मजदूर आंदोलन, कै सी है दशा, क्या होगी दिशा

April 30, 2007 at 7:43 pm 3 comments

उमाधर जी बिहार में मज़दूर आंदोलन के पर्याय के रूप में जाने जाते हैं. उनका अशोक पेपर मिल का आंदोलन बिहार का प्रतिनिधि मज़दूर आंदोलन रहा है. उन्होंने मज़दूर दिवस पर इसकी दशा और दिशा को लेकर एक लंबा लेख लिखा है. प्रस्तुत रचना इसी लेख का संपादित अंश है.

उमाधर प्रसाद सिंह
आज नयी विश्व अर्थव्यवस्था के शिकंजे में जकड़ी, निजीकरण, उदारीकरण एवं वैश्वीकरण आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था में मार्केट फ्रें डली, बिजनेस फ्रें डली, इन्वेस्टमेंट फ्रें डली जैसे भ्रामक शब्दों द्वारा आर्थिक -सामाजिक ढांचे के अंदर बढ़ रही भीषण असमानता, बेरोजगारी और 90 प्रतिशत जनता की पीड़ा पर रहस्य का आवरण देने की प्रक्रिया तो बड़े पैमाने पर जारी है, लेकिन संविधान में संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी गणराज्य बनाने, सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने की प्रस्तावना तथा समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटे जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो एवं आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले, जिससे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकें द्रण न हो (अनुच्छेद-39) के बावजूद पिपुल्स फ्रें डली, लेबर फ्रें डली, इंप्लाई फ़्रेंडली जैसे शब्द कहीं दिखायी नहीं देते.
हालांकि एक मात्र आर्थिक वृद्धि आधारित विकास अवधारणा के इन कुपरिणामों के परिणामस्वरूप बढ़ते जनाक्रोश को कुंद करने के लिए सर्वसमावेषी आर्थिक वृद्धि तथा विकास को मानवीय चेहरा देने जैसी अस्पष्ट प्रस्थापनाओं की बात भी अब शुरू की गयी है. लेकिन यह कैसे होगा या इसके लिए आर्थिक वृद्धि के परिणामों के वितरण की क्या प्रक्रिया होगी, इसकी कोई चर्चा नहीं की जा रही है. बल्कि इसके विपरित श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर श्रमिकों को अब तक के प्राप्त अधिकारों के अपहरण और उसमें भी कटौती की बात की जा रही है. श्रम कानूनों को लचीला बनाने के नाम पर श्रमिक वर्ग को पूरी तरह आत्मसर्मपण करने को मजबूर करने की कोशिशें हो रही हैं. इस स्थिति में मई दिवस, जो ऐतिहासिक रू प से श्रमिकों का न केवल एक शहादत दिवस है, बल्कि एक महान संकल्प का दिवस भी है, के अवसर पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि आज मजदूर आंदोलन कहां पर खड़ा है, कहां से चला था और आगे का उसका रास्ता कैसा है? देश के कुल घरेलू उत्पादन में आठ-नौ प्रतिशत वृद्धि के दावे के दरमियान 25 लाख मजदूरों की छंटनी, संगठित क्षेत्र के रोजगार में 0.38 प्रतिशत की कमी, भविष्य की अनिश्चितता और असंगठित क्षेत्र में प्रतिकूल सेवा शर्तें, असुरक्षित एवं वैधानिक अधिकारों से वंचित 35 करोड़ असंगठित श्रमशक्ति की मौजूदगी तथा हजारों सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के कारखानों की बंदी के बावजूद देश में कोई सशक्त मजदूर आंदोलन उभरता नहीं दिख रहा है. आर्थिक वृद्धि आधारित रोजगारविहीन तथाकथित विकास प्रक्रिया के परिणामस्वरू प ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी वृद्धि की दर नौ प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में आठ प्रतिशत है. बातें यहीं तक नहीं हैं, मुद्रास्फीति की दर छह प्रतिशत से ऊपर जा रही है और यह थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित है. खुदरा मूल्य और खास कर खाद्यान्न आदि की क ीमत के आधार पर यह वृद्धि 20 से 25 प्रतिशत से ऊपर जा रही है. यद्यपि मुद्रास्फीति के नियंत्रण और मूल्यवृद्धि पर रोक की तथाकथित कवायद सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा की जा रही है, लेकिन यह कितना वास्तविक और कितना भ्रामक है, यह वित्तमंत्री चिदंबरम की इस उक्ति से ही जाहिर हो जाता है कि मुद्रास्फीति में वृद्धि, आर्थिक वृद्धि की सहवर्ती है. (बजट भाषण, 28 फ रवरी 2007, पैरा-8)

