Archive for May 7, 2007

कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था : अरुंधति राय

देश और दुनिया में जिस तरह के हालात हैं उनमें लेखकों का क्या दायित्व बनता है और वे कहां खड़े हैं इस पर लगातार बहस होती रही है. साम्राज्यवाद का हमला साहित्य और संस्कृति पर भी हो रहा है. यह जनता को उसके संघर्षों और संवेदना से अलगाव में डाल देने की कोशिश के तहत हो रहा है. ऐसे में जब अरुंधति राय इस पर कुछ कहती हैं तो उसको सुनने का अपना अलग महत्व होता है. वे कम से कम अभी दुनिया की सबसे ज़्यादा सुनी जानेवाली और सबसे विश्वसनीय आवाज़ हैं. उनसे विभिन्न मुद्दों पर बात की है वैभव सिंह ने. यह बातचीत समकालीन जनमत में प्रकाशित हो चुकी है. यहां पूरी बातचीत का पहला आधा हिस्सा ही दिया जा रहा है. बाकी पढ़ेंगे कल.

साम्राज्यवाद का दौर बड़ा खतरनाक होता है और इसका जीवन के हर क्षेत्र पर असर पड़ता है.
कला-संस्कृति भी इससे अछूती नहीं रहती है. ऐसे में साम्राज्यवाद का सामना कर रहे लेखकों का क्या दायित्व होता है?

