इस तरह खत्म होते हैं लोग

March 1, 2007 at 3:28 pm Leave a comment

इस तरह खत्म होते हैं लोग
रेयाज़-उल-ह
यह मेरे घर के सामने के पाकड़ पर
नयी सुलंगियों के आने के दिन थे
और घर के पिछवाड़े के पोखर में
मल्लाहों के उतरने के दिन
जब होली के आस-पास
दिन भर वे काले-कलूटे मल्लाह
पीठ पर पसीना चमकाते
हिंड़ोड़ कर रख देते सारा पोखर
और मार निकालते
टोकरी भर कमसिन मछलियां
…जो बांट दी जातीं
मुहल्ले भर में
मल्लाहों को मेहनताना देने के बाद

उस दिन पूरा मुहल्ला
भर जाता करुआइन गंध से

…और बच्चे
उतने बच्चे तो कभी न हुए मेरे मुहल्ले में
न होंगे कभी
एक साथ,
जिनके खेलों से
फ़ुदक उठता था पूरा मुहल्ला
सचमुच की गली में पिट्टो
आइस-पाइस, चोर-चोर
अंधा टोपी…और चिरैया मेरो
उन नन्हीं-सी लकीरों के निशान
अब भी होंगे कहीं-न-कहीं
किसी ईंट-खपरे के नीचे
…तब क्रिकेट का ज़ोर इतना न था
…और लड़कियां!
पूरे मुहल्ले में भरी पड़ी थीं लड़कियां
जैसे किताबों में भरे रहते हैं शब्द
निश्शब्द, मगर वाचाल
सब साथ मिल कर हंसतीं
तो पोखर में तरंगें उठने लगतीं
सब साथ मिल कर गातीं
तो लगता
आ गया मुहर्रम का महीना
या किसी की शादी का दिन

एक चांद भी था मेरे मुहल्ले की छत पर
जो आता हर तीसवें दिन
पूरा का पूरा
जैसे आते हैं साईं त्योहार के त्योहार
मुंडेरों पर आते हैं कौवे
जैसे आते थे मेहमान
जब-तब, हमेशा

खेत
घर के चौखटे तक बिछे हुए थे
और घर
अपनी छप्पर में खुंसे हुए
हंसुए, खुरपी और छाता के साथ
ताख पर होता शीशा, दंतुअन, सिंदूर की डिब्बी
दीया

था एक पागल भी
महम्मद अली
गाता था जोशीले गीत
और हगता था खुलेआम
लोगों के दरवाज़ों पर
हर घर से मांगता दो रोटियां
इस तरह मानों मांग रहा हो
अपनी खाली कोटरों के लिए
दो आंखें

होतीं और भी कई चीज़ें घरों में
जितनी होतीं घरों से बाहर
तब दीवारें घर की हद नहीं हुआ करती थीं

शाम को धुएं से घिरे छप्परों
और भूसा भरे नांदोंवाला मेरा गांव
जिसके कोने अंतरे से उठती थी हुक्के की गुड़-गुड़

और थे सारे के सारे लोग
मुकम्मल चेहरे के साथ

और एक दिन चिपका दी गयी फ़ेहरिश्त
लोगों की
और कुछ गुनाहों की
जो उन्होंने किये थे

…और फिर
खत्म था सबकुछ
जैसे कभी
रहा ही न हो
एक हरा पत्ता भी

जला दिये गये घर
मानों हों ठूंठ-निकम्मे
राख यूं उड़ती रही
मानों घर से निकाल दिया गया
कुत्ता हो कोई

लोग मारे गये बेआवाज़
जैसे मर जाते हैं घोंघे
बिना चीखे

अपनों ने मारा उन्हें
अपनों ने खत्म किया
और वे चीख नहीं पाये

अब हैं केवल पीले पत्ते
और सन्नाटा.

Entry filed under: Poem. Tags: .

Iraq: Troops out now! अरुण कमल की तीन कविताएँ

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Trackback this post  |  Subscribe to the comments via RSS Feed


Recent Posts

calander

March 2007
M T W T F S S
« Feb   Apr »
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031  

%d bloggers like this: