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	<title>Comments on: हम एक असहिष्णु समाज का हिस्सा नहीं हो सकते</title>
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	<description>Just another WordPress.com weblog</description>
	<pubDate>Fri, 25 Jul 2008 11:54:46 +0000</pubDate>
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		<title>By: Reyaz-ul-haque</title>
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		<dc:creator>Reyaz-ul-haque</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 May 2007 18:54:15 +0000</pubDate>
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		<description>आप सभी असहिष्णुओं के कान समान रूप से उमेठते तब शायद हमारे कान यह दर्द आसानी से सह लेते&lt;br/&gt;&lt;br/&gt;घुघूती बासूती जी&lt;br/&gt;इसका मतलब हम यह क्यों न लगायें कि आप सिर्फ़ कान उमेठने में ही यकीन रखती हैं न कि सवालों के जवाब देने में. आपको ईर्ष्या है कि हम दूसरों की निंदा क्यों नहीं कर रहे (अगर कर दें तो शायद आप हमसे सहमत हो जायें, जैसा आप लिखती भी हैं). मगर आप एक कमजोर ज़मीन पर खडी़ हैं.&lt;br/&gt;आप कैसे दुनिया के तमाम असहिष्णुओं को आपस में विलगा कर देख सकती हैं. अविनाश भाई ने सही लिखा है कि जब हम इस तरह की कोई बात करते हैं तो हमारा मतलब तमाम तरह की असहिष्णुताओं से होता है. मगर क्या यह ज़रूरी है कि कोई लेख लिखते वक्त हम उसके साथ एक सूची भी संलग्न करें कि यह लेख इन तमाम मुद्दों पर है और इन तमाम लोगों के खिलाफ़ लिखा गया है? आप जानती हैं कि यह हास्यास्पद होगा.&lt;br/&gt;रही बात गुजरात की. कोई चीज़ इतिहास में क्या थी इससे उसका मूल्यांकन वर्तमान में नहीं होता बल्कि वह आज क्या है और अपने समय पर वह किस तरह के दाग (निशानी) छोड़ रही है, इससे होता है. &lt;br/&gt;गुजरात ने पारसियों के साथ क्या किया यह आज कोई मुद्दा है ही नहीं बल्कि आज का मुद्दा तो यह है कि वह वहां के मुसलमानों के साथ क्या कर रहा है, और उसके बारे में लोगों के विचार इसी तथ्य पर बनेंगे.&lt;br/&gt;हमारा कहना है कि देश में सबको बोलने, लिखने, सोचने का अधिकार है. और यह कोई फ़ासिस्ट गिरोह नहीं तय कर सकता कि हम क्या बोलें, क्या सोचें, क्या लिखें.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप सभी असहिष्णुओं के कान समान रूप से उमेठते तब शायद हमारे कान यह दर्द आसानी से सह लेते</p>
<p>घुघूती बासूती जी<br />इसका मतलब हम यह क्यों न लगायें कि आप सिर्फ़ कान उमेठने में ही यकीन रखती हैं न कि सवालों के जवाब देने में. आपको ईर्ष्या है कि हम दूसरों की निंदा क्यों नहीं कर रहे (अगर कर दें तो शायद आप हमसे सहमत हो जायें, जैसा आप लिखती भी हैं). मगर आप एक कमजोर ज़मीन पर खडी़ हैं.<br />आप कैसे दुनिया के तमाम असहिष्णुओं को आपस में विलगा कर देख सकती हैं. अविनाश भाई ने सही लिखा है कि जब हम इस तरह की कोई बात करते हैं तो हमारा मतलब तमाम तरह की असहिष्णुताओं से होता है. मगर क्या यह ज़रूरी है कि कोई लेख लिखते वक्त हम उसके साथ एक सूची भी संलग्न करें कि यह लेख इन तमाम मुद्दों पर है और इन तमाम लोगों के खिलाफ़ लिखा गया है? आप जानती हैं कि यह हास्यास्पद होगा.<br />रही बात गुजरात की. कोई चीज़ इतिहास में क्या थी इससे उसका मूल्यांकन वर्तमान में नहीं होता बल्कि वह आज क्या है और अपने समय पर वह किस तरह के दाग (निशानी) छोड़ रही है, इससे होता है. <br />गुजरात ने पारसियों के साथ क्या किया यह आज कोई मुद्दा है ही नहीं बल्कि आज का मुद्दा तो यह है कि वह वहां के मुसलमानों के साथ क्या कर रहा है, और उसके बारे में लोगों के विचार इसी तथ्य पर बनेंगे.<br />हमारा कहना है कि देश में सबको बोलने, लिखने, सोचने का अधिकार है. और यह कोई फ़ासिस्ट गिरोह नहीं तय कर सकता कि हम क्या बोलें, क्या सोचें, क्या लिखें.</p>
