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	<title>guzarish</title>
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	<description>Just another WordPress.com weblog</description>
	<pubDate>Thu, 24 May 2007 19:59:00 +0000</pubDate>
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		<title>वे अब किसके लिए आयेंगे ?</title>
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		<pubDate>Thu, 24 May 2007 19:59:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>guzarish</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आओ बहसियाएं]]></category>

		<category><![CDATA[खबर पर नज़र]]></category>

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		<description><![CDATA[हम पहले भी बता चुके हैं, किस तरह देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबायी जा रही है. डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी के बाद छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के अध्यक्ष राजेंद्र सायल को भी गिरफ़्तार कर लिया गया है. बहुचर्चित शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड मामले में अदालत के फैसले पर टिप्पणी करने के  आरोप में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><div style="text-align:left;font-family:arial;"><span style="font-style:italic;font-size:85%;" class="CH1">हम पहले भी बता चुके हैं, किस तरह देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबायी जा रही है. डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी के बाद छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के अध्यक्ष</span><span style="font-style:italic;font-size:85%;"> <span style="font-weight:bold;">राजेंद्र सायल</span></span><span style="font-style:italic;font-size:85%;" class="CH1"><span style="font-weight:bold;"> </span>को भी गिरफ़्तार कर लिया गया है. </span><span style="font-style:italic;font-size:85%;">बहुचर्चित शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड मामले में अदालत के फैसले पर टिप्पणी करने के  आरोप में उनको आज पुलिस ने गिरफ्तार कर  लिया। लगभग नौ साल पहले की गई इस टिप्पणी पर जबलपुर हाईकोर्ट ने उन्हें छ: माह की  सजा सुनाई थी।  श्री सायल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील करने  पर सजा की अवधि कम  कर एक सप्ताह तय कर दी गई।  विस्तार से जानें <a href="http://www.dailydeshbandhu.com/default.asp?sourceid=&amp;smenu=1&amp;twindow=&amp;mad=&amp;sdetail=10232&amp;wpage=1&amp;skeyword=&amp;sidate=&amp;ccat=&amp;ccatm=&amp;restate=&amp;restatus=&amp;reoption=&amp;retype=&amp;repmin=&amp;repmax=&amp;rebed=&amp;rebath=&amp;subname=&amp;pform=&amp;sc=1984&amp;hn=dailydeshbandhu&amp;he=.com">देशबंधु </a>पर. यहां हम डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी पर देशबंधु में छपे अनिल चमड़िया के <a href="http://www.dailydeshbandhu.com/default.asp?sourceid=&amp;smenu=101&amp;twindow=Default&amp;mad=No&amp;sdetail=9872&amp;wpage=1&amp;skeyword=&amp;sidate=&amp;ccat=&amp;ccatm=&amp;restate=&amp;restatus=&amp;reoption=&amp;retype=&amp;repmin=&amp;repmax=&amp;rebed=&amp;rebath=&amp;subname=&amp;pform=&amp;sc=1984&amp;hn=dailydeshbandhu&amp;he=.com">आलेख</a> को पुनर्प्रस्तुत कर रहे हैं. हम इस मुद्दे को भी नामवर सिंह, चंद्रमोहन, हुसेन आदि मामलों से अलग कर के नहीं देख रहे.</span><br /><span style="font-weight:bold;" class="CH1"><br />डॉ. विनायक सेन का सिलसिला नहीं रूका तो&#8230;</span></div>
<table style="font-family:arial;" align="right" border="0" cellpadding="3" cellspacing="0" width="1">
<tbody>
<tr>
<td><img src="http://www.dailydeshbandhu.com/clients/dailydeshbandhu/5-20-2007-10-54-08-AM-2549951.jpg" alt="" align="right" /></td>
</tr>
<tr>
<td align="center"></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><span style="font-weight:bold;font-family:arial;">अनिल चमड़िया</span><br /><span style="font-family:arial;">दिल्ली के प्रेस क्लब में पूर्व न्यायाधीश राजिन्दर सच्चर, वकील प्रशांत भूषण, लेखिका अरूंधति राय, जेपी आंदोलन के नेता अख्तर हुसैन, विधायक डॉ. सुनीलम और दूसरे कई लोग मीडिया वालों से यह अनुरोध कर रहे थे कि छत्तीसगढ़ में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी की सूचना छापने की कृपा करें। उन्हें चौदह मई को बिलासपुर में जन सुरक्षा विशेष कानून 2005 और गैर कानूनी गतिविधि रोधक कानून 1967 के तहत गिरफ्तार किया गया था। डॉ. विनायक सेन पहले दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में डॉक्टर थे। लेकिन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नेता शंकर गुहा नियोगी के आंदोलन के प्रभाव में आकर वे आदिवासियों के बीच वहां जाकर काम करने लगे। कामगारों द्वारा चलाए जाने वाला शहीद अस्पताल खड़ा किया। इन दिनों खासतौर से यह देखा जाता है कि मीडिया के पत्रकारों की मानसकिता कामगारों की तरह नहीं रही। वे अधिकारियों की तरह सोचते और हुक्म देते हैं। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के संबंध में भी उन्हाेंने पुलिस के आरोपों की तरफ से सोचना शुरू किया। इसीलिए उनके भीतर लोकतंत्र के मूल्य बोध को जगाने की कोशिश करनी पड़ रही है। एक व्यापारी पीयूष गुहा ने पुलिस द्वारा खुद को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखे जाने के दौरान यह बयान दिया है कि डॉ. विनायक सेन का माओवादियों से रिश्ता हैं। स्टिंग आपरेशन में फंसे छत्तीसगढ़ के एक सांसद संसद भवन में तो यह तक कह रहे थे कि उन्हें पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने बताया है कि उनके पास पक्के सबूत हैं। रायपुर जेल तक उड़ाने की योजना थी। इसीलिए एक बड़े नक्सलवादी को (संभवत: नारायण सन्याल) को वहां से बिलासपुर की जेल में भेज दिया गया है। पिछले पचास-साठ वर्षों में ऐसे न जाने कितने उदाहरण मिल सकते हैं जिसमें कि सरकार और पुलिस ने लोगों के लिए लड़ने वाले या लोकतंत्र के पक्ष में बोलने वालों के खिलाफ तरह-तरह के आरोपों में मुकदमें लादे हैं। कांग्रेस की सरकारों ने शासन के ढांचे को इस दिशा में मजबूत किया। इंदिरा गांधी तानाशाही तक पहुंच गईं। आपातकाल लगाया। देश के बडे-बड़े नेताओं को बड़ौदा डायनामाइट कांड में फंसाया था। सरकार अपने विरोधियों को पकड़वाने के बाद हमेशा ही कहती है कि उसके पास पुख्ता सबूत हैं। लेकिन इस देश में क्या कभी देश के किसी बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ पुख्ता सबूत साबित हो सकें? </span><br /><span style="font-family:arial;">यहां इस बात से ज्यादा चिंता हो रही है कि सरकारी मशीनरियां तेजी से फासीवाद की तरफ बढ़ रही हैं। आपातकाल लगा तो विरोध हुआ। न्यायपालिका ने घुटने टेके। लेकिन