Archive for April 18, 2007

नंदीग्राम की कसम

नरेंद्र कुमार
मैं लाल झंडे की कसम खाता हूं
नंदीग्राम के बारे में मैं कोई बहस नहीं करुंगा
क्योंकि कामरेडों ने नंदीग्राम पर बहस पर रोक लगा दी है।

आज मैं मुक्तिबोध पर बहस करुंगा
जिन्होंने लिखा था कि अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए
उठाने ही होंगे खतरे तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब

आज मैं सफदर हाशमी की हत्या के बारे में बहस करुंगा
जो मार दिये गये उस समय,
जब वे बोल रहे थे साम्राज्य की शक्तियों के खिलाफ।

आज मैं गुजरात के बारे में बहस करुंगा
जहां राजसत्ता और हिंदूवादी गुंडों ने
गोधरा के बहाने मचाया था कत्लेआम।

आज मैं जालियांवाला बाग के बारे में बहस करुंगा
जहाँ देश के लोग मारे गये थे विदेशी राजसत्ता की गोलियों से जब वे उनकी गुलामी स्वीकार करने से
मना करने लगे थे।

आज मैं भगत के बारे में बहस करुंगा
जिन्होंने इन तमाम तरह की फासीवादी ताकतों के खिलाफ
लड़ने का आह्उाान किया था।

लेकिन मैं नंदीग्राम के बारे में कोई बहस नहीं करुंगा
क्योंकि नंदीग्राम में मैंने
जालियांवाला बाग, गुजरात और सफदर की हत्या का दृश्य
एक साथ देखा है।

नंदीग्राम के बारे में बहस करना
अब बेमानी है
नंदीग्राम के बाद सिर्फ पक्ष चुनना बाकी है
कि तुम किसकी तरफ से लड़ोगे।

और मैंने अपना पक्ष चुन लिया है।
इसलिए नंदीग्राम के बारे में मैं कोई बहस नहीं करुंगा।

नरेंद्र कुमार युवा एक्टिविस्ट और सामाजिक सरोकारोंवाले लेखक है. उनके दो उपन्यास ’20वीं सदी के नायक’ तथा ’चुनाव’ आ चुके हैं और चर्चा में भी रहे हैं.

बुलावा
विश्वजीत सेन
विकास रोकने के लिए विदेश से पैसे आ रहे हैं
बिमान बसु, राज्य सचिव, सीपीआइ एम
दैनिक स्टेट्समैन बांग्ला

इतना दूर हो गये हैं वे
जन-जागृति से कि
जब-जब जनता जागती है
तब तब फुसफुसाने लगते हैं
एक दूसरे के कानों में
विदेशी पैसे का ही करतब है यह सब कुछ
विदेशी… विदेशी…
इस बरताव को क्या हम कह सकते हैं? स्वदेशी ?
पंजे उठाये, नाखून निकाले
चारों दिशा से दौड़ते आ रहे हैं
‘विदेशी लफड़े`
यह देखते ही वे तेल तथा घी में नहलाने लगते हैं
कैडरों को,
उनके हाथों में जबरन ठूंस देते हैं-कट्टे, बम,
कैडर्स होने लगते हैं पहलवानों जैसे तगड़े, और भी तगड़े
उधर ‘दर्शन` के खाली कमरे में भटकती है हवा
पीटती छाती ‘हाय, हाय, हाय`
बुलाती है बहुराष्ट्रीय संस्थाएं
बस पहंुच ही चुके हैं आप, आगे बढ़ें
आयें, आयें, आयें

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April 18, 2007 at 9:48 am 1 comment

भरत मंडल की मां

जय गोस्वामी

नंदीग्राम में प्रतिरोध की पहली पांत में जो महिलाएं खड़ी थीं, उनका आवेग सही नहीं था.
नंदीग्राम के बारे में सुनील गंगोपाध्याय,
आनंद बाजार पत्रिका, 16 मार्च, 07

बूढ़ी बोलीं-
‘मेरा एक बेटा तो गया
दूसरे को भी वे ले जायें
मेरे इन हाथों को देखो बेटा…`
कह कर उन्होंने उठाये अपने कांपते,
नस निकले हाथ,
दिखाये… इन दो हाथों से
खेत के सारे काम
निपटाये हैं मैंने अब तक,
इन्हीं हाथों से
जमीन को छीन जाने से रोकूंगी.`

मौसी-माई, आपके पास
ईंट भट्ठे में छुपाये गये हथियारों का जखीरा
नहीं है,
मौसी-माई, आपके पास
हथियारों से लैस पुलिस नहीं है
मौसी-माई, आपके पास
चप्पल पहने, पुलिसिया वरदी में
हजारों कैडर नहीं हैं,
फिर भी इतनी ताकत
आप लाती कहां से हैं?

