कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था : अरुंधति राय

May 7, 2007 at 11:39 pm 7 comments

देश और दुनिया में जिस तरह के हालात हैं उनमें लेखकों का क्या दायित्व बनता है और वे कहां खड़े हैं इस पर लगातार बहस होती रही है. साम्राज्यवाद का हमला साहित्य और संस्कृति पर भी हो रहा है. यह जनता को उसके संघर्षों और संवेदना से अलगाव में डाल देने की कोशिश के तहत हो रहा है. ऐसे में जब अरुंधति राय इस पर कुछ कहती हैं तो उसको सुनने का अपना अलग महत्व होता है. वे कम से कम अभी दुनिया की सबसे ज़्यादा सुनी जानेवाली और सबसे विश्वसनीय आवाज़ हैं. उनसे विभिन्न मुद्दों पर बात की है वैभव सिंह ने. यह बातचीत समकालीन जनमत में प्रकाशित हो चुकी है. यहां पूरी बातचीत का पहला आधा हिस्सा ही दिया जा रहा है. बाकी पढ़ेंगे कल.

साम्राज्यवाद का दौर बड़ा खतरनाक होता है और इसका जीवन के हर क्षेत्र पर असर पड़ता है.
कला-संस्कृति भी इससे अछूती नहीं रहती है. ऐसे में साम्राज्यवाद का सामना कर रहे लेखकों का क्या दायित्व होता है?

