Archive for May 6, 2007

उत्तर प्रदेश : हाथ की बेकारी और कमल की बदबू

हाथ, हाथी, साइकिल और कमल
रविभूषण
राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्रों के अर्थ अक्सर हमारे लिए विचारणीय नहीं होते. नाजिम हिकमत की `हाथ’ पर लिखी मशहूर कविता को अगर हम याद न भी करें, तो इतना तो सभी जानते हैं कि हाथ ने ही मनुष्य को सबसे पहले मानवेतर प्राणियों से अलग किया. जो कुछ संदर और सार्थक है, उसमें हाथ की सर्वोपरि भूमिका है. अब हाथ कांग्रेस का चुनाव चिह्र है और जहां तक हाथ का साथ देने का प्रश्न है, 1989 के बाद भारत के बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस की भूमिका क्रमश: घटती गयी है. फिलहाल उत्तर प्रदेश के चुनाव को ध्यान में रखते हुए वहां कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा के भविष्य पर विचार किया जा सकता है. अभी द इंडियन एक्सप्रेस सीएनएन-आइबीएन, सीएसडीएस ने जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण किया है, उसमें बसपा की स्थिति अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में सर्वाधिक अच्छी है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 403 है. उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं होने जा रहा है. 403 सीटों पर कुल 2,972 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं, जिनमें 117 राजनीतिक दलों के प्रत्याशी हैं और स्वतंत्र/निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या 2,275 है. राजनीतिक दल संख्या में जितने हों, उत्तर प्रदेश में बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा ही प्रमुख हैं. किसी भी राजनीतिक दल को 202 सीटें प्राप्त नहीं होंगी. यह वह जादुई संख्या है, जिसे प्राप्त कर कोई भी राजनीतिक दल बहुमत प्राप्त होने का दावा कर सकता है. जहां तक दूसरे राजनीतिक दलों की बात है, अजीत सिंह और राज बब्बर का राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली नहीं है. उमा भारती की पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है. विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल के अनुरोध पर उमा भारती ने अपने प्रत्याशियों को चुनावी होड़ से अलग कर लिया. भाजपा के कल्याण सिंह और उमा भारती दोनों लोध जाति के हैं. उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस बार रामजन्मभूमि का मुद्दा नहीं है. हिंदुत्व के सहारे बार-बार सामान्य जनता को जन समस्याओं से विमुख नहीं किया जा सकता. प्रदेश के इतिहास में पहली बार विधानसभा का चुनाव सात चरणों में संपन्न हो रहा है. जिस प्रकार चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा का चुनाव सात चरणों में संपन्न हो रहा है. जिस प्रकार चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी सक्रियता से चुनाव को सही रूप में संपन्न कराया, उसी प्रकार उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं. अब तक हो चुके मतदान में मतदान का प्रतिशत पिछले चुनावों की तुलना में निश्चित रूप से कम है, पर मतदान केंद्रों पर कोई भी राजनीतिक दल गलत ढंग से प्रभावकारी भूमिका में नहीं है.
21वीं सदी का भारत अपनी मौजूदा समस्याओं से घिरा हुआ है. हाथ खाली और बेकार हैं. कमल की वास्तविक सुगंध से सब परिचित हैं. हाथ अपने विशाल आकार में अब भी लोगों का ध्यान खींच रहा है और तमाम तरह की कारों के बाद भी साइकिलों का बाजार घटा नहीं है. उत्तर प्रदेश के चुनाव में कई नारों में से एक नारा अधिक गूंज रहा है – ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी आगे जाएगा. हाथी बसपा का चुनाव चिह्र है और बहुजन समाज पार्टी ने अब बहुजन के स्थान पर सर्वजन को स्थान दे दिया है. मायावती ने अपनी पार्टी से ऊंची जातियों के 139, पिछड़ी जातियों के 110, अनुसूचित जातियों के 93 और 61 मुसलिम प्रत्याशी खड़े किये हैं. 1989 में उसने 364 प्रत्याशी खड़े किये थे, जिनमें केवल 13 विजयी हुए थे. 1991 के चुनाव में भी बसपा की स्थिति बहुत बेहतर नहीं हुई थी. 370 प्रत्याशियों में से केवल 12 प्रत्याशी विधानसभा चुनाव जीत पाये थे. बसपा को मिले वोटों का प्रतिशत भी सामान्य था. 1989 में उसे 9.63 प्रतिशत तथा 1991 में 9.70 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. बाद में बसपा की स्थिति बेहतर होने लगी. 1993 में 69, 1996 में 66 और 2002 में उसके 98 प्रत्याशी विजयी हुए थे. वोट प्रतिशत तेरह (1989 से 2002) में 9.63 प्रतिशत से बढ़ कर 23.06 प्रतिशत हो गया. मायावती ने 1995-96 में मुलायम सिंह के साथ मिल कर सरकार बनायी थी. 1996-97 में बसपा की मैत्री भाजपा से हुई. बाद में राष्ट्रपति शासन के बाद भी उसकी मैत्री भाजपा से बनी.