देखिए, पहले तो मैं साफ कर दूं कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मैं लेखकों के बारे में कोई नियम बनाने के सख्त खिलाफ हूं. हर लेखक दूसरे लेखक से अलग होता है और सामाजिक यथार्थ को समझने की उसकी दृष्टि भी अलग होती है. इसलिए उसे क्या लिखना चाहिए, क्या नहीं, इस पर पहले से कोई तयशुदा मानदंड नहीं विकसित किये जाने चाहिए. ऐसे मानदंड अक्सर ही जड़ होते हैं और जिन गतिशील मानवीय भावों से जीवंत रचनाओं का जन्म होता है, उनके साथ न्याय नहीं कर पाते हैं. वैसे भी हमें अखबारी रिपोर्ट जैसे उपन्यास या कहानियां नहीं चाहिए, क्योंकि उनसे पाठक अपने को लंबे समय तक जोड़ नहीं पाते हैं. सामाजिक थीम को आधार बना कर लिखे गये गीत अन्य गीतों की तुलना में ज्यादा सुंदर होते हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग पहले से तय कर सामाजिक मुद्दों पर लिखने बैठते हैं, अक्सर ही उनकी रचनाएं दोयम दर्जे की और घटिया होती हैं. लेकि न इसका यह मतलब भी नहीं कि जो सामाजिक मुद्दों पर नहीं लिखते हैं, वे हमेशा अच्छी रचनाएं ही लिखते हैं. मैं अंगरेजी में लिखती हूं और जानती हूं कि अंगरेज लेखकों की दुनिया ही अलग होती है. उन्हें इससे फर्क पड़ता ही नहीं कि उनके उपन्यासों में कोई सामाजिक मुद्दा आता है या नहीं और उससे समाज में परिवर्तन का लक्ष्य कहां तक पूरा होता है. वैसे भी लेखकों के दायित्व के बारे में इकतरफा ढंग से विचार करना क ठिन होता है, क्योंकि लेखक भी कई राजनीतिक दलों और विचारधाराओं में बंटे होते हैं. ये प्रगतिशील, रेसिस्ट, फासिस्ट या कम्युनल, कुछ भी हो सकते हैं. उनकी पॉलिटिक्स अलग-अलग होती है.
लेकि न इसके बावजूद कोई लेखक अपनी कलम को प्रतिरोध का अस्त्र तो बना ही सक ता है?
मैं फिर भी कहूंगी कि सभी कलाकार और कवि एक श्रेणी के सदस्य नहीं होते हैं. साहित्य रचना अपने में फैक्चर्ड बिजनेस है. इसके अलावा प्रतिरोध के लिए सिर्फ क लाकार ही क्यों आगे आयें, सिर्फ इसलिए कि वह कोई स्पेशल कैटेगरी हैं. मैं अपने बारे में तो कह सकती हूं कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ मुझे लिखना चाहिए, लेकिन दूसरों को ऐसे किसी नियम में बांध नहीं सकती हूं और न बांधा जाना चाहिए. मेरा काम कोई नेता बनना, मंच से अच्छे भाषण देना या लोगों को खुश रखना नहीं होना चाहिए. मुझे अपनी आजादी और स्पेस भी चाहिए ताकि लिख सकूं, कुछ और सोच सकूं. मैं यह दावा नहीं कर सकती कि मैं कोई बहुत अच्छी इनसान हूं और हर वक्त लोगों के मुक्ति संघर्ष के बारे में सोचती रहती हूं. दुर्भाग्य से अच्छे लोग अक्सर बुरे लेखक साबित होते हैं. इसके अलावा, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम हैं कौन, यह पहचानें और यह किसी उधार के नजरिये से नहीं बल्कि खुद के नजरिये से पहचानी जानेवाली चीज है. एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सक ता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. मैं जो नहीं हूं, वह होने का दिखावा भी नहीं कर सकती. मैं लेखक हूं और किसी नेता की तरह अपनी छवि को निर्मित नहीं कराना चाहती. मैं गलत चीजों के विरोध में तर्क कर सकती हूं, लेकिन उनके खिलाफ अंतिम संघर्ष छेड़ने के लिए दूसरी ही तरह की योग्यता व कौशल की आवश्यक ता होती है, जो हो सकता है कि मेरे पास न हो. मेरे पास एक लेखक की संवेदना (सेंसबिलिटी) है और जिस तरह कि सी मजदूर को अपना रोजगार छिनने, बांध के इलाके में किसी किसान को अपनी जमीन डूबने का डर होता है, उसी तरह मुझे भी अपनी संवेदना के नष्ट होने, बाहरी स्थितियों के प्रवाह में उसके डूबने का खतरा सताता रहता है.
लेखक का उत्पीड़ित वर्ग से जुड़ने, उसके सौंदर्यशास्त्र व यथार्थ को साहित्य में व्यक्त करने के नैतिक दायित्व को कैसे भुलाया जा सकता है?
मुझे नहीं लगता कि लेखन कोई सोशल वर्क या चैरिटी का मामला है, भले ही किसी खास स्ट्रगल में इसका इसी रू प में इस्तेमाल कर लिया जाये. लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध क रते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन क रने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था. हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार समेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं. यानी शासकों को पता रहता है कि लेखकों को क्या ले-देकर खामोश रखा जा सकता है. ऐसा नहीं है कि व्यवस्था के अंग बन कर रहनेवाले ये लेखक इडियट हैं और उन्हें पता नहीं कि देश-दुनिया में हो क्या रहा है. ये लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन जानते हैं कि कहां उन्हें फायदा हो सकता है. लेखकों को बुला कर बड़े-बड़े समारोह किये जाते हैं और ठोस, हाड़-मांस के लोगों की जिंदगी में क्या घटित हो रहा है, इस पर बोलने के मौके इन्हें नहीं दिये जाते हैं. उड़ीसा में वेदांत नामक कंपनी है जो आदिवासी इलाकों में खनन का काम करती है. हमारे वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी उससे जुड़े हुए रहे हैं. वही कपंनी, जिस पर मानवाधिकार कानूनों के उल्लंघन के आरोप हैं, अब करीब एक अरब डॉलर खर्च कर विशाल यूनिवर्सिटी खोलने जा रही है और इसमें लेखकों, अकैडमिशियंश, जर्नलिस्ट और कलाकारों को भी आमंत्रित किया जा सकता है. यानी अब विचार, प्रतिरोध और दमन क मिला कर एक खूबसूरत खेल खेला जा रहा है. कोई भी अब अपने विचार व प्रतिबद्धता के मामले में पूरी तरह से शुद्ध और महान बन कर नहीं रह सकता. हम सब वे लोग हैं जो गंदे पानी के वाटर पूल में तैरने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरफ हैं. ऐसा कोई सपाट निष्क र्ष देना ठीक नहीं होगा कि चूंकि कोई लेखक है, इसलिए प्रगतिशील होना और साम्राज्यवाद का विरोध करना उसके लिए स्वाभाविक हो जाता है. रुडयार्ड किपलिंग एक मशहूर और बड़े लेखक रहे हैं लेकिन उनके लेखन में भयंकर रेसिस्ट और उपनिवेशवादी प्रवृत्तियां दिखायी पड़ सकती हैं.
आप देखें कि कितने युद्धों में कितने लेखक मारे गये. दूसरे विश्वयुद्ध में नाजियों ने भारी पैमाने पर लेखकों का कत्लेआम किया. इराक में भी सैक ड़ों रचनाकार मारे जा चुके हैं और बांग्लादेश में तसलीमा नसरीन को रहने नहीं दिया जा रहा. इन खतरनाक स्थितियों में लेखक क्या सिर्फ आत्मसंतोष की रचनाएं लिख कर जिंदा रह सकता है? हम सिर्फ फूलों और सितारों की कहानियों से दिल बहला सकते हैं?
आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं कहीं भी आत्मसंतोषी होकर जीने और लिखने की वकालत नहीं कर रही हूं और मैं निजी तौर पर अन्याय व लोगों की पीड़ा के अलावा कहीं और देख ही नहीं सकती. मई, 2005 में तुर्की के इस्तांबुल शहर में वर्ल्ड ट्रिब्यूनल ऑन इराक की बैठक में दी गयी स्पीच में मैंने इराक के संदर्भ में ऐसे इतिहास लेखन की बात की थी जो विजेताओं के नजरिये से नहीं बल्कि हारे हुए. कत्लोगारत के शिकार हुए पराजित लोगों के नजरिये से लिखा गया हो. वैसे भी एक -एक लेखक के पास इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं कि वह ईमानदारी से अपने वक्त की क हानियां लिखे. वह वक्त युद्ध का हो सकता है, शांति का हो सकता है और प्रेम का हो सकता है, लेकिन लेखक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते. जैसे कि हाल ही में जयपुर में रायटर्स मीट में बड़े और मशहूर अंगरेजी लेखक जुटे थे, लेकिन वहां भी बड़े गैर राजनीतिक ढंग से दुनिया की परिस्थितियों के बारे में चर्चाएं होती रहीं. उनकी बातें सुन कर तो ऐसा लगता है जैसे समाज के ताकतवर और कमजोर लोगों को जोड़नेवाली भाषा खत्म कर दी गयी है. उनके बीच अब कोई संवाद या कम्युनिकेशन हो ही नहीं सकता है. जयपुर के लेखक सम्मेलन में भारत की गरीबी, बेरोजगारी की दशा पर शायद ही कोई बोला. इसकी जगह हर लेखक भारत की कथित प्रगति और वर्ल्ड पावर बनने की संभावनाओं पर ही आत्ममुग्ध भाव से बात करता रहा. जबकि वर्तमान हालात में विकास के नाम पर ऐसी अंधेरगर्दी और लूटपाट मची है जितनी शायद औपनिवेशिक शासन में भी नहीं रही होगी. एक तरफ रूरल एंप्ल्वायमेंट गारंटी प्रोग्राम चलाये जा रहे हैं तो दूसरी ओर स्पशेल इकॉनामिक जोन (सेज) के नाम पर किसानों की जमीनें छीन कर उनकी खेतीबाड़ी को नष्ट किया जा रहा है. सेज के निर्माण से ज्यादा लोग उजाड़े जायेंगे. दिल्ली के ही हालात देखिए, हर तरफ भयंकर अराजकता नजर आती है और अफ सोस की बात है कि हम इस अराजकता के भी आदी होते जा रहे हैं. मुझे तो लगता है कि 1789 की फ्रेंच क्रांति से पहले पेरिस की जैसी अराजकतापूर्ण स्थितियां थीं, कुछ वैसी ही स्थितियां दिल्ली की भी हो गयी हैं. माफियाओं क राज, जबरन उजाड़ा जाना और नये समृद्ध वर्ग का उदय, यह सभी दिल्ली के वर्तमान चरित्र को तय कर रहे हैं. कोई नहीं पूछ रहा कि इस हवाई प्रगति की कीमत किसके आंसुओं और खून के एवज में चुकायी जा रही है. इस मामले में राज्य की जल्लादी भूमिका देख कर कोई भी चकित हो जाये. सबसे बड़ी दिक्कत असीमित संचय की छूट देने की भी है. जिस तरह से मीडिया कैपिटल, लैंड कैपिटल या राजनीतिक पूंजी एकत्र करने की छूट दी जा रही है, उससे व्यापक विनाश को ही हम दावत दे रहे हैं. लोगों में भी गुस्सा बढ़ेगा और उसी का नतीजा है कि भारत के सैकड़ों इलाके नक्सलियों या उग्रवादियों की चपेट में हैं.
ऐसे में साहित्य यथार्थ के बारे में कैसे हमारी समझदारी को ज्यादा मानवीय और तर्क संगत बना सक ता है?
कोई तो हो जो इस पूरी उथलपुथल को रिकार्ड करे और किसी लेखक का काम उत्पीड़न के खिलाफ लोगों को संवेदनशील बनाना है. उसका लेखन ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों में गुस्सा पैदा हो और वे अपने स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोच सकें . साथ ही उसमें सत्तावर्ग के पतनशील जीवन के चित्र भी होने चाहिए क्योंकि किसी भी लड़ाई को तब तक नहीं जीता जा सकता जब तक कि हम अपने दुश्मन को ठीक से नहीं समझते, उसके इरादों को नहीं जानते. लेखक अपने चारों और फैले यथार्थ के बीच अकेला होता है, उसका सामना करता है और फिर वही यथार्थ कई भाव-स्तरों से छन कर उसकी रचनाओं का अहम हिस्सा बन जाता है. मैं मानती हूं कि लेखक का काम सिर्फ एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का हिस्सा बन जाना नहीं है. उसकी समसामयिक यथार्थ के बारे में प्रखर राजनीतिक समझ होनी चाहिए और वह समझ लेखन में भी रचनात्मक रू प में उभर कर आनी चाहिए. एक लेखक चाहे तो लाखों लोगों की आवाज बन सकता है और लोग उसके लेखन में अपनी जिंदगियां तलाश सकते हैं. परियों की सीधी-सरल कहानियों में ढेर सारी राजनीति छिपी होती है लेकिन उन कहानियों से हमें पता चलता है कि सीधी-सरल ढंग से लिखी गयी चीजों का कितना गहरा असर होता है. इसलिए लेखक को सरल लेखन करने की जटिल साधना से गुजरना चाहिए. लेखकों के दायित्व के अलावा लेखकों के ईद-गिर्द बुना गया कै रियर और ऐश्वर्य का जाल भी कम खतरनाक नहीं होता और हमें इसके बारे में बात करनी चाहिए.
भारत में लोकतंत्र कई तरह के छलावों का शिकार हो रहा है. क्या किसी मुल्क की जनता सिर्फ अहिंसा के सहारे अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के रास्ते में आनेवाले बाधक तत्वों से निपट सकती है?
कु छ दिन पहले दावोस सम्मेलन में जाकर सोनिया गांधी ने बड़े आत्मप्रशंसा के भाव से कहा था कि किस तरह भारतवासी गांधी के अहिंसा सिद्धांतों पर चलने में यकीन क रते हैं. यह वही सरकार है जो गांधी के नाम पर सिर्फ शैंपू और खादी बेचती है और बाकी उसे गांधी से कोई लेना-देना नहीं है. वैसे भी सरकार और सोनिया गांधी अगर अहिंसा के बारे में इतनी तारीफ करें तो हमें अहिंसा पर भी संदेह करना चाहिए. इस वजह से क्योंकि अहिंसा के कारण ही सरकार और पूंजीपतियों को बड़ा फायदा होता है. जब लोग अहिंसक होते हैं तो राज्य और कोर्ट भी जनविरोधी होने से नहीं डरते हैं. वहां अपील करने पर लोगों को न्याय नहीं बल्कि थप्पड़ ही मिलती है. इसीलिए जबर्दस्त दमन के दौर में अब मैं किसी को गांधीवादी उसूलों को अपनाने को नहीं कहती, क्योंकि नर्मदा बचाओ आंदोलन और नार्थ ईस्ट की एक्टिविस्ट शर्मिला जैसे जो लोग गांधीवादी उसूलों के सहारे लड़ाई लड़ते हैं, उनकी आवाज कहीं सुनी नहीं जाती है. मुझे बार-बार हरसूद का एक उदाहरण याद आता है. जब पूरा कस्बा डूबनेवाला था तो मैं हालात का जायजा लेने वहां गयी थी. वहां जब मैंने लोगों से पूछा कि वे अपने कस्बे को बचाने के लिए डट कर विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने जो जवाब दिया उसने मुझे अचंभित कर दिया. उनलोगों का कहना था कि हमलोग इसलिए विरोध नहीं कर रहे हैं क्योंकि ऐसा करना संस्कृति-सभ्यता के खिलाफ होगा. क्या करेंगे ऐसी सभ्यता और उसूलों को लेक र, जिसमें आपकी आवाज सुनी ही नहीं जाती? हम अपने लोकतंत्र पर इतराते हैं. लैटिन अमेरिकी मुल्क चिली के तानाशाह आगस्टो पिनोशे के शासनकाल में 3500 लोग मारे गये और करीब 17000 लोग गायब हो गये, लेकिन हिंदुस्तान में सिर्फ कश्मीर में 68 हजार लोग मारे जा चुके हैं. यानी कभी-क भी लोकतंत्र किसी भी तानाशाही से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.