देखिए, पहले तो मैं साफ कर दूं कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मैं लेखकों के बारे में कोई नियम बनाने के सख्त खिलाफ हूं. हर लेखक दूसरे लेखक से अलग होता है और सामाजिक यथार्थ को समझने की उसकी दृष्टि भी अलग होती है. इसलिए उसे क्या लिखना चाहिए, क्या नहीं, इस पर पहले से कोई तयशुदा मानदंड नहीं विकसित किये जाने चाहिए. ऐसे मानदंड अक्सर ही जड़ होते हैं और जिन गतिशील मानवीय भावों से जीवंत रचनाओं का जन्म होता है, उनके साथ न्याय नहीं कर पाते हैं. वैसे भी हमें अखबारी रिपोर्ट जैसे उपन्यास या कहानियां नहीं चाहिए, क्योंकि उनसे पाठक अपने को लंबे समय तक जोड़ नहीं पाते हैं. सामाजिक थीम को आधार बना कर लिखे गये गीत अन्य गीतों की तुलना में ज्यादा सुंदर होते हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग पहले से तय कर सामाजिक मुद्दों पर लिखने बैठते हैं, अक्सर ही उनकी रचनाएं दोयम दर्जे की और घटिया होती हैं. लेकि न इसका यह मतलब भी नहीं कि जो सामाजिक मुद्दों पर नहीं लिखते हैं, वे हमेशा अच्छी रचनाएं ही लिखते हैं. मैं अंगरेजी में लिखती हूं और जानती हूं कि अंगरेज लेखकों की दुनिया ही अलग होती है. उन्हें इससे फर्क पड़ता ही नहीं कि उनके उपन्यासों में कोई सामाजिक मुद्दा आता है या नहीं और उससे समाज में परिवर्तन का लक्ष्य कहां तक पूरा होता है. वैसे भी लेखकों के दायित्व के बारे में इकतरफा ढंग से विचार करना क ठिन होता है, क्योंकि लेखक भी कई राजनीतिक दलों और विचारधाराओं में बंटे होते हैं. ये प्रगतिशील, रेसिस्ट, फासिस्ट या कम्युनल, कुछ भी हो सकते हैं. उनकी पॉलिटिक्स अलग-अलग होती है.
लेकि न इसके बावजूद कोई लेखक अपनी कलम को प्रतिरोध का अस्त्र तो बना ही सक ता है?
मैं फिर भी कहूंगी कि सभी कलाकार और कवि एक श्रेणी के सदस्य नहीं होते हैं. साहित्य रचना अपने में फैक्चर्ड बिजनेस है. इसके अलावा प्रतिरोध के लिए सिर्फ क लाकार ही क्यों आगे आयें, सिर्फ इसलिए कि वह कोई स्पेशल कैटेगरी हैं. मैं अपने बारे में तो कह सकती हूं कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ मुझे लिखना चाहिए, लेकिन दूसरों को ऐसे किसी नियम में बांध नहीं सकती हूं और न बांधा जाना चाहिए. मेरा काम कोई नेता बनना, मंच से अच्छे भाषण देना या लोगों को खुश रखना नहीं होना चाहिए. मुझे अपनी आजादी और स्पेस भी चाहिए ताकि लिख सकूं, कुछ और सोच सकूं. मैं यह दावा नहीं कर सकती कि मैं कोई बहुत अच्छी इनसान हूं और हर वक्त लोगों के मुक्ति संघर्ष के बारे में सोचती रहती हूं. दुर्भाग्य से अच्छे लोग अक्सर बुरे लेखक साबित होते हैं. इसके अलावा, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम हैं कौन, यह पहचानें और यह किसी उधार के नजरिये से नहीं बल्कि खुद के नजरिये से पहचानी जानेवाली चीज है. एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सक ता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. मैं जो नहीं हूं, वह होने का दिखावा भी नहीं कर सकती. मैं लेखक हूं और किसी नेता की तरह अपनी छवि को निर्मित नहीं कराना चाहती. मैं गलत चीजों के विरोध में तर्क कर सकती हूं, लेकिन उनके खिलाफ अंतिम संघर्ष छेड़ने के लिए दूसरी ही तरह की योग्यता व कौशल की आवश्यक ता होती है, जो हो सकता है कि मेरे पास न हो. मेरे पास एक लेखक की संवेदना (सेंसबिलिटी) है और जिस तरह कि सी मजदूर को अपना रोजगार छिनने, बांध के इलाके में किसी किसान को अपनी जमीन डूबने का डर होता है, उसी तरह मुझे भी अपनी संवेदना के नष्ट होने, बाहरी स्थितियों के प्रवाह में उसके डूबने का खतरा सताता रहता है.
लेखक का उत्पीड़ित वर्ग से जुड़ने, उसके सौंदर्यशास्त्र व यथार्थ को साहित्य में व्यक्त करने के नैतिक दायित्व को कैसे भुलाया जा सकता है?
