दलित अस्मिता और एजेण्डा ‘जाति विनाश’ का

April 8, 2007 at 7:37 pm Leave a comment


सुवीरा जायसवाल
सुवीरा जायसवाल वरिष्ठ इतिहासकार हैं. उनका यह महत्वपूर्ण लेख तद्भव के जनवरी, 2007 अंक से साभार.

हिन्दू समाज में ÷ अछूत’ मानी जाने वाली जातियों के लिए सम्भवतः सबसे पहले उन्नीसवी सदी में जोतिराव फुले ने ÷ दलित’ शब्द का प्रयोग किया। उन्हें जाति विरोधी आन्दोलनों का अग्रदूत कहा जा सकता है। 1840 में उन्होंने मुम्बई में खास तौर पर ÷ अछूतों’ के लिए एक स्कूल खोला और 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ÷ शूद्र’ और ÷ अतिशूद्र’ कही जाने वाली जातियों को अपने मानवाधिकारों के प्रति जागरूक बनाना और उन्हें ब्राह्मण धर्मशास्त्राों में प्रतिपादित विचारधारा के प्रभाव से मुक्त कराना था। महाराष्ट्र सहित दक्षिण भारत के प्रदेशों में विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों वश, जिनका विवेचन हमने अन्यत्र किया है, पूर्व मध्य युग से ही वर्ण जाति व्यवस्था का स्वरूप उत्तर भारत से कुछ भिन्न था क्योंकि वहां ÷ क्षत्रिाय’ अथवा ÷ वैश्य’ के रूप में अपनी पहचान सर्वसम्मत रूप से स्थापित करने वाले जाति समुदायों का अभाव था और मोटे तौर पर वर्णव्यवस्थित समाज की तीन कोटियां थीं, शीर्षस्थ ब्राह्मण जातियां, उनके नीचे ÷ शूद्र’ कहीं जानी वाली फिर भी अपेक्षाकृत सम्पन्न और शुद्ध मानी जाने वाली जातियां, जिनमें एक ओर बहुसंख्य कृषक मराठा जाति थी जिसके हाथ में अधिकांश जमीन थी और जो सत्राहवीं अठारहवीं शताब्दियों में राजसत्ता से गौरवान्वित रही थी, तो दूसरे छोर पर माली, गावली, ढांगर कुम्हार आदि पिछड़ी जातियां थीं। इनके नीचे ÷ अतिशूद्रों’ की श्रेणियां थीं जिनमें महार प्रमुख थे किन्तु इनके अतिरिक्त चम्मार ( चमार) मांग आदि भी थे जिनकी संख्या कुछ कम न थी। इस श्रेणीबद्ध समाज में जातियों का पदानुक्रम उनके स्वभावात्मक रूप से शुचित अथवा अशुचित होने के ब्राह्मणीय सिद्धान्त पर आधारित था, जो अवर जातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न को औचित्य प्रदान करता था। उत्पीड़न के तर्क और ब्राह्मणीय भावबोध की जकड़ में उत्पीड़क और उत्पीड़ित सभी जातियां थीं। परन्तु जहां ऊंची जातियां दुनियावी मामलों में आपस में प्रतिद्वन्द्विता रखते हुए भी नीची जातियों के निदोहन के मामले में अपने विशेषाधिकारों के लिए एकजुट हो जाती थीं, निचले तबके की जातियों की आत्मचेतना बंटी हुई थी और शिक्षा के अभाव में वे आसानी से सभी प्रकार के शोषण का शिकार हो रही थीं। ब्रिटिश शासन में उनके शिक्षित होने पर कोई सैद्धान्तिक बाधा न होने पर भी वस्तुस्थिति यह थी कि 1857 में धारवाड़ ( कर्नाटक) में एक महार लड़के ने सरकारी स्कूल में दाखिले के लिए आवेदन किया परन्तु ऊंची जाति के लोगों के प्रबल विरोध के कारण सरकार से उसे अनुमति नहीं मिली।2 ऐसी परिस्थितियों में फुले ने जाति व्यवस्था का जबर्दस्त विरोध किया और उसे ÷ गुलामगीरी’ कहा। इसी नाम से उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने बतलाया कि किस प्रकार धोखाधड़ी और बल का प्रयोग कर ब्राह्मणों ने इस व्यवस्था को भारत के मूल निवासियों पर लागू कर दिया था।

उन्नीसवी सदी में प्राच्पविदों में यह परिकल्पना लगभग सर्वसम्मत थी कि आयोर्ं की एक समांगी नस्ल यूरोपीय स्टेपी प्रदेश से अथवा काकेशस से पश्चिमी एशिया होते हुए भारत आयी। उसने यहां के मूल निवासियों को , जिन्हें ऋग्वेद में दास एवं दस्यु कहा गया है, हराया और वर्ण व्यवस्था में उन्हें ÷ शूद्र’ का दर्जा दिया। इस धारणा के मूल में वह महत्वपूर्ण भाषा वैज्ञानिक अनुसन्धान था जिससे यह प्रमाणित हो गया था कि संस्कृत, लैटिन और ग्रीक भाषाओं के क्रिया मूलों, व्याकरण एवं शब्द भण्डार में इतनी समानता है कि वह आकस्मिक नहीं हो सकती। इन भाषाओं के बोलने वालों के पूर्वज एक ही कौम के रहे होंगे। भाषा की एकता को नस्ल की एकता भी मान लिया गया। फ्रीडिश मैक्समूलर (1823-1900) ने राजा राम मोहन राय की इंग्लैण्ड की यात्राा का उल्लेख करते हुए बड़ी भावुकता से कहा –

÷÷ अपने आर्य भाइयों से विचार विमर्श करने के लिए पूर्व से पश्चिम आने वालों में राम मोहन राय सर्वप्रथम थे… जिससे हमें एक बार फिर उस प्राचीन भाईचारे का एक अहसास होता है जो सम्पूर्ण आर्य नस्ल को एक सूत्रा में बांधता है, प्रेरणा देता है…।”3

यद्यपि बाद में मैक्समूलर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आर्य नस्ल की अवधारणा बिल्कुल गलत है, ÷ आर्य’ भाषा का सूचक है किसी विशिष्ट प्रजाति का नहीं, परन्तु तत्कालीन वातावरण में पश्चिमी भारतविद् चाहे वे मिशनरी रहे हों या औपनिवेशिक शासक, अन्वेषक या प्राच्यविद्याविद्, सभी मनीषी भाषाओं की सभ्यता को नस्ल की सभ्यता का लक्षण मान कर चल रहे थे और हिन्दू समाज को आर्य और अनार्य नस्लों के संघर्ष और सम्मिश्रण के प्रसंग से ही परिभाषित कर रहे थे। किस प्रकार विभिन्न उद्देश्यों से प्रेरित अध्ययन एक ही निष्कर्ष पर पहुंच रहे थे, इसका काफी विवेचन हो चुका है, परन्तु इस सिद्धान्त का भारतीय मनीषियों पर भी काफी प्रभाव पड़ा था।

1877 में कलकत्ता में आयोजित एक सभा में ब्रह्मसमाजी नेता केशव चन्द्र सेन (1834-84) ने भारत में अंग्रेजों के आगमन को आर्य नस्ल के दो भिन्न परिवारों के वंशजों का, बिछुड़े हुए बन्धुओं का, पुनर्मिलन बताया।4 बालगंगाधर तिलक (1856-1920) ब्रिटिश शासन के कटु आलोचक थे और हिन्दू धार्मिक परम्पराओं के कट्टे समर्थक। फिर भी उनका विचार था कि गौरवर्णी आर्य आर्कटिक प्रदेश से भारत आये और ब्राह्मण तथा ऊंची जाति के हिन्दू उन्हीं की सन्तान हैं। यद्यपि उन्होंने गणेशोत्सव द्वारा महाराष्ट्र में सभी हिन्दुओं को एकजुट करने का प्रयत्न किया, वे वेद और ब्राह्मण को सर्वोपरि मानते थे और परम्परानुसार जाति प्रथा ही नहीं बल्कि बाल विवाह तक का समर्थन करने के लिए उद्यत थे।

इस प्रकार चाहे बंगाल के ब्राह्मण नेता केशव चन्द्र सेन हों या महाराष्ट्र के बालगंगाधर तिलक – शुरुआती दौर में ऊंची जाति के मनीषियों ने आयोर्ं के नस्लवादी सिद्धान्त को गर्व से अपनाया। जोतिबा फुले ने इसी सिद्धान्त को उलट कर दलितों के अधिकारों की लड़ाई के लिए महत्वपूर्ण औजार बना दिया। 1856 में बिशप काल्डवेल ने गहन अनुसन्धान कर द्रविड़भाषाशार पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की थी जिसमें उन्होंने यह सफलतापूर्वक सिद्ध कर दिया कि भाषाविज्ञान की दृष्टि से दक्षिण भारत की भाषाएं संस्कृत से नहीं बल्कि एक अन्य पुरातन द्रविड़ भाषा से निकली हैं। तत्कालीन प्रचलित अवधारणा के अनुसार उन्होंने भी भाषा को नस्ल का सूचक माना और कहा कि दक्षिण भारत के ब्राह्मण उत्तर से आये हुए आप्रवासी हैं और यद्यपि ब्राह्मण धर्मशास्त्राकारों ने द्रविड़ जाति के लोगों को ÷ पतित क्षत्रिाय’ माना है, वस्तुतः आयोर्ं के अलावा और कोई द्विज हो ही नहीं सकता था, इस लिए अधिसंख्य द्रविड़ों को ब्राह्मणों ने शूद्र का दर्जा ही दिया। फुले ने आर्य द्रविड़ की द्वन्द्वात्मक अवधारणा को आधार बनाया और कहा कि शूद्र और अतिशूद्र कही जाने वाली जातियां दक्षिण भारत के मूल निवासियों की सन्तान हैं। ब्राह्मणों ने बाहर से आकर हिंसा, छलकपट आदि सभी हथकण्डों का प्रयोग कर मूल निवासियों की जमीन हड़प ली। इसलिए ब्राह्मणों का भूमि पर कोई नैतिक, वैध, अधिकार नहीं है। जाति व्यवस्था भी सामाजिक स्तरीकरण की ब्राह्मणों की चाल है। दलितों को ब्राह्मणों के प्रभाव से अपने आप को मुक्त करना होगा और सामाजिक परिवर्तन के लिए दलितों का शिक्षित होना बहुत जरूरी है।