देखें : सितंबर 11 की घटना पर अरुंधति का मशहूर भाषण.

अमेरिका भी अपने को लोकतांत्रिक मुल्क कहता है लेकिन वहीं एक पूर्व सेना अधिकारी और वर्ल्ड बैंक के पूर्व प्रेजिडेंट रॉबर्ट मैक नामरा ने कहा था कि वियतनाम के लोग अपनी जिंदगी का मूल्य नहीं समझते, इसीलिए अमेरिका को उनका हजारों-लाखों की संख्या में नरसंहार करना पड़ा. अमेरिका ही नहीं बल्कि रूस, जर्मनी, जापान, चीन जैसी सभी महान सभ्याताएं और देश दूसरों को लूटने और खून-खराबे की बुनियाद पर टिकी हैं. अजीब बात है कि भारत में मुख्यधारा के वामदल एक और इराक में जारी कत्लेआम का विरोध क रते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद की आड़ में कश्मीर पर चुप्पी साध लेते हैं. इराक में अगर भारी तादाद में अमेरिकी फौजे हैं तो कश्मीर में भी करीब सात लाख भारतीय फौजें हैं. इसके अलावा नॉर्थ ईस्ट का आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट तो बड़े से बड़े तानाशाहीवाले कानून का बाप है. क श्मीर में तो फौजें भी आतंकवाद को हवा दे रही हैं और किसी युवक या युवती का अचानक गुम हो जाना अब बड़ी खबर नहीं है. कश्मीर वैसे भी कभी भारत का हिस्सा नहीं था और 1947 में उसे जबरन भारत में मिला लिया गया था. कोई नहीं जानना चाहता कि कश्मीर के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं और यह जानने में अगर उनकी थोड़ी भी रुचि होती तो वहां पर जनमत संग्रह अब तक करा दिया जाता. लेकिन हमारा दिमागी दिवालियापन हमें बताता है कि संसद कांड के अभियुक्त अफजल को फांसी पर लटका देने भर से हम आतंक वाद से मुक्त हो जायेंगे. सब जानते हैं कि अफजल को निचली अदालत में वकील नहीं मिला और कोई भी सबूत उसे फांसी पर लटकाने के लिए काफी नहीं है. पुलिस ने जो थ्योरी गढ़ी है उसमें काफी कु छ झूठ है. हमें संसद कांड में सच को नहीं बताया जा रहा, उल्टे कश्मीर में अब पुलिस दमन में मारे गये लोगों की कब्रें बरामद हो रही हैं और राज्य सरकार अपने ही पुलिस अफसरों को जेल भेज रही है.

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May 7, 2007 at 11:39 pm 7 comments

कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था : अरुंधति राय

देश और दुनिया में जिस तरह के हालात हैं उनमें लेखकों का क्या दायित्व बनता है और वे कहां खड़े हैं इस पर लगातार बहस होती रही है. साम्राज्यवाद का हमला साहित्य और संस्कृति पर भी हो रहा है. यह जनता को उसके संघर्षों और संवेदना से अलगाव में डाल देने की कोशिश के तहत हो रहा है. ऐसे में जब अरुंधति राय इस पर कुछ कहती हैं तो उसको सुनने का अपना अलग महत्व होता है. वे कम से कम अभी दुनिया की सबसे ज़्यादा सुनी जानेवाली और सबसे विश्वसनीय आवाज़ हैं. उनसे विभिन्न मुद्दों पर बात की है वैभव सिंह ने. यह बातचीत समकालीन जनमत में प्रकाशित हो चुकी है. यहां पूरी बातचीत का पहला आधा हिस्सा ही दिया जा रहा है. बाकी पढ़ेंगे कल.

साम्राज्यवाद का दौर बड़ा खतरनाक होता है और इसका जीवन के हर क्षेत्र पर असर पड़ता है.
कला-संस्कृति भी इससे अछूती नहीं रहती है. ऐसे में साम्राज्यवाद का सामना कर रहे लेखकों का क्या दायित्व होता है?