मुझे नहीं लगता कि लेखन कोई सोशल वर्क या चैरिटी का मामला है, भले ही किसी खास स्ट्रगल में इसका इसी रू प में इस्तेमाल कर लिया जाये. लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध क रते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन क रने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था. हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार समेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं. यानी शासकों को पता रहता है कि लेखकों को क्या ले-देकर खामोश रखा जा सकता है. ऐसा नहीं है कि व्यवस्था के अंग बन कर रहनेवाले ये लेखक इडियट हैं और उन्हें पता नहीं कि देश-दुनिया में हो क्या रहा है. ये लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन जानते हैं कि कहां उन्हें फायदा हो सकता है. लेखकों को बुला कर बड़े-बड़े समारोह किये जाते हैं और ठोस, हाड़-मांस के लोगों की जिंदगी में क्या घटित हो रहा है, इस पर बोलने के मौके इन्हें नहीं दिये जाते हैं. उड़ीसा में वेदांत नामक कंपनी है जो आदिवासी इलाकों में खनन का काम करती है. हमारे वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी उससे जुड़े हुए रहे हैं. वही कपंनी, जिस पर मानवाधिकार कानूनों के उल्लंघन के आरोप हैं, अब करीब एक अरब डॉलर खर्च कर विशाल यूनिवर्सिटी खोलने जा रही है और इसमें लेखकों, अकैडमिशियंश, जर्नलिस्ट और कलाकारों को भी आमंत्रित किया जा सकता है. यानी अब विचार, प्रतिरोध और दमन क मिला कर एक खूबसूरत खेल खेला जा रहा है. कोई भी अब अपने विचार व प्रतिबद्धता के मामले में पूरी तरह से शुद्ध और महान बन कर नहीं रह सकता. हम सब वे लोग हैं जो गंदे पानी के वाटर पूल में तैरने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरफ हैं. ऐसा कोई सपाट निष्क र्ष देना ठीक नहीं होगा कि चूंकि कोई लेखक है, इसलिए प्रगतिशील होना और साम्राज्यवाद का विरोध करना उसके लिए स्वाभाविक हो जाता है. रुडयार्ड किपलिंग एक मशहूर और बड़े लेखक रहे हैं लेकिन उनके लेखन में भयंकर रेसिस्ट और उपनिवेशवादी प्रवृत्तियां दिखायी पड़ सकती हैं.
आप देखें कि कितने युद्धों में कितने लेखक मारे गये. दूसरे विश्वयुद्ध में नाजियों ने भारी पैमाने पर लेखकों का कत्लेआम किया. इराक में भी सैक ड़ों रचनाकार मारे जा चुके हैं और बांग्लादेश में तसलीमा नसरीन को रहने नहीं दिया जा रहा. इन खतरनाक स्थितियों में लेखक क्या सिर्फ आत्मसंतोष की रचनाएं लिख कर जिंदा रह सकता है? हम सिर्फ फूलों और सितारों की कहानियों से दिल बहला सकते हैं?
आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं कहीं भी आत्मसंतोषी होकर जीने और लिखने की वकालत नहीं कर रही हूं और मैं निजी तौर पर अन्याय व लोगों की पीड़ा के अलावा कहीं और देख ही नहीं सकती. मई, 2005 में तुर्की के इस्तांबुल शहर में वर्ल्ड ट्रिब्यूनल ऑन इराक की बैठक में दी गयी स्पीच में मैंने इराक के संदर्भ में ऐसे इतिहास लेखन की बात की थी जो विजेताओं के नजरिये से नहीं बल्कि हारे हुए. कत्लोगारत के शिकार हुए पराजित लोगों के नजरिये से लिखा गया हो. वैसे भी एक -एक लेखक के पास इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं कि वह ईमानदारी से अपने वक्त की क हानियां लिखे. वह वक्त युद्ध का हो सकता है, शांति का हो सकता है और प्रेम का हो सकता है, लेकिन लेखक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते. जैसे कि हाल ही में जयपुर में रायटर्स मीट में बड़े और मशहूर अंगरेजी लेखक जुटे थे, लेकिन वहां भी बड़े गैर राजनीतिक ढंग से दुनिया की परिस्थितियों के बारे में चर्चाएं होती रहीं. उनकी बातें सुन कर तो ऐसा लगता है जैसे समाज के ताकतवर और कमजोर लोगों को जोड़नेवाली भाषा खत्म कर दी गयी है. उनके बीच अब कोई संवाद या कम्युनिकेशन हो ही नहीं सकता है. जयपुर के लेखक सम्मेलन में भारत की गरीबी, बेरोजगारी की दशा पर शायद ही कोई बोला. इसकी जगह हर लेखक भारत की कथित प्रगति और वर्ल्ड पावर बनने की संभावनाओं पर ही आत्ममुग्ध भाव से बात करता रहा. जबकि वर्तमान हालात में विकास के नाम पर ऐसी अंधेरगर्दी और लूटपाट मची है जितनी शायद औपनिवेशिक शासन में भी नहीं रही होगी. एक तरफ रूरल एंप्ल्वायमेंट गारंटी प्रोग्राम चलाये जा रहे हैं तो दूसरी ओर स्पशेल इकॉनामिक जोन (सेज) के नाम पर किसानों की जमीनें छीन कर उनकी खेतीबाड़ी को नष्ट किया जा रहा है. सेज के निर्माण से ज्यादा लोग उजाड़े जायेंगे. दिल्ली के ही हालात देखिए, हर तरफ भयंकर अराजकता नजर आती है और अफ सोस की बात है कि हम इस अराजकता के भी आदी होते जा रहे हैं. मुझे तो लगता है कि 1789 की फ्रेंच क्रांति से पहले पेरिस की जैसी अराजकतापूर्ण स्थितियां थीं, कुछ वैसी ही स्थितियां दिल्ली की भी हो गयी हैं. माफियाओं क राज, जबरन उजाड़ा जाना और नये समृद्ध वर्ग का उदय, यह सभी दिल्ली के वर्तमान चरित्र को तय कर रहे हैं. कोई नहीं पूछ रहा कि इस हवाई प्रगति की कीमत किसके आंसुओं और खून के एवज में चुकायी जा रही है. इस मामले में राज्य की जल्लादी भूमिका देख कर कोई भी चकित हो जाये. सबसे बड़ी दिक्कत असीमित संचय की छूट देने की भी है. जिस तरह से मीडिया कैपिटल, लैंड कैपिटल या राजनीतिक पूंजी एकत्र करने की छूट दी जा रही है, उससे व्यापक विनाश को ही हम दावत दे रहे हैं. लोगों में भी गुस्सा बढ़ेगा और उसी का नतीजा है कि भारत के सैकड़ों इलाके नक्सलियों या उग्रवादियों की चपेट में हैं.
