भारतीय राज सत्ता और हिंदी

May 1, 2007 at 2:08 am 1 comment

जसम से जुड़े रविभूषण भाषा और संस्कृति पर लिखते रहे हैं. इस लेख में वे हिंदी और भारत की राज्सत्ता के चरित्र का आकलन कर रहे हैं.
रविभूषण
20सवीं सदी के भारत में आजादी के पहले महात्मा गांधी ने अहिंदी क्षेत्र में हिंदी के विकास के लिए जिन संस्थाओं का गठन किया, उनका हिंदी के प्रचार-प्रसार में ऐतिहासिक महत्व है. 1885 में स्थापित कांग्रेस कई वर्षों तक अंगरेजी का दामन पकड़े हुई थी. राजनीति के क्षेत्र में सक्रि य लोगों की शिक्षा-दीक्षा और उनकी सामाजिक -राजनीतिक दृष्टि से भी इसका संबंध था. ब्रिटिश शासन में अंगरेजी का जो प्रभुत्व था, उससे कहीं अधिक आज है. भाषा का प्रश्न मुख्यत: सामाजिक -सांस्कृतिक प्रश्न है, पर जब राजनीतिक हस्तक्षेप सर्वत्र जारी हो, तो उससे भाषा भी अछूती नहीं रहती. भाषा और राजनीति के घनिष्ठ संबंधों पर अनिवार्य रूप से विचार होना चाहिए. इसलिए कि राजनीतिक प्रयोजन का क्षेत्र बड़ा है, जिसमें संपूर्ण समाज आ जाता है. राजनीति की भाषा और भाषा की राजनीति पर एक साथ विचार करने से ही हम समझ सकते हैं कि स्वतंत्र भारत में राज सत्ता की भाषा अंगरेजी क्यों है? क्यों सरकारें बच्चों को आरंभिक कक्षाओं से अंगरेजी पढ़ने पर विवश क र रही है. शिक्षा-नीति और भाषा-नीति सत्ता से जुड़ी है और स्वतंत्र भारत में इन्हें अलग-अलग रख कर विचार होता रहा है, जो विशेष उपयोगी और सार्थक नहीं हैं. हिंदी कभी सत्ता की भाषा नहीं रही हैं. उसे सत्ता की भाषा बनाने की चाह रखनेवाले उससे अपना आर्थिक स्वार्थ भी सिद्ध करना चाहते हैं. हिंदी का प्रश्न मात्र भाषा का नहीं, वह सुंदर, स्वच्छ और सार्थक लोकतंत्र का भी प्रश्न है. भारतीय लोकतंत्र के हिलते रहने और चरमराने के जितने कारण हों, उनमें एक कारण भाषा भी है, क्योंकि हमने लोक भाषा और जन भाषा की उपेक्षा क र उस अभिजात भाषा को महत्व दे रहे हैं, जिसका व्यवहार करने वालों की संख्या अधिक नहीं है. राजसत्ता जब तक अभिजात और कुलीन वर्ग के पक्ष में है, तब तक शासन प्रणाली में, संसद और न्यायालयों में जनभाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती. महात्मा गांधी की दृष्टि दूरदर्शी और व्यापक थी. हिंदी का उन्होंने हथियार के रू प में इस्तेमाल किया. सामान्य जनकर्म, श्रम, संघर्ष से विमुख नहीं होते. इसी कारण उनकी भाषा में पसीना और खून मिला होता है. हिंदी श्रम और संघर्ष की भाषा है. श्रम से जुड़े और संघर्षशील व्यक्ति की दृष्टि अन्य की तुलना में अधिक उदार होती है. हिंदी उदार भाषा है और इसकी उदारता के सामाजिक कारणों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. जो भाषा उदार नहीं होगी, वह बड़े स्तर पर संपर्क भाषा भी नहीं बन सके गी. हमें भारत के प्रशासनिक ढांचे के साथ हिंदी या भारतीय भाषाओं को जोड़ कर देखना होगा. यह सच है कि विगत कुछ वर्षों से स्थितियां बदल रही हैं. अगर एक ओर उदारीकरण और वैश्वीकरण है तो दूसरी ओर हाशियों से निरंतर उठ रही आवाजें भी हैं. परिपक्व राजनीतिक चेतना व दृष्टि का अभाव भले हो, पर एक अकुलाहट और