देखें सेंट पीटर्सबर्ग का अंत. सोवियत रूस की एक महान फ़िल्म जो मज़दूरों की पीडा़, उनकी नासमझियों और उनकी बहादोरी को दिखाती है. फ़िल्म में दुनिया के सर्वहारा की एक महान विजय और एक महान क्रांति, रूसी क्रांति के अद्भुत क्षणों को दरसाया गया है.

पूंजी अपने मुनाफे में वृद्धि के लिए श्रम लागत में कटौती के नाम पर लगातार उत्पादित आय में से श्रम के हिस्से में कमी को ही एक मात्र हथियार के रूप में उपयोग करती रही है, चाहे मजदूरी में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कटौती का तरीका हो या कम से कम श्रम की मात्रा से अधिकतम उत्पादन हासिल करने की तथाकथित श्रम उत्पादकता में वृद्धि की अवधारणा. श्रम की कीमत कम रहे अर्थात उत्पादित आय में श्रम का हिस्सा अल्प से अल्पतम बना रहे, इसके लिए काम की मांग को सीमित रखने और इसकी पूर्ति के आधिक्य की अवधारणा पर ऐच्छिक बेरोजगारी, बेरोजगारी की स्वाभाविक दर, फिर पूर्ण रोजगार से कम स्तर को पूर्ण रोजगार की स्वीकार्यता जैसी प्रस्थापनाओं का प्रतिपादन इस तथाकथित विकास प्रक्रिया के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है. इस तरह बेरोजगारी एवं मुद्रास्फीति इस नयी आर्थिक अवधारणा के मुख्य हथियार हैं, जिनका अर्थव्यवस्था के नियंत्रक शिखर के मुट्ठी भर महाप्रभु, खास कर श्रमिक वर्ग एवं आम रूप से आम जनता के विरुद्ध आर्थिक वृद्धि के नाम पर धड़ल्ले से उपयोग कर रहे हैं. यह वास्तव में बहुराष्ट्रीय निगमों, विश्व बैंक , अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और खास रूप से अमेरिका द्वारा थोपे गये विकास का वह मॉडल है, जो मुक्त बाजार व्यवस्था के नाम पर लादा जा रहा है. मुद्रास्फ ीति जहां मजदूरी में अप्रत्यक्ष कटौती करती है, वहीं आय के वितरण की असमानता में, पूंजी के पक्ष में वृद्धि का द्योतक भी है. दूसरी ओर बेरोजगारी की मौजूदगी, रोजगार के होड़ की प्रतिस्पर्धा में, श्रम की कीमत की वृद्धि पर रोक लगा देती है और श्रम संगठन तथा श्रमिक आंदोलन को कमजोर करती है. इसलिए तमाम तथाक थित अर्थशास्त्रियों के सोच एवं अवधारणा का केंद्र बिंदू-चाहे केंस समर्थक हों या केंस विरोधी, मिल्टन-फ्रीडमैन हों या सेम्युल्सन, रॉर्बट शोलो हों अथवा विलियम फिलिप्स या एडमंड फ्लेप्स, क्रुगर हों अथवा जोसेफ स्टिग्लिट्ज, मुक्त बाजार समर्थक हों अथवा बाजार की अपूर्णता के प्रतिपादक बेरोजगारी, अपूर्ण रोजगार, बेरोजगारी की स्वाभाविक दर, स्फीति-अस्फीति तथा आर्थिक वृद्धि जैसे रहस्यात्मक सूत्रों के आवरण में पूंजी द्वारा श्रम के अधिकारों के अपहरण की प्रक्रिया पर परदा डालने तक ही सीमित रहा है. और अर्थव्यवस्था के नियंत्रक शिखर से निर्धारित इन आर्थिक अवधारणाओं का भ्रमजाल सिर्फ सरकार के नीति-निर्माताओं को अपने शिकंजे में लेने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालय परिसरों, सांस्कृ तिक कें द्रों से लेकर 1.5 लाख क रोड़ पंूजी से संचालित मीडिया परिक्षेत्रों क ो भी अपने नियंत्रण में ले लिया है. यही वह क ार्य है जिसे पुराना पूंजीवाद और उसके द्वारा शासित प्रशासन तंत्र नहीं कर पाया था. इतनी तैयारी के बाद श्रम सुधार तथा श्रम कानूनों को लचीला