मीडिया के कम से कम एक हिस्से ने तो लड़ाई लड़ी। कई पत्रकार जेल गए। संसदीय राजनीतिक पाटयों से लेकर नक्सलवादियों तक ने तानाशाही के खिलाफ एकजुटता दिखाई। लेकिन आपातकाल के बाद सत्ता मशीनरी ने दमन के साथ-साथ उसके विरोध की ताकतों को तरह-तरह से अलग-थलग किया और अब अमेरिकी शासन शैली को स्वीकृति मिलने के बाद तो वह आक्रमकता की स्थिति में आ गई है। मीडिया की पूरी मानसिकता इस तरह से तैयार की जा रही है कि वह सरकारी मशीनरी की तरह सोचे। वह लोकतंत्र का कोई सवाल ही नहीं खड़ा करें। सरकारी नीतियों की वजह से संघर्ष की परिस्थितियां खड़ी हो तो वह नीतियों के बजाय संघर्ष को विकास विरोधी बताने की मुहिम में शामिल हो। संघर्षों को राष्ट्र विरोधी तक करार करने के तर्कों में मददगार हो। शासन व्यवस्था के पास एक बड़ा हथियार पहले ही मौजूद है। किसी संघर्ष को हिंसक बताकर उसे कानून एवं व्यवस्था के समस्या के रूप में खड़ी करे। वह शांति की एकतरफा जिम्मेदारी स्थापित करने में कामयाब होती रही है। इस गणतांत्रिक ढांचे में यह भी किया गया है कि राय और केन्द्र की नीतियों को एक रूप करने के तरीके खोजे गए। छत्तीसगढ़ की सरकार जब दमन करे तो केन्द्र सरकार कानून एवं व्यवस्था को राय का विषय बता दे और जब छत्तीसगढ़ में कानून एवं व्यवस्था के नाम पर दमन की कार्रवाइयां चलाने के लिए फौज की जरूरत हो तो केन्द्र सरकार उसे अपना राष्ट्रीय और संवैधानिक कर्तव्य बताए। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल से एक प्रतिनिधिमंडल मिला तो उन्होंने कहा कि ये छत्तीसगढ़ का मामला है और वे केवल सरकार को लिखकर पूछ सकते हैं। प्रतिनिधिमंडल चाहें तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायालय में जा सकता है। देश का गृहमंत्री किन मामलों में लाचार दिखने लगा है? </span><br /><span style="font-family:arial;">छत्तीसगढ़ एक ऐसा उदाहरण है जहां संसदीय लोकतंत्र में संस्थाओं के स्तर पर दिखने वाले भेद मिट गए हैं। छत्तीसगढ़ आदिवासियों के राय के रूप में अलग हुआ। आदिवासी विधायक बहुमत में चुनाव जीते लेकिन सरकार का नेतृत्व गैर आदिवासी करता है। भाजपा की सरकार है और सलवा-जुडूम कांग्रेस के नेतृत्व चलता में हैं। सलवा-जुडूम के जुर्मों के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग चुप है। न्यायालय में इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने वहां की स्थितियां बयान की है। अनुभव रहा है कि सत्ता मशीनरी जिस संघर्ष को राष्ट्र विरोधी, विकास विरोधी और हिंसक के रूप में स्थापित करने के तर्कों को समाज के मध्य वर्ग तक ले जाने में सफल हो जा रहा है तो उसके खिलाफ तमाम संस्थाओं की राय एक सी बन जाती है। सरकारी मशीनरियों को कौन सा एक आक्रमक विचार संचालित कर रहा है?</span><br /><span style="font-family:arial;">छत्तीसगढ़ में जन सुरक्षा विशेष कानून 2005 बना है, वह पोटा से भी ज्यादा दमनकारी है। लेकिन उसे लेकर कोई मतभेद छत्तीसगढ़ की दोनों सत्ताधारी पाटयों के बीच नहीं दिखा। दरअसल कांग्रेस और भाजपा की नीतियों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। कांग्रेस ने जो दमनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया है, भाजपा उसका इस्तेमाल ही नहीं करना चाहती है बल्कि उसे और मजबूत करना चाहती है। कांग्रेस ने टाडा लगाया तो भाजपा ने पोटा लगाया। पोटा खत्म किया तो राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर गैरकानूनी गतिविधि रोधक कानून 1967 में उसके प्रावधानों को जोड़ दिया गया। दोनों ही पाटयों का सामाजिक, आथक और राजनीतिक आधार एक है। कांग्रेस के जमाने में जिस तरह से दलितों और आदिवासियों को नक्सलवादी के नाम पर मारा गया है उसी तरह से भाजपा शासित रायों में भी मारा गया है। छत्तीसगढ़ में सलवा-जुडूम की ज्यादतियों को लेकर देश के उन बड़े अधिकारियों एवं न्यायाधीशों ने कई कई रिपोटर्ें पेश की हैं जो भारत सरकार के महत्वपूर्ण ओहदे पर रह चुके हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने वाले प्रोफेसर्स, पत्रकारों, वकीलों ने बताया कि कैसे छत्तीसगढ़ में आदिवासी मारे जा रहे हैं। अमेरिका ने कहा था कि जो हमारे साथ नहीं है वह आतंकवाद के साथ है। छत्तीसगढ़ में इसी वाक्य को दोहराया गया कि जो सलवा-जुडूम के साथ नहीं है वो माओवादियों के साथ है। जब राजनैतिक सत्ता इस तरह से आक्रमक हो जाए तो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है। यहां तो सरकार के साथ हां में हां नहीं मिलाने वाले सभी के सभी माओवादी माने जा सकते हैं। संसदीय लोकतंत्र का ढांचा इस तरह का समझा जाता रहा है कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों और मूल्यों पर हमलों पर अंकुश लगाने की गुंजाइश रहती है। लेकिन अनुभव बताता है कि पूरा ढांचा एकरूप हो चुका है। ऐसी स्थितियों के लिए ही मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। मीडिया भी जब सरकारी संस्थाओं की तरह सोचने लगे तो लोकतंत्र में लोग अपनी बात कहने के लिए कहां जा सकते हैं? जब लोकतंत्र ही नहीं बचेगा तो मीडिया अपनी ताकत को कैसे बचाकर रख सकेगा। लोकतंत्र एक सिद्धांत है और यह सोचना कि वह किसी मामले में तो लोकतंत्र की आवाज उठाएगा और किसी में नहीं तो वह गफलत में है। स्टार न्यूज के मुंबई दफ्तर पर हमले के बाद पिछले दिनों दिल्ली के प्रेस क्लब में हुई विरोध सभा में चंद ही लोग जमा हो सके। </span><br /><span style="font-family:arial;">लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए पिछले वर्षों में जो कुछ हासिल किया उस पर तेजी से हमले हो रहे है। लोकतंत्र के मूल्यों पर हमले के लिए राष्ट्रवाद और शांति की आड़ ली जाती है। सत्ता मशीनरी बराबर इस किस्म की दुविधा पैदा करने की कोशिश करती है। राष्ट्र चाहिए या लोकतंत्र? लेकिन जागरूकता इसी में सिद्ध होती है कि वह दो में से एक के चुनाव करने के प्रश्न के तरीके को ही ध्वस्त कर दे। राष्ट्र अपनी व्यवस्था के लिए जाना जाता है। राष्ट्र की जब व्यवस्था ही लोकतांत्रिक नहीं होगी तो उसका क्या अर्थ रह जाता है? लगातार शांतिपूर्ण संघर्षों की उपेक्षा जानबूझकर की जा रही है। उन बुद्धिजीवियों को ठिकाने लगाने का है जो जन संघर्षों के साथ रहते हैं। छत्तीसगढ़ भारतीय समाज व्यवस्था की भविष्य की नीति की जमीन तैयार कर रहा है। देश का बड़ा हिस्सा आदिवासियों जैसा ही होता जा रहा है। यह सोचना कि वहां आदिवासी मारे जा रहे हैं, ऐसा नहीं है। आदिवासी जैसे हालात में रहने वाले लोग मारे जा रहे हैं।</span></p>
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		<title>गुजरात बनता सारा देश</title>
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		<pubDate>Thu, 24 May 2007 19:22:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>guzarish</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[
जब-जब फ़ासीवाद समाज, कला और राजनीति को खरोंचने की कोशिश करता है, याद आती है पिकासो की गुएर्निका. यह आज भी गुजरातों और  केसरिया फ़ासीवाद समेत सभी तरह के फ़ासीवाद के खिलाफ़ लडा़ई में हमारे लिए रोशनी की मीनार की तरह है.