खलबालाहट भी मौजूद है. राज सत्ता में वंचित लोगों की भागीदारी बढ़ रही है, पर उस पर नियंत्रण जिसका है, उसे हमें अवश्य देखना चाहिए. भारतीय पूंजीपति के साथ विदेशी आर्थिक शक्ति यां भारतीय राज सत्ता को नियंत्रित क र रही हैं. हमारी सामाजिक -राजनीतिक चेतना का सही अर्थों में विकास नहीं हो रहा है. आर्थिक विकास के जिस मार्ग और मॉडल को हमने अपनाया है, वह पराया हैं. मॉडल जिनका होगा, उनकी भाषा ही राज सत्ता की भाषा होगी. स्वतंत्र भारत में हिंदी के प्रश्न को व्यापक संदर्भों में रख कर देखना होगा. भाषा का प्रश्न सामाजिक प्रश्न है और सामाजिक विकासादि के साथ हमारी राजनीतिक दृष्टि जुड़ी है. अब आर्थिक दृष्टि राजनीतिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है. स्वतंत्र भारत की अर्थ संबंधी नीतियां एक नहीं रही हैं. नेहरू के समय की अर्थ नीति मिश्रित थी. प्राइवेट सेक्टर और पब्लिक सेक्टर दोनों थे. राजीव गांधी के समय ही इस नीति में बदलाव शुरू होने लगे थे. विश्व में स्थितियां बदल रही थीं और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिक्त हो रहा था. यह कहना गलत होगा कि ऐसी भूचाली स्थिति के लिए नेहरू जिम्मेदार थे. आज भारतीय राजनीति में गांधी-नेहरू की चर्चा कम होती है. या उनके विचार पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं. विचारों की विदाई के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता. भाषा के साथ विचार और संस्कृति जुड़ी होती है. अंगरेजी सत्ता की भाषा रही है, यह देश के अधिकारियों और बौद्धिकों की भाषा है. आज समाजवाद की कहीं चर्चा नहीं है. वह संकट में है. रणधीर सिंह ने अपनी पुस्तक क्राइसिस ऑफ सोशियोलिज्म में इस पर विस्तार से विचार किया है. भारतीय राज सत्ता सामान्य जन के विरुद्ध है. देश के लगभग तीन लाख गांवों में शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है. इसका आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, पर यह लगभग तय है कि स्वतंत्र भारत में जितनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, गुलाम भारत में उतने किसान आत्महत्या नहीं करते थे. हिंदी हत्यारों की भाषा नहीं है. इसकी उदारता के भाषिक पक्षों पर ही नहीं रुक कर इससे संबद्ध अन्य कारक तत्वों पर भी हमें ध्यान देना चाहिए. हिंदी समाज का व्याक रण बदल रहा है. भाषा का ही व्याकरण नहीं होता, अपितु प्रत्येक समाज का अपना व्याकरण होता है. सामाजिक व्याकरण से हमारा तात्पर्य सामाजिक इकाइयों और संरचनाओं से है, जो स्थिर नहीं रहती और समयानुसार बदलती चलती हैं. ये बदलाव दोनों ही रूपों में जाने-अनजाने होते रहते हैं. स्वाधीनता आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने हिंदी को सर्वाधिक महत्व इसलिए दिया था कि इसी भाषा में वे भारत के सामान्य जन से संवाद कर सक ते थे. आज राज सत्ता का सामान्य जन से कोई संवाद नहीं है. कितने विधायकों और सांसदों का अपने निर्वाचन क्षेत्र की सामान्य जनता से निरंतर सक्रिय और जीवंत संवाद है? सत्तासीन व्यक्तियों में आज स्वाभिमान का लोप हो चुका है, हिंदी