Archive for April 13, 2007

डॉ आंबेडकर और व्यक्तिगत स्वाधीनता

प्रकाश लुईस
‘एक बहुत ही नई घटना की सूचना जयपुर रियासत में चकवारा से मिली है। समाचार पत्राों में छपी सूचना से पता चलता है कि चकवारा के एक अछूत ने, जो तीर्थ यात्राा के बाद घर लौटा था, अपने धार्मिक अनुष्ठान को पूरा करने के लिए गाँव के अपने अछूत भाईयों को भोज देने की व्यवस्था की थी। मेजबान की इच्छा थी मेहमानों को बहुमूल्य भोजन खिलाया जाए और उसमें घी से युक्त व्यंजन भी परोसे जाएं। किंतु जिस समय अछूत लोग भोजन कर रहे थे, तभी सैकड़ों की संख्या में हिन्दू लाठियाँ लेकर वहाँ आए, भोजन को खराब कर दिया और अछूतों को बुरी तरह पीटा। परोसे गए भोजन को छोड़ मेहमान अपनी जान बचाने के लिए भाग गए। निस्सहाय अछूतों पर ऐसा प्राण घातक आक्रमण क्यों किया गया? इसका कारण जो बताया है, वह यह था कि अछूत मेजबान इतना धृष्ट था कि उसने घी का प्रयोग किया और उसके अछूत मेहमान इतने मूर्ख थे कि वे उसे खा रहे थे।`

देखें डा बाबा साहब की महानता. बाबा साहब पर फ़िल्म डिविज़न द्वारा बनायी गयी एक दस्तावेज़ी फ़िल्म.

डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा- घी नि:संदेह अमीरों के लिए बिलास की वस्तु है। किंतु कोई भी यह नहीं सोचेगा कि घी ऊंचे सामाजिक स्तर का प्रतीक है। चकवारा के हिन्दुओं ने इसका दूसरा अर्थ लिया और इन अछूतों द्वारा उनके साथ की गई गलती के लिए हिन्दुओं के धार्मिक क्रोध में उनसे बदला लिया, जिन्होंने अपने भोजन में घी परोसकर उनका अपमान किया था। उन्हें यह जानना चाहिए था कि वे हिन्दुओं के सम्मान की बराबरी नहीं कर सकते। इस तरह १९४० में जाति-व्यवस्था का बोलबाला और जाति-उन्मूलन पर लिखते हुए डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय सामाजिक संरचना, व्यक्ति और विभिन्न समूहों का स्थान एवं भूमिका पर प्रकाश डाला था। विशेषकर जातिवाद पर निर्मित भारतीय समाज में व्यक्तिगत स्वाधीनता को कुचलने और कुछेक समूहों की आत्मनिर्भरता को नकारने का घिनौना विचार एवं व्यवहार पर डॉ. अम्बेडकर ने तीखा प्रहार किया था।
यह सर्वविदित है कि डॉ. अम्बेडकर के सिद्धांतों ने पूर्णतया दलित समूह के हर प्रयत्न में प्रभावी भूमिका निभायीं विशेषकर दलित अस्तित्व निर्माण, दलित संघर्ष एवं दलित मुक्ति आन्दोलन। डॉ. अम्बेडकर को यह स्पष्ट रूप से मालूम था कि जाति व्यवस्था पर आधारित भारतीय समाज में व्यक्ति प्रमुख नहीं। यहाँ पर मात्रा समूह की बुनियाद है, यह इसलिए कि हर भारतीय अपनी जाति में जन्म लेता है, जीवनयापन करता है, उसका विवाह उसी जाति के तहत् संभव है और वह उसी जाति में स्वर्गवासी होता है। इसलिए डॉ. आंबेडकर ने व्यक्तिगत स्वाधीनता एवं स्वतंत्राता पर जोर दिया था, ताकि जाति व्यवस्था का नाश हो और हर व्यक्ति अपने बलबूते पर अपना जीवनयापन करें न कि किसी समूह के दबाव से प्रेरित होकर।
यहाँ इस तथ्य को रखने की आवश्यकता यह है कि डॉ. अम्बेडकर ने व्यक्तिगत स्वाधीनता को कोई हवामहल में ढूँढ़ने का प्रयत्न नहीं किया था। कई सारे मनोवैज्ञानिक आदमी की स्वतंत्राता को सामाजिक संरचना से अलग कर देखते हैं। इनकी तुलना में डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय परिवेश में व्यक्तिगत स्वाधीनता को हिन्दू समाज के विभिन्न आयामों के अधीन परखने की कोशिश की थी। इतना ही नहीं, डॉ. अम्बेडकर ने व्यक्तिगत स्वतंत्राता को जाति समूह एवं जाति समूह पर आधारित धंधा-पेशा एवं इससे उत्पन्न सामाजिक संबंध आदि की पृष्ठभूमि में विश्लेषण किया था।
अपने अनगिनत लेखों और वक्तव्यों में डॉ. अम्बेडकर ने यह दर्शाया कि दलितों की व्यक्तिगत स्वाधीनता नामक कोई चीज नहीं। दलितों का जीवन एवं अस्तित्व मात्रा सवर्णों के लिए है। सवर्ण जाति ही तय करती है दलितों के व्यवसाय, धंधा, जीवन-मरण, खान-पान, विचार-व्यवहार आदि। दलितों के जीवन के हर आयामों की सीमा सवर्ण ही निर्धारित करते हैं। इस विषय में कि दलित क्यों मरे हुए पशुओं की खाल निकालते हैं और उसका माँस खाते हैं? सवाल का उत्तर देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने विश्लेषण किया था- “दलितों के इस व्यवहार से घृणा करने वाले सवर्ण जाति कई बुनियादी सवाल नहीं उठाता है। अस्पृश्य सड़ा-गला माँस क्यों खाते हैं? क्या अस्पृश्यों को हिन्दू इस बात की छूट देंगे कि वे उनके मृत पशुओं को उठाना और उनकी खाल उतारना बंद कर दें?” इन सवालों के जवाब में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, यदि ताजा माँस उपलब्ध हो तो कोई भी सड़ा-गला माँस खाना पसन्द नहीं करेगा। अस्पृश्य सड़ा-गला माँस खाकर जिंदा रहते हैं, इसका कारण यह नहीं है कि वे इसे पसन्द करते हैं। सड़ा-गला माँस इसलिए खाते हैं कि उनके पास जिन्दा रहने के लिए कोई साधन नहीं है। सभी धंधों के द्वार उनके लिए बन्द होते हैं। दूसरा, यदि अस्पृश्य लोग हिन्दुओं के मृत पशुओं को उठाते हैं, तो उन्हें विवश होकर ऐसा करना पड़ता है। यदि वे ऐसा करने से इन्कार करते हैं तो उन पर जुर्माना किया जाता है। कुछ प्रांतों में इस घिनौना काम को करने से इन्कार करना दंडनीय अपराध है और जुर्माना किया जा सकता है।