अपने समय के कई सवाल हमारे समय जवाब के इंतज़ार में हैं. क्या [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><a href="http://bp0.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlXoLBdZWHI/AAAAAAAAARo/sn3fLf0hvnM/s1600-h/guernica.jpg"><img style="float:left;cursor:pointer;margin:0 10px 10px 0;" src="http://bp0.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlXoLBdZWHI/AAAAAAAAARo/sn3fLf0hvnM/s320/guernica.jpg" alt="" border="0" /></a><span style="font-style:italic;font-size:85%;"><span style="font-family:arial;"></p>
<p></span></span><span style="font-size:100%;"><span style="font-family:arial;"><span style="font-weight:bold;color:rgb(0, 0, 153);">जब-जब फ़ासीवाद समाज, कला और राजनीति को खरोंचने की कोशिश करता है, याद आती है पिकासो की गुएर्निका. यह आज भी गुजरातों और  केसरिया फ़ासीवाद समेत सभी तरह के फ़ासीवाद के खिलाफ़ लडा़ई में हमारे लिए रोशनी की मीनार की तरह है.</span><br /></span></span><span style="font-style:italic;font-size:85%;"><span style="font-family:arial;"></p>
<p>अपने समय के कई सवाल हमारे समय जवाब के इंतज़ार में हैं. क्या हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बंधक समय में यों ही रहते रहेंगे? क्या इस समय से निकलने का रास्ता नहीं? क्या सारा देश इसी तरह गुजरात में बदलता रहेगा और हम अपने दड़बों में सिकुडे़ सहमे बैठे रहेंगे? क्या इस गुजरात का मुकाबला करने का समय अब नहीं आ गया है? क्या इस देश की बहुप्रचारित आज़ादी का यही मतलब रह गया है कि भगवाधारी अपना मध्ययुगीन कचडा़ हम पर उंडे़लते रहें, पूरे देश को एक भयावह मोदीयुग में धकेलते रहें और देश का पूरा ढांचा उसके आगे दंडवत हो जाये? जैसा </span><span style="font-weight:bold;font-family:arial;">अपूर्वानंद जी</span><span style="font-family:arial;"> ने सवाल उठाया है क्या आज गा़लिब होते, कबीर होते, मीरां होतीं तो हम उन्हें यों ही अदालतों में घसीटते और अदालतें यह तय करतीं कि गालिब कौन-सा दोहा लिखें और कौन जला दें, मीरां क्या गायें और क्या न गायें और गा़लिब की कौन-सी गज़ल आपत्तिजनक है? आप भले इससे इनकार करें, हम ठीक ऐसे ही दौर से गुज़र रहे हैं. और हमें अपने समय के इन सवालों से कतरा कर निकलने के बजाय उनसे जूझने की ज़रूरत है.</span></span> <span style="font-weight:bold;color:rgb(204, 0, 0);font-size:130%;"><span style="font-family:arial;"></p>
<p>तर्क और तरकश</span></span> <span style="font-size:85%;"><span style="font-weight:bold;font-family:arial;"><br />अपूर्वानंद</p>
<p></span></span><span style="font-family:arial;"><span style="color:rgb(51, 153, 153);font-size:85%;">क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है?<br /></span><br /></span><span style="font-family:arial;">भारतीय न्याय व्यवथा की आरंभिक इकाइयों की निगाह में नामवर सिंह, एमएफ  हुसेन और चंद्रमोहन एक मायने में समान हैं. अलग-अलग जगहों पर निचली अदालतों ने तीनों को ही अलग-अलग मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 295ए के तहत मुकदमों में हाजिर होने का हुक्म सुनाया है. इन धाराओं का संबंध में ऐसे अपराध से है, जो विभिन्न समुदायों के बीच धर्म, नस्ल, जन्मस्थल, निवास, जाति या समुदाय के आधार पर शत्रुता पैदा करने और सौहार्द बिगाड़ने की नीयत से और किसी समुदाय के धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के लिए जान-बूझ कर द्वेषपूर्ण कृत्य के रूप में किया गया हो.</span><br /><span style="font-family:arial;">हुसेन पर कई शहरों की निचली अदालतों में इन धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज हुए और हर जगह से उन्हें अदालत में पेश होने का हुक्म सुनाया गया. ध्यान देने की बात यह है कि इन धाराओं में वर्णित अपराधों की सुनवाई प्रथम श्रेणी मजिस्टेट द्वारा की जानी होती है और ये गैर-जमानती हैं. पुलिस को मामले की तहकीकात करनी ही होगी. विधिवेत्ता राजीव धवन के अनुसार ऐसे मामले में पुलिस को गिरफ्तार करने का हक है, लेकिन जमानत देने का अधिकार नहीं है. हालांकि गिरफ्तारी की अवधि साठ दिनों की है, लेकिन धवन के मुताबिक उस व्यक्ति को दिमागी, शारीरिक और आत्मिक नुकसान हो ही चुका होता है. 2006 के पहले ऐसे मामलों में आगे बढ़ने के पहले राज्य की अनुमति जरूरी होती थी. पर 2006 में उच्च्तम न्यायालय ने पैस्टर राजू बनाम कर्नाटक राज्य के मुकदमे में कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस निर्णय को पलट दिया, जिसके हिसाब से तहकीकात के दौरान, पुलिस अभियुक्त को हिरासत में नहीं ले सकती. इसके चलते अब हुसेन हों या चंद्रमोहन या नामवर सिंह, गिरफ्तारी का खतरा तीनों पर है.</span><br /><span style="font-family:arial;">हुसेन अब तक किसी मामले में गिरफ्तार नहीं हुए हैं, लेकिन पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली और मुंबई पुलिस को उनके खिलाफ मुनासिब कार्रवाई के आदेश देने के बाद यह खतरा उन पर बढ़ तो गया ही है. महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा के कला संकाय के अंतिम वर्ष के छात्र चंद्रमोहन को छह दिनों तक हिरासत में रहना पड़ा. नामवर सिंह को अभी बनारस के मजिस्ट्रेट ने अपने सामने हाजिर होने को कहा है.</span><br /><span style="font-family:arial;">नामवर सिंह ने पिछले दिनों बनारस में आयोजित किसी गोष्ठी में सुमित्रानंदन पंत की एक चौथाई रचनाओं को कूड़ा कहा, ऐसा बताते हैं. इससे पंत जी के समर्थकों या उपासकों की भावनाओं को चोट पहुंची. जख्म इतना गहरा था कि वे अदालत तक नामवर सिंह के खिलाफ गुहार लगाने पहुंच गये. जिन्होंने भी इस लायक समझा कि मामला दर्ज किया जाये, वे निश्चय ही आहत भावनाओं के प्रति सहानुभूतिशील होंगे. न्यायिक प्रावधानों का इतने हास्यास्पद ढंग से दुरुपयोग भारत में सभ्य विचार-विमर्श को किस तरह के झटके दे सकता है, इसका अनुमान संबंधित न्यायिक अधिकारियों को शायद नहीं है. अमर्त्य सेन भारत को तर्क करनेवालों की परंपरा का देश कहते हैं. उनकी इस गर्वपूर्ण उक्ति पर पिछले सालों में जिम्मेदारी की जगह से होनेवाले ऐसे फैसलों की वजह से निश्चय ही सवालिया निशान लग गया है. चंद्रमोहन पर हमले के बाद हमलावर द्वारा ही की गयी शिकायत के बाद उसे गिरफ्तार कर लेना अत्यंत ही गंभीर घटना थी.</span><br /><span style="font-family:arial;">विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने ठीक ही सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा को नोटिस जारी किया और पूरे मामले पर रिपोर्ट मांगी. कुछ लोग इसे केंद्रीय हस्तक्षेप के रूप में देखेंगे, लेकिन वडोदरा का मामला लितना कला और अभिव्यक्ति पर आक्रमण का नहीं था, उतना एक अकादेमिक संस्था का खुद को विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल जैसे आततायियों के सुपुर्द कर देने का था. प्रासंगिक प्रश्न यह है कि कला संकाय में होनेवाले इम्तहान में कौन-सा छात्र कौन-सी कृति प्रविष्टि के रूप में देने जा रहा है, यह खबर बाहर कैसे गयी? यह अधिकार क्या किसी को दिया जा सकता है कि वह परीक्षा कक्ष में घुस जाये? क्या इम्तहान में लिखे जाने या दिये जानेवाले उत्तरों पर परीक्षक के अलावा किसी को टिप्पणी करने का हक है? ये वे आरंभिक प्रश्न हैं जो चंद्रमोहन के मामले में संबंधित न्यायिक अधिकारी को पूछने चाहिए थे, पर शायद पूछे नहीं गये. हुसेन के मामले में भी मामला दर्ज करने के पहले यह पूछा जा सकता था कि क्या वे सार्वजनिक प्रचार सामग्री तैयार कर रहे थे. कलाकृतियों को क्या सार्वजनिक बयान या भाषण के बराबर का दर्जा दिया जाना उचित है? किसी निजी-संग्रह में या सीमित पहुंचवाली कला दीर्घा में लगी कलाकृति को क्या दो समुदायों के बीच विद्वेष भड़काने के उद्देश्य से प्रेरित बताना तर्कपूर्ण है?