Archive for April 30, 2007

जाति आधारित जन गणना के पक्षधर थे मधु लिमये

विनोदानंद प्रसाद सिंह
एक मई, १९२२ को समाजवादी नेता मधु रामचंद्र लिमये का जन्म हुआ था. उनका देहावसन ८ जनवरी को हुआ. भारत में समाजवादी आंदोलन की पहली पीढ़ी के नेता आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ राममनोहर लोहिया के बाद सबसे अधिक लेखन मधु लिमये ने कि या. वे के वल लेखक नहीं थे. उन्होंने कि सी से भी क म संघर्ष नहीं कि या. १९८२ में वे दलगत राजनीति से अलग हो गये. दलगत राजनीति छोड़ने का वास्तविक कारण था, राजनीति के चरित्र का उनके माफि क नहीं रह जाना. उन्होंने एक घटना का जिक्र मुझसे कि या था. मधु लिमये पहली बार १९६४ के उपचुनाव में मुंगेर संसदीय क्षेत्र से लोक सभा के लिए निर्वाचित हुए थे. फि र १९६७ मं वहीं से जीते थे. वहीं से १९७७ में जीते. १९८० में वे बांका से चुनाव लड़ रहे थे. दोनों ही क्षेत्र पड़ोसी क्षेत्र हैं. संयोगवश एक ऐसा इलाका है जो पहले मुंगेर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था और बाद में बांका क्षेत्र का हिस्सा हो गया. वहां एक जगह एक सज्जन १९६४ से ही अपना मकान चुनाव कार्यालय के लिए देते थे. क भी उन्होंने कोई कि राय नहीं मांगा. १९८० में भी वहीं उनका चुनाव कार्यालय था. इस बार मालिक ने कि राया मांगा. कार्यक र्ता ने जब मधु जी की साधनहीनता की बात क ही तो मकान मालिक ने क हा कि अब तो वे सत्तारू ढ़ पार्टी के सदस्य हैं तो फिर साधनहीनता क्यों? मधुजी इस उत्तर से मर्माहत हुए थे. ऐसी घटनाएं बड़ा कारण बनीं. मधुजी की इस क थनी-क रनी में अंतर नहीं था. वे सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध थे. इसके अनेक उदाहरण हैं. वर्षों पहले जब अनेक समाजवादी, साम्यवादी और सिद्धांत क ी दुहाई देनेवाले नेता बात तो क रते थे समान शिक्षा क ी, लेकि न अपनी संतानों क ो पढ़ने के लिए भेजते थे अंगरेजी माध्यम के तथाक थित पब्लिक स्कू लों में, उस समय उन्होंने अपने एक लौते पुत्र अनिरुद्ध क ो भेजा था मराठी माध्यम से स्कू ल में. १९५५ में बीमार रहने के बावजूद उन्होंने गोवा मु`ति आंदोलन में भाग लिया, जहां पुर्तगालियों ने उनक ी क स क र पिटाई क ी थी. एक बार तो यह भी अफ वाह उड़ी कि उनक ी मृत्यु हो गयी. पुर्तगाली सैनिक अदालत ने १२ साल क ी क ठोर सजा दी थी. १९५७ में भारत सरक ार और जनमत के दबाव में सारे आंदोलनक ारियों क ो रिहा कि या गया.
१९७५ में इंदिरा गांधी ने आपातक ाल लागू क र लोक तंत्र क ा गला घोंटा था और तानाशाही स्थापित क ी थी. उसी के तहत लोक सभा क ी मियाद भी पांच साल से छह साल क र दी गयी थी. आम चुनाव १९७१ में हुआ था और १९७६ में उसक ी मियाद पूरी हो रही थी. अनेक विपक्षी सांसद जेलों में बंद थे. के वल मधु लिमये ने १९७६ में संसद क ी मियाद पूरी होने पर इस्तीफ ा दिया था. उन्हीं से प्रभावित हो क र उनके साथी सह बंदी शरद यादव ने भी इस्तीफ ा दिया था. १९७७ के चुनाव में जनता पार्टी क ी जीत हुई और मोरारजी भाई प्रधानमंत्री बने. मधु लिमये एक प्रमुख घटक के नेता थे. वे स्वयं मंत्रिमंडल में जा सक ते थे. लेकि न इसके बदले उन्होंेने मधु दंडवते, जार्ज फ र्नांडीस और पुरुषोत्तम क ौशिक क ो मंत्रिमंडल में भेजा. मधु लिमये क ो १९८० में बांक ा चुनाव हारने के बाद चौधरी चरण सिंह ने राज्य सभा क ा सदस्य बनने क ा आग्रह कि या. लेकि न उन्होंने पिछले दरवाजे से सांसद में जाना स्वीक ार नहीं कि या. मधु लिमये प्रखर राष्टवादी थे. आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या थी एक राष्टराज्य बनाने क ी. ७० और ८० के दशक में जब पंजाब, असम जैसे राज्यों में अस्मिता के सवाल पर आंदोलन शुरू हुए, उस समय बहुत सारे समाजवादी भी उसके पक्षधर थे. मैं भी उनमंे से एक था. उस समय भी मधु जी ने उसक ा समर्थन नहीं कि या था. जब पंजाब से पानी के सवाल पर संघर्ष शुरू होक र स्वायत्तता क ी मांग तक पहुंच रहा था तो मधु जी ने एक लंबा शोधपरक लेख लिखा और क हा कि वास्तव में अन्याय तो राजस्थान के साथ हो रहा है. इसक ा यह मतलब नहीं कि मधु जी सिखों या असम के छात्रों के खिलाफ थे. १९८४ में इंदिरा गांधी क ी हत्या के तत्क ाल बाद सिखों क ा क त्ल कि या जा रहा था. उन दिनों मधु जी वेस्टर्न क ोर्ट के एक क मरे में रहते थे. वेस्टर्न क ोर्ट के अहाते के बाहर एक टै`सी पड़ाव था, जहां अधिक तर गाड़ी चलानेवाले सिख थे. उन पर हमला हुआ था और गाड़ियों में आग लगा दी गयी थी. प्रतिकू ल स्वास्थ्य के बावजूद वे बाहर निक लने के लिए छटपटा रहे थे और बार बार क ह रहे थे कि `या यही देखने के लिए मैंे जिंदा हूं.
उन्होंने क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल क ो श`ति और सत्ता के विकेें द्रीक रण से जोड़ा और चौखंभा राज्य क ी अवधारणा क ी पुनर्व्याख्या क ी. वे मानते थे कि राष्ट तभी मजबूत हो सक ता है जब देश में समता के मूल्यों पर आधारित समाज क ा निर्माण हो. इसलिए वे क मजोर तबक ोंक ो विशेष अवसर देने क ी वक ालत क रते रहे. जब १९९० में मंडल क मीशन के एक हिस्से क ो लागू क रने के सवाल पर पूरे देश में बवाल मचा तो भी उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर अपनी बात क हनी नहीं छोड़ी. उस समय उन्होंेने एक लंबा लेख लिखा था, जिसक ा शीर्षक था-आरक्षण क ी स्वत: समापनीय योजना. उन्होंने क हा कि जनगणना द्वारा विभिन्न जातियों क ी संख्या क ा पता लगाना जरू री है. जातियों क ी जनगणना क रने में जातीयता नहीं बढ़ती. १९३१ के बाद जाति आधारित जनगणना खत्म क र दी गयी. उससे जातीयता खत्म हो गयी? या बढ़ी? उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अन्य पिछड़े वर्गों एवं उच्च् जातियों के गरीब तबक ों क ो उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और ऐसा न हो कि आरक्षित क ोटे पर के वल पुरुषों क ा एक ाधिक ार हो. उस समय ही उन्होंने सुझाव दिया था कि सुझाव में आरक्षण लागू होने पर विचार क रना चाहिए, `योंकि अन्य पिछड़े वर्गों में शिक्षा क ा प्रसार नहीं होगा तब तक सेवाओं मेंे आरक्षण दिखावे क ी वस्तु होगी. यह भी क हा था कि उच्च् जातियों-वर्गों के आर्थिक दृष्टि से क मजोर तबक ों क ो भी आरक्षण मिले. आरक्षण क ी सीमा ५० प्रतिशत तक ही रहने क ा क ोई औचित्य नहीं है. उन्होंने एक महत्वपूर्ण सुझाव यह भी दिया था कि जिन जातियों क ो सरक ारी नौक रियोंे मंे उनक ी जनसंख्या के अनुपात मंे क म-से-क म ५० प्रतिशत हिस्सा मिल चुक ा है, उन पर आर्थिक क सौटी लगायी जाये. अगर उनक ा प्रतिनिधित्व क म हो तो उन पर आर्थिक क सौटी नहीं लगायी जाये.