अपने विश्लेषण को आगे जारी रखते हुए डॉ. अम्बेडकर ने लिखा था कि महाड़ में अस्पृश्यों के सम्मेलन में संकल्प लिया गया था कि न तो अस्पृश्य हिन्दुओं के मृत पशुओं की खाल उतारेगा, न ही उसे उठाएगा और न उसके सड़े-गले माँस को खाएगा। इन संकल्पों का दोहरा उद्देश्य था। एक तो यह था कि अस्पृश्यों में आत्म-सम्मान और आत्म-प्रतिष्ठा का भाव जगाया जाए। यह गौण उद्देश्य था। प्रमुख उद्देश्य था, हिन्दू समाज-व्यवस्था पर करारा प्रहार। हिन्दू समाज-व्यवस्था श्रम के विभाजन पर टिकी है। वह हिन्दुओं के लिए स्वच्छ और सम्मानजनक धंधे आरक्षित करती है और धिनौने तथा घटिया धंधा अस्पृश्यों के मत्थे मढ़ती है। अपने इस विश्लेषण से डॉ. अम्बेडकर ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक संरचना लोगों के स्थान एवं भूमिका तय करती है। दूसरा, जहाँ कुछ लोग समाज के हर आयामों पर कब्जा जमाकर संसाधन, सत्ता और शक्ति के बल पर दूसरों को वंचित रखते हैं, तब यह वंचित समूह हर प्रकार के घटिया एवं घिनौना काम करने के लिए बाध्य किए जाते हैं। चूंकि यह वंचित समूह समाज में सबसे ज्यादा तिरस्कृत और घिनौने काम में लगे रहने को बाध्य किए जाता है, उनका व्यक्तित्व कुंठित एवं निकृष्ट हो जाता है। इस प्रकार के कुंठित एवं निकृष्ट व्यक्तित्व में स्वाधीनता या स्वतंत्राता की गुंजाईश नाममात्रा भी नहीं है। जब सारी के सारी व्यवस्थाओं ने अस्पृश्यों के कुंठित व्यक्तित्व को उनका स्वभाव माना था, डॉ. अम्बेडकर ने इस प्रकार के विचार और व्यवहार का कारण सामाजिक संरचना में ढूंढ़ निकाली थी।
एक और उदाहरण के जरिए डॉ. अम्बेडकर ने दलितों को मान-सम्मान से किस प्रकार वंचित रखा जाता है, इसका जिक्र किया। अम्बेडकर का कहना है मनु की धर्म व्यवस्था इन्हें मान-सम्मान से जीने से वंचित रखती है। मनु के धर्म के दैनिक प्रचार-प्रसार की विषैली छूत, पुरूष हो या स्त्राी, बच्चा हो या बूढ़ा, सबके मानस में घुस गई है। यह न्यायाधीशों के मानस में भी घुस गई है। कलकत्ता के एक समाचार के अनुसार, नौबिन नामक एक अस्पृश्य पर बकरी की चोरी करने के इल्जाम में मुकदमा चलाया गया। उसका दोष सिद्ध नहीं हुआ। उसने वादी के खिलाफ मानहानि के लिए फरियाद की। मजिस्ट्रेट ने उसकी फरियाद को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह तो निम्न जाति का है, उसका कोई मान है ही नहीं। इस पर उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि उसका दृष्टिकोण गलत है और दंड प्रक्रिया के अधीन सभी व्यक्ति समान हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि मजिस्ट्रेट को कहाँ से यह भान हुआ कि अस्पृश्य का कोई मान नहीं होता है? निश्चय ही ‘मनुस्मृति` के उपदेश से। इस तरह दलितों को हिन्दू समाज के तहत् कोई सम्मान नहीं है। हिन्दू धर्म के ग्रंथों ने इस आशय की वकालत की थी। हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म में दलितों और वंचितों को गुलाम, निर्बल एवं निचला बनाए रखने के ऐतिहासिक षड्यंत्रा पर डॉ. अम्बेडकर ने लगातार वार किया था। इतना ही नहीं, जब सब कोई जाति व्यवस्था में सुधार लाने की जरूरत पर जोर दे रहे थे, तो डॉ. अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था को जड़-मूल उखाड़ फेंकने की पेशकश की थी।
यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. अम्बेडकर ही भारतीय इतिहास में पहला ऐसा शक्स है, जिसने जाति प्रथा के प्रभाव को उसके बहुआयामी स्वरूप में पहचाना था। उन्होंने कहा -“हिन्दुओं की नीति और आचार पर जाति प्रथा का प्रभाव अत्याधिक सोचनीय है। जाति प्रथा ने जन-चेतना को नष्ट कर दिया है। उसने सार्वजनिक धर्मार्थ की भावना को भी नष्ट कर दिया है। जाति प्रथा के कारण किसी भी विषय पर सार्वजनिक सहमति का होना असंभव हो गया है। हिन्दुओं के लिए उनकी जाति ही जनता है। उनका उत्तरदायित्व अपनी जाति तक सीमित है। उनकी निष्ठा अपनी जाति तक सीमित है। गुणों का आधार भी जाति ही है और नैतिकता का आधार भी जाति ही है। जो व्यक्ति उनकी जाति के नहीं होते तो उनके प्रति सहानुभूति नहीं होती। दुखियों की पुकार का कोई जवाब नहीं है। आदमी कैसा भी हो, सही या गलत, अच्छा या बुरा, बस अपनी जाति का होना चाहिए।”
इस तरह डॉ. अम्बेडकर ने जाति प्रथा को हिन्दू समाज पर लगाम कसती जंजीर के रूप में देखा। अपने इस विश्लेषण को आगे जारी रखते हुए उन्होंने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया, ‘क्या हिन्दुओं ने अपनी जाति के हितों-स्वार्थों की रक्षा करने में अपने देश के प्रति विश्वासघात नहीं किया है?`
डॉ. अम्बेडकर ने अपने मन में व्यक्तिगत स्वाधीनता को रखकर ही हिन्दू समाज पर वार किया था। उनके लिए व्यक्तिगत स्वतंत्राता मूलभूत अधिकार की बुनियाद थी। इसलिए व्यक्तिगत स्वाधीनता को भी राष्ट्रीय मूल्य के लिए वे बलि चढ़ाना नहीं चाहते थे। इसी तरह एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. अम्बेडकर ने दलितों और दबे हुए के दृष्टिकोण से न केवल व्यक्तिगत स्वाधीनता की वकालत की, अपितु इन वंचित वर्गों की स्वाधीनता एवं स्वतंत्राता पर भी विशेष जोर दिया था। भारतीय परिवेश में उन्हें यह अनुभव था कि व्यक्तिगत स्वाधीनता भले सवर्णों के लिए हो सकती है, गरीब-गुर्बा के लिए नहीं।
डॉ. अम्बेडकर के विषय में लिखते हुए डॉ. रामविलास शर्मा यह कहते हैं- “दिसम्बर १९४२ के रेडियो भाषण में अम्बेडकर ने स्वाधीनता, समानता और भाईचारा इन तीन सूत्राों का उद्भव फ्रांसीसी क्रांति में देखा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये नारे अमल में नहीं लाए गए, इसलिए मजदूर वर्ग घाटे में रह गया। उन्होंने कहा कि मजदूर के लिए स्वाधीनता का अर्थ है जनता के द्वारा शासन, मजदूर वर्ग के लिए समानता का अर्थ है सबको काम करने के लिए समान अवसर मिले और राज्य सत्ता का कर्त्तव्य है, प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकताओं के अनुसार विकास के लिए सारी सुविधाएं प्रदान करंे। मजदूरों के लिए समानता का अर्थ है, नागरिक सेवाओं और फौज से लेकर व्यापार और उद्योग धंधों तक हर तरह के विशेषाधिकार खत्म किए जाएं, वे सारी चीजें खत्म हो जाएं जिनसे असमानता पैदा होती है।”
लेकिन यह कहकर रूक जाना कि डॉ. अम्बेडकर ने जाति उन्मूलन की बात की, ताकि दलितों, दबे-कुचलों को स्वाधीनता मिले, वास्तविकता को तोड़-मरोड़ करने के बराबर होगा। डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनगिनत लेख एवं भाषणों में वैकल्पिक समाज बनाने के लिए जो बुनियादी मानवीय मूल्य हैं, उनकी भी जोरदार वकालत की थी।
अपने लेखन में एक और जगह पर डॉ. अम्बेडकर ने यह तर्क दिया था- “जिस समाज में कुछ वर्गों के लोग जो कुछ चाहें वह सब कुछ कर सकें और बाकी वह सब भी न कर सकें जो उन्हें करना चाहिए, उस समाज के अपने गुण होते होंगे, लेकिन इनमें स्वतंत्राता शामिल नहीं होगी। अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आम तौर पर स्वतंत्राता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना अधिक उचित होगा।” इस भांति डॉ. अम्बेडकर ने न केवल व्यक्तिगत स्वाधीनता एवं स्वतंत्राता पर जोर दिया, बल्कि वंचित वर्ग के दृष्टिकोण से वंचित समूहों की स्वाधीनता पर भी बल दिया था। यह इसीलिए कि भारतीय सामाजिक संरचना के तहत् शासक वर्ग के लिए न केवल व्यक्तिगत स्वाधीनता प्राप्त है, बल्कि उनके पास सत्ता और संसाधन हैं । उन्होंने अपने समाज को भी शक्तिशाली बना दिया, जिससे यह समूह जो चाहे उसे कर सकता है। साथ ही साथ यह समूह दूसरे समूहों को स्वतंत्राता से वंचित भी रख सकता है।
राजनीतिक लोकतंत्रा पर डॉ. अम्बेडकर की विवेचना से व्यक्तिगत स्वाधीनता के विषय में उनके विचारों को जाना जा सकता है। उनके अनुसार “;१द्ध व्यक्ति अपने आप में एक सिद्धी है, ;२द्ध व्यक्ति के कुछ अहरणीय अधिकार होते हैं, जिनकी गारंटी उसे संविधान द्वारा दी जाए, ;३द्ध कोई विशेषाधिकार प्राप्त करने की पूर्व शर्त के रूप में किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा न की जाए कि वह अपने संवैधानिक अधिकारों में से किसी अधिकार का परित्याग करे, ;४द्ध राज्य लोगों पर शासन करने के लिए गैर-सरकारी लोगों को शक्तियां प्रदान न करें।” इस तरह डॉ. अम्बेडकर ने व्यक्तिगत स्वतंत्राता पर विशेष जोर दिया था। लेकिन वे यहीं तक रूक नहीं गए, अगर किसी व्यक्ति को जीवन जीने की आवश्यक वस्तुएं प्रचुर मात्राा में उपलब्ध नहीं होतीं, तो स्वाधीनता के अधिकार ज्यादा मायने नहीं रखता है।
डॉ. अम्बेडकर राजनैतिक लोकतंत्रा तक ही अपना विचार सीमित नहीं रखते हैं। वास्तव में वे राजनैतिक लोकतंत्रा से ज्यादा सामाजिक लोकतंत्रा पर जोर देते हैं। उनके मुताबिक- “हमें अपने राजनैतिक लोकतंत्रा को सामाजिक लोकतंत्रा में तब्दील करना चाहिए। राजनैतिक लोकतंत्रा अधिक समय तक चल नहीं सकता अगर इसके आधार में सामाजिक लोकतंत्रा नहीं होता। सामाजिक प्रजातंत्रा का अर्थ क्या है? इसका मायने वे बुनियादी विचार और व्यवहार जो स्वतंत्राता, समानता और बन्धुत्व के मूल्यों पर आधारित हैं, ये तीनों अलग-अलग मूल्य नहीं हैं बल्कि प्रजातंत्रा को बनाए रखने में ये तीनों बराबर की भागीदारी निभाते हैं। समानता के अभाव में कुछ अपनी स्वतंत्राता का उपयोग कर दूसरों पर हुकूमत चलाने लगेंगे। जहाँ स्वाधीनता नहंीं है वहाँ समानता हर प्रकार की व्यक्तिगत प्रेरणा पर लगाम लगाता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बन्धुत्व के बिना स्वाधीनता और समानता अपने आप में सार्थक सिद्ध नहीं हो सकती हैं। इनको क्रियान्वित रखने के लिए किसी एजेंट या ताकत की जरूरत है। २६ जनवरी, १९५० के दिन हम विरोधाभास से भरी परिस्थिति में प्रवेश करेंगे। राजनैतिक क्षेत्रा में हम समानता पर चर्चा करेंगे, मगर सामाजिक और आर्थिक आयामों में हमें असमानता का सामना करना है। राजनीति में हम एक व्यक्ति और एक मत का पालन करेंे, मगर आर्थिक और सामाजिक क्षेत्राों में एक व्यक्ति और एक मूल्य को निरंतर नकारते रहेंगे। अब यह सवाल उठता है कि कब तक हम इन विरोधाभासों के साथ जीते रहेंगे? कब तक हम समाज के वंचित वर्ग को सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रा में समानता से वंचित रखते रहेंगे?”