</span> <span style="font-family:arial;"><br />नामवर सिंह के खिलाफ दर्ज मामला चंद्रमोहन या हुसेनवाले मामलों की श्रेणी का नहीं क्योंकि पहले दोनों ही प्रसंगों में संघ से जुड़े संगठन की योजना है, जबकि नामवर सिंह के प्रसंग में ऐसा नहीं है. लेकिन तीनों के ही सिलसिले में यह प्रश्न तो प्रसंगिक है ही: क्या हमारे देश में सार्वजनिक विचार-विमर्श या व्यक्तिगत रचनाशीलता के लिए स्थान घटता जा रहा है?  क्या 21वीं सदी में गालिब का होना खतरनाक नहीं?  क्या वे धर्म और धर्मोपदेशक की खिल्ली उड़ाने को स्वतंत्र होंगे? उसी प्रकार क्या प्रेमचंद या हरिशंकर परसाई का लेखन अबाधित रह पायेगा? मजाक उड़ाना, व्यंग्य करना कला और साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा रहा है. कलाकार अपनी ही मूर्ति बनाता और ढालना नहीं है, वह बने बनाये गये बुतों को ध्वस्त कर सकता है. अगर बुतपरस्ती वह करता है, तो बुतशिकन भी उसे होना ही होगा. पर क्या हमारे दौर में कला के क्या रचना के स्वभाव से अंतर्भूत बुतशिकनी की इजाजत है?</span> <span style="font-family:arial;"><br />क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है? आखिरकार, दीपा मेहता अपनी फिल्म वाटर भारत में नहीं बना सकीं, हुसेन लंबे समय से भारत से निर्वासन में हैं, कला दीर्घाओं के मालिक गुजरात में ही नहीं, अन्यत्र भी कलाकारों को असुविधाजनक कलाकृतियां प्रदर्शित न करने की भद्र सलाह दे रहे हैं. जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी किताब पर अदालत द्वारा पाबंदी हटाये जाने के बाद भी शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के आक्रामक बयानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.</span> <span style="font-family:arial;">क्या तर्क वागीशों का यह देश मूर्खता के प्रदेश में बदल रहा है? 1857 के 150वें, भगत सिंह के 100वें और आजादी के 60वें साल में यह दुर्भाग्यपूर्ण प्रश्न हमारे सामने है.</span>
<div style="text-align:right;"><span style="font-weight:bold;font-style:italic;font-size:85%;"><span style="font-family:arial;">अपूर्वानंद जी का यह आलेख जनसता के 23 मई के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ है. वहां से साभार.</span></span></div>
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		<title>आइए, हम अंधेरे समय से बाहर निकलें</title>
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		<pubDate>Wed, 23 May 2007 17:52:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>guzarish</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आओ बहसियाएं]]></category>

		<category><![CDATA[खबर पर नज़र]]></category>

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		<description><![CDATA[हम अंधेरे समय में रह रहे हैं. यहां बोलने, सोचने, लिखने, फ़िल्में बनाने और किसी के बारे में कोई राय व्यक्त करने पर भी लगभग अघोषित पाबंदी है. हमारे सामने एक तरफ़ छत्ती़सगढ़ की मिसाल है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को उग्रवादियों से सांठ-गांठ होने के एक बेहद ढीले-ढाले आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><span style="font-style:italic;font-size:85%;"><span style="font-family:arial;">हम अंधेरे समय में रह रहे हैं. यहां बोलने, सोचने, लिखने, फ़िल्में बनाने और किसी के बारे में कोई राय व्यक्त करने पर भी लगभग अघोषित पाबंदी है. हमारे सामने एक तरफ़ छत्ती़सगढ़ की मिसाल है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को उग्रवादियों से सांठ-गांठ होने के एक बेहद ढीले-ढाले आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है तो दूसरी ओर नामवर सिंह जैसे वरिष्ठ आलोचक को इसलिए अदालत में तलब किया जाता है कि उन्होंने एक घटिया और अप्रासंगिक हो चुके कवि की असलियत बता दी. हम उसी देश में रह रहे हैं जहां पेंटरों को मनमाने तरीके से तबाह करने की हर कोशिश की जाती है और फ़िल्मों के लिए एक पूरे के पूरे राज्य के दरवाजे बंद कर दिये जाते हैं. हम नहीं जानते कि किसी एक देश में कब एक साथ इस तरह का आतंक कायम किया गया हो. और वह भी आज़ादी और लोकतंत्र की बहरी कर कर देनेवाली नारेबाजी के साथ. और ऐसे में </span>घुघूती बासूती</span><span style="font-family:arial;"><span style="font-style:italic;font-size:85%;"> जी का <a href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6715902137608428652&amp;postID=1485611543335165005">आग्रह</a> है कि हम जब इस अंधे समय के खिलाफ़ बोलें तो दुनिया के इतिहास के हर अंधे समय के खिलाफ़ भी बोलें. हम नहीं जानते कि कोई कैसे अंधे समय को अंधे समय से अलग कर सकता है. हम जब एक अंधेरे के खिलाफ़ बोलते हैं तो हमारी आवाज़ दुनिया की तमाम अंधेरी ताकतों और तारीख के तमाम स्याह पन्नों को खिलाफ़ भी होती है. और जब वे ऐसा कोई आग्रह करती हैं तो हमें उनकी नीयत पर संदेह करना चाहिए. हमें बहस के समकालीन मोर्चों को भोथडा़ होने से बचाना चाहिए. जारी बहस को आगे बढाते हुए नामवर सिंह-पंत मुद्दे और उसके संदर्भ में लेखकों की आज़ादी पर हम आज दो लेखको के विचार दे रहे हैं. इनमें से एक तो अरुंधति राय के हाल ही में आये एक इंटरव्यू का अंश है जो हाशिया पर भी प्रकाशित किया गया था. हम कल भी हाज़िर होंगे पटना के कुछ बडे लेखकों के साथ.</span></p>
<p></span><a href="http://bp3.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlSKGBdZWGI/AAAAAAAAARg/bvfpvXHuMy8/s1600-h/FP_ARUNDHATI_ROY7.JPG"><img style="float:left;cursor:pointer;margin:0 10px 10px 0;" src="http://bp3.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlSKGBdZWGI/AAAAAAAAARg/bvfpvXHuMy8/s200/FP_ARUNDHATI_ROY7.JPG" alt="" border="0" /></a><span style="font-family:arial;"><span style="font-weight:bold;color:rgb(153, 0, 0);font-size:85%;">अरुंधति राय</span><br /></span><span style="font-family:arial;">एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सकता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. </span><span style="font-family:arial;"></span><span style="font-family:arial;"></span><span style="font-family:arial;">लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध करते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन करने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था.</span><span style="font-family:arial;"> हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार स</span><span style="font-family:arial;">मेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं.</span><br /><span style="font-family:arial;"><br /><span style="font-style:italic;color:rgb(102, 102, 102);font-size:85%;">संतोष सहर भाकपा माले से जुडे़ और एक बेहद खामोश लेखक हैं. हंस, समकालीन जनमत, संप्रति पथ और फ़िलहाल जैसी पत्रिकाओं में छपने के बावजूद वे लिखने के मामले में बहुत सुस्त रहते हैं. वे जसम से जुडे़ रहे हैं. </span></p>