आज मलाईदार तबके क ी बहस के संदर्भ में यह सुझाव बहुत ही प्रांसगिक है. उनक ा अनुमान था कि अगर ईमानदारी से यह लागू कि या जाये तो अगले चार-पांच दशक ों में आरक्षण क ी जरू रत स्वत: समाप्त् हो जायेगी. इन दिनों सच्च्र क मेटी क ी रिपोर्ट बड़ी चर्चा में है. प्रत्येक दल अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार उसक ी व्याख्या क र रहा है. अब सच्च्र क मेटी के रिपोर्ट क ा उपयोग इसलिए कि या जा रहा है कि इस तरीके से वोट बैंक क ो अक्षुण्ण बनाया जाये या रखा जाये. जो लोग चिल्लाते हंै कि अल्पसंख्यक ों और खास क र मुसलमानों के प्रति तुष्टीक रण क ी नीति चलायी जा रही है. इसमें साफ -साफ क हा गया है कि मुसलमानों क ी सामाजिक , आर्थिक स्थिति अन्य वर्गों से बदतर है. इस सच्चई क ो क ौन नहीं जानता कि उच्च् सेवाओं के मामले में यहां तक कि निम्न सेवाओं के मामलों में, संपत्ति के मामले में मुसलमानों क ी स्थिति तुलनात्मक रू प से खराब है? दूसरी ओर धर्म के आधार पर आरक्षण देने क ी वक ालत क रनेवाले लोगों के लिए भी सच्च्र क मेटी क ी रिपोर्ट क ी अनुशंसा क ोई मदद नहीं क रती. सच्च्र क मेटी ने धर्म पर आधारित आरक्षण क ो नक ारा है. इस संबंध में अपनी मृत्यु के कु छ ही दिनों पहले मधु जी ने चेतावनी भरे शब्दों में क हा था कि धर्म आधारित आरक्षण क ा खतरनाक खेल न खेलंे.
आज मधु जी नहीं हैं. कु छ अखबारों या संस्थानों क ो छोड़ उन पर लेख नहीं लिखे जायेेंगे, गोष्ठियां नहीं होंगी, `योंकि जब राजनीति में वोट बैंक बनाने क ी रणनीति ही प्रमुख है तो जातिविहीन समाज और राजनीति क ी वक ालत क रनेवाले लोग उन्हें कै से याद क रेंगे? उनक ो याद क रने से क ोई वोट बैंेक शायद ही बने.
मधु जी क ो क ई मामलांे में गलत समझा गया. वे स्वभावत: अंतर्मुखी थे, पर कु छ लोग उन्हें घमंडी मानते थे. फि र भी जो लोग कु छ समय के लिए भी उनके संपर्क मंे आये, उन्होंेने उनक ी सादगी, उनक ी सरलता, उनक ी विद्वता क ो महसूस कि या. सबसे बड़ी विडंबना तो यह रही कि जिस मधु लिमये ने हर मोड़ पर समाजवादी आंदोलन क ी एक ता क ो क ायम रखने क ी क ोशिश क ी, उन्हें ही तोड़क क हा गया, दूसरे के द्वारा नहीं, अपनों के द्वारा ही.

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April 30, 2007 at 10:17 pm 1 comment

भारतीय राज सत्ता और हिंदी

जसम से जुड़े रविभूषण भाषा और संस्कृति पर लिखते रहे हैं. इस लेख में वे हिंदी और भारत की राज्सत्ता के चरित्र का आकलन कर रहे हैं.
रविभूषण
20सवीं सदी के भारत में आजादी के पहले महात्मा गांधी ने अहिंदी क्षेत्र में हिंदी के विकास के लिए जिन संस्थाओं का गठन किया, उनका हिंदी के प्रचार-प्रसार में ऐतिहासिक महत्व है. 1885 में स्थापित कांग्रेस कई वर्षों तक अंगरेजी का दामन पकड़े हुई थी. राजनीति के क्षेत्र में सक्रि य लोगों की शिक्षा-दीक्षा और उनकी सामाजिक -राजनीतिक दृष्टि से भी इसका संबंध था. ब्रिटिश शासन में अंगरेजी का जो प्रभुत्व था, उससे कहीं अधिक आज है. भाषा का प्रश्न मुख्यत: सामाजिक -सांस्कृतिक प्रश्न है, पर जब राजनीतिक हस्तक्षेप सर्वत्र जारी हो, तो उससे भाषा भी अछूती नहीं रहती. भाषा और राजनीति के घनिष्ठ संबंधों पर अनिवार्य रूप से विचार होना चाहिए. इसलिए कि राजनीतिक प्रयोजन का क्षेत्र बड़ा है, जिसमें संपूर्ण समाज आ जाता है. राजनीति की भाषा और भाषा की राजनीति पर एक साथ विचार करने से ही हम समझ सकते हैं कि स्वतंत्र भारत में राज सत्ता की भाषा अंगरेजी क्यों है? क्यों सरकारें बच्चों को आरंभिक कक्षाओं से अंगरेजी पढ़ने पर विवश क र रही है. शिक्षा-नीति और भाषा-नीति सत्ता से जुड़ी है और स्वतंत्र भारत में इन्हें अलग-अलग रख कर विचार होता रहा है, जो विशेष उपयोगी और सार्थक नहीं हैं. हिंदी