डॉ. भीमराव अम्बेडकर का यह कथन अपने आप में स्पष्ट है और इस पर कोई टीका-टिप्पणी करने की जरूरत भी नहीं है। इस तथ्य को पुन: एक बार दुहराने की जरूरत है कि डॉ. अम्बेडकर ने प्रजातंत्रा को किसी सरकार के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक सामाजिक गठन के मार्फत देखा। इस सामाजिक गठन के तहत् इन्सान सभी प्रकार के बन्धन से मुक्त किए जाएंगे। इस लिहाज से डॉ. अम्बेडकर का व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वाधीनता की खोज बुर्जुआ राजनैतिक-सामाजिक सुधारकों से भिन्न है। उन्होंने दलित एवं पिछड़ों के दृष्टिकोण से व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वाधीनता की वकालत की थी। सवर्णों के लिए व्यक्तिगत स्वाधीनता अवश्य दूसरों पर हुकूमत चलाने का हथकंडा हो सकता है। लेकिन दलितों के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्राता तब ही सार्थक होगी, जब सम्पूर्ण दलित समुदाय आजाद हांे, छुआछूत, जाति प्रथा, निर्धनता, निर्बलता आदि सामाजिक बन्धनों से मुक्त हों।

अंत में यह कहना उचित है कि डॉ. अम्बेडकर से प्रेरित दलित व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वाधीनता का संघर्ष दोनों भौतिक एवं वैचारिक आयामों से निर्मित होते हैं। चूंकि दलित समूह रोजाना जिन्दगी के भौतिक क्षेत्रा से हू-ब-हू संलग्न है, इनकी स्वतंत्राता का संग्राम किसी दर्शन से प्रेरित नहीं होता। व्यवहार से उत्पन्न विचारों के सिद्धान्त पुन: उनके व्यवहारों को प्रेरित करता है। इसके फलस्वरूप भी क्यों दलित मुक्ति अब भी एक सपना ही रह गया है। इसका कोई सरल उत्तर नहीं है। बस यह अवश्य कहा जा सकता है कि दलित स्वाधीनता तब ही संभव है जब सवर्ण भी जाति प्रथा, सामन्ती विचार और व्यवहार, पुरूष प्रधान सोच एवं कार्य से मुक्त होंगे। दलित और सवर्ण कोई दो समाज के नहीं हैं भले जाति के आधार पर दो खेमों के क्यों न हो। इस लिहाज से सम्पूर्ण भारत के मुक्ति संग्राम तब ही संभव है जब व्यक्ति एवं पूरा समाज स्वाधीनता प्राप्त नहीं करते। डॉ. अम्बेडकर के कथनानुसार जब भारत के हर नागरिक और सम्पूर्ण समाज स्वतंत्राता, समानता और बन्धुत्व के आधार पर समाज और देश का निर्माण करेगा तब व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वाधीनता कारगर सिद्ध होगी। डॉ अम्बेडकर की जयंति इस दिशा की ओर समर्पित रहने के लिए आहवान करता है ।

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April 13, 2007 at 8:19 pm Leave a comment

ऋग्वैदिक भारत और संस्कृत : मिथक एवं यथार्थ


राजेन्द्रप्रसाद सिंह
एसी. दास ने ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में लिखा है कि आर्यों का मूल निवास ‘सप्रसिंधु` या ‘पंजाब` में था। कुछ लोग जो आर्यों को बाहर से आया मानते हैं, वे भी बताते हैं ये लोग प्रथमत: सप्तसिंधु प्रदेश में बसे थे। एक संगत अनुमान यह है कि ऋग्वेद के अधिकांश भाग की रचना लगभग १५००-१२०० ई. पू. के बीच पंजाब में हुई, अथवा कम-से-कम इसमें उल्लिखित घटनाएं इस काल की हैं।१ पर पुरातात्त्विक साक्ष्य इसके समर्थन में नहीं हैं। गैरिक मृद्भांड की संस्कृति (ओ.सी.पी.) ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खाती है। इसका सबसे मोटा जमाव हरियाणा और राजस्थान की सीमा पर अवस्थित जोधपुरा में देखा गया है। बावजूद इसके, इसे ऋग्वेदकालीन लोगों की कृति मानने में कई कठिनाईयां हैं। यह भी कि इस संस्कृति के आज तक ज्ञात लगभग एक सौ से अधिक स्थानों में से बहुत कम ही सप्तसैंधव क्षेत्र में हैं जो कि ऋग्वैदिक सभ्यता का केंद्र था। अधिकांशत: ये स्थल गंगाऱ्यमुना दोआब में केंद्रित हैं।२ प्रत्येक नयी पुरातात्त्विक संस्कृति की खोज के साथ उसे ‘ऋग्वैदिक इंडिया` से जोड़ने की होड़ लग जाती है, पर कोई भी पुरावशेष ऐसा कर नहीं पाता है। कुछ ऐसा ही असमीकरण ‘ऋग्वैदिक इंडिया` से काले एवं लाल मृद्भांड की संस्कृति का भी है। ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खानेवाली तीसरी संस्कृति ताम्र निधियों ;बवचचमत ीवंतकेद्ध की है जिसमें से लगभग आधी गंगाऱ्यमुना दोआब में केंद्रित हैं। सप्तसिंधु से इनका भी वास्ता नगण्य है। इनका वास्ता पूरब में बंगाल और उड़ीसा से है, दक्षिण में आंध्र प्रदेश से है तथा पश्चिम में गुजरात और हरियाणा से है जबकि ऋग्वैदिक लोग पूरब में बंगाल और उड़ीसा तक पहुंचे भी नहीं थे। कुल मिलाकर ऋग्वैदिक जनों की पुरातात्त्विक पहचान की समस्या को सुलझाना कठिन है।३ अब जबकि पुरातात्त्विक साक्ष्य के मूल्य पर महाभारत और रामायण में प्रतिबिंबित ‘महाकाव्य युग` (एपिक एज) की कपोलकल्पित धारणा त्यागी जा रही है, तब क्यों और किस आधार पर आज भी इस कालखंड को भारतीय इतिहास में ‘ऋग्वैदिक इंडिया` कहा जाता है जबकि ‘ताम्र-पाषाण युग` की अवधारणा सर्वाधिक निरापद है।
२.