<p></span><span style="color:rgb(153, 0, 0);font-size:85%;"><span style="font-weight:bold;">संतोष सहर</span></span><br />नामवर सिंह ने सुमित्रानंदन पंत के बारे में जो टिप्पणी कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. ये बातें कहीं लिखित रूप में हों तब बात दूसरी है. क्योंकि ऐसा माना जा सकता है कि वे उनके विचार हैं. लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर ऐसा बोलना विवादों में रहने की मानसिकता को दरसाता है. जब उनसे पूछा जायेगा तो हो सकता है वे अपने कहे से मुकर जायें.<br />हिंदी साहित्य की अपनी एक लंबी परंपरा रही है. इसमें हर तरह की चीजें हैं. कुछ जनपक्षीय हैं तो कुछ क्रांतिकारी भी.  किसी भी लेखक या साहित्यकार का निरंतर विकास होता ही है. इसलिए पहले लिखित साहित्य को कूड़ा<br />कहना कहीं से भी ठीक नहीं है. फिर चाहे वह पंत जी के  संदर्भ में बात कही गयी हो या तुलसीदास के बारे में. हां कम या ज्यादा के  पैमाने पर इसका मूल्यांकन किया जा सकता है.<br />सुमित्रानंदन पंत छायावाद के  पहले लेखक माने जाते हैं और छायावाद का संबंध हिंदी साहित्य में प्रगतिशील साहित्य से बिलकुल स्पष्ट रूप सें जुड़ा हुआ है. छायावाद के चार स्तंभ कहे जाने में प्रसाद सबसे पहले पायदान पर आते हैं. यह भी सच है कि छायावाद की सबसे कमजोर कड़ी पंत जी ही माने जाते हैं. लेकि न इसका मतलब कहीं से भी यह नहीं निकाला जा सकता है कि उनका शुरुआती साहित्य कूड़ा था.<br />साहित्य में इन बातों पर बहस की जा सकती है. इसके  जरिये सही विचारों को भी सामने लाया जा सकता है. अदालत का हस्तक्षेप इसमें सही जान नहीं पड़ता है. साहित्य की चीजों को साहित्य के अंदर ही सुलझा लेना चाहिए. बाहरी हस्तक्षेप बेमानी है. क्योंकि  इससे कोई ठोस हल नहीं निकलेगा. आज जरूरत है साहित्य के  सम्यक  विवेचन की. नामवर सिंह की आदतों में शामिल है कि  वे कहीं भी किसी विषय पर टिप्पणी कर देते हैं. साहित्य का मूल्यांकन करना तो उन्होंने लगभग छोड़ दिया है. वे खुद ही कहते हैं कि  आजकल की कविता उनकी समझ से बाहर की चीज है. समकालीन कविताएं उन्हें रास नहीं आती हैं. इसलिए भी उन्होंने कविताओं के  मूल्यांकन से अपना पल्ला झाड़ लिया है. मेरे कहने का मतलब है कि ऐसा कह कर उन्होंने खुद ही अपने लिए सीमाएं निर्धारित कर ली हैं. इसलिए अच्छा तो यही होगा कि वे अपनी सीमा में ही रहें और उल्टी-सीधी टिप्पणी से बचें.</p>
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		<title>आइए, हम अंधेरे समय से बाहर निकलें</title>
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		<pubDate>Wed, 23 May 2007 17:52:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>guzarish</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आओ बहसियाएं]]></category>

		<category><![CDATA[खबर पर नज़र]]></category>

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		<description><![CDATA[हम अंधेरे समय में रह रहे हैं. यहां बोलने, सोचने, लिखने, फ़िल्में बनाने और किसी के बारे में कोई राय व्यक्त करने पर भी लगभग अघोषित पाबंदी है. हमारे सामने एक तरफ़ छत्ती़सगढ़ की मिसाल है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को उग्रवादियों से सांठ-गांठ होने के एक बेहद ढीले-ढाले आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><span style="font-style:italic;font-size:85%;"><span style="font-family:arial;">हम अंधेरे समय में रह रहे हैं. यहां बोलने, सोचने, लिखने, फ़िल्में बनाने और किसी के बारे में कोई राय व्यक्त करने पर भी लगभग अघोषित पाबंदी है. हमारे सामने एक तरफ़ छत्ती़सगढ़ की मिसाल है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को उग्रवादियों से सांठ-गांठ होने के एक बेहद ढीले-ढाले आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है तो दूसरी ओर नामवर सिंह जैसे वरिष्ठ आलोचक को इसलिए अदालत में तलब किया जाता है कि उन्होंने एक घटिया और अप्रासंगिक हो चुके कवि की असलियत बता दी. हम उसी देश में रह रहे हैं जहां पेंटरों को मनमाने तरीके से तबाह करने की हर कोशिश की जाती है और फ़िल्मों के लिए एक पूरे के पूरे राज्य के दरवाजे बंद कर दिये जाते हैं. हम नहीं जानते कि किसी एक देश में कब एक साथ इस तरह का आतंक कायम किया गया हो. और वह भी आज़ादी और लोकतंत्र की बहरी कर कर देनेवाली नारेबाजी के साथ. और ऐसे में </span>घुघूती बासूती</span><span style="font-family:arial;"><span style="font-style:italic;font-size:85%;"> जी का <a href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6715902137608428652&amp;postID=1485611543335165005">आग्रह</a> है कि हम जब इस अंधे समय के खिलाफ़ बोलें तो दुनिया के इतिहास के हर अंधे समय के खिलाफ़ भी बोलें. हम नहीं जानते कि कोई कैसे अंधे समय को अंधे समय से अलग कर सकता है. हम जब एक अंधेरे के खिलाफ़ बोलते हैं तो हमारी आवाज़ दुनिया की तमाम अंधेरी ताकतों और तारीख के तमाम स्याह पन्नों को खिलाफ़ भी होती है. और जब वे ऐसा कोई आग्रह करती हैं तो हमें उनकी नीयत पर संदेह करना चाहिए. हमें बहस के समकालीन मोर्चों को भोथडा़ होने से बचाना चाहिए. जारी बहस को आगे बढाते हुए नामवर सिंह-पंत मुद्दे और उसके संदर्भ में लेखकों की आज़ादी पर हम आज दो लेखको के विचार दे रहे हैं. इनमें से एक तो अरुंधति राय के हाल ही में आये एक इंटरव्यू का अंश है जो हाशिया पर भी प्रकाशित किया गया था. हम कल भी हाज़िर होंगे पटना के कुछ बडे लेखकों के साथ.</span></p>
<p></span><a href="http://bp3.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlSKGBdZWGI/AAAAAAAAARg/bvfpvXHuMy8/s1600-h/FP_ARUNDHATI_ROY7.JPG"><img style="float:left;cursor:pointer;margin:0 10px 10px 0;" src="http://bp3.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlSKGBdZWGI/AAAAAAAAARg/bvfpvXHuMy8/s200/FP_ARUNDHATI_ROY7.JPG" alt="" border="0" /></a><span style="font-family:arial;"><span style="font-weight:bold;color:rgb(153, 0, 0);font-size:85%;">अरुंधति राय</span><br /></span><span style="font-family:arial;">एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सकता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. </span><span style="font-family:arial;"></span><span style="font-family:arial;"></span><span style="font-family:arial;">लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध करते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन करने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था.</span><span style="font-family:arial;"> हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार स</span><span style="font-family:arial;">मेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं.</span><br /><span style="font-family:arial;"><br /><span style="font-style:italic;color:rgb(102, 102, 102);font-size:85%;">संतोष सहर भाकपा माले से जुडे़ और एक बेहद खामोश लेखक हैं. हंस, समकालीन जनमत, संप्रति पथ और फ़िलहाल जैसी पत्रिकाओं में छपने के बावजूद वे लिखने के मामले में बहुत सुस्त रहते हैं. वे जसम से जुडे़ रहे हैं. </span></p>
<p></span><span style="color:rgb(153, 0, 0);font-size:85%;"><span style="font-weight:bold;">संतोष सहर</span></span><br />नामवर सिंह ने सुमित्रानंदन पंत के बारे में जो टिप्पणी कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. ये बातें कहीं लिखित रूप में हों तब बात दूसरी है. क्योंकि ऐसा माना जा सकता है कि वे उनके विचार हैं. लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर ऐसा बोलना विवादों में रहने की मानसिकता को दरसाता है. जब उनसे पूछा जायेगा तो हो सकता है वे अपने कहे से मुकर जायें.<br />हिंदी साहित्य की अपनी एक लंबी परंपरा रही है. इसमें हर तरह की चीजें हैं. कुछ जनपक्षीय हैं तो कुछ क्रांतिकारी भी.  किसी भी लेखक या साहित्यकार का निरंतर विकास होता ही है. इसलिए पहले लिखित साहित्य को कूड़ा<br />कहना कहीं से भी ठीक नहीं है. फिर चाहे वह पंत जी के  संदर्भ में बात कही गयी हो या तुलसीदास के बारे में. हां कम या ज्यादा के  पैमाने पर इसका मूल्यांकन किया जा सकता है.<br />सुमित्रानंदन पंत छायावाद के  पहले लेखक माने जाते हैं और छायावाद का संबंध हिंदी साहित्य में प्रगतिशील साहित्य से बिलकुल स्पष्ट रूप सें जुड़ा हुआ है. छायावाद के चार स्तंभ कहे जाने में प्रसाद सबसे पहले पायदान पर आते हैं. यह भी सच है कि छायावाद की सबसे कमजोर कड़ी पंत जी ही माने जाते हैं. लेकि न इसका मतलब कहीं से भी यह नहीं निकाला जा सकता है कि उनका शुरुआती साहित्य कूड़ा था.<br />साहित्य में इन बातों पर बहस की जा सकती है. इसके  जरिये सही विचारों को भी सामने लाया जा सकता है. अदालत का हस्तक्षेप इसमें सही जान नहीं पड़ता है. साहित्य की चीजों को साहित्य के अंदर ही सुलझा लेना चाहिए. बाहरी हस्तक्षेप बेमानी है. क्योंकि  इससे कोई ठोस हल नहीं निकलेगा. आज जरूरत है साहित्य के  सम्यक  विवेचन की. नामवर सिंह की आदतों में शामिल है कि  वे कहीं भी किसी विषय पर टिप्पणी कर देते हैं. साहित्य का मूल्यांकन करना तो उन्होंने लगभग छोड़ दिया है. वे खुद ही कहते हैं कि  आजकल की कविता उनकी समझ से बाहर की चीज है. समकालीन कविताएं उन्हें रास नहीं आती हैं. इसलिए भी उन्होंने कविताओं के  मूल्यांकन से अपना पल्ला झाड़ लिया है. मेरे कहने का मतलब है कि ऐसा कह कर उन्होंने खुद ही अपने लिए सीमाएं निर्धारित कर ली हैं. इसलिए अच्छा तो यही होगा कि वे अपनी सीमा में ही रहें और उल्टी-सीधी टिप्पणी से बचें.</p>