इस बार के चुनाव में सर्वाधिक सीटें बसपा को प्राप्त होंगी, यह तय है, पर यह तय नहीं है कि वह किस राजनीतिक दल से जुड़ कर सरकार बनायेंगी. मायावती मुलायम सरकार की कट्टर विरोधी हैं. बसपा का एक नारा है- चल गुंडों की छाती पर, बटन दबाओ हाथी पर. मुलायम सिंह मायावती के निशाने पर हैं और मुलायम सिंह के निशाने पर कोई नहीं है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में उन्हीं की सरकार है. सदी के महानायक उत्तर प्रदेश में दम देख रहे हैं और उनके अनुसार वहां कोई अपराध नहीं है. मायावती के अनुसार उत्तर प्रदेश में गुंडा राज है. वे सार्वजनिक भाषणों में कई बार यह कह चुकी हैं कि मुलायम सिंह और अमर सिंह को वे जेल में बंद करेंगी. राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों में अपराधी भी हैं. वे पहले भी थे. स्मिता गुप्त ने अपने लेख डज लॉ एंड ऑर्डर मैटर में (सेमिनार 571, मार्च, 2007) 403 विधायकों में से 205 विधायकों को अपराधी सूची में डाला है. उनके अनुसार सपा के 81, बसपा के 49, भाजपा के 39, कांग्रेस के 9 रालोद के 8 और 16 निर्दलीय विधायक अपराधी हैं. फिर भी चुनाव में अपराध कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. विकास, आजीविका, रोजगार और भ्रष्टाचार के मुद्दे बड़े हैं. चुनाव में जाति और समुदाय की तुलना में पार्टी और प्रत्याशी का अधिक महत्व है.
उत्तर प्रदेश चुनाव सामान्य चुनाव नहीं है. यह देश का सर्वप्रमुख राज्य है और इसके चुनावी परिणाम केंद्र को भी प्रभावित करते रहे हैं. अब राजनीतिक मूल्य नष्ट हो चुके हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह की अपनी अलग पार्टी थी, राष्ट्रीय क्रांति पार्टी. हमारे नेता शब्दों, विचारों, स्थापनाओं और मूल्यों के साथ जिस तरह खिलवाड़ करते हैं, यह उनके दल के नामकरण से ही समझा जा सकता है. कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी मर चुकी है. अब वे भाजपा में हैं. अपने घर में वापस लौट चुके हैं. उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी कांग्रेस में प्राण फूंक रहे हैं. 15 वर्ष से उत्तर प्रदेश में गैर कांग्रेसी शासन है और राहुल गांधी इस अवधि में होनेवाली बदहाली को फोकस में ला रहे हैं. आरोप-प्रत्यारोप का खेल भारतीय राजनीति का दिलचस्प खेल है. एक-दूसरे पर वार-प्रहार करके अपने को संतुष्ट किया जाता है. अभिनेत्रियां- जया बच्च्न और जयाप्रदा- सपा को गति नहीं दे सकतीं. मायावती इन दोनों की तुलना में बहुत आगे हैं और राजनीति में अभिनेताओं-अभिनेत्रियों के लिए स्थान नहीं है. वे महज आकर्षण हैं. मुलायम सिंह के साथ अमर सिंह, अंबानी, अमिताभ बच्च्न और अभिनेत्रियां हैं, पर यह लोकतंत्र का कमाल है या फि र जीवन की वे विकट-कठिन समस्याएं हैं, जहां इनकी उपस्थिति कोई अर्थ नहीं रखती.
मुलायम सिंह की राजनीति भी पेंडुलम की तरह रही है. कभी भाजपा की ओर और कभी कांग्रेस की ओर. साइकिल सामान्य जनों की सवारी है. पर मुलायम सिंह को सामान्य जन और समाजवाद से मतलब नहीं रहा है.
मंडल-कमंडल की राजनीति के दिन लद चुके हैं. अब नंगा यथार्थ सामने है. भूमंडलीकरण का दैत्य सबके सम्मुख है. इससे आंखें नहीं फेरी जा सकतीं. पिछले 15 वर्ष से उत्तर प्रदेश में भाजपा, बसपा और सपा की जीत होती रही है. त्रिशंकु विधानसभा पहले भी थी. अब भी रहेगी. राजनीतिक दलों का क्रम बदलता चलेगा. इस बार यह क्रम बसपा, सपा और भाजपा का होगा, ऐसी संभावना है. 40 प्रतिशत जनता वहां अशिक्षित है. समस्याएं सामने हैं और समाधान किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है. कभी चरण सिंह का गढ़ रहा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उनके बेटे अजीत सिंह के पक्ष में नहीं है. हाथी पर मायावती के साथ कौन बैठेगा? हाथी पर साइकिल नहीं लदेगी, यह तय है. जो भी बैठे उसके हाथ में क्या होगा? क्या उसके हाथ में कमल होगा? अगर कमल नहीं, तो फि र क्या होगा? फि र बड़ी बात यह भी है कि हाथी की चाल कैसी होगी? महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हाथी पर सवार कौन है? महत्वपूर्ण यह है कि हाथी और उस पर बैठे हुए व्यक्ति किस राहों से गुजर रहे हैं? क्या यह शोभायात्रा होगी या और कुछ?