दलित अस्मिता के उभरने में उनके मूल निवासी होने का दावा बहुत प्रभावशाली रहा। दक्षिण भारत में अनेक दलित जातियों ने अपनी पहचान आदि द्रविड़ , आदि कर्नाटक और आदि आन्ध्र के रूप में अभिज्ञापित करने की कोशिश की और 1931 की सेन्सस रिपोर्टों में कुछ की गणना भी इन्हीं नामों से हुई। उत्तर भारत में बीसवीं शती के पूर्वार्ध में पंजाब में आद्धर्म का आन्दोलन चला जो न केवल तथाकथित अछूतों को भारत का मूल निवासी मानता था बल्कि इस बात का प्रचार कर रहा था कि उनका धर्म हिन्दू धर्म से अलग है और वह अपने मूल और शुद्ध रूप में सन्त रविदास के उपदेशों में पुनः प्रसारित हुआ है। आर्यपूर्व मूल निवासी होने की धारणा आज भी अनेक दलित लेखकों और विचारकों में विद्यमान है, परन्तु दलितों के सर्वप्रमुख नेता बाबा साहब आम्बेडकर ने इसे पूरी तरह खारिज कर दियाथा।

डा. भीमराव आम्बेडकर केवल दलितों के सर्वप्रमुख राजनेता ही नहीं , मौलिक चिन्तक तथा असाधारण विद्वान थे जिन्होंने हिन्दू समाज की व्याधियों और दलितों की समस्या पर बहुत कुछ लिखा, जिनमें तीन कृतियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 1935 में लाहौर के जातपात तोड़क मण्डल ने उन्हें अपने वार्षिक सम्मेलन का अध्यक्ष चुना और भाषण देने के लिए निमन्त्रिात किया। परन्तु भाषण की प्रति पढ़ने के बाद मण्डल ने कई अंशों पर आपत्ति जतायी और आम्बेडकर से उन अंशों को निकाल देने का अनुरोध किया। आम्बेडकर के मना करने पर अधिवेशन ही रद्द कर दिया गया। भाषण की आलोचना महात्मा गांधी ने भी हरिजन में की थी। अतः 1936 में आम्बेडकर ने स्वयं ही भाषण को महात्मा गांधी को दिये गये प्रत्युत्तर के साथ Annihilation of Caste with a Reply to Mahatma Gandhi के नाम से प्रकाशित कर दिया। मुल्कराज आनन्द के शब्दों में यह छोटी सी पुस्तिका किसी भी निरपेक्ष पाठक को ÷ अस्पृश्यों की गीता’ प्रतीत होगी। मधुलिमए ने इसकी तुलना कार्ल मार्क्स के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो से कीहै।

इसके अतिरिक्त आम्बेडकर की Who were the Sudras 1946 में और The Untouchable 1948 में प्रकाशित हुईं। इन कृतियों में लेखक के गहन अध्ययन के साथ साथ गहरी संवेदना, दलितों की पीड़ा और हिन्दू धर्म में उनके उत्पीड़न के प्रति आक्रोश भी स्पष्टतः मुखरित हुए हैं। यद्यपि प्राचीन काल के आधिकारिक सुप्रतिष्ठित इतिहास लेखन में आम्बेडकर की ÷ शूद्र’ और अछूत जातियों की उत्पत्ति विषयक स्थापनाएं आसानी से खारिज कर दी गयी हैं,4 उन्होंने जाति व्यवस्था के अनेक ऐसे पक्षों की ओर ध्यान आकर्षित किया जो आज भी अर्थपूर्ण और प्रासंगिक हैं।

आम्बेडकर ने जातियों के उद्गम की नस्लवादी व्याख्या का जम कर खण्डन किया। सर हर्बट रिजले ने बीसवीं शती के आरम्भ में अपने मानवमितिकीय (anthrometric) परीक्षणों को आधार बना कर यह मत प्रतिपादित किया था कि आर्य विजेता अपनी नस्ल की शुद्धता कायम रखना चाहते थे और पराजित आदिवासी अनायोर्ं को हेय दृष्टि से देखते थे। फिर भी सम्मिश्रण एकदम रोका नहीं जा सका और जिस समुदाय में जितना अधिक अनार्य रक्त का अनुपात रहा उसे समाज में उतना ही नीचा दर्जा मिला। इस मत के अनुसार शीर्षस्थ ब्राहमण अपने रक्त की शुद्धता सुरक्षित रख सके थे और निचली जातियां मुख्य रूप से अनार्य आदिवासियों की सन्तान थीं। यह मत काफी प्रभावशाली रहा है। परन्तु आम्बेडकर ने प्रोफेसर जी.एस.धुर्ऐ की पुस्तक ÷ कास्ट एण्ड रेस इन इण्डिया’ को उद्धृत करते हुए दिखलाया5 कि कई प्रदेशों में मानवमितिकीय अभिसूचकों के अनुसार ब्राह्मणों में और वहां की कुछ अछूत मानी जाने वाली जातियों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। वस्तुतः भारत में आयी प्रजातियों का रक्त सम्मिश्रण जाति प्रथा के उदय से बहुत पहले प्राक्‌ऐतिहासिक काल में ही हो चुका था। आम्बेडकर ने कई स्थानों पर जोर देकर कहा है कि आर्य कोई नस्ल न थी बल्कि वह ऐसा जनसमूह था जिसमें सांस्कृतिक एकता थी और आर्य संस्कृति के हितों की रक्षा के तार ही उन्हें एक दूसरे से जोड़े रहते थे।

परन्तु आम्बेडकर की भारतीय इतिहास सम्बन्धी अवधारणाओं में काफी अन्तर्विरोध भी देखा जा सकता है। एक ओर तो उन्होंने ऋग्वेद में वर्णित आयोर्ं का दासों और दस्युओं से संघर्ष , दो नस्लों का टकराव नहीं बल्कि दो पृथक धमोर्ं के अनुयाइयों का टकराव बतलाया और कहा कि ऋग्वेद में आर्य शब्द का नस्ल के अर्थ में कहीं प्रयोग नहीं हुआ है। दूसरी ओर उसी पुस्तक में उन्होंने ऋग्वेदिक आयोर्ं और शूद्रों को दो भिन्न नस्लों के आर्य माना और शूद्रों का सम्बन्ध अथर्ववेद से जोड़ा। ऋग्वेद में उल्लिखित दशराज युद्ध के नायक सुदास को खींचतान कर शूद्र ठहराने की कोशिश की जबकि ऋग्वेद में प्रक्षिप्त पुरुष सूक्त को छोड़ शूद्रों का कोई उल्लेख नहीं है। शूद्रों की उत्पत्ति पर लिखी गयी पुस्तक का मुख्य ध्येय उनका प्राचीन गौरवमय अतीत और ब्राह्मणों के षड़यन्त्रा से उनका पतन सिद्ध करना ही प्रतीत होता है। यद्यपि वे यह भी कहते हैं कि प्राचीन काल की हिन्द आर्य नस्ल की शूद्र जाति से आज की शूद्र जातियों का कोई सम्बन्ध नहीं है। शूद्र नाम की एक आर्य जनजाति, जिसका उल्लेख यूनानी इतिहासकारों के विवरण तथा पतंजलि के महाभाष्य में हुआ है, पहले क्षत्रिाय वर्ण की थी। परन्तु उनका ब्राह्मणों से संघर्ष हुआ, फलस्वरूप ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन करना बन्द कर दिया और उन्हें वेदों के पठन पाठन से वंचित कर दिया। शूद्रों पर अनेक कठोर प्रतिबन्ध थोप दिये गये और उनकी अवस्था इतनी हीन हो गयी कि ÷ शूद्र’ निम्न वर्ग का पर्याय बन गया। ब्राह्मण शास्त्राकारों ने जो सामाजिक प्रतिबन्ध द्वेष के कारण मूल शूद्रों पर लगाये थे वे बाद में उन सभी समुदायों पर लागू कर दिये गये जो सांस्कृतिक रूप से पिछड़े हुए थे, निम्न वर्ग के थे और जिनकी समाज में कोई हैसियत न थी।

डा. आम्बेडकर ने पुस्तक के प्राक्कथन में लिखा है कि यद्यपि वे शूद्र जनों के गैर ब्राह्मण राजनीतिक आन्दोलन से जुड़े हुए हैं , फिर भी शूद्रों के बारे में लिखते समय उन्होंने वस्तुपरक ऐतिहासिक दृष्टि ही अपनायी है। परन्तु इस कृति के मूल्यांकन में विषय के चयन से लेकर उसके विस्तार तक इसे तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक वातावरण तथा डा. अम्बेडकर के जीवन लक्ष्य से अलग कर देखना मुश्किल है। वे ब्राह्मणीय सामाजिक संरचना में सभी शोषित वगोर्ं को एकजुट कर जाति प्रथा को समूल उखाड़ फेंकना चाहते थे। यह भी रोचक है कि आम्बेडकर ने अतिशूद्र कही जाने वाली ÷ अछूत’ जातियों की उत्पत्ति को शूद्र वर्ण से नहीं जोड़ा।