कभी सत्ता की भाषा नहीं रही हैं. उसे सत्ता की भाषा बनाने की चाह रखनेवाले उससे अपना आर्थिक स्वार्थ भी सिद्ध करना चाहते हैं. हिंदी का प्रश्न मात्र भाषा का नहीं, वह सुंदर, स्वच्छ और सार्थक लोकतंत्र का भी प्रश्न है. भारतीय लोकतंत्र के हिलते रहने और चरमराने के जितने कारण हों, उनमें एक कारण भाषा भी है, क्योंकि हमने लोक भाषा और जन भाषा की उपेक्षा क र उस अभिजात भाषा को महत्व दे रहे हैं, जिसका व्यवहार करने वालों की संख्या अधिक नहीं है. राजसत्ता जब तक अभिजात और कुलीन वर्ग के पक्ष में है, तब तक शासन प्रणाली में, संसद और न्यायालयों में जनभाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती. महात्मा गांधी की दृष्टि दूरदर्शी और व्यापक थी. हिंदी का उन्होंने हथियार के रू प में इस्तेमाल किया. सामान्य जनकर्म, श्रम, संघर्ष से विमुख नहीं होते. इसी कारण उनकी भाषा में पसीना और खून मिला होता है. हिंदी श्रम और संघर्ष की भाषा है. श्रम से जुड़े और संघर्षशील व्यक्ति की दृष्टि अन्य की तुलना में अधिक उदार होती है. हिंदी उदार भाषा है और इसकी उदारता के सामाजिक कारणों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. जो भाषा उदार नहीं होगी, वह बड़े स्तर पर संपर्क भाषा भी नहीं बन सके गी. हमें भारत के प्रशासनिक ढांचे के साथ हिंदी या भारतीय भाषाओं को जोड़ कर देखना होगा. यह सच है कि विगत कुछ वर्षों से स्थितियां बदल रही हैं. अगर एक ओर उदारीकरण और वैश्वीकरण है तो दूसरी ओर हाशियों से निरंतर उठ रही आवाजें भी हैं. परिपक्व राजनीतिक चेतना व दृष्टि का अभाव भले हो, पर एक अकुलाहट और खलबालाहट भी मौजूद है. राज सत्ता में वंचित लोगों की भागीदारी बढ़ रही है, पर उस पर नियंत्रण जिसका है, उसे हमें अवश्य देखना चाहिए. भारतीय पूंजीपति के साथ विदेशी आर्थिक शक्ति यां भारतीय राज सत्ता को नियंत्रित क र रही हैं. हमारी सामाजिक -राजनीतिक चेतना का सही अर्थों में विकास नहीं हो रहा है. आर्थिक विकास के जिस मार्ग और मॉडल को हमने अपनाया है, वह पराया हैं. मॉडल जिनका होगा, उनकी भाषा ही राज सत्ता की भाषा होगी. स्वतंत्र भारत में हिंदी के प्रश्न को व्यापक संदर्भों में रख कर देखना होगा. भाषा का प्रश्न सामाजिक प्रश्न है और सामाजिक विकासादि के साथ हमारी राजनीतिक दृष्टि जुड़ी है. अब आर्थिक दृष्टि राजनीतिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है. स्वतंत्र भारत की अर्थ संबंधी नीतियां एक नहीं रही हैं. नेहरू के समय की अर्थ नीति मिश्रित थी. प्राइवेट सेक्टर और पब्लिक सेक्टर दोनों थे. राजीव गांधी के समय ही इस नीति में बदलाव शुरू होने लगे थे. विश्व में स्थितियां बदल रही थीं और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिक्त हो रहा था. यह कहना गलत होगा कि ऐसी भूचाली स्थिति के लिए नेहरू जिम्मेदार थे. आज भारतीय राजनीति में गांधी-नेहरू की चर्चा कम होती है. या उनके विचार पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं. विचारों की विदाई के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता. भाषा के साथ विचार और संस्कृति जुड़ी होती है. अंगरेजी सत्ता की भाषा रही है, यह देश के अधिकारियों और बौद्धिकों की भाषा है. आज समाजवाद की कहीं चर्चा नहीं है. वह संकट में है. रणधीर सिंह ने अपनी पुस्तक क्राइसिस ऑफ सोशियोलिज्म में इस पर विस्तार से विचार किया है. भारतीय राज सत्ता सामान्य जन के विरुद्ध है. देश के लगभग तीन लाख गांवों में शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है. इसका आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, पर यह लगभग तय है कि स्वतंत्र भारत में जितनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, गुलाम भारत में