प्रभात खबर से
Advertisements

May 6, 2007 at 6:58 pm Leave a comment

उत्तर प्रदेश की सियासी संभावनाएं

एमजे अकबर इस बार उत्तर प्रदेश में सियासी संभावनाओं की तलाश कर रहे हैं. प्रभात खबर से साभार.
एमजे अकबर
यदि आप जीत नहीं सकते तो इसका सबसे बेहतर और स्वाभाविक तरीका यह है कि आप जीत की परिभाषा अपने अनुसार गढ़ लें. कुछ ऐसा ही हाल उत्तर प्रदेश चुनाव में सभी राजनीतिक दलों का है. वहां कोई भी राजनीतिक पार्टी स्पष्ट जीत की स्थिति में नहीं है. लिहाजा वे सभी अपनी-अपनी सफलता के दावे को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं. चुनाव विश्लेषक और मीडिया पंडित भी कुछ इसी तरह की घालमेल और चतुराई भरी बात फैला रहे हैं. सफलता एक तुलनात्मक कथन है, जबकि जीत एक स्पष्ट और सर्वस्वीकृत पैमाना है. यदि आप अपनी जीत की अपेक्षाओं को काफी नीचे रखते हैं तथा बाद में इससे आगे निकल जाते हैं, तो फिर आप अपनी आवाज बुलंद करने की स्थिति में हो जाते हैं. यह एक ऊंची कूद का खेल-युद्ध है, जिसमें काफी नीचे से आप छलांग लगाते र्है.
अभी समाजवादी पार्टी सत्ता में है और वह अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत सत्ता में पुनर्वापसी के रूप में कर रही है. हालिया चुनावों में यदि वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आती है, तो वह अपनी जीत का दावा करेगी. इसी तरह बहुजन समाज पार्टी सोचती है कि वह जीत की लहर पर सवार है. यदि वह 130 से 140 तक सीटें निकाल ले जाती है, तो उसके पास नोटों का अंबार सामने होगा. इस समय भाजपा ज्यादा आराम की स्थिति में है, क्योंकि तीन वर्ष पहले के आम चुनावों में वह बुरी तरह विफल रही थी. इसीलिए उसने बगैर किसी अपेक्षा के अपनी शुरुआत की है. यदि भाजपा 100 सीटों की संख्या को भी पार करती है, तो उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को यह कहने का अवसर होगा कि उनकी पार्टी फिर से जीवित हो रही है. यदि भाजपा 120 सीटों की संख्या पार कर लेती है, फिर तो वह इसके लिए डुगडुगी पीटने की स्थिति में होंगे. 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली अप्रत्याशित सफलता ने उसकी उम्मीदों को काफी उठा दिया है, जिस वजह से वह अपनी आवाज बुलंद करने की बेहतर स्थिति में है. तीन वर्ष बाद अब वह तीन अंकों में अपने परिणाम की आशा कर सकती है. इससे उसे अपने लंबे अवसान से उबरने का मौका मिलेगा, हालांकि उसके लिए यह बहुत छोटी छलांग होगी. कुल 400 सीटों में यदि कांग्रेस 35 सीटें भी निकाल पाती है, तो कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए अपनी पीठ थपथपाने का यह बेहतर मौका होगा. 