अछूतों की उत्पत्ति के बारे में डा. आम्बेडकर का मत और भी जटिल है। पहले तो उन्होंने इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की कि अछूतों की बस्तियां गांव के बाहर क्यों होती हैं और शास्त्राों में उन्हें ÷ अन्त्यवासिन्‌’ ( अन्त्यावसायिन्‌) क्यों कहा गया है। इसका समाधान उन्होंने प्रागैतिहासिक काल के कबायली जीवन में ढूंढा। उनके अनुसार आदिम युग में पशुपालक घुमन्तू कबीले कृषि उत्पादक कबीलों की बस्तियों पर लूटपाट के लिए अक्सर आक्रमण कर दिया करते थे। कबीलों में बराबर युद्ध होते रहते थे। हारे हुए कबीलों की बची हुई खण्डित टुकड़ियां, यानी खण्डित जन (broken men) भोजन और आश्रय के लिए दूसरे गांवों की सीमा पर जाकर बस गये। गांव वालों ने उन्हें घुमन्तू कबीलों के आक्रमण से अपनी सुरक्षा के लिए गांव का पहरेदार नियुक्त कर दिया। बाद में इन्हीें खण्डित जन समुदायों के वंशजों ने बौद्ध धर्म अपना लिया। गुप्त युग में जब ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान हुआ तो ब्राहमणों ने द्वेष वश बौद्ध धर्म मानने वाली जातियों को ÷ अस्पृश्य’ घोषित कर दिया। इसका एक कारण यह भी था कि ब्राह्मणों ने तो बौद्धों से प्रतिस्पर्धा में अहिंसा की लोकप्रियता देख न केवल यज्ञों में पशुबलि त्याग दी बल्कि मांस खाना भी छोड़ दिया और एक कदम आगे बढ़ कर गाय की पूजा शुरू कर दी तथा पूरी तरह शाकाहारी बन गये। उनका अनुसरण कर अन्य हिन्दुओं ने भी मांसाहार छोड़ दिया और गाय को पूज्य माना। परन्तु बौद्ध धर्म में स्वाभाविक कारणों से मरे हुए पशु का मांस खाने का निषेध नहीं था। अतः बौद्ध मरे हुए गाय बैल का मांस खाते रहे और इसलिए उन्हें घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा। वे अस्पृश्य बन गये।

कहा जा सकता है कि ÷ अन्त्यवासिन्‌’ और खण्डित जन की व्याख्या में डा. आम्बेडकर ने महार जाति के अनुभवों का सामान्यीकरण कर दिया है। महाराष्ट्र के हर गांव की सीमा पर महारवाड़ा होता था और महारों का परम्परागत काम था गांव के पहरेदार और सन्देशवाहक का काम करना, मरी हुई ढोर को ले जाना, जमीन सम्बन्धी विवादों को निबटाने में गांव के पाटिल की मदद करना आदि। बदले में उन्हें हर किसान से फसल के समय उपज का कुछ भाग और अपने भरण पोषण के लिए छोटी सी जमीन जिसे ÷ वतन, कहा जाता था’, मिलता था। आम्बेडकर लिखते हैं कि सम्भवतः इस तरह की प्रथा देश के अन्य भागों में भी रही होगी, परन्तु ऐसे खण्डित जन समुदाय का अस्पृश्य बना दिया जाना ब्राह्मणों का बौद्ध मतावलम्बियों से विद्वेष का परिणाम था और ब्राह्मण और बौद्ध धर्म के संघर्ष और अन्त में भारत से बौद्ध धर्म लगभग लुप्त हो जाने का सही इतिहास लिखा जाना अभी बाकी है।

यह कहना सही है कि अन्य महार नेताओं की तरह आम्बेडकर ने अस्पृश्यों के लिए पहले कभी ऊंची जाति के होने का दावा नहीं किया और न यह कहा कि वे भारत के मूल निवासी थे और आयोर्ं के आने से पहले जमीन के मालिक थे आम्बेडकर ने अस्पृश्यों की उत्पत्ति का जो मिथक गढ़ा वह एलिनोर जेलियट के शब्दों में ÷ अस्पृश्यता का युक्तियुक्त स्पष्टीकरण था जो अस्पृश्यों को भारतीय दर्शन की एक मुख्यधारा से अभिज्ञापित करता था और उनके अलग निवास स्थान और अपवर्जित पदार्थों के खाने का कारण भी स्पष्ट करता था।7 परन्तु नयी पहचान बनाने के लिए था तो यह एक नया मिथक ही। जन्मजात अस्पृश्यता की समस्या को केवल ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा सृजित धार्मिक परिघटना के रूप में ही निरूपित करने से इसके आर्थिक सामाजिक पहलुओं की अनदेखी हो जाती है और उन विशिष्ट परिस्थितियों का भी सही रेखांकन नहीं होता जिन्होंने इसे जन्म दिया और जीवित रखा। इस कथन8 में काफी सत्य है कि फ्रांसीसी समाजशास्त्राी लुई ड्यूमों जिनकी जातिप्रथा पर प्रसिद्ध पुस्तक9 होमो हाइरार्किकस जिस को ÷ जाति का ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण’ कहा गया है और आम्बेडकर के लेखन में असाधारण सादृश्य है। दोनों में ब्राह्मणों द्वारा आविष्कृत शौच और अशौच की परिकल्पना का ही प्राबल्य है जिसका अन्यायपूर्ण चरित्रा आम्बेडकर की रचनाओं में तीव्रता से मुखरित होता है।

परन्तु यह सादृश्य जातिप्रथा के उदय में ब्राह्मणों के अभिकर्तृब्य को जिम्मेदार ठहराने तक और ब्राह्मणीय मूल्यबोधों के वर्चस्व को रेखांकित करने तक ही सीमित है। वस्तुतः ड्यूमों और आम्बेडकर के जाति सम्बन्धी सिद्धान्तों में मूलभूत अन्तर है। ड्यूमों का मत है कि भारतीयों में अशौच की धारणाएं दो प्रकार की हैं , स्थाई अशौच और अस्थाई अशौच, लेकिन दोनों का सार तत्व एक ही है। मानव जीवन की ऐन्द्रिक प्रक्रियाएं या अपवित्रा मानी जाने वाली वस्तुओं से क्षणिक सम्पर्क अस्थाई अशौच की अवस्था उत्पन्न करती है, परन्तु जो अपवित्रा वस्तुओं के सतत सम्पर्क में रहते हैं, वे स्थाई रूप से अशुचित होते हैं। परम्परानुसार पेशे और शिल्प वंशानुगत होते थे, इसलिए जिन समुदायों का पेशा उन्हें लगातार अपवित्रा वस्तुओं के सम्पर्क में रखता था वे स्थाई रूप से अपवित्रा और अस्पृश्य बन गये। इस तरह के विचार महामहोपाध्याय पाण्डुरंग काणे10 और अन्य इतिहासकारों ने भी व्यक्त किये हैं। इसे पूर्वाग्रह ही कहा जाय कि इन मनीषियों का इस बात पर ध्यान नहीं गया कि धर्मशास्त्राों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ÷ अपवित्रा’ जातियों के मूल पूर्वजों ने वर्ण नियमों का अतिक्रमण कर प्रतिलोम विवाह किया था अतः उनके वर्णसंकर वंशज जन्म से ही अशुद्ध हो गये और उनके लिए केवल नीच और अतिशूद्र व्यवसाय ही निर्धारित हैं। यानी अतिशूद्र जातियां मूल पूर्वजों के पाप के कारण अधम मानी गयी हैं और अपवित्रा व्यवसायों द्वारा जीवन निर्वाह उनकी मजबूरी है – उनकी अपवित्राता का कारण नहीं।

जो भी हो , डा. आम्बेडकर ने इस सिद्धान्त का कि जातीय अस्पृश्यता समाज में अपवित्रा माने जाने वाले कामों के करने से उत्पन्न हुई है, जोरदार खण्डन किया। उन्होंने नारदस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति और मिताक्षरा के उद्धरण देकर दिखलाया कि प्राचीन काल में मल मूत्रा की सफाई, झाडू बुहारी आदि का काम दास करते थे जो किसी भी वर्ण के हो सकते थे परन्तु चातुर्वण्य में निहित असमानता के अनुकूल ब्राह्मण केवल ब्राह्मण का ही दास हो सकता था और अन्य वर्णों के व्यक्ति अनुलोम क्रम में ही अपने वर्ण अथवा अपने से ऊंचे वर्ण के व्यक्ति द्वारा ही दास बनाये जा सकते थे। यदि इस प्रकार दास बनाये गये आयोर्ं को अपवित्रा काम करना होता था तो यह कैसे कहा जा सकता है कि जन्मजात अस्पृश्यता का उदय गन्दा पेशा अपनाने से हुआ।11