देखिए, पहले तो मैं साफ कर दूं कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मैं लेखकों के बारे में कोई नियम बनाने के सख्त खिलाफ हूं. हर लेखक दूसरे लेखक से अलग होता है और सामाजिक यथार्थ को समझने की उसकी दृष्टि भी अलग होती है. इसलिए उसे क्या लिखना चाहिए, क्या नहीं, इस पर पहले से कोई तयशुदा मानदंड नहीं विकसित किये जाने चाहिए. ऐसे मानदंड अक्सर ही जड़ होते हैं और जिन गतिशील मानवीय भावों से जीवंत रचनाओं का जन्म होता है, उनके साथ न्याय नहीं कर पाते हैं. वैसे भी हमें अखबारी रिपोर्ट जैसे उपन्यास या कहानियां नहीं चाहिए, क्योंकि उनसे पाठक अपने को लंबे समय तक जोड़ नहीं पाते हैं. सामाजिक थीम को आधार बना कर लिखे गये गीत अन्य गीतों की तुलना में ज्यादा सुंदर होते हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग पहले से तय कर सामाजिक मुद्दों पर लिखने बैठते हैं, अक्सर ही उनकी रचनाएं दोयम दर्जे की और घटिया होती हैं. लेकि न इसका यह मतलब भी नहीं कि जो सामाजिक मुद्दों पर नहीं लिखते हैं, वे हमेशा अच्छी रचनाएं ही लिखते हैं. मैं अंगरेजी में लिखती हूं और जानती हूं कि अंगरेज लेखकों की दुनिया ही अलग होती है. उन्हें इससे फर्क पड़ता ही नहीं कि उनके उपन्यासों में कोई सामाजिक मुद्दा आता है या नहीं और उससे समाज में परिवर्तन का लक्ष्य कहां तक पूरा होता है. वैसे भी लेखकों के दायित्व के बारे में इकतरफा ढंग से विचार करना क ठिन होता है, क्योंकि लेखक भी कई राजनीतिक दलों और विचारधाराओं में बंटे होते हैं. ये प्रगतिशील, रेसिस्ट, फासिस्ट या कम्युनल, कुछ भी हो सकते हैं. उनकी पॉलिटिक्स अलग-अलग होती है.
लेकि न इसके बावजूद कोई लेखक अपनी कलम को प्रतिरोध का अस्त्र तो बना ही सक ता है?
मैं फिर भी कहूंगी कि सभी कलाकार और कवि एक श्रेणी के सदस्य नहीं होते हैं. साहित्य रचना अपने में फैक्चर्ड बिजनेस है. इसके अलावा प्रतिरोध के लिए सिर्फ क लाकार ही क्यों आगे आयें, सिर्फ इसलिए कि वह कोई स्पेशल कैटेगरी हैं. मैं अपने बारे में तो कह सकती हूं कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ मुझे लिखना चाहिए, लेकिन दूसरों को ऐसे किसी नियम में बांध नहीं सकती हूं और न बांधा जाना चाहिए. मेरा काम कोई नेता बनना, मंच से अच्छे भाषण देना या लोगों को खुश रखना नहीं होना चाहिए. मुझे अपनी आजादी और स्पेस भी चाहिए ताकि लिख सकूं, कुछ और सोच सकूं. मैं यह दावा नहीं कर सकती कि मैं कोई बहुत अच्छी इनसान हूं और हर वक्त लोगों के मुक्ति संघर्ष के बारे में सोचती रहती हूं. दुर्भाग्य से अच्छे लोग अक्सर बुरे लेखक साबित होते हैं. इसके अलावा, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम हैं कौन, यह पहचानें और यह किसी उधार के नजरिये से नहीं बल्कि खुद के नजरिये से पहचानी जानेवाली चीज है. एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सक ता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. मैं जो नहीं हूं, वह होने का दिखावा भी नहीं कर सकती. मैं लेखक हूं और किसी नेता की तरह अपनी छवि को निर्मित नहीं कराना चाहती. मैं गलत चीजों के विरोध में तर्क कर सकती हूं, लेकिन उनके खिलाफ अंतिम संघर्ष छेड़ने के लिए दूसरी ही तरह की योग्यता व कौशल की आवश्यक ता होती है, जो हो सकता है कि मेरे पास न हो. मेरे पास एक लेखक की संवेदना (सेंसबिलिटी) है और जिस तरह कि सी मजदूर को अपना रोजगार छिनने, बांध के इलाके में किसी किसान को अपनी जमीन डूबने का डर होता है, उसी तरह मुझे भी अपनी संवेदना के नष्ट होने, बाहरी स्थितियों के प्रवाह में उसके डूबने का खतरा सताता रहता है.
लेखक का उत्पीड़ित वर्ग से जुड़ने, उसके सौंदर्यशास्त्र व यथार्थ को साहित्य में व्यक्त करने के नैतिक दायित्व को कैसे भुलाया जा सकता है?
मुझे नहीं लगता कि लेखन कोई सोशल वर्क या चैरिटी का मामला है, भले ही किसी खास स्ट्रगल में इसका इसी रू प में इस्तेमाल कर लिया जाये. लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध क रते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन क रने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था. हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार समेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं. यानी शासकों को पता रहता है कि लेखकों को क्या ले-देकर खामोश रखा जा सकता है. ऐसा नहीं है कि व्यवस्था के अंग बन कर रहनेवाले ये लेखक इडियट हैं और उन्हें पता नहीं कि देश-दुनिया में हो क्या रहा है. ये लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन जानते हैं कि कहां उन्हें फायदा हो सकता है. लेखकों को बुला कर बड़े-बड़े समारोह किये जाते हैं और ठोस, हाड़-मांस के लोगों की जिंदगी में क्या घटित हो रहा है, इस पर बोलने के मौके इन्हें नहीं दिये जाते हैं. उड़ीसा में वेदांत नामक कंपनी है जो आदिवासी इलाकों में खनन का काम करती है. हमारे वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी उससे जुड़े हुए रहे हैं. वही कपंनी, जिस पर मानवाधिकार कानूनों के उल्लंघन के आरोप हैं, अब करीब एक अरब डॉलर खर्च कर विशाल यूनिवर्सिटी खोलने जा रही है और इसमें लेखकों, अकैडमिशियंश, जर्नलिस्ट और कलाकारों को भी आमंत्रित किया जा सकता है. यानी अब विचार, प्रतिरोध और दमन क मिला कर एक खूबसूरत खेल खेला जा रहा है. कोई भी अब अपने विचार व प्रतिबद्धता के मामले में पूरी तरह से शुद्ध और महान बन कर नहीं रह सकता. हम सब वे लोग हैं जो गंदे पानी के वाटर पूल में तैरने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरफ हैं. ऐसा कोई सपाट निष्क र्ष देना ठीक नहीं होगा कि चूंकि कोई लेखक है, इसलिए प्रगतिशील होना और साम्राज्यवाद का विरोध करना उसके लिए स्वाभाविक हो जाता है. रुडयार्ड किपलिंग एक मशहूर और बड़े लेखक रहे हैं लेकिन उनके लेखन में भयंकर रेसिस्ट और उपनिवेशवादी प्रवृत्तियां दिखायी पड़ सकती हैं.
आप देखें कि कितने युद्धों में कितने लेखक मारे गये. दूसरे विश्वयुद्ध में नाजियों ने भारी पैमाने पर लेखकों का कत्लेआम किया. इराक में भी सैक ड़ों रचनाकार मारे जा चुके हैं और बांग्लादेश में तसलीमा नसरीन को रहने नहीं दिया जा रहा. इन खतरनाक स्थितियों में लेखक क्या सिर्फ आत्मसंतोष की रचनाएं लिख कर जिंदा रह सकता है? हम सिर्फ फूलों और सितारों की कहानियों से दिल बहला सकते हैं?
आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं कहीं भी आत्मसंतोषी होकर जीने और लिखने की वकालत नहीं कर रही हूं और मैं निजी तौर पर अन्याय व लोगों की पीड़ा के अलावा कहीं और देख ही नहीं सकती. मई, 2005 में तुर्की के इस्तांबुल शहर में वर्ल्ड ट्रिब्यूनल ऑन इराक की बैठक में दी गयी स्पीच में मैंने इराक के संदर्भ में ऐसे इतिहास लेखन की बात की थी जो विजेताओं के नजरिये से नहीं बल्कि हारे हुए. कत्लोगारत के शिकार हुए पराजित लोगों के नजरिये से लिखा गया हो. वैसे भी एक -एक लेखक के पास इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं कि वह ईमानदारी से अपने वक्त की क हानियां लिखे. वह वक्त युद्ध का हो सकता है, शांति का हो सकता है और प्रेम का हो सकता है, लेकिन लेखक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते. जैसे कि हाल ही में जयपुर में रायटर्स मीट में बड़े और मशहूर अंगरेजी लेखक जुटे थे, लेकिन वहां भी बड़े गैर राजनीतिक ढंग से दुनिया की परिस्थितियों के बारे में चर्चाएं होती रहीं. उनकी बातें सुन कर तो ऐसा लगता है जैसे समाज के ताकतवर और कमजोर लोगों को जोड़नेवाली भाषा खत्म कर दी गयी है. उनके बीच अब कोई संवाद या कम्युनिकेशन हो ही नहीं सकता है. जयपुर के लेखक सम्मेलन में भारत की गरीबी, बेरोजगारी की दशा पर शायद ही कोई बोला. इसकी जगह हर लेखक भारत की कथित प्रगति और वर्ल्ड पावर बनने की संभावनाओं पर ही आत्ममुग्ध भाव से बात करता रहा. जबकि वर्तमान हालात में विकास के नाम पर ऐसी अंधेरगर्दी और लूटपाट मची है जितनी शायद औपनिवेशिक शासन में भी नहीं रही होगी. एक तरफ रूरल एंप्ल्वायमेंट गारंटी प्रोग्राम चलाये जा रहे हैं तो दूसरी ओर स्पशेल इकॉनामिक जोन (सेज) के नाम पर किसानों की जमीनें छीन कर उनकी खेतीबाड़ी को नष्ट किया जा रहा है. सेज के निर्माण से ज्यादा लोग उजाड़े जायेंगे. दिल्ली के ही हालात देखिए, हर तरफ भयंकर अराजकता नजर आती है और अफ सोस की बात है कि हम इस अराजकता के भी आदी होते जा रहे हैं. मुझे तो लगता है कि 1789 की फ्रेंच क्रांति से पहले पेरिस की जैसी अराजकतापूर्ण स्थितियां थीं, कुछ वैसी ही स्थितियां दिल्ली की भी हो गयी हैं. माफियाओं क राज, जबरन उजाड़ा जाना और नये समृद्ध वर्ग का उदय, यह सभी दिल्ली के वर्तमान चरित्र को तय कर रहे हैं. कोई नहीं पूछ रहा कि इस हवाई प्रगति की कीमत किसके आंसुओं और खून के एवज में चुकायी जा रही है. इस मामले में राज्य की जल्लादी भूमिका देख कर कोई भी चकित हो जाये. सबसे बड़ी दिक्कत असीमित संचय की छूट देने की भी है. जिस तरह से मीडिया कैपिटल, लैंड कैपिटल या राजनीतिक पूंजी एकत्र करने की छूट दी जा रही है, उससे व्यापक विनाश को ही हम दावत दे रहे हैं. लोगों में भी गुस्सा बढ़ेगा और उसी का नतीजा है कि भारत के सैकड़ों इलाके नक्सलियों या उग्रवादियों की चपेट में हैं.
ऐसे में साहित्य यथार्थ के बारे में कैसे हमारी समझदारी को ज्यादा मानवीय और तर्क संगत बना सक ता है?
कोई तो हो जो इस पूरी उथलपुथल को रिकार्ड करे और किसी लेखक का काम उत्पीड़न के खिलाफ लोगों को संवेदनशील बनाना है. उसका लेखन ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों में गुस्सा पैदा हो और वे अपने स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोच सकें . साथ ही उसमें सत्तावर्ग के पतनशील जीवन के चित्र भी होने चाहिए क्योंकि किसी भी लड़ाई को तब तक नहीं जीता जा सकता जब तक कि हम अपने दुश्मन को ठीक से नहीं समझते, उसके इरादों को नहीं जानते. लेखक अपने चारों और फैले यथार्थ के बीच अकेला होता है, उसका सामना करता है और फिर वही यथार्थ कई भाव-स्तरों से छन कर उसकी रचनाओं का अहम हिस्सा बन जाता है. मैं मानती हूं कि लेखक का काम सिर्फ एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का हिस्सा बन जाना नहीं है. उसकी समसामयिक यथार्थ के बारे में प्रखर राजनीतिक समझ होनी चाहिए और वह समझ लेखन में भी रचनात्मक रू प में उभर कर आनी चाहिए. एक लेखक चाहे तो लाखों लोगों की आवाज बन सकता है और लोग उसके लेखन में अपनी जिंदगियां तलाश सकते हैं. परियों की सीधी-सरल कहानियों में ढेर सारी राजनीति छिपी होती है लेकिन उन कहानियों से हमें पता चलता है कि सीधी-सरल ढंग से लिखी गयी चीजों का कितना गहरा असर होता है. इसलिए लेखक को सरल लेखन करने की जटिल साधना से गुजरना चाहिए. लेखकों के दायित्व के अलावा लेखकों के ईद-गिर्द बुना गया कै रियर और ऐश्वर्य का जाल भी कम खतरनाक नहीं होता और हमें इसके बारे में बात करनी चाहिए.
भारत में लोकतंत्र कई तरह के छलावों का शिकार हो रहा है. क्या किसी मुल्क की जनता सिर्फ अहिंसा के सहारे अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के रास्ते में आनेवाले बाधक तत्वों से निपट सकती है?
कु छ दिन पहले दावोस सम्मेलन में जाकर सोनिया गांधी ने बड़े आत्मप्रशंसा के भाव से कहा था कि किस तरह भारतवासी गांधी के अहिंसा सिद्धांतों पर चलने में यकीन क रते हैं. यह वही सरकार है जो गांधी के नाम पर सिर्फ शैंपू और खादी बेचती है और बाकी उसे गांधी से कोई लेना-देना नहीं है. वैसे भी सरकार और सोनिया गांधी अगर अहिंसा के बारे में इतनी तारीफ करें तो हमें अहिंसा पर भी संदेह करना चाहिए. इस वजह से क्योंकि अहिंसा के कारण ही सरकार और पूंजीपतियों को बड़ा फायदा होता है. जब लोग अहिंसक होते हैं तो राज्य और कोर्ट भी जनविरोधी होने से नहीं डरते हैं. वहां अपील करने पर लोगों को न्याय नहीं बल्कि थप्पड़ ही मिलती है. इसीलिए जबर्दस्त दमन के दौर में अब मैं किसी को गांधीवादी उसूलों को अपनाने को नहीं कहती, क्योंकि नर्मदा बचाओ आंदोलन और नार्थ ईस्ट की एक्टिविस्ट शर्मिला जैसे जो लोग गांधीवादी उसूलों के सहारे लड़ाई लड़ते हैं, उनकी आवाज कहीं सुनी नहीं जाती है. मुझे बार-बार हरसूद का एक उदाहरण याद आता है. जब पूरा कस्बा डूबनेवाला था तो मैं हालात का जायजा लेने वहां गयी थी. वहां जब मैंने लोगों से पूछा कि वे अपने कस्बे को बचाने के लिए डट कर विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने जो जवाब दिया उसने मुझे अचंभित कर दिया. उनलोगों का कहना था कि हमलोग इसलिए विरोध नहीं कर रहे हैं क्योंकि ऐसा करना संस्कृति-सभ्यता के खिलाफ होगा. क्या करेंगे ऐसी सभ्यता और उसूलों को लेक र, जिसमें आपकी आवाज सुनी ही नहीं जाती? हम अपने लोकतंत्र पर इतराते हैं. लैटिन अमेरिकी मुल्क चिली के तानाशाह आगस्टो पिनोशे के शासनकाल में 3500 लोग मारे गये और करीब 17000 लोग गायब हो गये, लेकिन हिंदुस्तान में सिर्फ कश्मीर में 68 हजार लोग मारे जा चुके हैं. यानी कभी-क भी लोकतंत्र किसी भी तानाशाही से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.