1984-85 के चुनावों में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी. उस समय जन्मे लोग इस बार विधानसभा चुनावों में पहली बार वोट डालेंगे. इन 20 वर्षों में भारत में तीन राष्ट्रपति हो चुके हैं और एक पूरी पीढ़ी मतदाता के रूप में परिपक्व हो चुकी है, लेकिन कांग्रेस अभी भी भारत के इस सबसे महत्वपूर्ण राज्य की राजनीतिक नब्ज को पहचान पाने में विफल रही है. किसी भी सामान्य चुनाव में जीत का गणितशास्त्र यह बताने के पर्याप्त होता है कि कौन-सी पार्टी जीत रही है. लेकिन उत्तर प्रदेश में विजेताओं का निर्धारण बीजगणित से तय होता है. गंठबंधन का निर्धारण चुनाव परिणाम आने के बाद तय होगा. इसी तरह मुख्यमंत्री का चुनाव मतदाताओं की इच्छा से नहीं, बल्कि राजनीतिज्ञों की इच्छा से तय होगा. इसलिए चुनाव के दौरान दिये जानेवाले सारे बयानों को भुला देना चाहिए. जिस तरह विवाह पूर्व के समझौते में सब कुछ स्वीकृत होता है, वैसे ही उत्तर प्रदेश में भी कोई भी किसी के साथ भी उठने-बैठने व समझौते को तैयार है. गंठबंधन की संभावना के बारे में अगर कुछ इनकार किया जा सकता है, तो वह है भाजपा और कांग्रेस के बीच गंठबंधन. इस बारे में राहुल गांधी की बात की जाये तो उनके चुनाव प्रचार से यह साफ है कि वह किसी अन्य के बजाय पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के खिलाफ ज्यादा हैं. इस बारे में वह कहते भी हैं कि 1996 में राव द्वारा बसपा के साथ गंठबंधन एक बड़ी ऐतिहासिक भूल थी. यह कथन बिल्कुल ठीक भी है, लेकिन यदि चुनावों में बसपा 140 सीटें और कांग्रेस 40 सीटें पाती है, तो यह कांग्रेस को मायावती सरकार में शामिल होने या बाहर से समर्थन करने से नहीं रोकेगी. संभवत: इस बारे में राजनाथ सिंह का कथन ज्यादा सटीक और साफ है. वह कहते हैं कि भाजपा के लिए कोई भी अछूत नहीं है. यदि संख्यात्मक आंकड़ों को पूरा करने की जरूरत हुई तो मायावती और मुलायम सिंह दोनों खुशी-खुशी अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन लेने को तैयार होंगे. हालांकि वे भाजपा को समर्थन देने के मामले में कम खुश होंगे, लेकिन यह सब कुछ मिलनेवाली सीटों की संख्या पर निर्भर करेगा. यदि उत्तर प्रदेश चुनावों में खंडित जनादेश आता है, तो कांग्रेस को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का मौका मिल जायेगा. हालांकि 10 फीसदी से भी कम सीटें पाने के बाद भी कांग्रेस के हाथों में सौ प्रतिशत यह अधिकार होगा. इसके लिए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सिर्फ यह घोषित करना होगा कि कोई भी राजनीतिक दल राज्य में स्थिर सरकार बनाने के लिए निर्णायक स्थिति में नहीं है. और इस तरह से कांग्रेस को राज्य में अपने निर्णयों और विशेषाधिकारों को थोपने के लिए एक बहाना मिल जायेगा. इस बारे में कांग्रेस के पास राज्य में उनका अपना आज्ञापालक राज्यपाल होने के बावजूद केवल एक बाधा भारत के निष्पक्ष राष्ट्रपति हैं. राष्ट्रपति कलाम की बढ़ती लोकप्रियता की वजह उनका सही होना है. वह संवैधानिक बातों के प्रति पर्याप्त सतर्क रहते हैं और राजनीतिक खेल के लिए नैतिक बातों को तोड़ने-मरोड़ने में विश्वास नहीं करते. वह अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के