यह मुझे पता नहीं
सिर्फ इतना जानती हूं

कभी कभी देवी दुर्गा
किसान की मां बन कर
हमलोगों को दर्शन देती हैं…

कौन ज्यादा कौन कम
जय गोस्वामी

मेरी समझ है कि वह मुख्यमंत्री खुद भी अकेला होते ही शोग्रस्त हो जाते हैं.
-नंदीग्राम के बारे में सुनील गंगोपाध्याय, आनंद बाजार पत्रिका, 16 मार्च, 07

ताकि पहचान न करा सके
इसलिए जिसकी जीभ
उन्होंने काट ली बलात्कार के बाद
दोनों हाथों से दोनों पैरों को पकड़
फाड़ डाला गया जिसके नवजात बच्चे को,
जिसके पति की गरदन काट कर
फेंक दी गयी आंगन के किनारे,
मर गया, फिर भी मुंह में पानी
नहीं देने दिया गया,
उन महिलाओं के भीतर
शोक की जो आग जल रही है
उसे अलग रखो
उस शासक की दो घंटे की उदासी,
जिसने गोली चलाने का हुक्म दिया था
फिर नाप लो
कौन ज्यादा हेै, कौन कम
सोचो, किसने कहा था
जीना हराम कर दूंगा
अगर जरूरत हुई, तो जान से
मार डालूंगा, जान से…`

इतना ही तो कहा था
तभी मोर के मुंह से आ गया खून
फिर वह नाचते हुए
परिक्रमा करने लगा श्मशानों की

उसके नृत्य से गिरने लगे
हर दिशा में
जलते पंख…

अजीब अंधेरा
जय गोस्वामी

वे इस बंगाल में ले आये हैं आज
एक अजीब अंधेरा
जिन्होंने कहा था ‘अंधेरे को दूर भगायेंगे हम`
वही आज सारी रोशनी का लोप कर रहे हैं,
अंधेरे के राजाओं के हाथ
सुपुर्द कर रहे हैं जमीन और चेतना-
‘तेभागा` की स्मृतियों को दफन कर रहे हैं
कह रहे हैं ‘जाओ, पूंजी के आगोश में जाओ`

नंदिनी अपने दोनों हाथों से
हटा रही है अंधेरा, पूकारती-‘रंजन कहां हो तुम!`
जितने रंजन हैं सभी घुसपैठिये, यह मान कर
जारी हुआ है वारंट
फिर भी वे आ खड़े हो रहे हैं
किसानों के कंधें से कंधा मिला कर
‘तेभागा` के कंधें से कंधा मिला कर
उनकी प्रतिध्वनि जगा रही है संकल्प के पर्वत-सी मानसिकता,
विरोध चारों ओर, कोतवाल त्रस्त हैं

युद्ध के मैदान में रेखाएं खींची जा चुकी हैं
तय कर लो तुम किधर जाओगे,
क्या तुम भी कदम बढ़ाओगे व्यक्ति स्वार्थ की चहारदीवारी की ओर
जैसे पूंजी की चाकरी करनेवाले ‘वाम` ने बढ़ाये हैं
या रहोगे मनुष्य के साथ
विभिन्न रंगों में रंगे सेवादासों ने
षड़यंत्रों के जो जाल बुने हैं
उन्हें नष्ट करते हुए
नये दिवस का, नये समाज का स्वप्न
देखना क्या नहीं चाहते तुम?

अगर नहीं आज…

जय गोस्वामी
दर्शक,
देखो उस मां को, जो
सीने से बच्चे को चिपकाये
अपना बलात्कार रोकने का प्रयास
कर रही है…

देखो, उनलोगों नेे छीन लिया उसके बच्चे को,
उसके सर को मुठ्ठी में पकड़
घुमाया दो-ढाई बार,
टूट गयी उसकी गरदन
फिर उस तिलमिलाते पुतले को
फेंक दिया नदी में

खड़े-खड़े यह दृश्य तुमने देखा
मैंने भी

इसके बाद किसी के पदत्याग की मांग करने से
मिलना क्या है?

अगर आज नहीं वापस ला सके
उन तमाम गांवों को
जो श्मशान में तबदील हो गये,
अगर आज नहीं इकट्ठा कर सके
उन तमाम रुलाइयों को
जो सूख गयीं,
अगर नहीं आज उनका एक स्तूप बन सके
अगर नहीं आज सारे शोक, जो सहम गये
एक चिनगारी बन
विस्फोट कर सकें?

जय बांग्ला के बडे़ कवि हैं. इन कविताओं का अनुवाद विश्वजीत सेन ने किया है.