आम्बेडकर के इस विवेचन का समर्थन सोलहवीं/सत्राहवीं सदी में संकलित दस्तावेजों के संग्रह ÷ लेखपद्धति’ में तेरहवीं सदी के एक दस्तावेज12 से भी मिलता है। इसके अनुसार मही नदी के किनारे बसा हुआ सिरनार नामक गांव अकाल और म्लेच्छों से त्रास्त था। राष्ट्रकूटों ने सारे प्रदेश में लूटपाट मचा रखी थी। ऐसी हालत में उस गांव की सम्पूरी नाम की एक दस वर्षीया राजपूत लड़की जिसे उसके मायके और ससुराल के सभी लोगों ने छोड़ दिया था, भीख मांग कर जीवन यापन करने पर मजबूर हो गयी। अन्त में उसने चाहड़ नाम के एक ( वैश्य) व्यापारी की दासी बनना स्वीकार कर लिया और यह तय हुआ कि वह सभी घरेलू काम जैसे कि पीसना, कूटना, झाडू लगाना, पीने का पानी लाना, गोबर से घर लीपना, विष्ठा फेंकना आदि और बाहरी काम जैसे कि जोताई और खेती से जुड़े अन्य काम, बिना कोई सवाल जवाब किये अनथक रूप से दिन रात हर ऋतु में करेगी और बदले में व्यापारी चाहड़ भोजन और कपड़े देगा। स्पष्टतः स्मृतियों के विधान के बावजूद क्षत्रिायवर्णा राजपूत लड़की को परिस्थितियोंवश एक व्यापारी वैश्य की दासी बनना पड़ा। परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिसे पीने का पानी लाने जैसा पवित्रा काम करना था उसे ही विष्ठा फेंकने जैसा अपवित्रा काम भी करना था। आज किसी हिन्दू घर में यह स्वीकार्य नहीं होगा। इससे तो यही सिद्ध होता है कि शौचाशौच सम्बन्धी धारणाएं प्रागाधुनिक युग में उत्तरोत्तर उग्र होती गयीं। स्मृतियों के अनुसार अशुचित काम करना दासों की विवशता थी, भृतक अथवा कर्मकर ऐसा नहीं करते थे।

चमड़ा अपवित्रा वस्तु माना जाता है। ऐसी धारणा है कि उत्तर भारत की बहुसंख्य चमार जाति , तमिलनाडु की चक्किलियन और आन्ध्रप्रदेश की माडिगा जाति को चमड़े का काम करने के कारण ÷ अस्पृश्य’ माना गया, यद्यपि यह निर्विवाद है कि इनका अधिकांश भाग खेतों में ही काम करता चला आ रहा है। उत्तर वैदिक काल में चमड़ा अशुद्ध नहीं माना जाता था और पंचविंश ब्राहमण (XVI 13.13) में यज्ञ के लिए चमड़े के थैलों में भरे हुए दूध के प्रयोग का उल्लेख हुआ है। बौधायन श्रौत सूत्रा (XV 6) में घी, शहद, चावल और भुने हुए अनाजों से भरे चमड़े के सैकड़ों थैलों का जिक्र है। स्पष्ट ही चमड़े को और चर्मकारों को अपवित्रा मानना बाद की कल्पना है। अमरावती के एक प्राकृत अभिलेख13 में एक बौद्ध चर्मकार विधिक का उल्लेख है जिसने एक पूर्णघट और पट्ट का दान किया। उसे उपाध्याय नाग का पुत्रा कहा गया है, जिससे पता चलता है कि वह ब्राह्मण पुत्रा था। यह दान उसने अपने पिता और सम्बन्धियों के साथ दिया था। लिपि के आधार पर यह अभिलेख तीसरी चौथी सदी का हो सकता है। बाद में बृहन्नारदीय पुराण में चर्मकार को चाण्डाल से भी नीचा माना गया है।14

परन्तु इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अधिसंख्य चर्मकार बौद्ध थे और बौद्ध धर्मानुयायी होने के कारण ब्राह्मणों ने , जो हिन्दू धर्म के ठेकेदार थे, बौद्धों को अस्पृश्य करार कर दिया और इस प्रकार अस्पृश्य जातियां अस्तित्व में आयीं। प्राचीन धर्मसूत्राों और गृह्यसूत्राों में तथा पाली बौद्ध ग्रन्थों में चाण्डाल, पौल्कस आदि कुछ जनसमूहों के ÷ अपवित्रा’ और हीन होने का और उनके पृथक्करण का स्पष्ट उल्लेख है जिससे यह सिद्ध होता है कि वेदोत्तर काल में परन्तु मौर्य युग से पहले ही, कुछ जनसमूह जन्म से अशुचित माने जा रहे थे।15 छान्दोग्य उपनिषद (VI 10.1) में ब्राह्मण, क्षत्रिाय और वैश्य वर्ण में जन्म पवित्रा और ÷ रमणीय’ कहा गया है और चाण्डाल, कुत्ता और शूकर योनि में जन्म अपवित्रा और पूर्व जन्म के पापों का फल बताया गया है। शूद्र वर्ण के स्थान पर चाण्डाल के उल्लेख से प्रतीत होता है कि शूद्र वर्ण एकाश्म न था, विभिन्न पृष्ठभूमि के अनेक जनसमूह इस कोटि में आते थे और चाण्डाल का दर्जा सबसे नीचा था। यह भी विचारणीय है कि जन्मजात अशौच का तार्किक समर्थन पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धान्त से किया गया जिसकी वैचारिकी उपनिषद काल के ब्राह्मण और क्षत्रिाय कुलीन बौद्धिकों में उपजी थी।16 उनके दृष्टिकोण से समाज में बढ़ती हुई आर्थिक और सामाजिक असमानताओं की यह तार्किक व्याख्या थी। इस अवतरण से यह भी सिद्ध होता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिाय और वैश्य की पहचान भी अब जन्म पर आधारित थी।

प्राचीन पाली बौद्ध निकाय साहित्य और जातकों में प्रतिबिम्बित समाज ऊंची और नीची जातियों में तथा ÷ उच्च कुल’ और ÷ नीच कुल’ में बंटा हुआ समाज था। ऊंच और नीच की भावनाएं शिल्पकार व्यवसाय के क्षेत्रा में भी काम कर रही थीं। कुछ शिल्प और व्यवसायों को ऊंचा कहा गया है और कुछ को हीन। शाक्य, लिच्छवि और ब्राह्मण आदि उच्च जाति के हैं तो ÷ हीन जाति’ या ÷ नीच कुल’ में विशेष पांच जन समूहों का उल्लेख है – चाण्डाल, पुक्कुसा ( पौल्कस), वेण, रथकार और नेसाद ( निषाद)। इनमें से चार तो निश्चित ही आर्य कृषक बस्तियों के हाशिये पर रहने वाली अथवा समीप के जंगलों में रहने वाली जन जातियां थीं। महाभारत ( शान्तिपर्व सं. 141) में जंगल के भीतर चाण्डालों की बस्ती का उल्लेख है जहां तरह तरह के जानवरों को मारने के हथियार और उनकी खालें बिखरी हुई थीं। जातकों में पुक्कस बहेलिए और झाड़ू बुहारी करने वाले दरिद्रजन हैं। मनुस्मृति ( 10 49 ) के अनुसार उनका व्यवसाय बिल में रहने वाले जानवरों को पकड़ कर मारना था। वेण को यद्यपि एक शिल्पी समुदाय का ÷ हीन जाति’ में दलन का उदाहरण17 माना गया है, परन्तु आपस्तम्ब धर्मसूत्रा (II. 12.6) में उनका उल्लेख चाण्डालों और पौल्कसों के साथ है। वे ढोल बजा कर और बांस की तीलियां तोड़ कर जीवनयापन करते थे। अतः वे भी एक जनजाति के ही प्रतीत होते हैं। निषाद जनजाति का उल्लेख तो उत्तर वैदिक ग्रन्थों में भी है। उनकी बस्तियां आर्य बस्तियों के समीप ही थीं और उनके आर्यीकरण के भी प्रमाण मिलते हैं। यह एक बहुसंख्य जनजाति थी जिसका वर्णन ऐतरेयब्राह्मण में जंगल में लोगों को लूट लेने वाले लुटेरों की तरह किया गया है। इस प्रकार जिन्हें ÷ हीन जाति’ की संज्ञा दी गयी है वे लगभग सभी किसी न किसी प्रकार जंगलों से जुड़े हुए थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनकी ÷ हीन’ अवस्था का कारण था उनका सांस्कृतिक पिछड़ापन और जीविकोपार्जन के अनिश्चित साधन तथा उनकी पशुपक्षियों के शिकार और खाद्य संग्रहण पर निर्भरता, जिससे वे मरे हुए जानवरों को हटाने, सड़कों की सफाई आदि करने के लिए बाध्य थे जिस कारण उन्हें आनुष्ठानिक रूप से अपवित्रा मान लिया गया। इस सुझाव में काफी बल है कि वन के उत्पाद पर निर्भर ये जनजातियां कृषि पर आधारित आर्य बस्तियों से टकराव की स्थिति में रही होंगी18 क्योंकि यह कृषि व्यवस्था के विस्तार का काल था जब जंगलों को काट कर कृषि योग्य भूमि प्राप्त की जा रही थी। अहिंसा और कर्म के सिद्धान्तों ने इस बैर भाव को धार्मिक औचित्य प्रदान किया और इन पिछड़े हुए जनसमूहों को ÷ अशुभ’, ÷ अस्पृश्य’,÷ अतिशूद्र’ अथवा पंचम वर्ण का कहा जाने लगा। जैसे जैसे इस महाद्वीप में आर्य सभ्यता का फैलाव हुआ अनेक अन्य जनजातियां भी इस श्रेणी में आ गयीं। मध्य युग की सामन्ती व्यवस्था में श्रमिक वगोर्ं की सम्पन्न अभिजात वगोर्ं से दूरी और भी बढ़ी और अनेक श्रमोपजीवी पराश्रित दस्तकार और कर्मकार जैसे कि रजक और चर्मकार19 भी अतिशूद्रों की श्रेणी में आ गये।