देखें : सितंबर 11 की घटना पर अरुंधति का मशहूर भाषण.

अमेरिका भी अपने को लोकतांत्रिक मुल्क कहता है लेकिन वहीं एक पूर्व सेना अधिकारी और वर्ल्ड बैंक के पूर्व प्रेजिडेंट रॉबर्ट मैक नामरा ने कहा था कि वियतनाम के लोग अपनी जिंदगी का मूल्य नहीं समझते, इसीलिए अमेरिका को उनका हजारों-लाखों की संख्या में नरसंहार करना पड़ा. अमेरिका ही नहीं बल्कि रूस, जर्मनी, जापान, चीन जैसी सभी महान सभ्याताएं और देश दूसरों को लूटने और खून-खराबे की बुनियाद पर टिकी हैं. अजीब बात है कि भारत में मुख्यधारा के वामदल एक और इराक में जारी कत्लेआम का विरोध क रते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद की आड़ में कश्मीर पर चुप्पी साध लेते हैं. इराक में अगर भारी तादाद में अमेरिकी फौजे हैं तो कश्मीर में भी करीब सात लाख भारतीय फौजें हैं. इसके अलावा नॉर्थ ईस्ट का आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट तो बड़े से बड़े तानाशाहीवाले कानून का बाप है. क श्मीर में तो फौजें भी आतंकवाद को हवा दे रही हैं और किसी युवक या युवती का अचानक गुम हो जाना अब बड़ी खबर नहीं है. कश्मीर वैसे भी कभी भारत का हिस्सा नहीं था और 1947 में उसे जबरन भारत में मिला लिया गया था. कोई नहीं जानना चाहता कि कश्मीर के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं और यह जानने में अगर उनकी थोड़ी भी रुचि होती तो वहां पर जनमत संग्रह अब तक करा दिया जाता. लेकिन हमारा दिमागी दिवालियापन हमें बताता है कि संसद कांड के अभियुक्त अफजल को फांसी पर लटका देने भर से हम आतंक वाद से मुक्त हो जायेंगे. सब जानते हैं कि अफजल को निचली अदालत में वकील नहीं मिला और कोई भी सबूत उसे फांसी पर लटकाने के लिए काफी नहीं है. पुलिस ने जो थ्योरी गढ़ी है उसमें काफी कु छ झूठ है. हमें संसद कांड में सच को नहीं बताया जा रहा, उल्टे कश्मीर में अब पुलिस दमन में मारे गये लोगों की कब्रें बरामद हो रही हैं और राज्य सरकार अपने ही पुलिस अफसरों को जेल भेज रही है.

May 7, 2007 at 6:21 pm 7 comments

उत्तर प्रदेश : हाथ की बेकारी और कमल की बदबू

हाथ, हाथी, साइकिल और कमल
रविभूषण
राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्रों के अर्थ अक्सर हमारे लिए विचारणीय नहीं होते. नाजिम हिकमत की `हाथ’ पर लिखी मशहूर कविता को अगर हम याद न भी करें, तो इतना तो सभी जानते हैं कि हाथ ने ही मनुष्य को सबसे पहले मानवेतर प्राणियों से अलग किया. जो कुछ संदर और सार्थक है, उसमें हाथ की सर्वोपरि भूमिका है. अब हाथ कांग्रेस का चुनाव चिह्र है और जहां तक हाथ का साथ देने का प्रश्न है, 1989 के बाद भारत के बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस की भूमिका क्रमश: घटती गयी है. फिलहाल उत्तर प्रदेश के चुनाव को ध्यान में रखते हुए वहां कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा के भविष्य पर विचार किया जा सकता है. अभी द इंडियन एक्सप्रेस सीएनएन-आइबीएन, सीएसडीएस ने जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण किया है, उसमें बसपा की स्थिति अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में सर्वाधिक अच्छी है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 403 है. उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं होने जा रहा है. 403 सीटों पर कुल 2,972 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं, जिनमें 117 राजनीतिक दलों के प्रत्याशी हैं और स्वतंत्र/निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या 2,275 है. राजनीतिक दल संख्या में जितने हों, उत्तर प्रदेश में बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा ही प्रमुख हैं. किसी भी राजनीतिक दल को 202 सीटें प्राप्त नहीं होंगी. यह वह जादुई संख्या है, जिसे प्राप्त कर कोई भी राजनीतिक दल बहुमत प्राप्त होने का दावा कर सकता है. जहां तक दूसरे राजनीतिक दलों की बात है, अजीत सिंह और राज बब्बर का राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली नहीं है. उमा भारती की पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है. विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल के अनुरोध पर उमा भारती ने अपने प्रत्याशियों को चुनावी होड़ से अलग कर लिया. भाजपा के कल्याण सिंह और उमा भारती दोनों लोध जाति के हैं. उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस बार रामजन्मभूमि का मुद्दा नहीं है. हिंदुत्व के सहारे बार-बार सामान्य जनता को जन समस्याओं से विमुख नहीं किया जा सकता. प्रदेश के इतिहास में पहली बार विधानसभा का चुनाव सात चरणों में संपन्न हो रहा है. जिस प्रकार चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा का चुनाव सात चरणों में संपन्न हो रहा है. जिस प्रकार चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी सक्रियता से चुनाव को सही रूप में संपन्न कराया, उसी प्रकार उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं. अब तक हो चुके मतदान में मतदान का प्रतिशत पिछले चुनावों की तुलना में निश्चित रूप से कम है, पर मतदान केंद्रों पर कोई भी राजनीतिक दल गलत ढंग से प्रभावकारी भूमिका में नहीं है.
21वीं सदी का भारत अपनी मौजूदा समस्याओं से घिरा हुआ है. हाथ खाली और बेकार हैं. कमल की वास्तविक सुगंध से सब परिचित हैं. हाथ अपने विशाल आकार में अब भी लोगों का ध्यान खींच रहा है और तमाम तरह की कारों के बाद भी साइकिलों का बाजार घटा नहीं है. उत्तर प्रदेश के चुनाव में कई नारों में से एक नारा अधिक गूंज रहा है – ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी आगे जाएगा. हाथी बसपा का चुनाव चिह्र है और बहुजन समाज पार्टी ने अब बहुजन के स्थान पर सर्वजन को स्थान दे दिया है. मायावती ने अपनी पार्टी से ऊंची जातियों के 139, पिछड़ी जातियों के 110, अनुसूचित जातियों के 93 और 61 मुसलिम प्रत्याशी खड़े किये हैं. 1989 में उसने 364 प्रत्याशी खड़े किये थे, जिनमें केवल 13 विजयी हुए थे. 1991 के चुनाव में भी बसपा की स्थिति बहुत बेहतर नहीं हुई थी. 370 प्रत्याशियों में से केवल 12 प्रत्याशी विधानसभा चुनाव जीत पाये थे. बसपा को मिले वोटों का प्रतिशत भी सामान्य था. 1989 में उसे 9.63 प्रतिशत तथा 1991 में 9.70 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. बाद में बसपा की स्थिति बेहतर होने लगी. 1993 में 69, 1996 में 66 और 2002 में उसके 98 प्रत्याशी विजयी हुए थे. वोट प्रतिशत तेरह (1989 से 2002) में 9.63 प्रतिशत से बढ़ कर 23.06 प्रतिशत हो गया. मायावती ने 1995-96 में मुलायम सिंह के साथ मिल कर सरकार बनायी थी. 1996-97 में बसपा की मैत्री भाजपा से हुई. बाद में राष्ट्रपति शासन के बाद भी उसकी मैत्री भाजपा से बनी.
इस बार के चुनाव में सर्वाधिक सीटें बसपा को प्राप्त होंगी, यह तय है, पर यह तय नहीं है कि वह किस राजनीतिक दल से जुड़ कर सरकार बनायेंगी. मायावती मुलायम सरकार की कट्टर विरोधी हैं. बसपा का एक नारा है- चल गुंडों की छाती पर, बटन दबाओ हाथी पर. मुलायम सिंह मायावती के निशाने पर हैं और मुलायम सिंह के निशाने पर कोई नहीं है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में उन्हीं की सरकार है. सदी के महानायक उत्तर प्रदेश में दम देख रहे हैं और उनके अनुसार वहां कोई अपराध नहीं है. मायावती के अनुसार उत्तर प्रदेश में गुंडा राज है. वे सार्वजनिक भाषणों में कई बार यह कह चुकी हैं कि मुलायम सिंह और अमर सिंह को वे जेल में बंद करेंगी. राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों में अपराधी भी हैं. वे पहले भी थे. स्मिता गुप्त ने अपने लेख डज लॉ एंड ऑर्डर मैटर में (सेमिनार 571, मार्च, 2007) 403 विधायकों में से 205 विधायकों को अपराधी सूची में डाला है. उनके अनुसार सपा के 81, बसपा के 49, भाजपा के 39, कांग्रेस के 9 रालोद के 8 और 16 निर्दलीय विधायक अपराधी हैं. फिर भी चुनाव में अपराध कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. विकास, आजीविका, रोजगार और भ्रष्टाचार के मुद्दे बड़े हैं. चुनाव में जाति और समुदाय की तुलना में पार्टी और प्रत्याशी का अधिक महत्व है.
उत्तर प्रदेश चुनाव सामान्य चुनाव नहीं है. यह देश का सर्वप्रमुख राज्य है और इसके चुनावी परिणाम केंद्र को भी प्रभावित करते रहे हैं. अब राजनीतिक मूल्य नष्ट हो चुके हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह की अपनी अलग पार्टी थी, राष्ट्रीय क्रांति पार्टी. हमारे नेता शब्दों, विचारों, स्थापनाओं और मूल्यों के साथ जिस तरह खिलवाड़ करते हैं, यह उनके दल के नामकरण से ही समझा जा सकता है. कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी मर चुकी है. अब वे भाजपा में हैं. अपने घर में वापस लौट चुके हैं. उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी कांग्रेस में प्राण फूंक रहे हैं. 15 वर्ष से उत्तर प्रदेश में गैर कांग्रेसी शासन है और राहुल गांधी इस अवधि में होनेवाली बदहाली को फोकस में ला रहे हैं. आरोप-प्रत्यारोप का खेल भारतीय राजनीति का दिलचस्प खेल है. एक-दूसरे पर वार-प्रहार करके अपने को संतुष्ट किया जाता है. अभिनेत्रियां- जया बच्च्न और जयाप्रदा- सपा को गति नहीं दे सकतीं. मायावती इन दोनों की तुलना में बहुत आगे हैं और राजनीति में अभिनेताओं-अभिनेत्रियों के लिए स्थान नहीं है. वे महज आकर्षण हैं. मुलायम सिंह के साथ अमर सिंह, अंबानी, अमिताभ बच्च्न और अभिनेत्रियां हैं, पर यह लोकतंत्र का कमाल है या फि र जीवन की वे विकट-कठिन समस्याएं हैं, जहां इनकी उपस्थिति कोई अर्थ नहीं रखती.
मुलायम सिंह की राजनीति भी पेंडुलम की तरह रही है. कभी भाजपा की ओर और कभी कांग्रेस की ओर. साइकिल सामान्य जनों की सवारी है. पर मुलायम सिंह को सामान्य जन और समाजवाद से मतलब नहीं रहा है.
मंडल-कमंडल की राजनीति के दिन लद चुके हैं. अब नंगा यथार्थ सामने है. भूमंडलीकरण का दैत्य सबके सम्मुख है. इससे आंखें नहीं फेरी जा सकतीं. पिछले 15 वर्ष से उत्तर प्रदेश में भाजपा, बसपा और सपा की जीत होती रही है. त्रिशंकु विधानसभा पहले भी थी. अब भी रहेगी. राजनीतिक दलों का क्रम बदलता चलेगा. इस बार यह क्रम बसपा, सपा और भाजपा का होगा, ऐसी संभावना है. 40 प्रतिशत जनता वहां अशिक्षित है. समस्याएं सामने हैं और समाधान किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है. कभी चरण सिंह का गढ़ रहा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उनके बेटे अजीत सिंह के पक्ष में नहीं है. हाथी पर मायावती के साथ कौन बैठेगा? हाथी पर साइकिल नहीं लदेगी, यह तय है. जो भी बैठे उसके हाथ में क्या होगा? क्या उसके हाथ में कमल होगा? अगर कमल नहीं, तो फि र क्या होगा? फि र बड़ी बात यह भी है कि हाथी की चाल कैसी होगी? महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हाथी पर सवार कौन है? महत्वपूर्ण यह है कि हाथी और उस पर बैठे हुए व्यक्ति किस राहों से गुजर रहे हैं? क्या यह शोभायात्रा होगी या और कुछ?