बनाने के नाम पर राष्ट्रीय एवं विश्वस्तरीय के मायाजाल में फंसा कर, पूर्व प्रदत्त सेवा शर्तों, भविष्य सुरक्षा तथा वैधानिक दायित्वों को नकारने के साथ ही नियुक्ति और विमुक्ति, हायर एंड फायर तथा तालाबंदी के निरंकु श अधिकार प्राप्त करने में जुटा हुआ है. और यह विश्वपूंजीवाद नियंत्रित भारतीय अर्थव्यवस्था के नियंत्रकों का आधिपत्यवादी चरित्र का प्रतीक है, जो तथाकथित आर्थिक विकास श्रम एवं अवाम की कीमत पर सिर्फ अपने पूर्ण नियंत्रण में, अपने द्वारा और सिर्फ अपने लिए ही करने पर उतारू है. इस भीषण स्थिति में भी श्रमिकों का कोई संगठित एवं कारगर प्रतिरोध क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है, यह गंभीर चिंता का विषय है. यह सही है कि बेरोजगारों की विशाल फौज की मौजूदगी और रोजगार के सीमित हो रहे अवसरों के बीच के अंतर्सबंधों के कारण श्रमिकों की पांतों में कमजोरी आती है. लेकिन यह एक पक्ष है. कारणों को और गहराई से आंकने के लिए भारत के श्रमिक संघों के इतिहास, उसके चरित्र और चिंतन की धाराओं में झांकना होगा. 1875 में शोराबजी-शापुर जी के नेतृत्व में मजदूरों की दयनीय स्थिति की परिचर्चा, इसी समय लंकाशायर के उद्योगपतियों द्वारा भारतीय उद्योगपतियों की प्रतिस्पर्धा के खतरे के विरुद्ध फैक्टरी इंस्पेक्टर जोम्स से हस्तक्षेप क रा कर, 1879 में भारत फै क्टरी कानून का प्रस्ताव पारित कराने के साथ ही नारायण मेधजी लोखंडे द्वारा छह दिनों की हड़ताल करा कर ट्रेड यूनियन आंदोलन की शुरुआत ही विदेशी पूंजीपतियों की प्रेरणा से करायी गयी. हालांकि साम्राज्यवाद विरोधी स्वाधीनता आंदोलन के क्रमिक विकास के साथ मजदूर आंदोलनों के चरित्र और स्वरू प में भी परिवर्तन आता गया और बंबई के साथ ही कानपुर तथा क लकत्ता जैसे मजदूर आंदोलन के केंद्र विकसित हुए. मजदूर आंदोलन की इस विकसित चेतना का ही परिणाम था कि 1908 में लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी के विरुद्ध बंबई के मजदूरों ने लगातार छह दिनों तक हड़ताल क रते हुए बंबई को बंद रखा. इस ऐतिहासिक हड़ताल को लेनिन ने भारतीय मजदूरों की परिपक्वता एवं पर्याप्त वर्ग तथा राजनीतिक चेतना का प्रतीक कहा था. लेकि न 1917 की रूसी क्रांति के बाद भारत के मजदूर आंदोलन पर उसके बढ़ते प्रभाव के सांगठनिक रूप लेने से पहले ही 1920 में श्रम-पूंजी सहयोग सूत्र के आधार पर गांधी जी की छत्रछाया में अहमदाबाद में मजदूर-महाजन संघ की स्थापना कर दी गयी, जबकि भारत में 1924 में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के बाद मजदूर आंदोलन की दूसरी धारा का सांगठनिक रू प उभर कर सामने आया. लेकिन श्रम आंदोलन एवं श्रम संघ की पहली पहल क्रांतिकारी धारा के बजाय प्रतिगामी धारा के द्वारा ही हुई. यद्यपि मजदूर-महाजन के संगठन से पूर्व मद्रास में 1918 में वीपी वाडिया के नेतृत्व में एक मजदूर संगठन ने श्रम आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के अभिन्न हिस्से के रू प में आकार जरू र दिया था, लेकिन विनय एंड कं पनी के मजदूरों ने जुलाई, 1918 की हड़ताल का विरोध कर और महायुद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य को समर्थन दिया.