कहने का तात्पर्य यह है कि जाति व्यवस्था का शुरू से ही सत्ता और वर्चस्व की राजनीति से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। अतः यह समझना कि छुआछूत की धार्मिक अवधारणा समाप्त हो जाने से जाति प्रथा समाप्त हो जाएगी भ्रमपूर्ण है। डा. आम्बेडकर का यह कथन 20 कि ÷ अस्पृश्यता जाति व्यवस्था का विस्तार है। दोनों का पृथक्करण नहीं हो सकता। दोनों साथ रहेंगे तथा साथ ही समाप्त होंगे’ आंशिक सत्य है। यह तो सही है कि पिछड़े जनसमूहों का ÷ अस्पृश्य’ का दर्जा जातिप्रथा के कठोरतम, उत्पीड़क स्वरूप का विस्तार है, परन्तु जाति व्यवस्था की मूलभूत विशेषताएं – वंशानुगत पेशे, आंतर विवाह ( एण्डोगेमी) और सोपानबद्ध जातिसमाज ÷ अस्पृश्य’ जातियों के अस्तित्व में आने से पहले ही उत्तर वैदिक वर्णव्यवस्था की प्रकृति बन चुकी थी और उसी चौखटे में समूहों के संविलयन और विखण्डन की प्रक्रियाओं से सोपानबद्ध जातियां उभरीं। जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता की अवधारणा का कोई अन्योन्याश्रय सम्बन्ध नहीं है, यद्यपि ड्यूमों ऐसा ही मानते हैं। उन्होंने मार्क्स के इस कथन की, कि आधुनिक उद्योग और रेलवे यानी यातायात के नये तरीके भारत की जाति व्यवस्था को खत्म कर देंगे, आलोचना करते हुए लिखा कि इन सबके होने के बावजूद जातियां आज भी वर्तमान हैं और अस्पृश्यता अभी भी प्रभावी है क्योंकि जातिप्रथा का आधार शौच और अशौच की धार्मिक भावना है। ड्यूमों का मत है कि लोगों के वास्तविक और अवलोकनीय व्यवहारों का आधार उनके मूल्यबोध अथवा मानसिकता होती है। जाति व्यवस्था भारतीयों की ÷ पवित्रा’ और ÷ अपवित्रा’ की ÷ द्विचर प्रतिकूलता’ (binary opposition) पर आधारित सामाजिक सोपान की नैसर्गिक अवधारणा की उपज है। इसमें समाज की बुनियादी एकता के लिए व्यक्तिवादिता की बलि दी गयी और एक स्पर्धारहित प्रणाली का निर्माण हुआ जिसकी समरसता के लिए व्यक्ति को पहल की सुविधा से वंचित रखा गया। इस प्रकार भारतीय मानसिकता पाश्चात्य मानसिकता के बिल्कुल विपरीत है क्योंकि पश्चिमी मानसिकता समतावादी और व्यक्विादी है और व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा तथा पहल को बढ़ावा देती है।

ड्यूमों का जाति माडेल इस नींव पर खड़ा है कि इसमें ÷ ब्रह्म’ यानी धर्मसत्ता (hierarchical status) और क्षत्रा यानी लौकिक सत्ता (secular power) को बिल्कुल अलग अलग रखा गया है और लौकिक सत्ता का दर्जा धर्मसत्ता के नीचे है। परन्तु जैसा कि हमने अन्यत्रा21 दिखलाया है ब्रह्म और क्षात्रा वर्ग का पृथक्करण वैदिक आयोर्ं की पशुचारण व्यवस्था का अंग था। पशुपालन पर निर्भर अनेक जनजातियों में देखा गया है कि उनमें दो प्रकार के विशेषज्ञ वर्ग प्रमुख रूप से उभर आते हैं, एक तो पुरोहित वर्ग जो अपनी जनजाति का योगक्षेम आनुष्ठानिक कायोर्ं द्वारा देवताओं को प्रसन्न कर पशुधन की रक्षा और वृद्धि द्वारा सुनिश्चित करने का दावा करता है, दूसरा योद्धा वर्ग जो अपनी जनजाति के जान और माल की रक्षा करता है और अन्य जनजातियों पर हमला कर उनके पशुधन जीत कर अपने कबीले की सम्पन्नता में वृद्धि करता है। हिन्द आर्यों में ये दो वर्ग ब्रह्म और क्षत्रा के रूप में उभरे और जनजातीय समाज के विघटन और संविलयन तथा क्षेत्राीय राज्यों के अभ्युदय की प्रक्रिया में वंशानुगत बन गये। भारत के दीर्घकालीन इतिहास में सातत्यता है। परम्पराओं में परिवर्तन तभी होता है जब भौतिक परिस्थितियां उनके प्रतिकूल हों। बौद्ध और जैन ग्रन्थों में तो अक्सर क्षत्रिाय को ब्राह्मण से ऊंचा दर्जा दिया गया है परन्तु उनके अस्तित्व को नकारा नहीं गया है। यदि जातिप्रथा आज भी वर्तमान है तो इसका मतलब यह नहीं कि यह भारतीय मानसिकता की देन है। ड्यूमों22 स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि आधुनिक परिस्थितियों में शौच अशौच सम्बन्धी विधि निषेध काफी ढीले पड़ गये हैं, जातियों के पदानुक्रम का एहसास भी कम से कम शहरों में काफी शिथिल हो गया है और जाति व्यवसाय निर्धारित नहीं करती। यानी ड्यूमों की थीसिस का मूल आधार ÷ पवित्रा अपवित्रा की द्विचर प्रतिकूलता’ ही विलीन हो रही है। फिर भी वे यह कहते हैं कि जाति का मूलभूत चरित्रा, इसका धार्मिक आधार अक्षुण बना हुआ है। जो परिवर्तन हुए हैं वे इसके लचीलेपन की ओर इंगित करते हैं परन्तु इसका धार्मिक आधार सजातीय विवाह में देखा जा सकता है जो इसे कायम रखता है।

अन्य समाजशास्त्राी 23 भी सजातीय विवाह यानी आन्तरविवाह को ही जातिप्रथा का सारतत्व मानते हैं जो इसे जीवित रख रहा है। परन्तु प्रश्न यह है कि जहां पूंजीवादी औद्योगीकरण ने जाति व्यवस्था की अन्य अहम विशेषताओं को नकार दिया, सजातीय विवाह के बन्धन क्यों नहीं ढीले पड़ रहे? उत्तर स्पष्ट है कि जातिप्रथा केवल दलितों के शोषण पर ही नहीं स्त्राी के शोषण पर भी आधारित थी और आज भी है। जातिप्रथा के वे तत्व जो पूंजीवादी विकास में बाधा बन रहे थे, लुप्त हो गये अथवा होने की प्रक्रिया में हैं, परन्तु सजातीय विवाह प्रथा तो पूंजीवादी प्रवृत्तियों के अनुकूल है। इसमें पितृतन्त्रात्मक परिवार वर वधू का चयन आय, सम्पत्ति और सामाजिक प्रस्थिति को ध्यान में रख कर करते हैं। वधू पक्ष के लोग वर पक्ष की सभी मांगों को पूरा करने का प्रयास करते हैं, कन्या का दान होता है। लेनदेन, दहेज की प्रथा पूंजी के महत्व को और भी बढ़ावा देती है। वस्तुतः जातियों के अलगाव, उनके स्वतन्त्रा अस्तित्च के लिए यह अनिवार्य है कि स्त्रिायों के यौनत्व पर जाति का पूरा नियन्त्राण रहे और उसका उपयोग जाति के हित में सजातीय सम्बन्धों को सुदृढ़ करने के लिए किया जाय। डा. आम्बेडकर ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तिका Annihilation of Caste में जोर देकर कहा कि जाति व्यवस्था को समाप्त करने का एकमात्रा असली उपाय अन्तर्जातीय विवाह है। इससे उनका तात्पर्य जातियों के भीतर उपजी उपजातियों के संविलयन से एक बृहत्तर जाति बनाने की प्रक्रिया की ओर न था। ऐसी प्रक्रिया को तो वे और भी खतरनाक (mischievious) मानते थे क्योंकि इससे जातियां और भी शक्तिशाली हो जाएंगी और सम्भावना इसी बात की है कि उपजातियां भले ही समाप्त हो जाएं, जातिप्रथा समाप्त न होगी।24