प्रभात खबर से

May 7, 2007 at 12:16 am Leave a comment

उत्तर प्रदेश की सियासी संभावनाएं

एमजे अकबर इस बार उत्तर प्रदेश में सियासी संभावनाओं की तलाश कर रहे हैं. प्रभात खबर से साभार.
एमजे अकबर
यदि आप जीत नहीं सकते तो इसका सबसे बेहतर और स्वाभाविक तरीका यह है कि आप जीत की परिभाषा अपने अनुसार गढ़ लें. कुछ ऐसा ही हाल उत्तर प्रदेश चुनाव में सभी राजनीतिक दलों का है. वहां कोई भी राजनीतिक पार्टी स्पष्ट जीत की स्थिति में नहीं है. लिहाजा वे सभी अपनी-अपनी सफलता के दावे को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं. चुनाव विश्लेषक और मीडिया पंडित भी कुछ इसी तरह की घालमेल और चतुराई भरी बात फैला रहे हैं. सफलता एक तुलनात्मक कथन है, जबकि जीत एक स्पष्ट और सर्वस्वीकृत पैमाना है. यदि आप अपनी जीत की अपेक्षाओं को काफी नीचे रखते हैं तथा बाद में इससे आगे निकल जाते हैं, तो फिर आप अपनी आवाज बुलंद करने की स्थिति में हो जाते हैं. यह एक ऊंची कूद का खेल-युद्ध है, जिसमें काफी नीचे से आप छलांग लगाते र्है.
अभी समाजवादी पार्टी सत्ता में है और वह अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत सत्ता में पुनर्वापसी के रूप में कर रही है. हालिया चुनावों में यदि वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आती है, तो वह अपनी जीत का दावा करेगी. इसी तरह बहुजन समाज पार्टी सोचती है कि वह जीत की लहर पर सवार है. यदि वह 130 से 140 तक सीटें निकाल ले जाती है, तो उसके पास नोटों का अंबार सामने होगा. इस समय भाजपा ज्यादा आराम की स्थिति में है, क्योंकि तीन वर्ष पहले के आम चुनावों में वह बुरी तरह विफल रही थी. इसीलिए उसने बगैर किसी अपेक्षा के अपनी शुरुआत की है. यदि भाजपा 100 सीटों की संख्या को भी पार करती है, तो उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को यह कहने का अवसर होगा कि उनकी पार्टी फिर से जीवित हो रही है. यदि भाजपा 120 सीटों की संख्या पार कर लेती है, फिर तो वह इसके लिए डुगडुगी पीटने की स्थिति में होंगे. 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली अप्रत्याशित सफलता ने उसकी उम्मीदों को काफी उठा दिया है, जिस वजह से वह अपनी आवाज बुलंद करने की बेहतर स्थिति में है. तीन वर्ष बाद अब वह तीन अंकों में अपने परिणाम की आशा कर सकती है. इससे उसे अपने लंबे अवसान से उबरने का मौका मिलेगा, हालांकि उसके लिए यह बहुत छोटी छलांग होगी. कुल 400 सीटों में यदि कांग्रेस 35 सीटें भी निकाल पाती है, तो कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए अपनी पीठ थपथपाने का यह बेहतर मौका होगा. 1984-85 के चुनावों में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी. उस समय जन्मे लोग इस बार विधानसभा चुनावों में पहली बार वोट डालेंगे. इन 20 वर्षों में भारत में तीन राष्ट्रपति हो चुके हैं और एक पूरी पीढ़ी मतदाता के रूप में परिपक्व हो चुकी है, लेकिन कांग्रेस अभी भी भारत के इस सबसे महत्वपूर्ण राज्य की राजनीतिक नब्ज को पहचान पाने में विफल रही है. किसी भी सामान्य चुनाव में जीत का गणितशास्त्र यह बताने के पर्याप्त होता है कि कौन-सी पार्टी जीत रही है. लेकिन उत्तर प्रदेश में विजेताओं का निर्धारण बीजगणित से तय होता है. गंठबंधन का निर्धारण चुनाव परिणाम आने के बाद तय होगा. इसी तरह मुख्यमंत्री का चुनाव मतदाताओं की इच्छा से नहीं, बल्कि राजनीतिज्ञों की इच्छा से तय होगा. इसलिए चुनाव के दौरान दिये जानेवाले सारे बयानों को भुला देना चाहिए. जिस तरह विवाह पूर्व के समझौते में सब कुछ स्वीकृत होता है, वैसे ही उत्तर प्रदेश में भी कोई भी किसी के साथ भी उठने-बैठने व समझौते को तैयार है. गंठबंधन की संभावना के बारे में अगर कुछ इनकार किया जा सकता है, तो वह है भाजपा और कांग्रेस के बीच गंठबंधन. इस बारे में राहुल गांधी की बात की जाये तो उनके चुनाव प्रचार से यह साफ है कि वह किसी अन्य के बजाय पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के खिलाफ ज्यादा हैं. इस बारे में वह कहते भी हैं कि 1996 में राव द्वारा बसपा के साथ गंठबंधन एक बड़ी ऐतिहासिक भूल थी. यह कथन बिल्कुल ठीक भी है, लेकिन यदि चुनावों में बसपा 140 सीटें और कांग्रेस 40 सीटें पाती है, तो यह कांग्रेस को मायावती सरकार में शामिल होने या बाहर से समर्थन करने से नहीं रोकेगी. संभवत: इस बारे में राजनाथ सिंह का कथन ज्यादा सटीक और साफ है. वह कहते हैं कि भाजपा के लिए कोई भी अछूत नहीं है. यदि संख्यात्मक आंकड़ों को पूरा करने की जरूरत हुई तो मायावती और मुलायम सिंह दोनों खुशी-खुशी अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन लेने को तैयार होंगे. हालांकि वे भाजपा को समर्थन देने के मामले में कम खुश होंगे, लेकिन यह सब कुछ मिलनेवाली सीटों की संख्या पर निर्भर करेगा. यदि उत्तर प्रदेश चुनावों में खंडित जनादेश आता है, तो कांग्रेस को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का मौका मिल जायेगा. हालांकि 10 फीसदी से भी कम सीटें पाने के बाद भी कांग्रेस के हाथों में सौ प्रतिशत यह अधिकार होगा. इसके लिए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को सिर्फ यह घोषित करना होगा कि कोई भी राजनीतिक दल राज्य में स्थिर सरकार बनाने के लिए निर्णायक स्थिति में नहीं है. और इस तरह से कांग्रेस को राज्य में अपने निर्णयों और विशेषाधिकारों को थोपने के लिए एक बहाना मिल जायेगा. इस बारे में कांग्रेस के पास राज्य में उनका अपना आज्ञापालक राज्यपाल होने के बावजूद केवल एक बाधा भारत के निष्पक्ष राष्ट्रपति हैं. राष्ट्रपति कलाम की बढ़ती लोकप्रियता की वजह उनका सही होना है. वह संवैधानिक बातों के प्रति पर्याप्त सतर्क रहते हैं और राजनीतिक खेल के लिए नैतिक बातों को तोड़ने-मरोड़ने में विश्वास नहीं करते. वह अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के प्रथम दौर के अंतिम समय में किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहेंगे. हालांकि उत्तर प्रदेश के चुनावों का बहुत बड़ा प्रभाव कलाम के दूसरी बार चुने जाने पर पड़ेगा. इस बारे में किसी तरह के बहस की जरूरत नहीं है. चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से पता चलता है कि 80 प्रतिशत लोग कलाम को राष्ट्रपति के रूप में पसंद करते हैं. लेकिन चुनाव मंडल का निर्माण सांसदों और विधायकों को मिलाकर होता है, जिस वजह से यह राजनीतिक पार्टियों के बीच का खेल हो जाता है. हालांकि केंद्र सरकार अभी पूर्ण बहुमत की स्थिति में है, लेकिन प्रश्न यह है कि सरकार गुप्त मतदान में खुद को कितना सहज पायेगी? यह कोई नहीं जानता कि संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन सरकार को समर्थन कर रहे 45 से अधिक सांसद चुनाव के दौरान किधर जायेंगे? किसी भी गंठबंधन सरकार में सहभागी दलों को मुख्य दल की लोकप्रियता का ध्यान रखना चाहिए. यह विश्वास कांग्रेस से घटता नजर आ रहा है. पिछले दो वर्ष में बिहार और पश्चिम बंगाल के बाद यदि उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस के पुनर्जीवित होने की संभावना नहीं बनती तो यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा विस्मयात्मक प्रश्न होगा, जो अभी मेरे दिमाग में छोटे प्रश्न के रूप में उभर रहा है. इस सबके लिए केंद्र की कांग्रेस सरकार अकेले उत्तरदायी है, जो भारतीय राजनीति में सहज स्थान पाने के ऐतिहासिक अवसर को भुनाने में विफल रही. सरकार के पास अब भी अवसर है कि वह अपने फिर से चुने जाने के लिए मतदाताओं के एक निश्चित खेमे का निर्माण करे. 2004 में केंद्र में कांग्रेस ने बड़ी कुशलता से एक गंठबंधन का निर्माण किया. इससे उसे संसद में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में मदद मिली. लेकिन उसने मतदाताओं का गंठबंधन बनाने के काम को भुला दिया. परिणामस्वरूप वह अपनी उस बढ़त को कायम रख पाने में विफल हो रही है. यह एक सच है कि जब सत्ता आपके सिर पर हो तो आप नीचे की तरफ नहीं देख सकते. यह शक्ति बाद में शीर्ष से ओजोन स्तर में चली जाती है. इस तरह मैं कह सकता हूं कि सत्ता आपके हाथों से धीरे-धीरे फिसल जाती है. आज कांग्रेस में गंगा के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक कोई पार्टी संगठन नहीं दिखता. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल या बिहार में कोई भी समय के साथ चलनेवाला नेतृत्व नहीं दिख रहा और न ही कोई जमीनी स्तर पर क ड़ी मेहनत करने के लिए इच्छुक है. यदि सब कुछ ठीक रहता, तो उत्तर प्रदेश में अभी तक चार मुख्यमंत्री और भारत में पांच प्रधानमंत्री ही होते.

अनुवाद : योगेंद्र केसरवानी

May 7, 2007 at 12:01 am Leave a comment


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