उतने किसान आत्महत्या नहीं करते थे. हिंदी हत्यारों की भाषा नहीं है. इसकी उदारता के भाषिक पक्षों पर ही नहीं रुक कर इससे संबद्ध अन्य कारक तत्वों पर भी हमें ध्यान देना चाहिए. हिंदी समाज का व्याक रण बदल रहा है. भाषा का ही व्याकरण नहीं होता, अपितु प्रत्येक समाज का अपना व्याकरण होता है. सामाजिक व्याकरण से हमारा तात्पर्य सामाजिक इकाइयों और संरचनाओं से है, जो स्थिर नहीं रहती और समयानुसार बदलती चलती हैं. ये बदलाव दोनों ही रूपों में जाने-अनजाने होते रहते हैं. स्वाधीनता आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने हिंदी को सर्वाधिक महत्व इसलिए दिया था कि इसी भाषा में वे भारत के सामान्य जन से संवाद कर सक ते थे. आज राज सत्ता का सामान्य जन से कोई संवाद नहीं है. कितने विधायकों और सांसदों का अपने निर्वाचन क्षेत्र की सामान्य जनता से निरंतर सक्रिय और जीवंत संवाद है? सत्तासीन व्यक्तियों में आज स्वाभिमान का लोप हो चुका है, हिंदी अब तक स्वाभिमान की भाषा रही है. वह अपने लोगों द्वारा अपने ही इलाकों में पिट रही है. प्रश्न अनेक हैं और हमें शांत चित्त से उन सभी प्रश्नों पर विचार क रना चाहिए. पहला प्रश्न तो यही है कि हिंदी के छात्र-अध्यापक और हिंदी के पत्रकार चंद अपवादों को छोड़ कर किस भूमिका में खड़े हैं? क्या इनमें वैसे लोगों की संख्या अधिक नहीं है, जिन्हें अपनी भाषा-संस्कृति से कम लगाव है? हिंदी का खानेवाले हिंदी को खा रहे हैं. अहिंदी प्रेदशों में और देश के बाहर ऐसी स्थिति बहुत क म है. यह सब उस गलित राजनीतिक के दौर में संभव हुआ है, जहां आसानी से बहुत कु छ पाने के लिए हम पंक्ति बद्ध खड़े हैं. खुशामदियों और चाटुकारों की संख्या में वृद्धि हुई है और हिंदी इसके विरोध में खड़ी रही है. क्या यह आत्मालोचन और आत्ममंथन का समय नहीं है कि हम हिंदीभाषी क्षेत्र में हिंदी की दुर्दशा क रने-क राने में अपनी भूमिका की तलाश क रें? हिंदीभाषियों को अगर एक साथ कुंठित और अपमानित किया जाता है, तो हमें राज सत्ता के वास्तविक चरित्र को अवश्य समझना होगा. केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि भारतीय राज सत्ता पूंजीपतियों के पक्ष में है. कैसी पूंजी, कैसे पूंजीपति? पूंजी पहले भी थी और स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय पूंजीपतियों की भूमिका जगजाहिर है. उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में नयी पूंजी आ गयी है और जो आज के पूंजीपति हैं- मित्तल, अंबानी आदि- वे पहले के टाटा-बिड़ला से भिन्न हैं. अंबानी, अमर सिंह, अमिताभ बच्च्न एक साथ हैं. हरिवंश राय बच्च्न किनके साथ थे? प्रश्न राज सत्ता की भाषा का है. जो अंगरेजी नहीं जानते और उस भाषा-विशेष में निष्णात नहीं है, उन्हें कुंठित किया जा रहा है. केवल यही नहीं, जिनकी भाषा हिंदी है, वे भी हिंदी को गंभीरता से नहीं लेते. वे सत्ता से स्थानीय स्तर पर ही सही, जुड़ कर उस तंत्र को सुदृढ़ कर रहे हैं, जो जनता के पक्ष में नहीं है. हिंदी को राज सत्ता ने क भी शक्ति संपन्न नहीं किया. यह लड़नेवाली भाषा रही है. जिस समय हमारे मुल्क में फ ारसी राजभाषा थी, उस समय भी यह फैलती रही. ब्रिटिश शासन में यह उनके विरुद्ध लड़ती रही और अब वह अपनी शक्ति से फैल रही है. राज सत्ता ढोंग क र सकती है, पर हिंदी ढोंगियों पर प्रहार करती रही है. हिंदी प्रदेश में प्राय: प्रत्येक क्षेत्र में ढोंगियों और पाखंडियों की संख्या बढ़ रही है. यह एक नयी स्थिति है. यह अकारण नहीं है कि आज हिंदी से जुड़ी संस्थाएं हिंदी क्षेत्रों में विपन्न हैं और उनके स्वामी संपन्न हैं. हिंदी का प्रश्न समाजवाद और पूंजीवाद से, देशी और विदेशी पूंजी से, राज सत्ता के चरित्र से और हमारी अर्थनीतियों से भी जुड़ा हुआ है.