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		<title>By: avinash</title>
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		<dc:creator>avinash</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 May 2007 05:35:06 +0000</pubDate>
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		<description>घुघुती जी और अभय जी, आप दोनों सही कह रहे हैं... और रियाज़ और हमारी सबकी मंशा भी यही है। क्‍योंकि जब हम नामवर सिंह, चंद्रमोहन के संदर्भ में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की बात करते हैं- तो उसका यह निहितार्थ नहीं होता कि हम हजरत के कार्टून बनाने वालों का विरोध करनेवालों और रूश्‍दी की किताब पर पाबंदी लगाने वाली सरकार के साथ खड़े हैं।  डेरा सच्‍चा सौदा और अकालतख्‍त का विवाद धर्म की जंग नहीं, राजनीति की साज़‍िशों का विवाद है- इससे किसी को कोई असहमति नहीं सकती। लेकिन संभव है, रियाज़ या हमें ये पूरा मामला समझने में अभी वक्‍त लगाना होगा और नामवर-चंद्रमोहन का संदर्भ ज्‍यादा समझ में आता होगा। इसलिए ज़रूरी नहीं कि एक संदर्भ उठाते हुए हम तमाम दूसरे संदर्भों का सामान्‍य ज्ञान बताएं। बल्कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की लड़ाई का एक संदर्भ दूसरे कई संदर्भों को मदद पहुंचाता है। साथ ही मुझे ये भी लगता है कि एक संदर्भ उठने पर अगर आप कहते हैं कि दूसरे संदर्भ भी उठने चाहिए, तो ये मंशा मुझे सही नहीं लगती, क्‍योंकि हर आदमी मसले उठाने के लिए अपनी संवेदनात्‍मक तीव्रता के साथ आज़ाद है... (बकौल अभय तिवारी)।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>घुघुती जी और अभय जी, आप दोनों सही कह रहे हैं&#8230; और रियाज़ और हमारी सबकी मंशा भी यही है। क्‍योंकि जब हम नामवर सिंह, चंद्रमोहन के संदर्भ में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की बात करते हैं- तो उसका यह निहितार्थ नहीं होता कि हम हजरत के कार्टून बनाने वालों का विरोध करनेवालों और रूश्‍दी की किताब पर पाबंदी लगाने वाली सरकार के साथ खड़े हैं।  डेरा सच्‍चा सौदा और अकालतख्‍त का विवाद धर्म की जंग नहीं, राजनीति की साज़‍िशों का विवाद है- इससे किसी को कोई असहमति नहीं सकती। लेकिन संभव है, रियाज़ या हमें ये पूरा मामला समझने में अभी वक्‍त लगाना होगा और नामवर-चंद्रमोहन का संदर्भ ज्‍यादा समझ में आता होगा। इसलिए ज़रूरी नहीं कि एक संदर्भ उठाते हुए हम तमाम दूसरे संदर्भों का सामान्‍य ज्ञान बताएं। बल्कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की लड़ाई का एक संदर्भ दूसरे कई संदर्भों को मदद पहुंचाता है। साथ ही मुझे ये भी लगता है कि एक संदर्भ उठने पर अगर आप कहते हैं कि दूसरे संदर्भ भी उठने चाहिए, तो ये मंशा मुझे सही नहीं लगती, क्‍योंकि हर आदमी मसले उठाने के लिए अपनी संवेदनात्‍मक तीव्रता के साथ आज़ाद है&#8230; (बकौल अभय तिवारी)।</p>
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		<title>By: yogesh samdarshi</title>
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		<dc:creator>yogesh samdarshi</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 May 2007 05:16:21 +0000</pubDate>