प्रथम दौर के अंतिम समय में किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहेंगे. हालांकि उत्तर प्रदेश के चुनावों का बहुत बड़ा प्रभाव कलाम के दूसरी बार चुने जाने पर पड़ेगा. इस बारे में किसी तरह के बहस की जरूरत नहीं है. चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से पता चलता है कि 80 प्रतिशत लोग कलाम को राष्ट्रपति के रूप में पसंद करते हैं. लेकिन चुनाव मंडल का निर्माण सांसदों और विधायकों को मिलाकर होता है, जिस वजह से यह राजनीतिक पार्टियों के बीच का खेल हो जाता है. हालांकि केंद्र सरकार अभी पूर्ण बहुमत की स्थिति में है, लेकिन प्रश्न यह है कि सरकार गुप्त मतदान में खुद को कितना सहज पायेगी? यह कोई नहीं जानता कि संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन सरकार को समर्थन कर रहे 45 से अधिक सांसद चुनाव के दौरान किधर जायेंगे? किसी भी गंठबंधन सरकार में सहभागी दलों को मुख्य दल की लोकप्रियता का ध्यान रखना चाहिए. यह विश्वास कांग्रेस से घटता नजर आ रहा है. पिछले दो वर्ष में बिहार और पश्चिम बंगाल के बाद यदि उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस के पुनर्जीवित होने की संभावना नहीं बनती तो यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा विस्मयात्मक प्रश्न होगा, जो अभी मेरे दिमाग में छोटे प्रश्न के रूप में उभर रहा है. इस सबके लिए केंद्र की कांग्रेस सरकार अकेले उत्तरदायी है, जो भारतीय राजनीति में सहज स्थान पाने के ऐतिहासिक अवसर को भुनाने में विफल रही. सरकार के पास अब भी अवसर है कि वह अपने फिर से चुने जाने के लिए मतदाताओं के एक निश्चित खेमे का निर्माण करे. 2004 में केंद्र में कांग्रेस ने बड़ी कुशलता से एक गंठबंधन का निर्माण किया. इससे उसे संसद में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में मदद मिली. लेकिन उसने मतदाताओं का गंठबंधन बनाने के काम को भुला दिया. परिणामस्वरूप वह अपनी उस बढ़त को कायम रख पाने में विफल हो रही है. यह एक सच है कि जब सत्ता आपके सिर पर हो तो आप नीचे की तरफ नहीं देख सकते. यह शक्ति बाद में शीर्ष से ओजोन स्तर में चली जाती है. इस तरह मैं कह सकता हूं कि सत्ता आपके हाथों से धीरे-धीरे फिसल जाती है. आज कांग्रेस में गंगा के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक कोई पार्टी संगठन नहीं दिखता. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल या बिहार में कोई भी समय के साथ चलनेवाला नेतृत्व नहीं दिख रहा और न ही कोई जमीनी स्तर पर क ड़ी मेहनत करने के लिए इच्छुक है. यदि सब कुछ ठीक रहता, तो उत्तर प्रदेश में अभी तक चार मुख्यमंत्री और भारत में पांच प्रधानमंत्री ही होते.

अनुवाद : योगेंद्र केसरवानी

May 6, 2007 at 6:43 pm Leave a comment


calander

May 2007
M T W T F S S
« Apr    
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
28293031