April 30, 2007 at 8:50 pm 1 comment

मजदूर आंदोलन, कै सी है दशा, क्या होगी दिशा

उमाधर जी बिहार में मज़दूर आंदोलन के पर्याय के रूप में जाने जाते हैं. उनका अशोक पेपर मिल का आंदोलन बिहार का प्रतिनिधि मज़दूर आंदोलन रहा है. उन्होंने मज़दूर दिवस पर इसकी दशा और दिशा को लेकर एक लंबा लेख लिखा है. प्रस्तुत रचना इसी लेख का संपादित अंश है.

उमाधर प्रसाद सिंह
आज नयी विश्व अर्थव्यवस्था के शिकंजे में जकड़ी, निजीकरण, उदारीकरण एवं वैश्वीकरण आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था में मार्केट फ्रें डली, बिजनेस फ्रें डली, इन्वेस्टमेंट फ्रें डली जैसे भ्रामक शब्दों द्वारा आर्थिक -सामाजिक ढांचे के अंदर बढ़ रही भीषण असमानता, बेरोजगारी और 90 प्रतिशत जनता की पीड़ा पर रहस्य का आवरण देने की प्रक्रिया तो बड़े पैमाने पर जारी है, लेकिन संविधान में संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी गणराज्य बनाने, सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने की प्रस्तावना तथा समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटे जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो एवं आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले, जिससे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकें द्रण न हो (अनुच्छेद-39) के बावजूद पिपुल्स फ्रें डली, लेबर फ्रें डली, इंप्लाई फ़्रेंडली जैसे शब्द कहीं दिखायी नहीं देते.
हालांकि एक मात्र आर्थिक वृद्धि आधारित विकास अवधारणा के इन कुपरिणामों के परिणामस्वरूप बढ़ते जनाक्रोश को कुंद करने के लिए सर्वसमावेषी आर्थिक वृद्धि तथा विकास को मानवीय चेहरा देने जैसी अस्पष्ट प्रस्थापनाओं की बात भी अब शुरू की गयी है. लेकिन यह कैसे होगा या इसके लिए आर्थिक वृद्धि के परिणामों के वितरण की क्या प्रक्रिया होगी, इसकी कोई चर्चा नहीं की जा रही है. बल्कि इसके विपरित श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर श्रमिकों को अब तक के प्राप्त अधिकारों के अपहरण और उसमें भी कटौती की बात की जा रही है. श्रम कानूनों को लचीला बनाने के नाम पर श्रमिक वर्ग को पूरी तरह आत्मसर्मपण करने को मजबूर करने की कोशिशें हो रही हैं. इस स्थिति में मई दिवस, जो ऐतिहासिक रू प से श्रमिकों का न केवल एक शहादत दिवस है, बल्कि एक महान संकल्प का दिवस भी है, के अवसर पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि आज मजदूर आंदोलन कहां पर खड़ा है, कहां से चला था और आगे का उसका रास्ता कैसा है? देश के कुल घरेलू उत्पादन में आठ-नौ प्रतिशत वृद्धि के दावे के दरमियान 25 लाख मजदूरों की छंटनी, संगठित क्षेत्र के रोजगार में 0.38 प्रतिशत की कमी, भविष्य की अनिश्चितता और असंगठित क्षेत्र में प्रतिकूल सेवा शर्तें, असुरक्षित एवं वैधानिक अधिकारों से वंचित 35 करोड़ असंगठित श्रमशक्ति की मौजूदगी तथा हजारों सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के कारखानों की बंदी के बावजूद देश में कोई सशक्त मजदूर आंदोलन उभरता नहीं दिख रहा है. आर्थिक वृद्धि आधारित रोजगारविहीन तथाकथित विकास प्रक्रिया के परिणामस्वरू प ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी वृद्धि की दर नौ प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में आठ प्रतिशत है. बातें यहीं तक नहीं हैं, मुद्रास्फीति की दर छह प्रतिशत से ऊपर जा रही है और यह थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित है. खुदरा मूल्य और खास कर खाद्यान्न आदि की क ीमत के आधार पर यह वृद्धि 20 से 25 प्रतिशत से ऊपर जा रही है. यद्यपि मुद्रास्फीति के नियंत्रण और मूल्यवृद्धि पर रोक की तथाकथित कवायद सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा की जा रही है, लेकिन यह कितना वास्तविक और कितना भ्रामक है, यह वित्तमंत्री चिदंबरम की इस उक्ति से ही जाहिर हो जाता है कि मुद्रास्फीति में वृद्धि, आर्थिक वृद्धि की सहवर्ती है. (बजट भाषण, 28 फ रवरी 2007, पैरा-8)

देखें सेंट पीटर्सबर्ग का अंत. सोवियत रूस की एक महान फ़िल्म जो मज़दूरों की पीडा़, उनकी नासमझियों और उनकी बहादोरी को दिखाती है. फ़िल्म में दुनिया के सर्वहारा की एक महान विजय और एक महान क्रांति, रूसी क्रांति के अद्भुत क्षणों को दरसाया गया है.