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सावधान : संघ जब सामाजिक समरसता की बात करे भारतीय राज सत्ता और हिंदी

3 Comments Add your own

  • 1. अनुनाद सिंह  |  May 1, 2007 at 3:55 am

    आज मजदूर आन्दोलन के भूत पर दृष्टिपात करने पर यही लगता है कि मजदूर अन्दोलन के प्रणेता अदूरदर्शी थे, इन्होने मजदूरों को बर्गला कर मजदूरों का, समाज का और अनेक देशों को जबरजस्त अहित किया।

    अब भी समय है कि मजदूर अन्दोलनो की दिशा पर विवेकपूर्ण दृष्टि से विचार कर सही दिशा तय की जाय।

    Reply
  • 2. sarjak  |  May 1, 2007 at 5:43 pm

    आज, यानी 1 मई, 2007 को, दुनियाभर में मई दिवस के नाम पर कई आनु‍ष्‍ठानिक कार्रवाईयां की जाएंगी और भारत के संसदीय ”कॉमरेड” भी हर साल की तरह मई दिवस पर नीरस-बेजान आनुष्‍ठानिक कार्रवाईयां करेंगे। धार्मिक कथा की तरह शिकागो के मजदूरों के संघर्ष की कथा सुनाएंगे, झण्‍डा फहराएंगे और लड्डू आदि बांटकर इतिश्री कर लेंगे। लेकिन ‘समाजवाद के अंत’ की तमाम चीख-पुखार के बीच, इन संसदीय वामपंथियों द्वारा इस दिन को अनुष्‍ठान-सा बनाने के तमाम प्रयासों के बीच, देशभर के मजदूर और उनके हरावल और तमाम संवेदनशील लोग भारत के मजदूर आंदोलन की दशा-दिशा के बारे में लगातार गंभीरता से सोच रहे हैं। यह महज थोथा विश्‍वास नहीं है, बल्कि जगह-जगह इसके उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। कुछ प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं को पढ़कर, मजदूरों के बीच लीक से हट कर चलती कुछ कार्रवाईयों को देखकर तो यही अंदाजा लगता है, यही नहीं आज के हिंदी-अंग्रेजी के कुछ ब्‍लॉग, जैसे हाशिया, को देखकर भी यही लगता है। इसी दिशा में कुछ गंभीर चिंतन मुझे मज़दूरों के एक क्रांतिकारी अखबार बिगुल के सद्य-प्रकाशित सम्‍पादकीय में नजर आया। इसलिए इस सम्‍पाकीय को मैंने पीडीएफ फाइल बना कर यहां जोड़ दिया है। इसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें:
    http://shabdsangharsh.files.wordpress.com/2007/05/may_day_article.pdf

    Reply
  • 3. Reyaz-ul-haque  |  May 6, 2007 at 6:06 pm

    सर्जक भाई,
    आपके विचार अच्छे लगे. इस दिन को जिस तरह आडंबर पूर्ण बना दिया गया है वह विचलित करता है. किस तरह लाखों मज़दूरों के खून को यग्य का हवन बना दिया गया है. मगर यह सिर्फ़ एक ही पहलू है. काफ़ी लोग हैं जो दूसरे तरीके से सोच रहे हैं.

    Reply

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