्नों के फॉर्म लेकर आते देखता है, वह उसकी मदद इन प्रश्नों का जवाब देकर करता है, क्योंकि मतदाता जानता है कि यह लड़के की रोजी-रोटी का सवाल है. जवाब पाकर प्रश्न पूछनेवाला लड़का संतुष्ट होकर चला जाता है और उसके बाद जवाब देनेवाला मतदाता जोर-जोर से हंसने लगता है. उसे पता होता है कि उसने टेलीविजन से बदला ले लिया है.

अनुवाद : संजय/ईश्वर

Entry Filed under: आओ बहसियाएं, खबर पर नज़र. .

स्वनिर्मित चुनाव समीक्षक : एक्जिट पोल?

May 16, 2007

एक्जिट पोल?
एमजे अकबर
आप मिराज जहाज बेचकर कितना पैसा बना सकते हैं? शायद बहुत ज्यादा. फिर भी इसे टेलीविजन कैमरे के सामने छद्म तरीके से गंभीर मुखाकृति बनाकर ही साबित करने की कोशिश की जाती है. जब वास्तविक तथ्य सामने आते हैं, तो सबसे आसान तरीका होता है, वहां से बचकर निकल जाना. क्योंकि इससे आपके मोटे चेक पर कोई असर नहीं पड़ता. चुनाव समीक्षकों के भी वास्तविक बैंक बैलेंस पर अब तक नजर नहीं रखी गयी है. कोई यह अंदेशा लगा सकता है कि इन सारे उच्च् वेतनभोगी स्वनिर्मित चुनाव समीक्षक, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की थी, अपने लैंपपोस्ट से लटक गये होंगे. लेकिन इसमें मुझे संदेह ही है. इस तरह के जीवों की यह खासियत होती है कि वे कब्र से उठकर भी वापस आ सकते हैं. ये लोग इस बात से फायदा उठाते हैं कि ओपिनियन पोल दो तरह के होते हैं. दोनों पैसे बनाते हैं. सौभाग्य से धोखेबाज बहुत कम हंै, लेकिन लोगों की पहुंच से दूर भी नहीं है. राजनीतिज्ञों के साथ उनका गुप्त समझौता रहता है. वे ओपिनियन पोल के पीछे के रिसर्च को पैसा लगानेवालों के योग्य बनाते हैं और नतीजे को मोटी फीस लेकर प्रसारित करते हैं. राजनीतिज्ञ पैसा इसलिए देते हैं कि ओपिनियन पोल द्वारा मतदान के दौरान सकारात्मक माहौल बनाया जा सके.
चुनाव पैसा बनाने का खेल हो गया है. जबसे एक्जिट पोल और ओपिनियन पोल टेलीविजन पर आने लगे हैं, न्यूज चैनलों को विज्ञापन बहुत ज्यादा मिलने लगा है. हमलोग यानी प्रिंट मीडिया ओपिनियन पोल से सबसे ज्यादा बुद्धू बने हैं, क्योंकि हम बिना किसी विज्ञापन के इसके नतीजे छापते हैं. चुनाव आयोग अब चुनाव के छोटे से छोटे विवरण को कंट्रोल में रखता है. उत्तर प्रदेश का चुनाव जो कि एक माह से ज्यादा खिंचा, एक तरीके से दृढ़ता और धैर्य का ही प्रतीक था. चुनाव परिणाम का प्रबंधन पारदर्शिता और ईमानदारी से घोषित किया गया, हालांकि कभी-कभी इसमें चुनाव आयोग का अनाधिकार प्रवेश भी था. कोई नहीं कह सकता है कि वोटिंग में तिकड़म हुआ या सत्ताधारी पार्टी द्वारा प्रशासन के सहयोग से बूथ लूटा गया. यद्यपि जनवरी में चुनाव में धांधली किये जाने के आरोप के आधार पर मुलायम की सरकार को बर्खास्त करने की कोशिशंे हुई थीं. लेकिन चुनाव आयोग भी ओपिनियन पोल के मुद्दे पर लाचार है. हाल ही में फ्रांस में आम चुनाव हुए हैं. एक्जिट पोल और ओपिनियन पोल को चुनाव पूर्व संध्या या चुनाव के दौरान प्रतिबंधित कर दिया गया था. जबसे यह खुद को ज्यादा सही साबित करने लगा है, एक्जिट पोल बहुत खतरनाक हो रहे हैं. लेकिन भ्रामक सूचनाआें को लगातार ये विश्वसनीय बनाने पर तुले रहते हैं. एक्जिट पोल में महारत हासिल करनेवाले चैनल का एक उदाहरण लेते हैं.
एनडीटीवी ने अपने अंतिम एक्जिट पोल के बाद बसपा को 117 से 127 सीटें दी थीं. एक्जिट पोल में तीन फीसदी गलती को लोग स्वीकार करते हैं, मगर 403 सीटोंवाली विधानसभा में 80 से 90 सीटों का अंतर आना बहुत ही आश्चर्यजनक है. दूसरी तरफ इसने कांग्रेस को 35 से 45 सीटें एक्जिट पोल में दी थीं,पर उसे पूर्वानुमान से आधी सीटें ही मिलीं. शायद एनडीटीवी ने उत्तर प्रदेश के बजाय दूसरे राज्य में अपना रिसर्च किया था. उसने भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 108 से 118 सीटें मिलने का अनुमान किया था. भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह बहुत खुश होते यदि भाजपा को एनडीटीवी के अनुमान के मुताबिक सीटें मिलतीं. वास्तविकता यह है कि भाजपा को अनुमान से आधी सीटें ही मिलीं. दूसरे चैनल भी अच्छे नहीं रहे. स्टार टीवी ने भाजपा को 108 सीटें दी थीं.