ऐसे में साहित्य यथार्थ के बारे में कैसे हमारी समझदारी को ज्यादा मानवीय और तर्क संगत बना सक ता है?
कोई तो हो जो इस पूरी उथलपुथल को रिकार्ड करे और किसी लेखक का काम उत्पीड़न के खिलाफ लोगों को संवेदनशील बनाना है. उसका लेखन ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों में गुस्सा पैदा हो और वे अपने स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोच सकें . साथ ही उसमें सत्तावर्ग के पतनशील जीवन के चित्र भी होने चाहिए क्योंकि किसी भी लड़ाई को तब तक नहीं जीता जा सकता जब तक कि हम अपने दुश्मन को ठीक से नहीं समझते, उसके इरादों को नहीं जानते. लेखक अपने चारों और फैले यथार्थ के बीच अकेला होता है, उसका सामना करता है और फिर वही यथार्थ कई भाव-स्तरों से छन कर उसकी रचनाओं का अहम हिस्सा बन जाता है. मैं मानती हूं कि लेखक का काम सिर्फ एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का हिस्सा बन जाना नहीं है. उसकी समसामयिक यथार्थ के बारे में प्रखर राजनीतिक समझ होनी चाहिए और वह समझ लेखन में भी रचनात्मक रू प में उभर कर आनी चाहिए. एक लेखक चाहे तो लाखों लोगों की आवाज बन सकता है और लोग उसके लेखन में अपनी जिंदगियां तलाश सकते हैं. परियों की सीधी-सरल कहानियों में ढेर सारी राजनीति छिपी होती है लेकिन उन कहानियों से हमें पता चलता है कि सीधी-सरल ढंग से लिखी गयी चीजों का कितना गहरा असर होता है. इसलिए लेखक को सरल लेखन करने की जटिल साधना से गुजरना चाहिए. लेखकों के दायित्व के अलावा लेखकों के ईद-गिर्द बुना गया कै रियर और ऐश्वर्य का जाल भी कम खतरनाक नहीं होता और हमें इसके बारे में बात करनी चाहिए.
भारत में लोकतंत्र कई तरह के छलावों का शिकार हो रहा है. क्या किसी मुल्क की जनता सिर्फ अहिंसा के सहारे अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के रास्ते में आनेवाले बाधक तत्वों से निपट सकती है?
कु छ दिन पहले दावोस सम्मेलन में जाकर सोनिया गांधी ने बड़े आत्मप्रशंसा के भाव से कहा था कि किस तरह भारतवासी गांधी के अहिंसा सिद्धांतों पर चलने में यकीन क रते हैं. यह वही सरकार है जो गांधी के नाम पर सिर्फ शैंपू और खादी बेचती है और बाकी उसे गांधी से कोई लेना-देना नहीं है. वैसे भी सरकार और सोनिया गांधी अगर अहिंसा के बारे में इतनी तारीफ करें तो हमें अहिंसा पर भी संदेह करना चाहिए. इस वजह से क्योंकि अहिंसा के कारण ही सरकार और पूंजीपतियों को बड़ा फायदा होता है. जब लोग अहिंसक होते हैं तो राज्य और कोर्ट भी जनविरोधी होने से नहीं डरते हैं. वहां अपील करने पर लोगों को न्याय नहीं बल्कि थप्पड़ ही मिलती है. इसीलिए जबर्दस्त दमन के दौर में अब मैं किसी को गांधीवादी उसूलों को अपनाने को नहीं कहती, क्योंकि नर्मदा बचाओ आंदोलन और नार्थ ईस्ट की एक्टिविस्ट शर्मिला जैसे जो लोग गांधीवादी उसूलों के सहारे लड़ाई लड़ते हैं, उनकी आवाज कहीं सुनी नहीं जाती है. मुझे बार-बार हरसूद का एक उदाहरण याद आता है. जब पूरा कस्बा डूबनेवाला था तो मैं हालात का जायजा लेने वहां गयी थी. वहां जब मैंने लोगों से पूछा कि वे अपने कस्बे को बचाने के लिए डट कर विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने जो जवाब दिया उसने मुझे अचंभित कर दिया. उनलोगों का कहना था कि हमलोग इसलिए विरोध नहीं कर रहे हैं क्योंकि ऐसा करना संस्कृति-सभ्यता के खिलाफ होगा. क्या करेंगे ऐसी सभ्यता और उसूलों को लेक र, जिसमें आपकी आवाज सुनी ही नहीं जाती? हम अपने लोकतंत्र पर इतराते हैं. लैटिन अमेरिकी मुल्क चिली के तानाशाह आगस्टो पिनोशे के शासनकाल में 3500 लोग मारे गये और करीब 17000 लोग गायब हो गये, लेकिन हिंदुस्तान में सिर्फ कश्मीर में 68 हजार लोग मारे जा चुके हैं. यानी कभी-क भी लोकतंत्र किसी भी तानाशाही से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.