पूंजी अपने मुनाफे में वृद्धि के लिए श्रम लागत में कटौती के नाम पर लगातार उत्पादित आय में से श्रम के हिस्से में कमी को ही एक मात्र हथियार के रूप में उपयोग करती रही है, चाहे मजदूरी में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कटौती का तरीका हो या कम से कम श्रम की मात्रा से अधिकतम उत्पादन हासिल करने की तथाकथित श्रम उत्पादकता में वृद्धि की अवधारणा. श्रम की कीमत कम रहे अर्थात उत्पादित आय में श्रम का हिस्सा अल्प से अल्पतम बना रहे, इसके लिए काम की मांग को सीमित रखने और इसकी पूर्ति के आधिक्य की अवधारणा पर ऐच्छिक बेरोजगारी, बेरोजगारी की स्वाभाविक दर, फिर पूर्ण रोजगार से कम स्तर को पूर्ण रोजगार की स्वीकार्यता जैसी प्रस्थापनाओं का प्रतिपादन इस तथाकथित विकास प्रक्रिया के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है. इस तरह बेरोजगारी एवं मुद्रास्फीति इस नयी आर्थिक अवधारणा के मुख्य हथियार हैं, जिनका अर्थव्यवस्था के नियंत्रक शिखर के मुट्ठी भर महाप्रभु, खास कर श्रमिक वर्ग एवं आम रूप से आम जनता के विरुद्ध आर्थिक वृद्धि के नाम पर धड़ल्ले से उपयोग कर रहे हैं. यह वास्तव में बहुराष्ट्रीय निगमों, विश्व बैंक , अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और खास रूप से अमेरिका द्वारा थोपे गये विकास का वह मॉडल है, जो मुक्त बाजार व्यवस्था के नाम पर लादा जा रहा है. मुद्रास्फ ीति जहां मजदूरी में अप्रत्यक्ष कटौती करती है, वहीं आय के वितरण की असमानता में, पूंजी के पक्ष में वृद्धि का द्योतक भी है. दूसरी ओर बेरोजगारी की मौजूदगी, रोजगार के होड़ की प्रतिस्पर्धा में, श्रम की कीमत की वृद्धि पर रोक लगा देती है और श्रम संगठन तथा श्रमिक आंदोलन को कमजोर करती है. इसलिए तमाम तथाक थित अर्थशास्त्रियों के सोच एवं अवधारणा का केंद्र बिंदू-चाहे केंस समर्थक हों या केंस विरोधी, मिल्टन-फ्रीडमैन हों या सेम्युल्सन, रॉर्बट शोलो हों अथवा विलियम फिलिप्स या एडमंड फ्लेप्स, क्रुगर हों अथवा जोसेफ स्टिग्लिट्ज, मुक्त बाजार समर्थक हों अथवा बाजार की अपूर्णता के प्रतिपादक बेरोजगारी, अपूर्ण रोजगार, बेरोजगारी की स्वाभाविक दर, स्फीति-अस्फीति तथा आर्थिक वृद्धि जैसे रहस्यात्मक सूत्रों के आवरण में पूंजी द्वारा श्रम के अधिकारों के अपहरण की प्रक्रिया पर परदा डालने तक ही सीमित रहा है. और अर्थव्यवस्था के नियंत्रक शिखर से निर्धारित इन आर्थिक अवधारणाओं का भ्रमजाल सिर्फ सरकार के नीति-निर्माताओं को अपने शिकंजे में लेने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालय परिसरों, सांस्कृ तिक कें द्रों से लेकर 1.5 लाख क रोड़ पंूजी से संचालित मीडिया परिक्षेत्रों क ो भी अपने नियंत्रण में ले लिया है. यही वह क ार्य है जिसे पुराना पूंजीवाद और उसके द्वारा शासित प्रशासन तंत्र नहीं कर पाया था. इतनी तैयारी के बाद श्रम सुधार तथा श्रम कानूनों को लचीला बनाने के नाम पर राष्ट्रीय एवं विश्वस्तरीय के मायाजाल में फंसा कर, पूर्व प्रदत्त सेवा शर्तों, भविष्य सुरक्षा तथा वैधानिक दायित्वों को नकारने के साथ ही नियुक्ति और विमुक्ति, हायर