भाजपा और कांग्रेस खुद को राष्ट्रीय पार्टी मानती हैं, जिसे दिल्ली में बैठे कुछ लोग भी हवा देते रहते हैं. दोनों पार्टियां सपने देखा करती हैं कि देश में दो पार्टी सिस्टम हो, जिसमें सिर्फ वे दोनों ही हों. उत्तर प्रदेश में इन पार्टियों की स्थिति देखें. भाजपा के पास डेढ़ जिलों पर एक विधायक है, जबकि कांग्रेस के पास तीन जिलों पर एक. यदि आप रायबरेली और अमेठी को हटा दें, तो औसत और भी कम हो जायेगा. दोनों राष्टीय पार्टियां अपने अपने खेल रही थीं. भाजपा मुसलिमों के विरुद्ध घृणा फैलानेवाली सीडी बांट रही थी, जबकि कांग्रेस अपनी सभी ताकतों का इस्तेमाल एक परिवार के करिश्मे को भुनाने पर कर रही थी. यह जानना दिलचस्प है कि कैसे एलिट क्लास मायावती और मुलायम को पिछड़ा और एंटी मॉडर्न बता रहा था, जबकि कांग्रेस और भाजपा द्वारा मध्यकालीन राजनीति की जा रही थी. हिंदू और मुसलिम वोटर मायावती के चुनावी योजनाआें में शामिल थे. भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टी इस योग्य भी नहीं है कि वे उत्तर प्रदेश में नंबर दो की हैसियत रखें. मौलाना मुलायम आसानी से नंबर दो बनें. क्या उत्तर प्रदेश भाजपा को बढ़ाने में मदद करेगा? पांच साल तक यूपी में विपक्ष में रहने तथा तीन साल से दिल्ली में सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस परिवार पिछली बार से तीन सीटें कम ही निकाल पाया. आप खुद ही निष्कर्ष निकाल सकते हैं, राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव में एक दिलचस्प पैटर्न देखने को मिल रहा है, जो राष्ट्रीय पार्टियों के लिए बुरी खबर हो सकती है, अगर यह आगामी आम चुनावों तक मौजूद रह जाता है. कांग्रेस और भाजपा, ज्यादातर जगहों पर जहां दूसरी पार्टियां नहीं हंै, एक-दूसरे से सीटों की अदला-बदली करती रहती हैं. मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और कुछ हद तक महाराष्ट्र जहां सहयोगी दलों के बीच लड़ाई चलती रहती है. उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, तमिलनाडु जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां काफी मजबूत हैं और राष्ट्रीय पार्टियां वहां पिछलग्गू बनी रहती हंै. बिहार में भाजपा को नीतीश कुमार की जरूरत होती है और कांग्रेस अगर झारखंड और हरियाणा में क्षेत्रीय पार्टियों को ज्यादा सीटें नहीं देगी, तो उसे हार का सामना करना पड़ेगा. कांग्रेस पार्टी पंजाब में शायद ही उभरकर सामने आये, यदि अकाली दल के अलावा किसी दूसरी क्षेत्रीय पार्टी का उदय वहां हो. महाराष्ट्र में कांग्रेस और शरद पवार को एक-दूसरे की आवश्यकता है. देवगौडा की पकड़ कर्नाटक में मजबूत है और एम करुणानिधि तमिलनाडु में कांग्रेस के वोटों पर अपनी सरकार बनाते हैं. भारतीय जनता पार्टी नवीन पटनायक के बिना ओड़िशा में मृतप्राय है. अगर पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादियों को कोई टक्कर दे रही है तो यह ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस है, जो कि एक क्षेत्रीय पार्टी ही है. भाजपा और कांगे्रस के लिए दायरे सिमट रहे हैं, जिसके लिए वे खुद ही दोषी हैं. कांग्रेस पार्टी आश्चर्यजनक रूप से एक ऐसी आर्थिक नीति को लागू करने की कोशिश कर रही है, जो कभी-कभी लगता है कि ये नीति वर्ल्ड बैंक के लिए है, न कि भारतीय मतदाताआें के लिए. भारतीय मतदाताआें की दो मांगें हैं- आर्थिक न्याय और सामाजिक सहयोग. यह दोनों भारत के लिए बेहद जरूरी है, अगर भारत को उम्मीद के मुताबिक विकास करना है. राजनीतिक दल अब मतदाताआें का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं, बल्कि मतदाता उनकी सफलता के लिए मानक का निर्धारण कर रहे हैं. अब मतदाता राजनीतिक दलों से ज्यादा परिपक्व हो गये हैं और यह बेहतरीन खबर है. यद्यपि इससे ज्यादा खुशी की बात कुछ नहीं हो सकती कि आम मतदाता भी ओपिनियन पोल करनेवालों को मूर्ख बनाने लगे हैं. मैं मानता हूं कि ओपिनियन पोल के लिए हजारों लोगों से बात की जाती होगी, जैसा कि प्रचार में भी बार-बार इसकी विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए कहा जाता है. फिर भी यह कैसे बिना रुके हुए और हास्यास्पद ढंग से चल रहा है? बहुत ही साधारण बात है. मतदाता एक जवान लड़के को हाथ में प्रश्नों के फॉर्म लेकर आते देखता है, वह उसकी मदद इन प्रश्नों का जवाब देकर करता है, क्योंकि मतदाता जानता है कि यह लड़के की रोजी-रोटी का सवाल है. जवाब पाकर प्रश्न पूछनेवाला लड़का संतुष्ट होकर चला जाता है और उसके बाद जवाब देनेवाला मतदाता जोर-जोर से हंसने लगता है. उसे पता होता है कि उसने टेलीविजन से बदला ले लिया है.

अनुवाद : संजय/ईश्वर

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