ऐसी कल्पना कुछ लोगों की है कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में वस्तु-विनियम मुख्य था, पर सोनेे-चांदी के सिक्के भी थे। सोने के सिक्के ‘निष्क` कहे जाते थे। सातवलेकर ने ‘निष्क` का अनुवाद, सोने के सिक्के किया है जो सही मालूम होता है।४ चांदी के सिक्के ‘रजत` हो सकते हैं।५ यदि यह कल्पना ठीक है तो सवाल है कि ऋग्वेद में वर्णित सोने और चांदी के ये सिक्के किस कालखंड के हैं? भारत में प्राप्त सिक्के तो ईसापूर्व छठी सदी से पहले के नहीं हैं। धातु के सिक्के सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मिले हैं। आरंभ में सिक्के प्राय: चांदी के होते थे, हालांकि कुछ तांबे के भी मिले हैं। ये सिक्के आहत मुद्राएं ;च्नदबी डंतामकद्ध कहलाते हैं। सोने के सिक्के भारत में सबसे पहले हिंदऱ्यूनानियों ने जारी किए।६ यदि ऊपर के वर्णन से सिक्के का इतिहास ग्रहण किया जाय तो साफ होगा कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कुछ चीजें बुद्ध और मौर्योत्तर काल में दिखाई पड़ती हैं फिर ‘ऋग्वैदिक इंडिया` इसके पहले कब और कहां था? दावा तो यह भी है कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया` में लौह-प्रौद्योगिकी का ज्ञान था। ऐसा कि ऋग्वैदिक जनों ने एक महिला के कटे हुए पैरों की जगह लोहे की जांघ लगा दी थी७ जबकि इतिहास गवाह है कि लोहे का ज्ञान पाकिस्तान के गंधार क्षेत्र में १००० ई. पू. के आसपास हुआ था।८ बताया यह भी जाता है कि ऋग्वेद में अकेले कुंए के तेरह पर्याय आये हैं। यह भी कि अश्मचक्र (१०.१०१.७) पत्थर के घेरेवाले पक्के कुंए थे।९ पर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि घेरेदार कुंए सबसे पहले मौर्यकाल में गंगा घाटी में प्रकट हुए थे।१० तब क्या यह माना जाय कि ऋग्वेद में जिस ‘अश्मचक्र` की चर्चा है, वह मौर्यकालीन है? यदि नहीं तो आखिर वे कौन-से इंद्रवादी थे जिन्होंने बाद में कुंए को ‘मृग-हस्तिन` (हाथवाले पशु) की तरह जिज्ञासा से ‘इंद्रागार` (वर्षा के देवता इंद्र का घर) कहा था और जिनके देवता ‘इंद्रासन` कुंए में वास करते थे? यह भी कि यदि ऋग्वेद के सभी कूपवाची शब्द तरल हैं तो फिर ऐसे लचीले और बहुरूपिए शब्दों से इतिहास का निर्माण नहीं हो सकता है। कारण कि इतिहास ठोस तथ्यों और प्रमाणिक आंकड़ों के आधार पर लिखा जाता है।
३.
ऋग्वेद की सर्वाधिक चर्चा पुराणों में है।११ ये सभी के सभी अति प्रााचीन होने का दावा करते हैं, परन्तु इनकी रचना या पुनर्रचना छठी से बारहवीं सदी के बीच हुई है।१२ प्राचीन काल के ये सभी पुराण मिथकों, आख्यानों और प्रवचनों से भरे हैं। ऐतिहासिक ग्रंथ ‘अर्थशा`़ है जिसमें वेदों का जिक्र है, पुराणों का भी है जबकि पुराण मौर्यकालीन नहीं हैं, बाद के हैं। ‘अर्थशा`़ में ‘चीनपट्ट` का उल्लेख, जिसका वर्णन प्राय: प्राचीन संस्कृत साहित्य में है, बाद की तिथि सूचित करता है, क्योंकि चीन स्पष्ट ही प्रारंभिक मौर्यों के क्षितिज के बाहर था और नागार्जुनीकोंडा के अभिलेखों के पहले किसी भी भारतीय अभिलेख में उसका उल्लेख नहीं पाया जाता है।१३ अशोक के अभिलेख, सबसे पुराने अभिलेख जो पढ़े जा चुके हैं, में ब्राह्मणों की चर्चा है, स्वर्ग की चर्चा है; पर ऋग्वेद-वेद का कोई उल्लेख नहीं है। चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में दूत बनकर आये मेगास्थनीज की ‘इंडिका` भी वेदों का कोई हवाला नहीं देती है। सर्वाधिक चौंकानेवाला तथ्य तो यह कहा जाना है कि बौद्ध धर्म का उदय वैदिक धर्म के खिलाफ हुआ था। यदि बौद्ध धर्म का उदय वैदिक धर्म के खिलाफ हुआ था तो इसे पश्चिमोत्तर भारत में होना चाहिए था जहां वैदिक संस्कृति का प्रभाव था और आगे भी कई सदियों तक रहा। वास्तविकता तो यह है कि बुद्ध की लड़ाई भारत में पहले से चले आ रहे विश्वासों और मान्यताओं के विरूद्ध थी। ऐसी ही लड़ाई ईरान में जरथु ने लड़ी थी जबकि वहां ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कपोल-कल्पित अवधारणा नहीं है। तब यह शंका निर्मूल नहीं है कि बौद्धधारा वेदपूर्व थी।१४ निश्चय ही ‘तेविज्जसुत्त` (दीर्घनिकाय) का संवाद जिसमें वेदों का जिक्र है, क्षेपक है क्योंकि आरंभिक पालि बौद्धग्रंथों में इंद्र तथा ब्रह्मा को बुद्ध के उपदेशों को श्रद्धापूर्वक सुननेवालों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।१५ अभिलेख भी पीछे नहीं हैं। मद्रास में गुंटूर जिले से प्राप्त वीर पुरुषदत्त के नागार्जुनीकोंडा अभिलेखों में (ईसा की तीसरी सदी) बुद्ध को इंद्र द्वारा पूजित अंकित है।१६
४.
इतिहास का यह तथ्य गलत है कि पुष्यमित्र के स्मरणीय अश्वमेघ यज्ञ से उस ब्राह्मण प्रतिक्रिया का आरंभ होता है जिसकी पूर्णाहुति पांच शताब्दियों के बाद समुद्रगुप्त और उसके उत्तराधिकारियों के काल में होती है। सच यह है कि पुष्यमित्र ब्राह्मण-धर्म का पुनरूद्धारक नहीं था अपितु वह बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया में वैदिक धर्म का संस्थापक था। इतिहास गवाह है कि मौर्य राजाओं ने ईरानी सामन्तों को अपनी सेवा में रखा था। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि चंद्रगुप्त मौर्य के राज्य में एक ईरानी सामंत तुषस्प काठियावाड़ का शासक था।१७ ऐसा ही ईरानी सामंत पुष्यमित्र शुंग था जो अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ का सेनापति था। डा. राजमल बोरा ने श्रीधर व्यंकटेश केतकर के हवाले से बताया है कि मगों का भारतीय इतिहास वेदकाल से पहले का है।१८ पुष्यमित्र शुंग ईरानी मग ब्राह्मण था। हरप्रसाद शाी़ भी शुंगों को ईरानी मानने के पक्ष में थे। पता नहीं क्यों, बाद में उन्होंने यह फैसला वापस ले लिया था। इन्हीं मग ब्राह्मणों ने भारत में आकर सूर्य की एक विशेष पूजा चलायी थी। शुंग राजा इसलिए अपने नाम के साथ ‘मित्र` (सूर्य) लगाया करते थे। गुप्तकाल का ज्योतिषज्ञ वराहमिहिर भी मग ब्राह्मण था जो अपने नाम के आगे ‘मिहिर` (सूर्य) लगाया करता था। मौर्यों के खिलाफ शुंगों का विद्रोह बौद्धधारा के बदले वैदिक धर्म स्थापित करने का उपक्रम था। वैदिक धर्म के इन इंद्रवादियों को ईरान में जरथु ने खारिज कर दिया था जिसकी चर्चा ऋग्वेद के दसवें मंडल में है। बावजूद इसके यह माना जाता है कि ऋग्वेद का भारत में समय अवेस्था से पहले है। शायद जी.ह्मूसिंग ;ळण्भ्नेपदहद्ध का यह निष्कर्ष सही है कि दूसरी शती ई.पू. में भी ऋग्वैदिक स्तोत्रों का संकलन पूर्ण नहीं हुआ था।१९ जाहिर सी बात है कि पश्चिम एशिया के ‘इन्दर` पुराने हैं, पर भारत के संदर्भ में वर्ण-संकोचित ‘इंद्र` नये हैं।
५.