वस्तुतः डा. आम्बेडकर एक ईमानदार राजनीतिज्ञ , विचारक और दूरदर्शी थे। वे जातिप्रथा को समूल उखाड़ फेंकना चाहते थे, उसे राजसत्ता हथियाने का हथियार नहीं बनाना चाहते थे। परन्तु जाति व्यवस्था का मुख्य आधार शुद्धता और प्रदूषण के ब्राह्मणवादी विचारों में ही देखने से इसमें निहित वर्गीय और लैंगिक वर्चस्व की राजनीति का पूरा खुलासा नहीं हो पाता। इस कारण बाबा साहब के विचारों का क्रान्तिकारी अन्तर्य अस्मितावादी दलित राजनीति में खो गया है। जाति व्यवस्था की निरन्तरता का एक बड़ा कारण यह रहा है कि इसमें प्रभुता की राजनीति से समझौता करने की, बिना किसी आमूलचूल परिवर्तन के उसका अपने हित में उपयोग करने की अद्भुत क्षमता रही है। प्राक्‌ औपनिवेशिक काल में वर्ण धर्म के समाज में प्रभावी होने के लिए राजसत्ता की सापेक्षता आवश्यक थी। मध्ययुगीन अनेक अभिलेखों में राजा द्वारा नियुक्त धर्माधिकारी का उल्लेख हुआ है। इस पदाधिकारी द्वारा शासक विशिष्ट जनसमूह की ही नहीं व्यक्तियों की भी जाति विन्यास में प्रस्थिति के बारे में फैसला दिया जाता था।25 यह परम्परा इतनी रूढ़ हो गयी थी कि कभी कभी मुस्लिम26 शासकों और बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भी ऐसे झगड़ों में फैसला देने का आवेदन किया जाता था। इसके अतिरिक्त इस व्यवस्था से शासक वर्ग को बहुत लाभ था। इरफान हबीब27 का कहना है कि मुसलमान शासकों और बुद्धिजीवियों ने हिन्दू धर्म के बहुदेववाद और मूर्तिपूजा की तो कटु आलोचना की है परन्तु इस्लामी कानून के विरुद्ध होने पर भी जातिपरक असमानताओं पर कभी कोई आपत्ति नहीं की। उनके अनुसार इसका कारण यह था कि जातिप्रथा से निम्नश्रेणी के कारीगरों और भूमिहीन श्रमिकों का विशाल अन्याश्रयी वर्ग तत्कालीन उत्पादन प्रणाली को सस्ते में ही उपलब्ध हो जाता था, जिससे कम लागत में अधिक उत्पादन सम्भव था और परिणामतः अधिक अधिशेष सुलभ होने के कारण शासक वर्ग भी अधिक राजस्व वसूल कर लाभान्वित होता था। यह तो हुई ऐसे शासकों की बात जो जातिप्रथा के बाहर थे और जिन्हें अपना सत्ताधिकार वैध ठहराने के लिए परम्परागत प्रतीकों की जरूरत न थी। परन्तु जो जाति समाज के भीतर थे उन शासकों के प्रभुत्व एवं अधिकारों की पुष्टि और वैधता प्रदान करने में यह व्यवस्था अहम भूमिका निभाती थी। पूर्व मध्ययुग के ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब कबायली क्षेत्राों में राज्य संरचना की प्रक्रिया में कबीलों के उदीयमान अभिजात वर्ग ने वर्ण जातिवादी सामाजिक वर्गीकरण अपना कर अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को वैध बनाया और कबीलों के आम लोगों से अपना पृथकत्व स्थापित कर उच्च प्रस्थिति और विशेषाधिकारों के हकदार बने। इस प्रक्रिया को ÷ ब्राह्मणीकरण’ अथवा ÷ क्षत्रिायकरण’28 का नाम भी दिया गया है। प्राक्‌ औपनिवेशिक काल में सत्ता का आधार जनतान्त्रिाक न होकर आनुवांशिक, कुलीनवर्गीय एवं निरंकुश होता था। अतः सोपानगत अलगाव की प्रवृत्ति थी। परन्तु आज परिस्थितियां बदल गयी हैं। अब राजनीतिक लड़ाइयां अभिजनों के अखाड़े में नहीं जनता के बीच जाकर लड़नी होती हैं। सत्ता तक पहुंचने के लिए बहुसंख्य वोट चाहिए। इसलिए ÷ अलगाव’ की जगह जातिपरक बड़ी अस्मिताओं को गढ़ने की ओर झुकाव है ताकि बड़ा जनाधार खड़ा किया जा सके। दलित जनता का समर्थन आर्थिक मुद्दों को उठा कर सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के खिलाफ लड़ कर किसी प्रगतिशील विचारधारा के तहत पाने का प्रयास किया जा सकता है, या फिर पारम्परिक, धार्मिक अथवा जातिगत अस्मिताओं को सुदृढ़ कर उनका ÷ वोट बैंक’ बनाया जा सकता है। स्पष्ट है कि पहला रास्ता सुलझी समझ, प्रतिबद्धता और त्याग की अपेक्षा रखता है जिससे सम्पन्न अभिजात वगोर्ं के हितों को ठेस भी पहुंच सकती है परन्तु परम्परागत अस्मिताओं के नाम पर एकीकरण की अपील द्वारा जाति एक ÷ हित समूह’ के रूप में अपने कुछ सदस्य परिवारों एवं व्यक्तियों को तो शक्ति और प्रभुता के पदों पर आसीन कर सकती है, सामूहिक रूप से पूरी जाति की आर्थिक सामाजिक अवस्था सुधारने में असफल ही रहती है। यह सर्वविदित है कि दलित जातियों का बहुलांश भूमिहीन है जिसके लिए वर्ग आधारित संघर्ष की आवश्यकता है तभी उनकी अवस्था में सुधार हो सकता है। पर दलित नेताओं का ध्यान शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण पर ही केन्द्रित है और यह भी वर्चस्व की संकुचित राजनीति की ही विडम्बना है कि जहां ऊंची जाति के लोग आरक्षण के विरुद्ध नारा लगाते हुए समानता, सामाजिक न्याय और गुणवत्ता की दुहाई देते हैं पिछड़ी और दलित जातियों के नेता पिछड़ेपन को ही आधार बना विशेषाधिकारों और सुविधाओं की मांग करते हैं।

यह कहना बिल्कुल सही है कि शोषण की किसी भी व्यवस्था को निर्मूल करने की पहली शर्त है- उसकी बुनियाद भलीभांति समझना। जाति व्यवस्था की बुनियाद है – पितृतन्त्राात्मक विचारधारा की जकड़बन्दी से स्त्राी के यौनत्व पर नियन्त्राण और उसकी पराधीनता तथा उच्चवर्गीय हितों के परिपोषण को धार्मिक रूप देकर स्वीकार्य बनाना। इस बुनियाद पर ऐसी सशक्त विचारधारा की अधिरचना हुई जो वर्ग चेतना के विकास में जबर्दस्त अवरोधक बनी। डा. आम्बेडकर की यह उक्ति कि जाति व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन ही नहीं श्रमिकों का भी विभाजन करती है, इस बात को सूत्रा रूप में रेखांकित करती है। आज ऐसे आन्दोलनों की कमी नहीं है जिनमें दलित जातियां ही एक दूसरे के आमने सामने होती हैं और अक्सर ऐसे आरोप लगाये जाते हैं कि दलितों के लिए निश्चित आरक्षण की सुविधाओं का लाभ किसी एक अपेक्षाकृत ÷ सम्पन्न’ दलित जाति को ही मिल रहा है और बाकी दलित जातियां ऐसी सुविधाओं से वंचित ही रह जा रही है। इस प्रघटना को ÷ दलित अस्मिता के विखण्डन की प्रक्रिया’ कहा गया है। परन्तु दलित चेतना जातिगत चेतना है वर्ग चेतना नहीं। ब्राह्मण विरोधी आन्दोलनों में दलित अस्मिता का उदय हुआ परन्तु दलित जातियों की पृथक अस्मिता दलित अस्मिता में लुप्त नहीं हुई। अनेक समाजशास्त्राीय क्षेत्राीय पर्यवेक्षणों से यह स्पष्ट हो चुका है कि दलित जातियों में भी वर्ण व्यवस्था की पदानुक्रम की भावना और शौचाशौच तथा अन्य जाति सम्बन्धी आस्थाओं की जबर्दस्त पकड़ है। उन्हें भले ही अपनी नीची प्रस्थति के बारे में आपत्ति हो परन्तु अन्य दलित जातियों की प्रस्थिति तथा उनसे अपने सम्बन्धों का निर्धारण वे वर्ग जाति व्यवस्था के सिद्धान्तों के अनुसार ही करती हैं। उत्तर भारत के अनेक क्षेत्राों में कई अछूत जातियां भी धोबी जाति को अस्पृश्य मानती हैं और आनुष्ठानिक तौर पर धोबी के सम्पर्क में आना वर्जनीय।29

