Archive for March 21, 2007

कामरेड तुम्हारी पक्षधरता क्या है?

पढ़ें : कामरेड तुम्हारी पक्षधरता क्या है? भाग-1

पढें : कामरेड तुम्हारी पक्षधरता क्या है? भाग-२

सुनील/रेयाज़-उल-हक

नंदीग्राम : बदरंग लाल की आभा
लोग कितनी आसानी से मार दिये जाते हैं!
हालांकि उनकी चीख तब भी निकलती है और दूर तक पहुंचती है. नंदीग्राम में गैर सरकारी स्रोत बताते हैं कि डेढ़ सौ से ज़्यादा लोग मारे गये. लाशें नदी में बहा दी गयीं. दो सौ लोग अब भी लापता हैं. महिलाऒं के साथ बलात्कार हुए हैं और पत्रकारों को अभी भी वहां नहीं जाने दिया जा रहा है.
तो क्या हम लोकतंत्र में रह रहे हैं? 1947 के बाद संभवत: यह अकेली बडी़ घटना है, जिसमें एक पूरे गांवं को घेर कर उसे इस तरह कुचल दिया गया हो. और यह सब कौन कर रहा है? वही सीपीएम सरकार जो गरीबों-किसानों की पक्षधरता के दावे करती नहीं थकती. आप उसके नेताओं के चेहरों को देखिए-वे फक पडे़ हुए हैं, मगर कह रहे हैं-हत्याएं सही थीं.
याद आ रहा है वह अमेरिकी अधिकारी, जिसने कुछ दिन पहले बीबीसी पर सीपीएम को विकास की ज़रूरत और अमेरिकी हितों को सबसे अच्छी तरह समझनेवाली पार्टी कहा था. इससे समझा जा सकता है कि सीपीएम सरकार के हित किसके साथ गुत्थमगुत्था हैं, और सीपीएम विकास की जो अवधारणा पेश कर रही है वह कहां बनी है. मगर सिंगुर और नंदीग्राम के लोगों को समझने के लिए किसी अमेरिकी अधिकारी के बयान की ज़रूरत नहीं है. वे दरअसल उस आतंक को भोग रहे हैं, जो यह सरकार उन पर कर कर रही है. नंदीग्राम के लोग इंडोनेशियाई कंपनी सालिम को नहीं आने देने की कीमत चुका रहे हैं. यह वही सालिम ग्रुप है, जो इंडोनेशिया में 1965 कम्युनिस्टों के कत्लेआम के बाद अमेरिकी संरक्षण में फला-फूला. इसे भ्रष्ट सुहार्तो शासन ने विकसित होने में मदद की. अब सुदूर भारत में इसे एक ज़बरदस्त मददगार मिल गया है-बुद्धदेव भट्टाचार्य.
इधर बंगाल में कथित विकास की प्रक्रिया पर ध्यान दें, तो पायेंगे कि बडी़ सफ़ाई से आम किसानों, भूमिहीनों और मज़दूरों की कीमत पर शहरों का विस्तार किया ज रहा है. शापिंग माल और मल्टीप्लेक्स बनाये जा रहे हैं. कामरेड बुद्धा के विचार में यही विकास है, मगर वे जिस तरह के विकास की बात कर रहे हैं, वह लोगों को झांसा देने के लिए है. उनका कहना है कि वे राज्य को क्रिषि से उद्योग की तरफ़ ले जा रहे हैं. उनकी राय में विकास की यही प्रक्रिया है. मगर विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है. इसके लिए पहले क्रिषि को काफ़ी विकसित करना होता है, जिससे जमा अतिरिक्त संसाधन उद्योगों के विकास में लगाया जाता है. इससे आम आदमी की क्रयशक्ति भी बढ़ती है. इस प्रक्रिया में क्रिषि का अतिरिक्त श्रम उद्योगों के काम आता है. मगर भारत में क्रिषि का वैसा विकास नहीं हुआ है. इसके उलट क्रिषि संकट गहराता जा रहा है. इसलिए आज बेलगाम औद्योगिक विकास का सीधा मतलब किसानों को उजाड़ना है. नंदीग्राम के किसान इस उजड़ने से बचने के लिए संधर्ष कर रहे हैं. नंदीग्राम में हुई इस तरह की ज़ुल्म-ज़बर्दस्ती सिर्फ़ इसी का प्रमाण है कि यह सरकार किस हद तक अपने उद्देश्यों से दूर आ चुकी है और अपने लोगों के कितना खिलाफ़ जा सकती है. महाश्वेता देवी कहती हैं-‘यही सीपीएम है.’ मतलब यही सीपीएम का असली रंग है. देश के एक बड़े तबके में अब यह सवाल उठने लगा है कि भारत में संसदीय वामपंथ कहां आ पहुंचा है.
इस नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. गुरुवार को कोलकाता की जादवपुर युनिवर्सिटी में गुस्साये छात्रों ने कैंपस से खदेड़ दिया. देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. नेट पर युवकों की एक बडी़ संख्या संसदीय वामपंथ के इस चेहरे पर अपने गुस्से का इजहार कर रही है.
आखिर यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि पुलिस के पांच हज़ार जवान किसलिए गांव में भेजे गये थे? हम कैसे समाज में रह रहे हैं? क्या हिंसा करना सत्ता का एकाधिकार है और जनता को, (क्या हम कह सकते हैं, निरीह जनता को?) हंसिये लहराने का भी अधिकार नहीं है? क्या वह रो भी नहीं सकती?
नंदीग्राम ने पूरे देश को दो संदेश दिये हैं-एक तो यह कि भारतीय संसदीय पार्टियां अमेरिकी साम्राज्यवाद के हितों की रक्षा में किस हद तक जा सकती हैं. दूसरा संदेश यह है कि ऐसी बेलगाम बर्बरता के खिलाफ़ जनता को किस तरह उठ खड़े होना चाहिए.
बांग्ला रंगकर्मी अर्पिता घोष का मानना है कि यह संघर्ष प्रकाश की रेखा है. वे कहती हैं-अगर हम इसके साथ नहीं हुए तो हम बच नहीं पायेंगे.