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		<title>हम एक असहिष्णु समाज का हिस्सा नहीं हो सकते</title>
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		<pubDate>Tue, 22 May 2007 18:35:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>guzarish</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आओ बहसियाएं]]></category>

		<category><![CDATA[खबर पर नज़र]]></category>

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		<description><![CDATA[आजकल देश में आप कुछ भी कहिए तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और न जाने दंड विधान की कितनी धाराओं का उल्लंघन हो जाता है. अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब एक कलाकार द्वारा बनायी गयी कुछ तसवीरों पर संघी गुंडों ने उत्पात मचाया था. अभी नामवर जी द्वारा पंत साहित्य [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><a href="http://bp0.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlM7qhdZWFI/AAAAAAAAARY/TAgmydkbL_w/s1600-h/khajuraho.jpg"><img style="float:left;cursor:pointer;margin:0 10px 10px 0;" src="http://bp0.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlM7qhdZWFI/AAAAAAAAARY/TAgmydkbL_w/s320/khajuraho.jpg" alt="" border="0" /></a><span style="font-style:italic;font-family:arial;font-size:85%;">आजकल देश में आप कुछ भी कहिए तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और न जाने दंड विधान की कितनी धाराओं का उल्लंघन हो जाता है. अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब एक कलाकार द्वारा बनायी गयी कुछ तसवीरों पर संघी गुंडों ने उत्पात मचाया था. अभी नामवर जी द्वारा पंत साहित्य और सदानंद शाही द्वारा तुलसी सहित्य में कूडा़ नज़र आने पर उसी तरह लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं जिस तरह गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम को दिखाये जाने पर भगवाधारियों की होती हैं. हमारे देश का नरेंद्र मोदीकरण बढ़ रहा है और ऐसी जगहें लगातार कम होती जा रही हैं जहां बैठ कर कोई कलाकार, फ़िल्मकार, लेखक अपना काम कर सके. और अदालतें इस मोदीकरण में एक अहम हिस्सेदार बन कर सामने आयी हैं, चाहे वह हुसैन का मामला हो या नामवर सिंह का. देखने में ये सभी मामले अलग-अलग भले लगें पर सभी जुडे़ हुए हैं. इस मुद्दे पर हाशिया पर रविभूषण जी का <a href="http://hashiya.blogspot.com/2007/05/blog-post_20.html">लेख</a> आ चुका है. आगे पटना के कई लेखकों-पत्रकारों का नज़रिया हम सामने रखेंगे.  आज हम कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर <span style="font-weight:bold;">बीबीसी </span>के </span><span style="font-family:arial;font-size:85%;"><span style="font-weight:bold;">विनोद वर्मा </span></span><span style="font-style:italic;font-family:arial;font-size:85%;">का <a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2007/05/070522_edit_patrika.shtml">आलेख</a> दे रहे हैं, सभार- (इस टिप्पणी के साथ कि विनोद जी को  जिन दलों से बडी़ मासूम-सी उम्मीदें हैं, वे दल खुद ऐसी ही हरकतें करते रहे हैं, इसलिए हमें उनसे कोई उम्मीद नहीं है) यह <span style="font-weight:bold;">बीबीसी हिंदी पत्रिका </span>में प्रकाशित हुआ है. हमें इन मुद्दों पर बहस करनी ही होगी क्योंकि बकौल भाई अविनाश, &#8216;हम एक असहिष्णु समाज के हिस्से नहीं हो सकते.&#8217;<br /></span><span style="font-weight:bold;font-size:130%;">अभिव्यक्ति की एकतरफ़ा स्वतंत्रता</span><br /><span style="font-family:arial;font-size:85%;"><span style="font-size:100%;"><span style="color:rgb(204, 0, 0);font-size:85%;"><span style="font-weight:bold;">विनोद वर्मा</span></span><br /><span style="font-size:100%;">वड़ोदरा के सुप्रसिद्ध कला संस्थान में जो विवाद खड़ा हुआ है उसने कई पुराने सवालों को कुरेद कर एक बार फिर सतह पर ला दिया है. इस सवाल ने पहले की ही तरह बुद्धिजीवियों, लेखकों, बड़े समाचार पत्रों और अन्य प्रगतिशील ताक़तों को एकसाथ ला दिया है. और कहना न होगा कि कट्टरपंथी ताक़तें हमेशा की तरह एकजुट हैं और सारे विरोधों को अनदेखा, अनसुना करते हुए वही कर रही हैं जो वे कहना-करना चाहती हैं.<br />इस बार का विवाद देवी-देवताओं के कथित अश्लील चित्र बनाने को लेकर शुरु हुआ. इसके बाद भारतीय संस्कृति के तथाकथित रखवालों ने वही सब किया जो वे करते आए हैं. पेंटिंग बनाने वाले छात्र को गिरफ़्तार कर लिया गया और कला विभाग के डीन को निलंबित कर दिया गया.<br />संयोग भर नहीं है कि विवाद गुजरात में हुआ. नरेंद्र मोदी शासित गुजरात में ऐसे विवादों और उसकी ऐसी परिणति पर अब किसी को आश्चर्य भी नहीं होता. आश्चर्य तो यह होता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहाँ सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग अलापते नहीं थकतीं, वहाँ यह यह सब होता है.<br />भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना जैसे कुछ संगठनों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपना एकाधिकार मान लिया है. पिछले कुछ बरसों में उन्होंने बार-बार इसे साबित भी किया है.<br />उनकी मर्ज़ी के बिना न कोई चित्रकार ऐसे चित्र बना सकता है जो उनको न जँचे. न कोई ऐसा नाटक कर सकता है जो उनको न रुचे.<br />कोई फ़िल्मकार फ़िल्म नहीं बना सकता. बना भी ले तो उसे प्रदर्शित नहीं कर सकता. जैसा कि गुजरात में &#8216;परज़ानिया&#8217; फ़िल्म के साथ हुआ. एमएफ़ हुसैन जैसे देश के प्रतिष्ठित कलाकार के साथ पिछले कुछ सालों में जो कुछ घटा है वह भारत के सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक इतिहास में एक काला अध्याय है.<br />आश्चर्य नहीं होता जब मोदी सरकार के संरक्षण में यह सब होता है. उनका एजेंडा साफ़ है. आश्चर्य तब भी नहीं होता जब देश की समाजवादी पार्टियाँ चुप रहती हैं क्योंकि वे सत्ता पाने के लिए भाजपा के पहलू में ही बैठी हुई हैं. खजुराहो के मंदिर अपने समय के समाज की सहिष्णुता के प्रतीक हैं.आश्यर्च होता है जब वामपंथी दल और कांग्रेस पार्टी इस मामले में अपने प्रवक्ताओं के भरोसे काम चलाने की कोशिश करते हैं और ऐसी घटनाओं का विरोध केवल बयानों तक सीमित होकर रह जाता है.<br />आश्चर्य तब भी होता है जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का गृहमंत्रालय हुसैन की पेंटिंग्स को लेकर उन्हें नोटिस भेजता है और जवाबतलब करता है. कलाकारों को संयम की सलाह देना अपनी जगह सही है. दूसरों की भावनाओं को आहत न करने का मशविरा भी ठीक है. कलाकारों की स्वतंत्रता की भी सीमाएँ हैं.<br />लेकिन सलाह-मशविरे की जगह सबक सिखाने की इच्छा अपने आपमें घातक है. सवाल यह है कि क्या विरोध का वही एक रास्ता है जो विश्वहिंदू परिषद, शिवसेना और बजरंग दल के कार्यालयों में तय होता है?<br />यह ठीक है कि भारत में कलाकारों और साहित्यकारों को अपनी अपेक्षित जगह पाने के लिए अब संघर्ष करना पड़ता है और आख़िर में वे हाशिए पर ही नज़र आते हैं. लेकिन उन्हें धकेलकर हाशिए से भी बाहर कर देने की कोशिश अपने आपमें अश्लीलता है.<br />अच्छा ही है कि वात्सायन ने बीते ज़माने में कामसूत्र की रचना कर ली, चंदेलों ने एक हज़ार साल पहले खजुराहो के मंदिर बनवा दिए और राजा नरसिंहदेव ने तेरहवीं शताब्दी में कोणार्क में मिथुन मूर्तियाँ लगवाने की हिम्मत कर ली. अगर इन संगठनों को इतिहास में जाने की अनुमति हो तो वे वात्सायन का मुँह काला कर दें और चंदेलों को सरेआम फाँसी देकर खजुराहो के मंदिरों को तहस-नहस कर दें. वैसे जो कुछ ये कर रहे हैं वह भारत की सांस्कृतिक विरासत पर कालिख़ पोतने से कोई कम भी नहीं है.</span><br /></span></span></p>