डा. आम्बेडकर को इस बात का एहसास था और वे जातिप्रथा के विनाश के लिए सभी को एक मंच पर संगठित करना इसलिए असम्भव मानते थे क्योंकि ÷ हर जाति इस बात में गर्व और आश्वासन का अनुभव करती है कि वह जातियों के पदानुक्रम में कुछ अन्य जातियों के ऊपर है।30 नामी पत्राकार पी. साईंनाथ ने अंग्रेजी के ÷ हिन्दू’ दैनिक समाचारपत्रा में अपने क्षेत्राीय अनुसन्धान के आधार पर आधुनिक तत्वों के प्रभाव से पश्चिमी उड़ीसा की जाति व्यवस्था में हो रहे परिवर्तनों पर कुछ लेख लिखे हैं। उनके अनुसार वहां जबर्दस्त विरोध के बावजूद दलितों को लेकर कुछ ऐसे अन्तर्जातीय विवाह हुए हैं जिनकी बीस वर्ष पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वे बंगामुण्डा ( बोलानगिर) में हुए चार ऐसे विवाहों का उल्लेख करते हैं।31 1997 में सबिता नाम की एक ब्राह्मण लड़की ने सुदाम कुम्भार नाम के एक डोम हरिजन से विवाह कर लिया। दोनों स्थानीय कालेज में नौकरी करते थे। यह तो ÷ महापाप’ था। लड़की के माता पिता को अनेक प्रकार के अपमान झेलने पड़े। उससे सारे सम्बन्ध तोड़ कर उसकी ÷ मृत्यु’ मान कर लड़की का श्राद्ध करना पड़ा और गोबरपानी पीकर तथा पिता को केश मुंडवा कर शुद्धि के संस्कार करने पड़े। दूसरी और हरिजनपाड़ा में इस विवाह का पूरा स्वागत हुआ और अब सबिता हरिजनपाड़ा में ही रहती है। दो अन्य विवाह भी ऊंची जाति की लड़कियों ने दलित लड़कों से किये और उनका भी हरिजनपाड़ा में स्वागत हुआ। परन्तु चौथे में कालिन्ध्री नाम की एक डोम ( हरिजन) लड़की ने जे. पी. नायक नाम के घसी जाति के लड़के से विवाह कर लिया। स्थानीय जातिगत सोपान में घसी जाति डोम से भी नीची मानी जाती है। उसी हरिजनपाड़ा ने जहां ऊंची जाति की लड़कियों को सहर्ष अपना लिया था कालिन्ध्री के परिवार को लड़की के जघन्य अपराध के लिए निकाल बाहर किया। पी. साईंनाथ का यह निष्कर्ष सही है कि ऊंची जाति से लड़की लाना हरिजनपाड़ा के लिए उनकी जाति की ऊर्ध्वमुखी गतिशीलता का लक्षण थी। किन्तु जो विवाह इसका अपवाद था उसकी ओर डोमों का भी रुख उतना ही कठोर था जितना कि ब्राह्मणों का।

क्या ऐसे उदाहरणों को हम ÷ जाति के विनाश’ की प्रक्रिया का आरम्भ मान सकते हैं? धर्मशास्त्राों में32 जात्युकर्ष और जात्यत्कर्ष का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है जिसके अनुसार लगातार कई पीढ़ियों तक ( पीढ़ियों की संख्या के बारे में विभिन्न मत है) प्रतिलोम विवाह यानी नीची जाति के लड़के का ऊंची जाति की लड़की से विवाह होते रहने से सातवीं अथवा आठवीं पीढ़ी में वंश का जात्युत्कर्ष यानी मां की जाति में सन्तान का अन्तरण हो जाता है। उसी प्रकार लगातार कई पीढ़ियों तक अनुलोम विवाह ( जिसमें लड़का ऊंची जाति का और लड़की नीची जाति की होती हैं) होते रहने से जात्यपकर्ष, यानी नीची जाति में संक्रमण हो जाता है। महामहोपाध्याय पाण्डुरंग वामन काणे के अनुसार यह सिद्धान्त एक शास्त्राीय कल्पना मात्रा है, वास्तविक जीवन में इस पर अमल असम्भव रहा होगा। जो भी हो, प्राक्‌ औपनिवेशिक काल में विशिष्ट भौतिक परिस्थितियों में जाति समाज के भीतर गतिशीलता असम्भव नहीं थी, चाहे वह ऊर्ध्वमुखी हो या अधोमुखी। अधिकतर विचलन सामुदायिक थे, यद्यपि कुछ वंशगत और वैयक्तिक गतिशीलता के उदाहरण भी मिल जाते हैं। परन्तु इनसे व्यवस्था के अस्तित्व पर – उसके पैटर्न की निरन्तरता पर – कोई आघात अथवा खतरा नहीं होता था क्योंकि वे जाति समाज में ही आत्मसात कर लिए जाते थे। तद्भव में प्रकाशित एक लेख33 में वैयक्तिक अधोमुखी गतिशीलता को ÷ अवजातीकरण’ की संज्ञा दी गयी है और उसे व्यक्ति की जाति व्यवस्था के प्रति गहरे असन्तोष की अभिव्यक्ति माना गया है तथा ÷ जाति को कमजोर करने वाली प्रक्रिया’ के रूप में व्याख्यायित किया गया है। परन्तु ध्यान देने योग्य है कि इस प्रसंग में जो भी मध्ययुगीन एवं आधुनिक उदाहरण दिये गये हैं वे सभी वैयक्तिक कारणों से ऊंची जाति के व्यक्तियों का निचली जाति में संक्रमण दिखलाते हैं, इन्हें ÷ जाति के विनाश’ की प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। व्यक्तिगत पहल प्रतिरोध के इक्केदुक्के उदाहरण पेश कर सकती है, वह चाहे स्वेच्छित चयन से प्रेरित रही हो या सूखा, अकाल, महामारी आदि आपात्‌कालीन परिस्थितियों के दबाव से। परन्तु जाति व्यवस्था को समूल उखाड़ फेंकने के लिए इसके भौतिक मूलाधार, उन परम्परागत स्रोतों को मिटाना होगा जिनसे इनकी जड़ों को पानी मिलता है।

जातिप्रथा की निरन्तरता के दो मुख्य कारक हैं – पहला, स्त्राी की अधीनता, उसके यौनत्व पर पितृतन्त्राात्मक नियन्त्राण, जिससे इस प्रथा को निर्बाघि नया जीवन मिलता रहता है। हमने अन्यत्रा34 दिखलाया है कि पितृसत्ता और वर्ण जाति स्तरीकरण, दोनों परिघटनाओं का उदय साथ साथ ही हुआ है और दोनों का अन्योन्याश्रय सा सम्बन्ध रहा है। आधुनिक औद्योगीकरण की आवश्यकतानुसार जातिप्रथा ने कम से कम नगरों में तो छुआछूत की भावना, सोपानबद्धता और जातिगत व्यवसाय की एकान्तिकता आदि के बन्धनों को ढीला कर दिया है परन्तु जैसा कि मैं पहले भी कह चुकी हूं जाति के अन्तर्गत आन्तर वैवाहिक विन्यस्त विवाह प्रथा (endogemous system of arranged marriages) की पकड़ अभी भी ढीली नहीं हुई है क्योंकि पूंजीवादी विचारधारा से इसका पूरा सामंजस्य है। फिर भी प्रगतिशील शहरी अभिजन और बुद्धिजीवी परिवारों में, जहां स्त्रिायां अपना व्यवसाय और जीवन यापन प्रणाली स्वयं चुन सकती हैं और आर्थिक रूप से स्वतन्त्रा हैं वे अपना जीवनसाथी भी स्वयं चुनती हैं और अन्तर्जातीय विवाह विरल नहीं रह गये हैं। समाज का यह अंश निश्चय ही ÷ जाति’ से विमुक्त होकर ÷ वर्ग’ में संक्रमण कर रहा है और भूमण्डलीकरण के आघात से इस प्रक्रिया को और भी प्रेरणा मिल रही है।

जातिप्रथा की निरन्तरता का दूसरा कारक है वर्चस्व की राजनीति में इसकी उपादेयता। यह मान्यता 35 सही नहीं है कि प्राक्‌ औपनिवेशिक युग में जाति धार्मिक संस्था थी जिसका सम्बन्ध आन्तर विवाह, गोत्रा बहिर्विवाह, सोपानगत प्रस्थिति आदि से था, लेकिन आज ये मसले कमजोर पड़ गये हैं और यह एक राजनीतिक आर्थिक संरचना बन गयी है। अब इसमें धार्मिक प्रभुसत्ता ( रिचुअल पावर) का स्थान आर्थिक और राजनीतिक प्रभुसत्ता ने ले लिया है और इसने उन क्षेत्राों में प्रवेश कर लिया है जो इसके दायरे से बाहर हुआ करते थे। मेरे विचार से ऐसी समाजशास्त्राीय दृष्टि जाति व्यवस्था के केवल बाहरी रूप पर ही ध्यान देती है, इसके असली प्रकार्य को नजरअंदाज कर देती है। दरअसल वर्चस्व की राजनीति इसके दायरे से बाहर कभी थी ही नहीं। दामोदर धर्मानन्द कोसाम्बी ने कहा था कि ÷ जाति पिछड़े उत्पादन के स्तर पर वर्ग का ही एक प्रकार है’ ।36 यह ऐसी शोषण व्यवस्था है जिसके माध्यम से प्रभुता सम्पन्न जातियां आनुवांशिक तौर पर निचले तबके की जातियों का सदियों से शोषण करती चली आ रही हैं। भारत के अधिसंख्य गांवों में परिस्थिति आज भी कुछ अधिक नहीं बदली है, यद्यपि दलित जातियों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता कुछ अवश्य बढ़ी है। परन्तु इस कारण जाति संघषोर्ं की संख्या में भी वृद्धि हुई है। 1997 में तमिलनाडु की सरकार ने जाति संघषोर्ं के कारणों का पता लगाने के लिए और उन्हें दूर करने के उपाय सुझाने के लिए एक कमेटी बनायी थी जिसकी रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने दलितों की उन्नति के लिए जो प्रोग्राम बनाये उनसे दलितों की कठिनाइयां और उनका अलगाव और भी बढ़ा है क्योंकि ऊंची जातियों के एक बड़े हिस्से को यह सह्‌य नहीं होता कि सरकारी सुविधाओं के चलते दलित अपनी प्रस्थिति में सुधार कर लें। वस्तुतः बात केवल जातीय पूर्वग्रहों से ग्रस्त मानसिकता की ही नहीं है। कृषि क्षेत्रा में आधुनिक संसाधनों और पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के प्रवेश से जाति समुदायों के पारस्परिक लेनदेन और अन्तनिर्भरता का स्थान बाजार द्वारा संचालित सम्बन्धों ने ले लिया है। अधिसंख्य दलित जातियां वेतनभोगी मजदूर वर्ग में परिवर्तित हो रही हैं। इन परिस्थितियों में सजातीय एकात्मकता और दूसरी जातियों से अलगाव की भावना और भी घनीभूत हो रही है। जहां कमजोर जाति के व्यक्ति और परिवार अपने कठिन समय में अपने जाति बन्धुओं से ही सहायता की आशा रखते हैं और उनका समर्थन पाते हैं, ऊंची जाति के लोग दलितों की मांगों का, उनके प्रतिरोध का सामना भी सामूहिक रूप से करते हैं। वे एकजुट होकर दलितों का सामाजिक बहिष्कार, सार्वजनिक सुविधाओं और खेत मजदूरी आदि से वंचित करने का निर्णय लेते हैं और हमले, हिंसा और अमानवीय व्यवहार के वारदात भी जातिगत विद्वेष की भावना से प्रेरित होकर किये जाते हैं। इस तरह की घटनाएं भारत के अनेक प्रदेशों में तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में घटित होती रही हैं और अक्सर उनके मूल में दलित जातियों के ÷ दुस्साहस’ और आत्मसम्मान की बात ही नहीं उनके द्वारा खेत मजदूरी के लिये सरकार द्वारा नियत न्यूनतम पारिश्रमिक की मांग, भूमि पर बटाईदार का दखल अधिकार आदि के मसले होते हैं। जाति विषयक मानसिकता को उसके भौतिक आधार से अलग करके नहीं देखा जा सकता। जरूरत है ऐसे विवेकपूर्ण सशक्त आन्दोलन की जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी स्तरों पर जातिगत परम्पराओं के समूल उन्मूलन का बीड़ा उठाये, जाति का उसके अभिजन वर्ग के हित समूह के रूप में उपयोग की राजनीति का पर्दाफाश करे, पितृसत्तात्मक मूल्यों का अवमूल्यन कर नारी को स्वाधीनता और स्वतन्त्रा चयन का अधिकार दे और सही मायनों में वर्चस्वहीन समाज की स्थापना का प्रयास करे। तभी बाबा साहेब आम्बेडकर का विजन ÷ जाति का विनाश’ साकार सकता है।