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		<description>घूघुती जी से मेरी भी सहमति है</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>घूघुती जी से मेरी भी सहमति है</p>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
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		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 May 2007 00:59:12 +0000</pubDate>
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		<description>रियाज़.. घुघूती जी की बातों को गम्भीरता से सोचिये.. उन्होने कहा है तो आप निश्चित चूक कर रहे हैं..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रियाज़.. घुघूती जी की बातों को गम्भीरता से सोचिये.. उन्होने कहा है तो आप निश्चित चूक कर रहे हैं..</p>
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		<title>By: Mired Mirage</title>
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		<dc:creator>Mired Mirage</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 May 2007 23:01:02 +0000</pubDate>
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		<description>बिल्कुल सही कह रहे हैं आप । मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ । बस एक कमी रह गई है, उस पर भी ध्यान दें तो लेख पूरा हो जाएगा व धर्म ,जाति, प्रान्त निरपेक्ष भी हो जाएगा । इस विषय में हजरत जी के कार्टून बनाने वालों का विरोध करने वालों, सलमान रुशदी की सैटानिक वर्सेज पर पाबंदी लगाने वाली सरकार( वह हिन्दुत्व वाली न थी), डेरा सच्चा सौदा का विरोध करने वालों, डा विंसी कोड पर बनी फिल्म का विरोध करने वालों के भी नाम आते तो हमें लगता आप सभी असहिष्णुओं के कान समान रूप से उमेठते हैं । तब शायद हमारे कान यह दर्द आसानी से सह लेते ।&lt;br/&gt;हम तो अपने कान स्वयं ही उमेठ लेते हैं और दूसरों के छोड़ देते हैं सो अब आप बाँकी सबके कान भी उमेठिये तब हमारे कानों को कुछ राहत मिलेगी । आजकल वे कुछ अधिक ही खींचे जा रहे हैं कुछ अपने हाथों व कुछ बाँकी संसार के हाथों ।&lt;br/&gt;जहाँ तक गुजरात का प्रश्न है तो वह कक्षा के उस शरारती बच्चे जैसा हो गया है जो इतना बदनाम हो गया है कि शरारत कोई भी करे दो धौल उसे जमाकर शिक्षक अपने अनुशासन की इति समझ लेता है । ऐसा सब करते समय लोग दिल्ली व आधे उत्तर भारत को भूल जाते हैं जहाँ एक नेता की हत्या के लिए हजारों सिक्खों को मार दिया गया था ।क्यों बार बार उस बर्बरता को याद नहीं किया जाता ? अब जब गुजरात पर उँगली उठाइये तो यह न भूलियेगा कि राजधानी की तरफ तीन उँगलियाँ उठ रही हैं । याद रखिये इसी गुजरात ने एक पूरे के पूरे धर्म को तब अपने यहाँ शरण दी जब किसी और धर्म वाले उन धर्मावलम्बियों को उन्हीं के अपने देश में अपना धर्म का पालन करते हुए जीने नहीं दे रहे थे । हाँ मैं पारसियों की बात कर रही हूँ । यदि गुजराती सहिष्णु न होते तो आज पारसियों का नामों निशां संसार से मिट गया होता । यदि यह बात पुरानी है तो फिर मनु की बात, खजुराहो की बात भी पुरानी है । अवगुणों के साथ गुण भी याद रखिये । &lt;br/&gt;बुरा बुरा ही होता है, चाहे इसका नाम न.मो. हो या रा.गाँ, चाहे वे हिन्दुत्व वाले हों या काँग्रेसी या किसी और दल के या किसी और धर्म के । गाँव व मोहल्लों में टी वी देखने पर पाबंदी लगाने वालों का भी नाम आना चाहिये, स्त्रियों को जबरन सिर या मुँह ढकने पर मजबूर करने वालों की भी भर्त्सना होनी चाहिये । तभी सिद्ध होगा कि आप सब असहिष्णुओं का विरोध करते हैं ।