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March 21, 2007 at 8:56 pm Leave a comment

एक कवि जिहादी की अंतिम दिनलिपि


पढें पहली किस्त.
दूसरी किस्त
केन सारो वीवा
मूवमेंट फॉर द सर्वाइवल ऑफ़ द ओगोनी पीपुल (मोसप) के नेतृत्‍व में ओगोनी ने चुनाव का बहिष्कार किया था. लापरवाही से कागज़ पर कुछ लिखने से पहले मैंने अपने वकील से मिलने देने के लिए कहा. यह आग्रह, जैसी मुझे उम्मीद थी, अस्वीकर कर दिया गया. यह अच्छी तरह जानते हुए कि यह कभी इस्तेमाल नहीं होगा, बगैर बतंगड़ के मैंने कलम संभाला और वह आवश्यक बयान लिख दिया. मैंने घुमा कर दस्तखत कर दिया.
एक खूबसूरत जवान औरत, जो एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थी, मैंने जो बयान दिया था, जल्दी ही उसे देखने आयी. उसने उसे पढा़, लगा कि वह संतुष्ट नहीं हुई है और फिर बगलवाले अपने परदेदार दफ़्तर में, उसने मुझे लकडी़ की एक जर्जर कुरसी पेश की. कितनी भली है, मैंने सोचा. बयान लेकर वह गायब हो गयी. मुझे पाइप के साथ रहने दिया. मैंने उसे झाडा़, जलाया और गहरा कश खींचा. मेरा मन पंख के सहारे उड़नेवाले पंछी की तरह उड़ने लगा.
युवा महिला कमरे में वापस आयी और उसने मुझे अपने साथ मुख्य इमारत में चलने के लिए कहा. जैसे ही मैंने खुले अहाते को पार किया, मैंने एक फुसफुसाहट सुनी कि मुझे कारावास के लिए लागोस ले जाया जायेगा. यह ऐसी कोई बात नहीं थी, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी. संभाव्य घटना के लिए मैं अपने को मजबूत बनाने लगा. उसी समय मुझे ख्याल आया कि दिन भर मैंने खाना नहीं खाया.
हम मुख्य इमारत की पहली मंज़िल की अंधेरी, गंदली सीढ़ियां चढ़ कर आये. लटकते हुए सूती कपड़े पहने हुए एक वरिष्ठ अधिकारी के सामने मुझे ले जाया गया. अपने काम के टेबुल से काफ़ी दूर उन्होंने मुझे एक सीट दी. मैं वहां बैठा रहा, जबकि वहां काफ़ी दूसरे पुलिस अधिकारियों की आवाजाही बनी रही. साज़िशाना ढंग से उन्होंने वरिष्ठ अधिकारी के कान में फुसफुसाया और उन्होंने भी फुसफुसा कर आदेश दिया. प्रसन्न होकर मैं उन्हें देखता रहा. वे लोग क्या योजना बना रहे हैं, उसका अगर मुझे पता होता तो वह मुझे मज़ाकिया लगता इसमें मुझे शक है.
मानों अनंतकाल तक इंतज़ार के बाद, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने मुझे बताया कि चुनाव के दिन ओगोनी में उपद्रव हुआ है. मैंने कहा, यह मेरे लिए खबर है, क्योंकि उस दिन मैं वहां से 1000 मील दूर रहा और ओगोनी के आसपास कहीं नहीं था. मैंने उन्हें उस सूचना के लिए धन्यवाद दिया. उसके बाद जब मैं पचा रहा था तो लंबी चुप्पी बनी रही. मैंने कमरे के चारों ओर देखा. एक बड़ा-सा लिखने को टेबुल पूरा गद्देदार कुरसी का परिपूरक तथा दो-तीन फ़ाइल रखनेवाली आल्मारियों लायक ही वह बड़ा था. डेस्क पर बैठा आदमी, पेंसिल की तरह छरहरा और टेढे़मेढे़ नाक-नक़्शवाला था. यह काफ़ी भद्दा दिख रहा था और उसका आचरण काफ़ी अशोभनीय था. समय काटने के लिए मैं उससे बातचीत करने की कोशिश करने लगा.
‘मैं समझता हूं आप मुझे लागोस भेज रहे हैं.’
‘आपको किसने कहा?’
‘एक चिड़िया ने.’
‘क्या?’
‘हवा ने.’
‘मैं आपको लागोस नहीं भेज रहा हूं.’
झूठा कहीं का. उसके झूठ बोले होठों पर मैं घूंसा मारना चाहता था. मैंने अपनी पाइप निकाली, एक तीली जलायी और खींचने लगा. हवा में धुआं नाचने लगा और ऊपर छत की ओर बढ़ा.
‘दिन भर मैंने कुछ भी नहीं खाया’- मैंने कहा.
उसने अपने कपड़े के भीतर से गरी का एक टुकडा़ निकाला, उसे दो टुकडा़ किया और मुझे आधा दिया. मैंने उसे अस्वीकार कर किया. उसने अपने आधे में दांत गड़ाया और चबाता रहा.
पढें अगली बार अगली किस्त.

March 21, 2007 at 7:49 pm Leave a comment


calander

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