ईरान और भारतवर्ष को छोड़कर प्राचीनकाल में ‘आर्य` शब्द अनातोलिया की हित्ती भाषा में पाया जाता है। अनातोलिया के निकट बोगाजकोइ से, जो हित्ती राजाओं की राजधानी थी, कीलाक्षर इष्टिकाओं में सुरक्षित कुछ अभिलेख मिले हैं। हिंदऱ्यूरोपीय भाषा में यह प्राचीनतम लिखित सामग्री है।२० इनका समय १४०० ई.पू. माना गया है। ऐसा माना जाता है कि आर्य संस्कृति की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता हिंदऱ्यूरोपीय भाषा है।२१ बोगाजकोइ के इन अभिलेखों में तथाकथित ऋग्वैदिक देवताओं को हित्ती-मितन्नी राजाओं के संधि-साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कभी यह नहीं बताया गया है कि ऋग्वेद में बोगाजकोई से आये देवताओं की उपस्थिति है जबकि संभावना इसी की है। बोगाजकोई में ‘अग्नि` साक्षी नहीं हैं। अग्नि तो अवेस्तावादियों के देवता थे जिनकी धाक चंद्रगुप्त मौर्य के राजदरबार में थी। बाद के मौर्य सम्राटों ने ईरानी केंचुल को उतार फेंकने की कोशिश की थी जिसका नतीजा बृहद्रथ-हत्याकांड के रूप में सामने आया। भारत में अग्नि शुंगों के काल में वेदों के माध्यम से स्थापित हुए। बोगाजकोइ के साक्षी-देवता इन्-द-र (इंद्र), उ-रु-वन (वरूण), मि-इत्-र (मित्र) और न-स-अत्-ति-इअ (नासत्यौ) हैं, जिसका कोष्ठक में दिये गये रूप वेदों का है। स्पष्ट है कि ऋग्वेद की भाषा में शब्दों के वर्ण-विलंबित रूपों का स्खलन हुआ है। वैदिक भाषा की प्रवृत्ति वर्ण-संकोच की ओर है। संस्कृत में यह वर्ण संकोच अपनी पराकाष्ठा पर है जिसमें पाणिनि ने अपना व्याकरण लिखा था। अवेस्ता ऐसे मामले में निश्चत रूप से वेदों के सापेक्ष पुराना गं्रथ है। आवेस्तीक गाथाओं की भाषा ऋग्वेद की भाषा की अपेक्षा किसी भी दशा में कम आर्ष ;ंतबींपबद्ध नहीं है अपितु कुछ दृष्टि से अधिक ही आर्ष है।२२ यदि जरथु बुद्ध के समकालीन थे तो यह तय है कि वेदों की रचना बुद्ध के बाद हुई है। शायद इसीलिए ‘ऋग्वेद इंडिया` मौर्यकालीन चित्र प्रस्तुत करता है। इसीलिए यह भी कि बोगाजकोइ के ‘इन्-द-र` से भारत के ‘इंद्र` नये हैं।
६.
‘ऋग्वैदिक इंडिया` में हजार खंभों के ऊपर हजार दरवाजे वाले घर हैं, सौ दीवारों वाले पत्थर के किले हैं, इंद्र की मूर्त्तियां हैं२३ जबकि पुरावशेष इनमें से किसी को स्वीकार नहीं करता है। उत्खननों से पता चलता है कि बहुत-सारे बड़े-बड़े नगर मौर्यकाल के हैं। मेगास्थनीज ने कहा है कि पाटलिपुत्र स्थित मौर्य राजप्रसाद उतना ही भव्य था जितना ईरान की राजधानी में बना राजप्रसाद। पत्थर के स्तंभों और भूलमुंडों के टुकड़े आधुनिक पटना नगर के किनारे कुम्हरार में पाये गये हैं जो ८० स्तंभोंवाले विशाल भवन के अस्तित्व का संकेत देते हैं।२४ इसके पहले इतने विशाल भवनों का कोई भी पुरातात्त्विक साक्ष्य भारत के किसी कोने से कहीं नहीं मिलता है। तब क्या ‘ऋग्वेद इंडिया` का मिथक मौर्यकाल से नहीं जुड़ता है? समय का तकाजा है कि अब वेदों के रचनाकाल के संदर्भ में मीमांसकों को उद्धृत करना बंद कर दिया जाय; जो बताते हैं कि सृष्टि की आयु के साथ वेदों की आयु भी दो अरब वर्ष के लगभग पुराना है। ऋग्वेद के तिथि-निर्धारण में खगोलविज्ञान का प्रयोग भी अविश्वसनीय है।२५ याकोबी और तिलक के अनुयायी अब वैदिक साहित्य में वर्णित नक्षत्रों के आधार पर ज्यातिष और वैदिक रचनाकाल में मनगढ़ंत रिश्ते कायम करना बंद करें। आज जबकि आधुनिक विज्ञान ने पुरावशेषों के काल-निर्धारण के काफी अच्छे तरीके खोज निकाले हैं तब अंतहीन युगचक्रों (मन्वंतरों) की काल-मापक पौराणिक दृष्टि से भारतीय इतिहास को मुक्त हो जाना चाहिए। आज का अध्ययन पुरावशेषों में फ्लोरीन की मात्रा के मापन, काठ कोयले की हड्डी में रेडियो-धर्मिता की मात्रा, भूचुंबकीय अवलोकन और वृक्ष-तैथिकी पर आधारित है तब सत्ययुग या कृतयृग की किसी विलुप्त स्वर्णयुग की कल्पना निरर्थक है।२६
७.