देखें : सितंबर 11 की घटना पर अरुंधति का मशहूर भाषण.

अमेरिका भी अपने को लोकतांत्रिक मुल्क कहता है लेकिन वहीं एक पूर्व सेना अधिकारी और वर्ल्ड बैंक के पूर्व प्रेजिडेंट रॉबर्ट मैक नामरा ने कहा था कि वियतनाम के लोग अपनी जिंदगी का मूल्य नहीं समझते, इसीलिए अमेरिका को उनका हजारों-लाखों की संख्या में नरसंहार करना पड़ा. अमेरिका ही नहीं बल्कि रूस, जर्मनी, जापान, चीन जैसी सभी महान सभ्याताएं और देश दूसरों को लूटने और खून-खराबे की बुनियाद पर टिकी हैं. अजीब बात है कि भारत में मुख्यधारा के वामदल एक और इराक में जारी कत्लेआम का विरोध क रते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद की आड़ में कश्मीर पर चुप्पी साध लेते हैं. इराक में अगर भारी तादाद में अमेरिकी फौजे हैं तो कश्मीर में भी करीब सात लाख भारतीय फौजें हैं. इसके अलावा नॉर्थ ईस्ट का आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट तो बड़े से बड़े तानाशाहीवाले कानून का बाप है. क श्मीर में तो फौजें भी आतंकवाद को हवा दे रही हैं और किसी युवक या युवती का अचानक गुम हो जाना अब बड़ी खबर नहीं है. कश्मीर वैसे भी कभी भारत का हिस्सा नहीं था और 1947 में उसे जबरन भारत में मिला लिया गया था. कोई नहीं जानना चाहता कि कश्मीर के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं और यह जानने में अगर उनकी थोड़ी भी रुचि होती तो वहां पर जनमत संग्रह अब तक करा दिया जाता. लेकिन हमारा दिमागी दिवालियापन हमें बताता है कि संसद कांड के अभियुक्त अफजल को फांसी पर लटका देने भर से हम आतंक वाद से मुक्त हो जायेंगे. सब जानते हैं कि अफजल को निचली अदालत में वकील नहीं मिला और कोई भी सबूत उसे फांसी पर लटकाने के लिए काफी नहीं है. पुलिस ने जो थ्योरी गढ़ी है उसमें काफी कु छ झूठ है. हमें संसद कांड में सच को नहीं बताया जा रहा, उल्टे कश्मीर में अब पुलिस दमन में मारे गये लोगों की कब्रें बरामद हो रही हैं और राज्य सरकार अपने ही पुलिस अफसरों को जेल भेज रही है.