एंड फायर तथा तालाबंदी के निरंकु श अधिकार प्राप्त करने में जुटा हुआ है. और यह विश्वपूंजीवाद नियंत्रित भारतीय अर्थव्यवस्था के नियंत्रकों का आधिपत्यवादी चरित्र का प्रतीक है, जो तथाकथित आर्थिक विकास श्रम एवं अवाम की कीमत पर सिर्फ अपने पूर्ण नियंत्रण में, अपने द्वारा और सिर्फ अपने लिए ही करने पर उतारू है. इस भीषण स्थिति में भी श्रमिकों का कोई संगठित एवं कारगर प्रतिरोध क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है, यह गंभीर चिंता का विषय है. यह सही है कि बेरोजगारों की विशाल फौज की मौजूदगी और रोजगार के सीमित हो रहे अवसरों के बीच के अंतर्सबंधों के कारण श्रमिकों की पांतों में कमजोरी आती है. लेकिन यह एक पक्ष है. कारणों को और गहराई से आंकने के लिए भारत के श्रमिक संघों के इतिहास, उसके चरित्र और चिंतन की धाराओं में झांकना होगा. 1875 में शोराबजी-शापुर जी के नेतृत्व में मजदूरों की दयनीय स्थिति की परिचर्चा, इसी समय लंकाशायर के उद्योगपतियों द्वारा भारतीय उद्योगपतियों की प्रतिस्पर्धा के खतरे के विरुद्ध फैक्टरी इंस्पेक्टर जोम्स से हस्तक्षेप क रा कर, 1879 में भारत फै क्टरी कानून का प्रस्ताव पारित कराने के साथ ही नारायण मेधजी लोखंडे द्वारा छह दिनों की हड़ताल करा कर ट्रेड यूनियन आंदोलन की शुरुआत ही विदेशी पूंजीपतियों की प्रेरणा से करायी गयी. हालांकि साम्राज्यवाद विरोधी स्वाधीनता आंदोलन के क्रमिक विकास के साथ मजदूर आंदोलनों के चरित्र और स्वरू प में भी परिवर्तन आता गया और बंबई के साथ ही कानपुर तथा क लकत्ता जैसे मजदूर आंदोलन के केंद्र विकसित हुए. मजदूर आंदोलन की इस विकसित चेतना का ही परिणाम था कि 1908 में लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी के विरुद्ध बंबई के मजदूरों ने लगातार छह दिनों तक हड़ताल क रते हुए बंबई को बंद रखा. इस ऐतिहासिक हड़ताल को लेनिन ने भारतीय मजदूरों की परिपक्वता एवं पर्याप्त वर्ग तथा राजनीतिक चेतना का प्रतीक कहा था. लेकि न 1917 की रूसी क्रांति के बाद भारत के मजदूर आंदोलन पर उसके बढ़ते प्रभाव के सांगठनिक रूप लेने से पहले ही 1920 में श्रम-पूंजी सहयोग सूत्र के आधार पर गांधी जी की छत्रछाया में अहमदाबाद में मजदूर-महाजन संघ की स्थापना कर दी गयी, जबकि भारत में 1924 में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के बाद मजदूर आंदोलन की दूसरी धारा का सांगठनिक रू प उभर कर सामने आया. लेकिन श्रम आंदोलन एवं श्रम संघ की पहली पहल क्रांतिकारी धारा के बजाय प्रतिगामी धारा के द्वारा ही हुई. यद्यपि मजदूर-महाजन के संगठन से पूर्व मद्रास में 1918 में वीपी वाडिया के नेतृत्व में एक मजदूर संगठन ने श्रम आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के अभिन्न हिस्से के रू प में आकार जरू र दिया था, लेकिन विनय एंड कं पनी के मजदूरों ने जुलाई, 1918 की हड़ताल का विरोध कर और महायुद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य को समर्थन दिया.

April 30, 2007 at 7:43 pm 3 comments


calander

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