April 18, 2007 at 9:43 am 1 comment

नंदीग्राम की कसम

नरेंद्र कुमार
मैं लाल झंडे की कसम खाता हूं
नंदीग्राम के बारे में मैं कोई बहस नहीं करुंगा
क्योंकि कामरेडों ने नंदीग्राम पर बहस पर रोक लगा दी है।

आज मैं मुक्तिबोध पर बहस करुंगा
जिन्होंने लिखा था कि अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए
उठाने ही होंगे खतरे तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब

आज मैं सफदर हाशमी की हत्या के बारे में बहस करुंगा
जो मार दिये गये उस समय,
जब वे बोल रहे थे साम्राज्य की शक्तियों के खिलाफ।

आज मैं गुजरात के बारे में बहस करुंगा
जहां राजसत्ता और हिंदूवादी गुंडों ने
गोधरा के बहाने मचाया था कत्लेआम।

आज मैं जालियांवाला बाग के बारे में बहस करुंगा
जहाँ देश के लोग मारे गये थे विदेशी राजसत्ता की गोलियों से जब वे उनकी गुलामी स्वीकार करने से
मना करने लगे थे।

आज मैं भगत के बारे में बहस करुंगा
जिन्होंने इन तमाम तरह की फासीवादी ताकतों के खिलाफ
लड़ने का आह्उाान किया था।

लेकिन मैं नंदीग्राम के बारे में कोई बहस नहीं करुंगा
क्योंकि नंदीग्राम में मैंने
जालियांवाला बाग, गुजरात और सफदर की हत्या का दृश्य
एक साथ देखा है।

नंदीग्राम के बारे में बहस करना
अब बेमानी है
नंदीग्राम के बाद सिर्फ पक्ष चुनना बाकी है
कि तुम किसकी तरफ से लड़ोगे।

और मैंने अपना पक्ष चुन लिया है।
इसलिए नंदीग्राम के बारे में मैं कोई बहस नहीं करुंगा।

नरेंद्र कुमार युवा एक्टिविस्ट और सामाजिक सरोकारोंवाले लेखक है. उनके दो उपन्यास ’20वीं सदी के नायक’ तथा ’चुनाव’ आ चुके हैं और चर्चा में भी रहे हैं.

बुलावा
विश्वजीत सेन
विकास रोकने के लिए विदेश से पैसे आ रहे हैं
बिमान बसु, राज्य सचिव, सीपीआइ एम
दैनिक स्टेट्समैन बांग्ला

इतना दूर हो गये हैं वे
जन-जागृति से कि
जब-जब जनता जागती है
तब तब फुसफुसाने लगते हैं
एक दूसरे के कानों में
विदेशी पैसे का ही करतब है यह सब कुछ
विदेशी… विदेशी…
इस बरताव को क्या हम कह सकते हैं? स्वदेशी ?
पंजे उठाये, नाखून निकाले
चारों दिशा से दौड़ते आ रहे हैं
‘विदेशी लफड़े`
यह देखते ही वे तेल तथा घी में नहलाने लगते हैं
कैडरों को,
उनके हाथों में जबरन ठूंस देते हैं-कट्टे, बम,
कैडर्स होने लगते हैं पहलवानों जैसे तगड़े, और भी तगड़े
उधर ‘दर्शन` के खाली कमरे में भटकती है हवा
पीटती छाती ‘हाय, हाय, हाय`
बुलाती है बहुराष्ट्रीय संस्थाएं
बस पहंुच ही चुके हैं आप, आगे बढ़ें
आयें, आयें, आयें

April 18, 2007 at 4:30 am 1 comment

भरत मंडल की मां

जय गोस्वामी

नंदीग्राम में प्रतिरोध की पहली पांत में जो महिलाएं खड़ी थीं, उनका आवेग सही नहीं था.
नंदीग्राम के बारे में सुनील गंगोपाध्याय,
आनंद बाजार पत्रिका, 16 मार्च, 07

बूढ़ी बोलीं-
‘मेरा एक बेटा तो गया
दूसरे को भी वे ले जायें
मेरे इन हाथों को देखो बेटा…`
कह कर उन्होंने उठाये अपने कांपते,
नस निकले हाथ,
दिखाये… इन दो हाथों से
खेत के सारे काम
निपटाये हैं मैंने अब तक,
इन्हीं हाथों से
जमीन को छीन जाने से रोकूंगी.`

मौसी-माई, आपके पास
ईंट भट्ठे में छुपाये गये हथियारों का जखीरा
नहीं है,
मौसी-माई, आपके पास
हथियारों से लैस पुलिस नहीं है
मौसी-माई, आपके पास
चप्पल पहने, पुलिसिया वरदी में
हजारों कैडर नहीं हैं,
फिर भी इतनी ताकत
आप लाती कहां से हैं?