ऐसे तथाकथित गौरवपूर्ण तथा अतिरंजित ‘ऋग्वेद इंडिया` के मनगंढ़त किस्सों के साथ भारत की भाषा का एक प्रकार से जाली वैज्ञानिक इतिहास जुड़ा हुआ है। वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत की सीढ़ी से उतरकर पालि की जमीन पर पैर रखना सर्वथा भ्रामक है। सही इसका उल्टा है। पालि भारत की प्राचीनतम ऐतिहासिक भाषा है इसके साक्षी पुरावशेष हैं। भारत के पुराने अभिलेख पालि भाषा में हैं। पालि भारत की प्राचीनतम प्राकृत भाषाओं में से एक है और यह भी कि पालि भाषा वैदिक भाषा के अधिक निकट है और प्राकृत भाषाएं संस्कृत भाषा के।२७ ई.पू. तीसरी सदी के अशोक के शिलालेख पालि भाषा में हैं। ये सबसे पुराने अभिलेख हैं जो पढ़े जा चुके हैं। अभिलेखों में संस्कृत भाषा ईसा की दूसरी सदी से मिलने लगती है जिसका व्यापक प्रयोग ईसा की चौथी-पांचवीं सदी में होता है। शक राजा रुद्रदामन ने सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लंबा अभिलेख १५० ई. में जारी किया था। शकों को संस्कृत पर गर्व था। शायद इसीलिए रूद्रदामन बड़े अभिमान से कहता है कि संस्कृत भाषा पर उसका अधिकार है। नासिक की बौद्ध गुफाओं के अतिसंस्कृतमय लेख भी शक दाताओं के हैं जबकि सातवाहनों ने अपने अभिलेख प्राकृत भाषा में खुदवाये थे। यह देशी और विदेशी राजाओं की भाषाई प्रतिद्वंद्विता है।२८
८.
संस्कृत के निर्माण में गंधार की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। ५२०-१८ ई. पू. के बहिस्तान शिलालेख इस बात का गवाह हैं कि ईरानियों का कब्जा गंधार पर था। जाहिर है कि ईरानी भाषा तब गंधार में प्रवेश कर चुकी थी जिसे भाषाविज्ञान में प्राचीन फारसी कहते हैं। यह भाषा वैदिक भाषा के करीब है। इसी भाषा में गंधार क्षेत्र की प्राकृतों का मिश्रण होने से संस्कृत भाषा का निर्माण हुआ था। यदि भारत के प्राचीन भूगोल पर विचार करें तो ऐसा दिखलाई देता है कि जितना हम उत्तर-पश्चिम की दिशा की ओर जाते हैं संस्कृत और प्राकृत का अंतर कम होता जाता है। उदाहरणार्थ, गंधारी, प्राकृत में संस्कृत में प्र,र्म,त्र जैसे बहुत-से संयुक्त-व्यंजन के रूप सुरक्षित हंै।२९ इसी गंधार में पेशावर के आसपास का क्षेत्र निया प्रदेश है। निया प्राकृत में श, ष और स तीनों ऊष्म व्यंजन हैं, यह भी किसमें क्र, ग्र, त्र, द्र, प्र, ब्र, भ्र, अविकृत रूप में मिलते हैं। कहना न होगा कि इसी प्रविधि का इस्तेमाल संस्कृत के निर्माण में कसकर किया गया था। शायद इसीलिए ‘अष्टाधयायी` का पणिनि पेशावर के निकट शलातुर का निवासी था।३० मध्य एशिया से आये विदेशी राजववंशों ने भारत में आकर संस्कृत भाषा पर इतना बल क्यों दिया, इसका रहस्य शायद खुल गया होगा। जिसे भाषाविज्ञान में संयुक्त व्यंजन कहा गया है, वह एक प्रकार से वर्ण-संकोच है। संस्कृत इसी वर्ण-संकोच की भाषा है। इस वर्ण-संकोच का सबसे बड़ा औजार ‘र` का बहुरूपिया रूप (व्र, वृ, र्व, र्, त्र, श्र, ऋ) था। ऐसी तकनीक वाली फैक्ट्री में एक बार देशी शब्दों के आ जाने से उनकी शक्ल संस्कृत वाली हो जाया करती थी। १४वीं-१५वीं सदी ई.पू. के आसपास अश्वशा पर हित्ती भाषा में एक रचना मिलती है जिसमें बहुत से ऐसे शब्द हैं जो संस्कृत के निकट हैं। ये शब्द संख्यावाची हैं। ऐसे शब्द देशांतरण के बावजूद कम बदलते हैं। इस रचना में अइक (एक), तेर (त्रि), पंज (पञ्च), सत्त (सप्त) और (नव) शब्दों का प्रयोग अंकों के लिए किया गया है।३१ संख्यावाची पांच के लिए आज भी पंजाबी और सिंधी में हित्ती भाषा का ‘पंज` प्रचलित है और सात के लिए ‘सत्त` का प्रचलन है। यह ‘सत्त` पालि और प्राकृत में भी हैं संस्कृत ‘सप्त` निश्चित रूप से संस्कृत के नये कानून के हिसाब से है। हिन्दी तेरह के समक्ष ‘त्रि` का भी वर्ण-संकोच स्पष्ट है। ऐसी प्रवृत्ति कश्मीरी में भी है। शायद इसीलिए कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जो कश्मीरी का संबंध वैदिक संस्कृत से स्थापित करते हैं। ऐसे भी संस्कृत के पुराने लेखकों का संबंध कश्मीर से रहा है। मध्य एशिया, खास तौर से गंधार क्षेत्र से आयी संस्कृत भाषा के ये सब पद-चिन्ह हैं जिसका साक्ष्य अति प्राचीन का दावा करनेवाले संस्कृत के ग्रंथ सावधानी के बावजूद भी मिटा नहीं सके हैं। वह दिन दूर नहीं जिस दिन यह बताया जाएगा कि संस्कृत ‘आंग्ल` से अंग्रेजी का ‘इंग्लिश` बना है। संस्कृत के प्राय: तत्सम रूप वास्तव में देशी भाषाओं के तद्भव रूप हैं जिसे संस्कृत को मूलभाषा माने जाने की गलती से तद्भव मान लिया जाता है। जाहिर है कि नये कानून के औजारों से पुराने शब्दों को संस्कृत ने अपने कब्जे में लिया था। इसे लूट-खसोट, हड़प या परिमार्जन, जो भी कहेंं।
९.