अब तक स्वाभिमान की भाषा रही है. वह अपने लोगों द्वारा अपने ही इलाकों में पिट रही है. प्रश्न अनेक हैं और हमें शांत चित्त से उन सभी प्रश्नों पर विचार क रना चाहिए. पहला प्रश्न तो यही है कि हिंदी के छात्र-अध्यापक और हिंदी के पत्रकार चंद अपवादों को छोड़ कर किस भूमिका में खड़े हैं? क्या इनमें वैसे लोगों की संख्या अधिक नहीं है, जिन्हें अपनी भाषा-संस्कृति से कम लगाव है? हिंदी का खानेवाले हिंदी को खा रहे हैं. अहिंदी प्रेदशों में और देश के बाहर ऐसी स्थिति बहुत क म है. यह सब उस गलित राजनीतिक के दौर में संभव हुआ है, जहां आसानी से बहुत कु छ पाने के लिए हम पंक्ति बद्ध खड़े हैं. खुशामदियों और चाटुकारों की संख्या में वृद्धि हुई है और हिंदी इसके विरोध में खड़ी रही है. क्या यह आत्मालोचन और आत्ममंथन का समय नहीं है कि हम हिंदीभाषी क्षेत्र में हिंदी की दुर्दशा क रने-क राने में अपनी भूमिका की तलाश क रें? हिंदीभाषियों को अगर एक साथ कुंठित और अपमानित किया जाता है, तो हमें राज सत्ता के वास्तविक चरित्र को अवश्य समझना होगा. केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि भारतीय राज सत्ता पूंजीपतियों के पक्ष में है. कैसी पूंजी, कैसे पूंजीपति? पूंजी पहले भी थी और स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय पूंजीपतियों की भूमिका जगजाहिर है. उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में नयी पूंजी आ गयी है और जो आज के पूंजीपति हैं- मित्तल, अंबानी आदि- वे पहले के टाटा-बिड़ला से भिन्न हैं. अंबानी, अमर सिंह, अमिताभ बच्च्न एक साथ हैं. हरिवंश राय बच्च्न किनके साथ थे? प्रश्न राज सत्ता की भाषा का है. जो अंगरेजी नहीं जानते और उस भाषा-विशेष में निष्णात नहीं है, उन्हें कुंठित किया जा रहा है. केवल यही नहीं, जिनकी भाषा हिंदी है, वे भी हिंदी को गंभीरता से नहीं लेते. वे सत्ता से स्थानीय स्तर पर ही सही, जुड़ कर उस तंत्र को सुदृढ़ कर रहे हैं, जो जनता के पक्ष में नहीं है. हिंदी को राज सत्ता ने क भी शक्ति संपन्न नहीं किया. यह लड़नेवाली भाषा रही है. जिस समय हमारे मुल्क में फ ारसी राजभाषा थी, उस समय भी यह फैलती रही. ब्रिटिश शासन में यह उनके विरुद्ध लड़ती रही और अब वह अपनी शक्ति से फैल रही है. राज सत्ता ढोंग क र सकती है, पर हिंदी ढोंगियों पर प्रहार करती रही है. हिंदी प्रदेश में प्राय: प्रत्येक क्षेत्र में ढोंगियों और पाखंडियों की संख्या बढ़ रही है. यह एक नयी स्थिति है. यह अकारण नहीं है कि आज हिंदी से जुड़ी संस्थाएं हिंदी क्षेत्रों में विपन्न हैं और उनके स्वामी संपन्न हैं. हिंदी का प्रश्न समाजवाद और पूंजीवाद से, देशी और विदेशी पूंजी से, राज सत्ता के चरित्र से और हमारी अर्थनीतियों से भी जुड़ा हुआ है.

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  • 1. अनुनाद सिंह  |  May 1, 2007 at 8:59 am

    लेखक ने बहुत ही सही विचारा है। किन्तु अच्छा होता कि हिन्दी को उसका न्यायपूर्ण स्थान प्राप्त कराने के लिये कुछ व्यावहारिक उपाय भी सुझाते।

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