सन्दर्भ

1. सुवीरा जायसवाल, वर्ण, जाति व्यवस्थाः उद्भव, प्रकार्य और रूपान्तरण ( ग्रन्थ शिल्पी, नयी दिल्ली, 2004) पृ. 8-85 यह पुस्तक लेखिका द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित Caste, Origin, Function and Dimension of Change (Manohar Delhi, 1998) का श्री आदित्यनारायण सिंह द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद है। प्रस्तुत लेख में हिन्दी संस्करण का ही हवाला दिया गया है।

2. Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit: Essays on the Ambedkar Movement (Manohar Delhi, 1996) p. 38

3. Quoted in Rajesh Kochhar, The Vedic People : Their History and Geography (Orient Longman, Hyderabad, 2000, paperback ed.) p 9.

4 a . वही, पृ.10

4 b. R.S. Sharma, Sudio in Ancient India (Motilal Banarsidas, Delhi 2nd ed.980, pp 5, 40-42, 296.

5. Vasant Moon, ed. Dr. Babasaheb Ambedkar Writings and Speeches, (Henceforth BAWS) (Education Dept. Govt. of Maharashtra, 1990), Vol. 7, p. 301.

6. Eleanor Zelliot, op./cit., p. 156.

7. वही, पृ. 72 जेलियट के अनुसार The Untouchables दलितों को एक नया मिथक, नया इतिहास, नयी अस्मिता, देने के लिए लिखी गयी थी।

8. Oliver Mendeloohn and Marika Vicziary, The Untouchables: Subordination, Poverty The State in Modern India (Cambridge University Press, published in India by Foundation Books, New Delhi, 2000) p. 20.

9. Gerald D. Berreman, Contributions to Indian Sociology, New Series No V (Dec. 1971) p. 16f.

10. P.V. Kane, History of Dharmasastra, Vol II, pt i (Bhandarkar Oriental Research Institute Poona, 1941) pp 168-73

11. BAWS, Vol. 7, pp 305-7

12. Pushpa Prasad, Female Slavery in Thirteenth Century Gujarat Documents in the Lekha Paddhati India, Historical Review, Vol XV Nos 1-2 (July 1988 to January 1989) pp 273-74

13. Epigraphia Indica, Vol X Liders List No. 1273.

14. R.C. Hazra, Studies in the Upapuranas, Vol I (Sanskrit College, Calcutta, 1958) p 324.

15. R.S. Sharma, Sudras in Ancient India (2nd ed. Motilal Banarsidas, Delhi, 1980) p. 126, Vivekanand Jha, ‘Stages in the History of Untouchables’, Indian Historical Review Vol. II pt. 1 July 1975), pp 14-31.

16. Suvira Jaiswal, Change and Continuity in Brahmanical Religion, Social Scientist, vol. 29 nos. 5-6 (May-June 2000), p 11.

17. Vivekanand Jha, op it, pp 19-20.

18. Irfan Habib, ‘The Peasant in Indian History’, Presidential Address, The Indian History Congress, 43rd Session (Kureekshetra, 1982), pp 11-17.

19. मेक्डानेल और कीथ के अनुसार ऋग्वेद में चमड़े का काम एक सम्मानित व्यवसाय था, परन्तु पालि स्रोतों में चर्मकार की गणना शूद्रों में हुई है। A.A. Macdonell and A.B. Keith, Vedic Index, Vol. II Reprint Motilal Banarsidas, Delhi, 1982, p. 266) फिर भी आज की बहुसंख्य चमार जाति केवल चमड़े के उद्योग में लगे हुए लोगों से अस्तित्व में आयी ऐसा मानना सही नहीं होगा। क्षेत्राीय पर्यवेक्षण से पता चलता है कि बहुसंख्य चमार जाति में कई जनजातियां सम्मिलित हो गयी हैं। यह उत्तर भारत के बड़े क्षेत्रा में फैली हुई है और इसका केवल एक अंश ही परम्परागत चमड़े का कारोबार करता है। अधिक भाग खेतिहर मजदूर है। चमारों में कई उपजातियां हैं। विशेष देखिए Joan P. Mencher, The Caste System Upside Down, or the Not-so-Mysterious East, Current Antropology Vol., 15, No. 4, Dec. 1974, p. 472.

20. Dr. Babasaheb Ambedkar Writings and Speches Compiled by Vasant Moon Vol. 5 (Education Dept. Govt. of Maharashtra, 1989), p. 101

21. सुवीरा जायसवाल, वर्ण आइडियोलोजी एण्ड सोशल चेंज, सोशल साइंटिस्ट Vol. 19 Nos. 3-4 (March-April 1991), pp 41-8, वर्ण जाति व्यवस्था…पृ. 148-149

22. Ouis Dumont, Homo Hierarchies: The Caste System and Its Implications (OUP., Delhi 1988), pp 218f.

23. Dipankar Gupta, Continuous Hierarchies and Diserete Caste, Economic and Political Weekly Vol. 19, No. 46 (17 November 1984) Reprinted in Social Stratification reprinted by Dipanker Gupta (OUP, Delhi, 1991), pp 110-141.

24. B.R. Ambedkar, Annihilation of Caste : An Undeliverred Speech, Edited by Mulk Raj Anand (Arnold Publishers, New Delhi, 1990) p. 82.

25. देखिए सुवीरा जायसवाल, वर्ण जाति व्यवस्था पृ. 106, 134 टि. 354

26. उदाहरण के लिए 1414 ई. के एक ताम्रपत्रा अभिलेख में सूचना दी गयी है कि तत्कालीन दिल्ली के सुल्तान ने अपनी सेवा में नियुक्त बारह क्षत्रिाय परिचारकों को किसी गम्भीर अपराध के कारण गोली से मार दिये जाने का हुक्म दिया परन्तु जौनपुर के पण्डित नन्दराम चौबे ने जो सरकारी खजांची सेठ मणिराम के पुरोहित थे, उनकी सिफारिश की और मृत्युदण्ड की सजा जाति अपकर्ष की सजा में बदल दी गयी। यह आदेश दिया गया कि वे सभी क्षत्रिाय अपराधी और उनकी सन्तान आगे से क्षत्रिायोचित वेशभूषा और हथियार नहीं धारण कर सकेंगे और सुनारी के काम से अपनी जीविका अर्जित करेंगे। ( मनुस्मृति IV 215 में सोनार को निषाद के समकक्ष रखा गया है तथा ब्राह्मण को उसका अन्न खाने से निषेध किया गया है)। इन पतित क्षत्रिायों को अपना गोत्रा बदल कर ÷ कश्यप’ गोत्रा लेना पड़ा और उन्होंने पण्डित नन्दराम चौबे और उनके वंशजों को इस उपकार के बदले में पीढ़ी दर पीढ़ी एक निश्चित रकम देते रहने का वायदा किया।

27. Irfan Habib, Interprcting Indian History (North Eastern Hill University Publications, Shillong, 1985) p. 19.

28. Hermann Kulke, Kings and culbs : State Formation and Legitimation in India and Southeast Asia ( Delhi, 1993) pp 82-93 , सु. जायसवाल, वर्ण जाति व्यवस्था, पृ. 29-30, 71- 77

29. Depankar Gupta, op cit, p. 124 Oliver Mendelsohn and Morika Vicziany, op cit. 1920

30. B.R. Ambedkar, Annihilation of Caste, p 89

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शासक के लिए देखें : ज़ुल्म और अमन

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