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		<title>हम एक असहिष्णु समाज का हिस्सा नहीं हो सकते</title>
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		<pubDate>Tue, 22 May 2007 18:35:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>guzarish</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आओ बहसियाएं]]></category>

		<category><![CDATA[खबर पर नज़र]]></category>

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		<description><![CDATA[आजकल देश में आप कुछ भी कहिए तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और न जाने दंड विधान की कितनी धाराओं का उल्लंघन हो जाता है. अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब एक कलाकार द्वारा बनायी गयी कुछ तसवीरों पर संघी गुंडों ने उत्पात मचाया था. अभी नामवर जी द्वारा पंत साहित्य [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><a href="http://bp0.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlM7qhdZWFI/AAAAAAAAARY/TAgmydkbL_w/s1600-h/khajuraho.jpg"><img style="float:left;cursor:pointer;margin:0 10px 10px 0;" src="http://bp0.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlM7qhdZWFI/AAAAAAAAARY/TAgmydkbL_w/s320/khajuraho.jpg" alt="" border="0" /></a><span style="font-style:italic;font-family:arial;font-size:85%;">आजकल देश में आप कुछ भी कहिए तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और न जाने दंड विधान की कितनी धाराओं का उल्लंघन हो जाता है. अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब एक कलाकार द्वारा बनायी गयी कुछ तसवीरों पर संघी गुंडों ने उत्पात मचाया था. अभी नामवर जी द्वारा पंत साहित्य और सदानंद शाही द्वारा तुलसी सहित्य में कूडा़ नज़र आने पर उसी तरह लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं जिस तरह गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम को दिखाये जाने पर भगवाधारियों की होती हैं. हमारे देश का नरेंद्र मोदीकरण बढ़ रहा है और ऐसी जगहें लगातार कम होती जा रही हैं जहां बैठ कर कोई कलाकार, फ़िल्मकार, लेखक अपना काम कर सके. और अदालतें इस मोदीकरण में एक अहम हिस्सेदार बन कर सामने आयी हैं, चाहे वह हुसैन का मामला हो या नामवर सिंह का. देखने में ये सभी मामले अलग-अलग भले लगें पर सभी जुडे़ हुए हैं. इस मुद्दे पर हाशिया पर रविभूषण जी का <a href="http://hashiya.blogspot.com/2007/05/blog-post_20.html">लेख</a> आ चुका है. आगे पटना के कई लेखकों-पत्रकारों का नज़रिया हम सामने रखेंगे.  आज हम कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर <span style="font-weight:bold;">बीबीसी </span>के </span><span style="font-family:arial;font-size:85%;"><span style="font-weight:bold;">विनोद वर्मा </span></span><span style="font-style:italic;font-family:arial;font-size:85%;">का <a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2007/05/070522_edit_patrika.shtml">आलेख</a> दे रहे हैं, सभार- (इस टिप्पणी के साथ कि विनोद जी को  जिन दलों से बडी़ मासूम-सी उम्मीदें हैं, वे दल खुद ऐसी ही हरकतें करते रहे हैं, इसलिए हमें उनसे कोई उम्मीद नहीं है) यह <span style="font-weight:bold;">बीबीसी हिंदी पत्रिका </span>में प्रकाशित हुआ है. हमें इन मुद्दों पर बहस करनी ही होगी क्योंकि बकौल भाई अविनाश, &#8216;हम एक असहिष्णु समाज के हिस्से नहीं हो सकते.&#8217;<br /></span><span style="font-weight:bold;font-size:130%;">अभिव्यक्ति की एकतरफ़ा स्वतंत्रता</span><br /><span style="font-family:arial;font-size:85%;"><span style="font-size:100%;"><span style="color:rgb(204, 0, 0);font-size:85%;"><span style="font-weight:bold;">विनोद वर्मा</span></span><br /><span style="font-size:100%;">वड़ोदरा के सुप्रसिद्ध कला संस्थान में जो विवाद खड़ा हुआ है उसने कई पुराने सवालों को कुरेद कर एक बार फिर सतह पर ला दिया है. इस सवाल ने पहले की ही तरह बुद्धिजीवियों, लेखकों, बड़े समाचार पत्रों और अन्य प्रगतिशील ताक़तों को एकसाथ ला दिया है. और कहना न होगा कि कट्टरपंथी ताक़तें हमेशा की तरह एकजुट हैं और सारे विरोधों को अनदेखा, अनसुना करते हुए वही कर रही हैं जो वे कहना-करना चाहती हैं.<br />इस बार का विवाद देवी-देवताओं के कथित अश्लील चित्र बनाने को लेकर शुरु हुआ. इसके बाद भारतीय संस्कृति के तथाकथित रखवालों ने वही सब किया जो वे करते आए हैं. पेंटिंग बनाने वाले छात्र को गिरफ़्तार कर लिया गया और कला विभाग के डीन को निलंबित कर दिया गया.<br />संयोग भर नहीं है कि विवाद गुजरात में हुआ. नरेंद्र मोदी शासित गुजरात में ऐसे विवादों और उसकी ऐसी परिणति पर अब किसी को आश्चर्य भी नहीं होता. आश्चर्य तो यह होता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहाँ सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग अलापते नहीं थकतीं, वहाँ यह यह सब होता है.<br />भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना जैसे कुछ संगठनों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपना एकाधिकार मान लिया है. पिछले कुछ बरसों में उन्होंने बार-बार इसे साबित भी किया है.<br />उनकी मर्ज़ी के बिना न कोई चित्रकार ऐसे चित्र बना सकता है जो उनको न जँचे. न कोई ऐसा नाटक कर सकता है जो उनको न रुचे.<br />कोई फ़िल्मकार फ़िल्म नहीं बना सकता. बना भी ले तो उसे प्रदर्शित नहीं कर सकता. जैसा कि गुजरात में &#8216;परज़ानिया&#8217; फ़िल्म के साथ हुआ. एमएफ़ हुसैन जैसे देश के प्रतिष्ठित कलाकार के साथ पिछले कुछ सालों में जो कुछ घटा है वह भारत के सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक इतिहास में एक काला अध्याय है.<br />आश्चर्य नहीं होता जब मोदी सरकार के संरक्षण में यह सब होता है. उनका एजेंडा साफ़ है. आश्चर्य तब भी नहीं होता जब देश की समाजवादी पार्टियाँ चुप रहती हैं क्योंकि वे सत्ता पाने के लिए भाजपा के पहलू में ही बैठी हुई हैं. खजुराहो के मंदिर अपने समय के समाज की सहिष्णुता के प्रतीक हैं.आश्यर्च होता है जब वामपंथी दल और कांग्रेस पार्टी इस मामले में अपने प्रवक्ताओं के भरोसे काम चलाने की कोशिश करते हैं और ऐसी घटनाओं का विरोध केवल बयानों तक सीमित होकर रह जाता है.<br />आश्चर्य तब भी होता है जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का गृहमंत्रालय हुसैन की पेंटिंग्स को लेकर उन्हें नोटिस भेजता है और जवाबतलब करता है. कलाकारों को संयम की सलाह देना अपनी जगह सही है. दूसरों की भावनाओं को आहत न करने का मशविरा भी ठीक है. कलाकारों की स्वतंत्रता की भी सीमाएँ हैं.<br />लेकिन सलाह-मशविरे की जगह सबक सिखाने की इच्छा अपने आपमें घातक है. सवाल यह है कि क्या विरोध का वही एक रास्ता है जो विश्वहिंदू परिषद, शिवसेना और बजरंग दल के कार्यालयों में तय होता है?<br />यह ठीक है कि भारत में कलाकारों और साहित्यकारों को अपनी अपेक्षित जगह पाने के लिए अब संघर्ष करना पड़ता है और आख़िर में वे हाशिए पर ही नज़र आते हैं. लेकिन उन्हें धकेलकर हाशिए से भी बाहर कर देने की कोशिश अपने आपमें अश्लीलता है.<br />अच्छा ही है कि वात्सायन ने बीते ज़माने में कामसूत्र की रचना कर ली, चंदेलों ने एक हज़ार साल पहले खजुराहो के मंदिर बनवा दिए और राजा नरसिंहदेव ने तेरहवीं शताब्दी में कोणार्क में मिथुन मूर्तियाँ लगवाने की हिम्मत कर ली. अगर इन संगठनों को इतिहास में जाने की अनुमति हो तो वे वात्सायन का मुँह काला कर दें और चंदेलों को सरेआम फाँसी देकर खजुराहो के मंदिरों को तहस-नहस कर दें. वैसे जो कुछ ये कर रहे हैं वह भारत की सांस्कृतिक विरासत पर कालिख़ पोतने से कोई कम भी नहीं है.</span><br /></span></span></p>
