हम एक असहिष्णु समाज का हिस्सा नहीं हो सकते
आजकल देश में आप कुछ भी कहिए तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और न जाने दंड विधान की कितनी धाराओं का उल्लंघन हो जाता है. अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब एक कलाकार द्वारा बनायी गयी कुछ तसवीरों पर संघी गुंडों ने उत्पात मचाया था. अभी नामवर जी द्वारा पंत साहित्य और सदानंद शाही द्वारा तुलसी सहित्य में कूडा़ नज़र आने पर उसी तरह लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं जिस तरह गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम को दिखाये जाने पर भगवाधारियों की होती हैं. हमारे देश का नरेंद्र मोदीकरण बढ़ रहा है और ऐसी जगहें लगातार कम होती जा रही हैं जहां बैठ कर कोई कलाकार, फ़िल्मकार, लेखक अपना काम कर सके. और अदालतें इस मोदीकरण में एक अहम हिस्सेदार बन कर सामने आयी हैं, चाहे वह हुसैन का मामला हो या नामवर सिंह का. देखने में ये सभी मामले अलग-अलग भले लगें पर सभी जुडे़ हुए हैं. इस मुद्दे पर हाशिया पर रविभूषण जी का लेख आ चुका है. आगे पटना के कई लेखकों-पत्रकारों का नज़रिया हम सामने रखेंगे. आज हम कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बीबीसी के विनोद वर्मा का आलेख दे रहे हैं, सभार- (इस टिप्पणी के साथ कि विनोद जी को जिन दलों से बडी़ मासूम-सी उम्मीदें हैं, वे दल खुद ऐसी ही हरकतें करते रहे हैं, इसलिए हमें उनसे कोई उम्मीद नहीं है) यह बीबीसी हिंदी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. हमें इन मुद्दों पर बहस करनी ही होगी क्योंकि बकौल भाई अविनाश, ‘हम एक असहिष्णु समाज के हिस्से नहीं हो सकते.’
अभिव्यक्ति की एकतरफ़ा स्वतंत्रता
विनोद वर्मा
वड़ोदरा के सुप्रसिद्ध कला संस्थान में जो विवाद खड़ा हुआ है उसने कई पुराने सवालों को कुरेद कर एक बार फिर सतह पर ला दिया है. इस सवाल ने पहले की ही तरह बुद्धिजीवियों, लेखकों, बड़े समाचार पत्रों और अन्य प्रगतिशील ताक़तों को एकसाथ ला दिया है. और कहना न होगा कि कट्टरपंथी ताक़तें हमेशा की तरह एकजुट हैं और सारे विरोधों को अनदेखा, अनसुना करते हुए वही कर रही हैं जो वे कहना-करना चाहती हैं.
इस बार का विवाद देवी-देवताओं के कथित अश्लील चित्र बनाने को लेकर शुरु हुआ. इसके बाद भारतीय संस्कृति के तथाकथित रखवालों ने वही सब किया जो वे करते आए हैं. पेंटिंग बनाने वाले छात्र को गिरफ़्तार कर लिया गया और कला विभाग के डीन को निलंबित कर दिया गया.
संयोग भर नहीं है कि विवाद गुजरात में हुआ. नरेंद्र मोदी शासित गुजरात में ऐसे विवादों और उसकी ऐसी परिणति पर अब किसी को आश्चर्य भी नहीं होता. आश्चर्य तो यह होता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहाँ सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग अलापते नहीं थकतीं, वहाँ यह यह सब होता है.
भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना जैसे कुछ संगठनों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपना एकाधिकार मान लिया है. पिछले कुछ बरसों में उन्होंने बार-बार इसे साबित भी किया है.
उनकी मर्ज़ी के बिना न कोई चित्रकार ऐसे चित्र बना सकता है जो उनको न जँचे. न कोई ऐसा नाटक कर सकता है जो उनको न रुचे.
कोई फ़िल्मकार फ़िल्म नहीं बना सकता. बना भी ले तो उसे प्रदर्शित नहीं कर सकता. जैसा कि गुजरात में ‘परज़ानिया’ फ़िल्म के साथ हुआ. एमएफ़ हुसैन जैसे देश के प्रतिष्ठित कलाकार के साथ पिछले कुछ सालों में जो कुछ घटा है वह भारत के सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक इतिहास में एक काला अध्याय है.
आश्चर्य नहीं होता जब मोदी सरकार के संरक्षण में यह सब होता है. उनका एजेंडा साफ़ है. आश्चर्य तब भी नहीं होता जब देश की समाजवादी पार्टियाँ चुप रहती हैं क्योंकि वे सत्ता पाने के लिए भाजपा के पहलू में ही बैठी हुई हैं. खजुराहो के मंदिर अपने समय के समाज की सहिष्णुता के प्रतीक हैं.आश्यर्च होता है जब वामपंथी दल और कांग्रेस पार्टी इस मामले में अपने प्रवक्ताओं के भरोसे काम चलाने की कोशिश करते हैं और ऐसी घटनाओं का विरोध केवल बयानों तक सीमित होकर रह जाता है.
आश्चर्य तब भी होता है जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का गृहमंत्रालय हुसैन की पेंटिंग्स को लेकर उन्हें नोटिस भेजता है और जवाबतलब करता है. कलाकारों को संयम की सलाह देना अपनी जगह सही है. दूसरों की भावनाओं को आहत न करने का मशविरा भी ठीक है. कलाकारों की स्वतंत्रता की भी सीमाएँ हैं.
लेकिन सलाह-मशविरे की जगह सबक सिखाने की इच्छा अपने आपमें घातक है. सवाल यह है कि क्या विरोध का वही एक रास्ता है जो विश्वहिंदू परिषद, शिवसेना और बजरंग दल के कार्यालयों में तय होता है?
यह ठीक है कि भारत में कलाकारों और साहित्यकारों को अपनी अपेक्षित जगह पाने के लिए अब संघर्ष करना पड़ता है और आख़िर में वे हाशिए पर ही नज़र आते हैं. लेकिन उन्हें धकेलकर हाशिए से भी बाहर कर देने की कोशिश अपने आपमें अश्लीलता है.
अच्छा ही है कि वात्सायन ने बीते ज़माने में कामसूत्र की रचना कर ली, चंदेलों ने एक हज़ार साल पहले खजुराहो के मंदिर बनवा दिए और राजा नरसिंहदेव ने तेरहवीं शताब्दी में कोणार्क में मिथुन मूर्तियाँ लगवाने की हिम्मत कर ली. अगर इन संगठनों को इतिहास में जाने की अनुमति हो तो वे वात्सायन का मुँह काला कर दें और चंदेलों को सरेआम फाँसी देकर खजुराहो के मंदिरों को तहस-नहस कर दें. वैसे जो कुछ ये कर रहे हैं वह भारत की सांस्कृतिक विरासत पर कालिख़ पोतने से कोई कम भी नहीं है.
5 comments May 22, 2007