&lt;br/&gt;घुघूती बासूती&lt;br/&gt;पुनःश्च : टी वी पर समाचार दिखाया जा रहा था कि किसी नए नाम वाली हिन्दुओं की रक्षा करने वाली संस्था ,गुट या जो भी हो, ने नामों की एक लिस्ट जारी की है ,( लगता है खिमायनी से सीखे हैं, नहीं नहीं कार्टून वाले किस्से से सीखे हैं ),लिस्ट में दिये लोगों को मारने पर २५ लाख रूपये मिलेंगे । लेने किसके पास जाना है यह पता नहीं दिया । अब तो हमारे कानों की क्या नाक की भी खैर नहीं । चलिये लग जाइये मरोड़ने !&lt;br/&gt;घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिल्कुल सही कह रहे हैं आप । मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ । बस एक कमी रह गई है, उस पर भी ध्यान दें तो लेख पूरा हो जाएगा व धर्म ,जाति, प्रान्त निरपेक्ष भी हो जाएगा । इस विषय में हजरत जी के कार्टून बनाने वालों का विरोध करने वालों, सलमान रुशदी की सैटानिक वर्सेज पर पाबंदी लगाने वाली सरकार( वह हिन्दुत्व वाली न थी), डेरा सच्चा सौदा का विरोध करने वालों, डा विंसी कोड पर बनी फिल्म का विरोध करने वालों के भी नाम आते तो हमें लगता आप सभी असहिष्णुओं के कान समान रूप से उमेठते हैं । तब शायद हमारे कान यह दर्द आसानी से सह लेते ।<br />हम तो अपने कान स्वयं ही उमेठ लेते हैं और दूसरों के छोड़ देते हैं सो अब आप बाँकी सबके कान भी उमेठिये तब हमारे कानों को कुछ राहत मिलेगी । आजकल वे कुछ अधिक ही खींचे जा रहे हैं कुछ अपने हाथों व कुछ बाँकी संसार के हाथों ।<br />जहाँ तक गुजरात का प्रश्न है तो वह कक्षा के उस शरारती बच्चे जैसा हो गया है जो इतना बदनाम हो गया है कि शरारत कोई भी करे दो धौल उसे जमाकर शिक्षक अपने अनुशासन की इति समझ लेता है । ऐसा सब करते समय लोग दिल्ली व आधे उत्तर भारत को भूल जाते हैं जहाँ एक नेता की हत्या के लिए हजारों सिक्खों को मार दिया गया था ।क्यों बार बार उस बर्बरता को याद नहीं किया जाता ? अब जब गुजरात पर उँगली उठाइये तो यह न भूलियेगा कि राजधानी की तरफ तीन उँगलियाँ उठ रही हैं । याद रखिये इसी गुजरात ने एक पूरे के पूरे धर्म को तब अपने यहाँ शरण दी जब किसी और धर्म वाले उन धर्मावलम्बियों को उन्हीं के अपने देश में अपना धर्म का पालन करते हुए जीने नहीं दे रहे थे । हाँ मैं पारसियों की बात कर रही हूँ । यदि गुजराती सहिष्णु न होते तो आज पारसियों का नामों निशां संसार से मिट गया होता । यदि यह बात पुरानी है तो फिर मनु की बात, खजुराहो की बात भी पुरानी है । अवगुणों के साथ गुण भी याद रखिये । <br />बुरा बुरा ही होता है, चाहे इसका नाम न.मो. हो या रा.गाँ, चाहे वे हिन्दुत्व वाले हों या काँग्रेसी या किसी और दल के या किसी और धर्म के । गाँव व मोहल्लों में टी वी देखने पर पाबंदी लगाने वालों का भी नाम आना चाहिये, स्त्रियों को जबरन सिर या मुँह ढकने पर मजबूर करने वालों की भी भर्त्सना होनी चाहिये । तभी सिद्ध होगा कि आप सब असहिष्णुओं का विरोध करते हैं ।<br />घुघूती बासूती<br />पुनःश्च : टी वी पर समाचार दिखाया जा रहा था कि किसी नए नाम वाली हिन्दुओं की रक्षा करने वाली संस्था ,गुट या जो भी हो, ने नामों की एक लिस्ट जारी की है ,( लगता है खिमायनी से सीखे हैं, नहीं नहीं कार्टून वाले किस्से से सीखे हैं ),लिस्ट में दिये लोगों को मारने पर २५ लाख रूपये मिलेंगे । लेने किसके पास जाना है यह पता नहीं दिया । अब तो हमारे कानों की क्या नाक की भी खैर नहीं । चलिये लग जाइये मरोड़ने !<br />घुघूती बासूती</p>
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