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		<title>जनता के अधिकारों का क्या हो?</title>
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		<pubDate>Sun, 20 May 2007 20:57:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>guzarish</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[आओ बहसियाएं]]></category>

		<category><![CDATA[खबर पर नज़र]]></category>

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		<description><![CDATA[छत्तीसगढ़ लोक  स्वातंत्र्य संगठन के प्रादेशिक महासचिव व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा विनायक सेन को छत्तीसगढ पुलिस ने पिछले दिनों यह कह कर गिरफ़्तार कर लिया कि उनके संबंध नक्सलियों से हैं. इसकी निंदा देश भर के जाने-माने लोगों ने की है जिनमें अरुंधति राय, प्रभाष जोशी, मेधा पाटकर, निर्मला देशपांडे आदि शामिल हैं. हम [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><span style="font-family:arial;font-size:85%;">छत्तीसगढ़ लोक  स्वातंत्र्य संगठन के प्रादेशिक महासचिव व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा विनायक सेन को छत्तीसगढ पुलिस ने पिछले दिनों यह कह कर गिरफ़्तार कर लिया कि उनके संबंध नक्सलियों से हैं. इसकी निंदा देश भर के जाने-माने लोगों ने की है जिनमें अरुंधति राय, प्रभाष जोशी, मेधा पाटकर, निर्मला देशपांडे आदि शामिल हैं. हम इसे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के कार्य को दायरों में समेटने और सरकार के लिए एक आरामदेह स्थिति कायम करने के कदम के रूप में देखते हैं. इसी सिलसिले में प्रस्तुत है रायपुर से प्रकाशित <a href="http://www.dailydeshbandhu.com/default.asp?sourceid=&amp;smenu=91&amp;amp;amp;amp;twindow=Default&amp;mad=No&amp;sdetail=9499&amp;wpage=1&amp;skeyword=&amp;sidate=&amp;amp;amp;amp;ccat=&amp;ccatm=&amp;restate=&amp;restatus=&amp;amp;amp;amp;reoption=&amp;retype=&amp;repmin=&amp;repmax=&amp;rebed=&amp;rebath=&amp;subname=&amp;pform=&amp;sc=1984&amp;hn=dailydeshbandhu&amp;he=.com">देशबंधु</a> समाचार पत्र का संपादकीय, आभार के साथ. </span>
<div style="text-align:left;font-family:arial;"><span style="font-weight:bold;font-size:130%;" class="CH1">जनाधिकार : संवाद की जरूरत</span></div>
<p><span style="font-family:arial;">छत्तीसगढ़  सरकार फिलहाल इस खुशफहमी में रह सकती है कि डॉ. विनायक सेन को गिरफ्तार कर उसने कोई  बड़ा तीर मार लिया है। लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि इस कदम से सरकार की साख में  गिरावट ही आई है। नक्सल समस्या का समाधान खोजने में उसकी असफलता भी इस तरह से उजागर  हो रही है। जून 2005 याने आज से ठीक दो साल पहिले छत्तीसगढ़ सरकार ने सलवा जुडूम  अभियान प्रारंभ किया था। उसी शृंखला में उसने संदिग्ध ख्याति प्राप्त &#8216;सुपरकॉप&#8217;  केपीएस गिल को भी नक्सल विरोधी अभियान के लिए सलाहकार नियुक्त किया था। संघ परिवार  से ताल्लुक रखने वाले रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों की सेवाएं भी राज्य ने ली थीं।  लेकिन इन सबका क्या हुआ, यह सबके सामने है। सलवा जुडूम पूरी तरह विफल हो चुका है,  और केपीएस गिल ही नहीं, उनके हॉकी मित्र तथा पूर्व मुख्य सचिव आरपी बगई भी सरकार को  कोसते नहीं थक रहे हैं। अपने मनपसंद पत्रकारों को जांच कमेटी में शामिल करने के बाद  भी एर्राबोर हत्याकांड की जांच अब तक कहीं नहीं पहुंच सकी है। इस बीच एक ओर नक्सली  हिंसा की खबरें, दूसरी ओर फर्जी मुठभेड़ में निरीह व्यक्तियों को मार कर गड़ा देने की  वारदातें और तीसरी तरफ नागा और मिजो बटालियनों के अत्याचार के प्रकरण आए दिन प्रकाश  में आ रहे हैं। इसके बावजूद सरकार तथा पुलिस न तो गलतियां स्वीकार करने, न ही अपनी  कार्यनीति में बदलाव लाने के लिए तैयार दिख रहे हैं।</span> <span style="font-family:arial;">डॉ. विनायक सेन को गिरफ्तार  कर सरकार ने अपनी एकांगी सोच का ही परिचय दिया है। डॉ. सेन छत्तीसगढ़ लोक  स्वातंत्र्य संगठन के प्रादेशिक महासचिव व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। एक सुयोग्य  चिकित्सक के रूप में वे जनसामान्य को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिले, इस मिशन पर  लगातार काम करते रहे हैं, फिर चाहे सेवाग्राम हो या दल्लीराजहरा का शहीद अस्पताल या  बिलासपुर के गांवों में जनस्वास्थ्य अभियान। छत्तीसगढ़ में वे पिछले पच्चीस साल से  मानव अधिकारों के लिए निरंतर काम करते रहे हैं। उनके विचारों से अथवा कार्यप्रणाली  से किसी को असहमति हो सकती है, व्यवस्था व तंत्र को उनकी सक्रियता से तकलीफ भी  पहुंच सकती है, लेकिन इस वजह से वे अपराधी नहीं हो जाते। देश के एक प्रमुख व  प्रभावशाली मानव अधिकार संगठन के कार्यकर्ता होने के नाते वे नक्सलियों के संपर्क  में हैं, इस आधार पर उन्हें अपराधी मान लेना एक पूर्वाग्रह ही कहा जा एगा।</span> <span style="font-family:arial;">यह  याद रखने की जरूरत है कि देश इस वक्त अभूतपूर्व सामाजिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा  है। देश का कोई भी हिस्सा नहीं है जहां स्थापित व्यवस्था के विरुध्द जनता का गुस्सा  न उबल रहा हो। सरकारों की विश्वसनीयता आज अपने निम्नतर स्तर पर है। कितनी सारी  घटनाएं हाल में ही घटी हैं। ऐसे में संवेदी समाज की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा  बढ़ गई है। पीयूसीएल और पीयूडीआर ही नहीं अनेकानेक संगठन हैं जो सरकार और जनता के  बीच हुक्मरानों और जनआकांक्षाओं के बीच पुल बनाने का काम कर रहे हैं। अगर गैर  सरकारी स्तर पर संवाद कायम करने की, स्थितियों को समझने की, उनका विश्लेषण प्रस्तुत  करने की और अंतत: समाधान सुझाने की कोशिशें न हों तो सरकार और जनता अपने ही विचारों  तथा उनसे उपजे निर्णयों के कैदी होकर रह जाएंगे। इसका दुष्परिणाम एक गहरी और लंबी  अराजकता में जाकर हो सकता है। राजाओं और तानाशाहों के खिलाफ दुनिया में बहुत सी  लड़ाइयां हुई हैं, लेकिन निर्वाचित सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वे इतिहास से  सबक लें और जनता की आवाज सुनें। छत्तीसगढ़ सरकार को अपना कदम वापस लेते हुए डॉ. सेन  को अविलंब रिहा करने के साथ-साथ जनाधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया  कायम रहने को भी सुनिश्चित करना चाहिए।</p>
<p><span style="font-weight:bold;color:rgb(204, 0, 0);">साथ में यह भी</p>
<p></span><span style="color:rgb(0, 0, 0);"><span style="font-size:100%;"><span style="font-weight:bold;font-size:130%;">सामाजिक कार्यकर्ता राज्यपाल व मुख्यमंत्री से मिलेंगे<br /></span><br /></span></span></span><a href="http://bp3.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlC4eBdZWEI/AAAAAAAAARQ/8jZrP3eFYHU/s1600-h/bin.jpg"><img style="float:left;cursor:pointer;margin:0 10px 10px 0;" src="http://bp3.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RlC4eBdZWEI/AAAAAAAAARQ/8jZrP3eFYHU/s320/bin.jpg" alt="" border="0" /></a><span style="font-family:arial;"><span style="color:rgb(0, 0, 0);"><span style="font-size:100%;">विनायक सेन के समर्थन में, कविता श्रीवास्तव, हर्षमंदर, अजीत भट्टाचार्जी,<br />प्रभाष जोशी, अरुण खोटे शामिल होंगे।<br /><span style="font-weight:bold;">रायपुर (छत्तीसगढ़‌)। </span>पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी को लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मिलकर विरोध दर्ज कराने सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईएएस हर्षमंदर, पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव कविता श्रीवास्तव पहुंच चुके हैं। कल प्रख्यात पत्रकार अजीत भट्टाचार्जी और अरुण खोटे दलित मानवाधिकार के राष्ट्रीय सदस्य राजधानी पहुंच रहे हैं।<br />कल राज्यपाल से मिलने का समय संगठन को मिल गया है। बताया जाता है कि संगठन की ओर से कल 12 बजे का समय मुख्यमंत्री से मां