इतिहासकारों का यह फैसला गलत है कि समृद्ध और शक्तिशाली विदेशी संस्कृत के जरिए अपने को भारतीय कुलीन-वर्ग में स्थापित करने का उपक्रम करते थे। वास्तविकता तो यह है कि संस्कृत विदेशी बाटमारों (भाषा के संदर्भ में रास्ता चलते लूट-पाट) की भाषा थी। इसीलिए संस्कृत का कोई भौगोलिक रूप नहीं मिलता है। प्राकृतों के भौगोलिक रूप (महाराष्ट्री, शौरसेनी, गंधारी, मागधी) मिलते हैं। संस्कृत दूसरी भाषाओं से शब्दों की लूट-पाट की भाषा थी। इसीलिए संस्कृत का कोई अपना भाषाई-भूगोल नहीं था। संस्कृत में प्राकृतों के शब्द-भंडार का संस्कृतिकरण हुआ है। यदि यह पूछा जाय कि संस्कृत किस भू-भाग की भाषा है तो इसका जवाब गोल-मटोल मिलेगा। यह कि संस्कृत वैदिक युग में समस्त मध्यदेश में फैली हुई थी। संस्कृत भाषा की यह अदृष्ट धारा वैदिक युग में मध्यदेश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक ठीक वैसी ही प्रवाहित होती थी जैसे पौराणिक कथाओं में अदृष्ट सरस्वती की पवित्र धारा बहती थी जिसके तट पर आर्यों का प्रमुख उपनिवेश था। सरस्वतीवादियों को अब इस अस्तित्त्वविहीन नदी का पानी नापना बंद कर देना चाहिए। यदि इतने विशाल भू-भाग में संस्कृत बोली जाती थी तब १९२१ एवं १९७१ की जनगणना में संस्कृतभाषी लोगों की जनसंख्या क्रमश: ५५५ एवं १२८२ क्यों पायी गयी है?३२ क्या संस्कृतभाषी लोग जंगलों तथा पहाड़ों में रहने वाले असुविधाभोगी आदिवासियों की तरह विलुप्त हो गये हैं? संस्कृत का वर्चस्व को देखकर ऐसा तो कदापि नहीं लगता है। सच तो यह है कि मुट्ठीभर मध्य एशियाई विदेशियों ने मौर्योत्तर काल में निरंतर दबाव बनाते हुए गुप्तयुग में संस्कृत को राजभाषा बनवाया था जबकि प्राकृत में लिखित साहित्य को दरबारी क्षेत्र के बाहर संरक्षण प्राप्त था। गुप्तयुग में संस्कृत का साहित्य विश्ष्टि वर्ग, दरबार, कुलीन वंश तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों से संबंधित व्यक्तियों से संबंधित था। नि:संदेह संस्कृत गुप्त राजाओं की शासकीय भाषा थी, पर आम जनता की भाषा प्राकृत थी जो उस काल के नाटकों में प्रयुक्त द्वैध भाषा के सामाजिक संदर्भ से स्पष्ट होता है।३३ राजभाषा के मामले में मुगलकाल में यह इतिहास दुहराया जाता है जब ईरानी संस्कृति से प्रभावित दिल्ली के मुट्ठीभर अभिजनों ने फारसी को राजभाषा बनवाया था जबकि बाबर की मातृभाषा तुर्की थी। तुर्क सुलतानों का तुर्की तथा अफगानों की जबान पश्तो कभी भी यहां राजभाषा का दर्जा नहीं नहीं प्राप्त कर सकी।
१०.
भारतीय भाषाओं में ऐसे शब्द नहीं मिलते हैं जो ब्राह्मण और क्षत्रिय के सजात शब्द हों, पर विश् (वैश्य) से मिलते-जुलते शब्द बहुसंख्यक हिंदऱ्यूरोपीय भाषाओं में मिलते हैं।३४ जाहिर है कि भारत की वर्णमूलक संस्कृति ऐसे लोगों द्वारा लायी गयी है जिन्होंने संस्कृत के नियम-कानून बनाये हैं। वर्ण-संकोच की ऐसी भाषा जो आम जनता और सुविधाभोगी वर्ग के बीच फासला पैदा करके लूटने की सुविधा दे। ऐसी ही वर्ण-संकोचमूलक भाषा और वर्ण-विस्तारमूलक समाज के बलबूते गुप्तकाल को भारतीय इतिहास में अभिजात्य नजरिये से ‘स्वर्णयुग` कहा जाता है। एक ऐसा युग जिसमें ब्राह्मणों को उदारतापूर्वक दान दिये जाते थे, मंदिर बनवाये जाते थे और महिलाएं सती हुआ करती थीं। सबसे चौंकानेवाली बात तो यह है कि इस काल में वर्ण-व्यवस्था पर आधारित ‘अमरकोश` लिखा जाता है। ऐसे समय में संस्कृत को राजभाषा बनाया जाना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है। पर संस्कृत पुरानी भाषा नहीं है। पैशाची पुरानी है। चीन तुर्किस्तान के खरोष्ठी शिलालेखों में इसका पुरातात्त्विक साक्ष्य मिलता है।३५ भाषावैज्ञानिकों का फैसला है कि यह वैदिक संस्कृत के निकट की भाषा है।
११.
निष्कर्ष यह कि वैदिक भाषा ईरान की प्राचीन फारसी, पश्चिमोत्तर की पैशाची और भारत की पालि के लगभग समकालीन थी। इसे ज्यादा से ज्यादा ६०० ई.पू. के आसपास का माना जाना चाहिए। वैदिक भाषा का अगला पड़ाव संस्कृत है। यह संस्कृत ईरान की पहलवी, पश्चिमोत्तर की निया प्राकृत एवं भारत के मिश्रित बौद्ध संस्कृत के प्राकृतांश के लगभग समकालीन है। मिश्रित बौद्ध संस्कृत की भाषा पालि के बाद पहली सदी के आसपास की है जब पश्चिमोत्तर में संस्कृत का जन्म हो रहा था। एक ऐसी भाषा जिसके जनमने के बाद उसकी मां पैशाची मृतप्राय हो जाती है। पालि में संस्कृत का प्रवेश बाद में हुआ, इसलिए कि इसके पहले संस्कृत भाषा नहीं थी। इस भाषा का उदय ईसा की पहली सदी के आसपास होता है। इसीलिए फ्रैंके ने दिखाया है कि शिलालेखों की भाषा के रूप में संस्कृत प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रकट होती है।३६ जाहिर है कि संस्कृत की प्राचीनता सिर्फ साहित्यिक या कहें मनगढ़ंत है, तभी तो अमेरिकी भाषावैज्ञानिक ब्लूमफील्ड को आश्यर्च होता है।३७ बात एकदम साफ है कि वैदिक भाषा भी पालि और पैशाची प्राकृतों की तरह ईसा से पहले की एक प्राचीन प्राकृत है जबकि संस्कृत ईसा के आसपास की ‘साहित्यिक प्राकृतों` की तरह एक प्रकार से कृत्रिम भाषा है। आज की तारीख में पालि भारत की सबसे पुरानी ऐतिहासिक भाषा है। भाषा के जानकार अब वैदिक और लौकिक संस्कृत के बाद पालि का इतिहास लिखना बंद करें और ‘ऋग्वैदिक इंडिया` की कपोल-कल्पित अवधारणा के साथ वैदिक भाषा को जोड़कर उसे पालि के पहले सिद्ध करने से बाज आवें।

संदर्भ
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अपने शोधपूर्ण लेखों के लिए प्रतिष्ठित राजेन्द्रप्रसाद सिंह सासाराम के एक कॉलेज में प्राध्यापक हैं। जन विकल्प से साभार प्रस्तुति.

April 13, 2007 at 7:52 pm 3 comments


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