यह मुझे पता नहीं
सिर्फ इतना जानती हूं

कभी कभी देवी दुर्गा
किसान की मां बन कर
हमलोगों को दर्शन देती हैं…

कौन ज्यादा कौन कम
जय गोस्वामी

मेरी समझ है कि वह मुख्यमंत्री खुद भी अकेला होते ही शोग्रस्त हो जाते हैं.
-नंदीग्राम के बारे में सुनील गंगोपाध्याय, आनंद बाजार पत्रिका, 16 मार्च, 07

ताकि पहचान न करा सके
इसलिए जिसकी जीभ
उन्होंने काट ली बलात्कार के बाद
दोनों हाथों से दोनों पैरों को पकड़
फाड़ डाला गया जिसके नवजात बच्चे को,
जिसके पति की गरदन काट कर
फेंक दी गयी आंगन के किनारे,
मर गया, फिर भी मुंह में पानी
नहीं देने दिया गया,
उन महिलाओं के भीतर
शोक की जो आग जल रही है
उसे अलग रखो
उस शासक की दो घंटे की उदासी,
जिसने गोली चलाने का हुक्म दिया था
फिर नाप लो
कौन ज्यादा हेै, कौन कम
सोचो, किसने कहा था
जीना हराम कर दूंगा
अगर जरूरत हुई, तो जान से
मार डालूंगा, जान से…`

इतना ही तो कहा था
तभी मोर के मुंह से आ गया खून
फिर वह नाचते हुए
परिक्रमा करने लगा श्मशानों की

उसके नृत्य से गिरने लगे
हर दिशा में
जलते पंख…

अजीब अंधेरा
जय गोस्वामी

वे इस बंगाल में ले आये हैं आज
एक अजीब अंधेरा
जिन्होंने कहा था ‘अंधेरे को दूर भगायेंगे हम`
वही आज सारी रोशनी का लोप कर रहे हैं,
अंधेरे के राजाओं के हाथ
सुपुर्द कर रहे हैं जमीन और चेतना-
‘तेभागा` की स्मृतियों को दफन कर रहे हैं
कह रहे हैं ‘जाओ, पूंजी के आगोश में जाओ`

नंदिनी अपने दोनों हाथों से
हटा रही है अंधेरा, पूकारती-‘रंजन कहां हो तुम!`
जितने रंजन हैं सभी घुसपैठिये, यह मान कर
जारी हुआ है वारंट
फिर भी वे आ खड़े हो रहे हैं
किसानों के कंधें से कंधा मिला कर
‘तेभागा` के कंधें से कंधा मिला कर
उनकी प्रतिध्वनि जगा रही है संकल्प के पर्वत-सी मानसिकता,
विरोध चारों ओर, कोतवाल त्रस्त हैं

युद्ध के मैदान में रेखाएं खींची जा चुकी हैं
तय कर लो तुम किधर जाओगे,
क्या तुम भी कदम बढ़ाओगे व्यक्ति स्वार्थ की चहारदीवारी की ओर
जैसे पूंजी की चाकरी करनेवाले ‘वाम` ने बढ़ाये हैं
या रहोगे मनुष्य के साथ
विभिन्न रंगों में रंगे सेवादासों ने
षड़यंत्रों के जो जाल बुने हैं
उन्हें नष्ट करते हुए
नये दिवस का, नये समाज का स्वप्न
देखना क्या नहीं चाहते तुम?

अगर नहीं आज…

जय गोस्वामी
दर्शक,
देखो उस मां को, जो
सीने से बच्चे को चिपकाये
अपना बलात्कार रोकने का प्रयास
कर रही है…

देखो, उनलोगों नेे छीन लिया उसके बच्चे को,
उसके सर को मुठ्ठी में पकड़
घुमाया दो-ढाई बार,
टूट गयी उसकी गरदन
फिर उस तिलमिलाते पुतले को
फेंक दिया नदी में

खड़े-खड़े यह दृश्य तुमने देखा
मैंने भी

इसके बाद किसी के पदत्याग की मांग करने से
मिलना क्या है?

अगर आज नहीं वापस ला सके
उन तमाम गांवों को
जो श्मशान में तबदील हो गये,
अगर आज नहीं इकट्ठा कर सके
उन तमाम रुलाइयों को
जो सूख गयीं,
अगर नहीं आज उनका एक स्तूप बन सके
अगर नहीं आज सारे शोक, जो सहम गये
एक चिनगारी बन
विस्फोट कर सकें?

जय बांग्ला के बडे़ कवि हैं. इन कविताओं का अनुवाद विश्वजीत सेन ने किया है.

April 18, 2007 at 4:25 am 1 comment


calander

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