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कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था : अरुंधति राय शहाबुद्दीन : इतिहास के कूडेदान में अब भी जगह काफ़ी है

7 Comments Add your own

  • 1. अभय तिवारी  |  May 8, 2007 at 8:20 am

    इस वार्ता के कुछ हिस्सों को पढ़ना वामपंथी लेखकों का पहला ‘दायित्व’ होना चाहिये..

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  • 2. Neeraj  |  May 8, 2007 at 5:37 pm

    इतने भी भोले बने तो सियासत कैसे करेंगे? सिमटे तो दिले आशिक़ फैले तो ज़माना है..

    अरुंधति की बातों में कोई अस्वाभाविक-सा या अप्रत्याशित लगने वाला विचार नहीं है. ले लो भैया जो लेना है. कश्मीर ले लो और चाहो तो हमें भी गोद ले लो .. बशर्ते कि हमें लोकतंत्र दे देना.. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दे देना और धर्म पालन की आज़ादी दे देना..अत्याचार मत करना.. कोई हो तो आए ले जाए.. हमें उठाकर. हम तैयार है.

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  • 3. Pratik  |  May 8, 2007 at 6:45 pm

    अरुंधति ने कहा कि कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था। क्या आप किसी एक प्रांत का नाम भी बता सकते हैं जो भारत का हिस्सा था?

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  • 4. Reyaz-ul-haque  |  May 12, 2007 at 11:40 pm

    नीरज भाई
    लगता है आप तक गलत संदेश चला गया है. अरुंधति ठीक उसके विपरीत चाहती हैं जो आप समझ रहे हैं. वे यह चाहती हैं कि देश एक सच्ची आज़ादी के साथ जिये, न कि एक छद्म आज़ादी के साथ जो वास्तविकता से ज़्यादा एक नारा भर है. आप बताइये कि देश किस तरह आज़ाद है? इस आज़ादी का क्य मतलब है उन लाखों लोगों के लिए जो 10 प्रतिशत या इससे अधिक आर्थिकि प्रगति की कीमत चुका रहे हैं या चुकाने को मज़बूर किये जा रहे हैं. गांवों में हालत और खराब होती जा रही है. खेती घाटे का सौदा हो गयी है और हम हैं कि वही पैसा अपने किसानों को न देकर महंगे दामों पर विदेश से अनाज मंगा रहे हैं. यह सब उन देशों के दबाव में हो रहा है. इससे तो खेती और बरबाद होगी. पर इतने पर भी बस नहीं-रियायत कम हो रही है, बीज, दवा महंगे हो रहे हैं, बाज़ार समितियां भंग की जा रही हैं. यह सब किसलिए हो रहा है? 10 प्रतिशत विकास दर के लिए न? कौन भोगेगा उसे?
    और कश्मीर? अलगाववाद? क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि क्यों लोग हमसे अलग होने की ज़िद किये बैठे हैं. और केवल बैठे ही नहीं हैं, एक लाख से ज़्यादा लोग जान दे चुके हैं. क्यों? क्या यह सब पाकिस्तान के बहकावे पर हो रहा है? तो क्या बहकाने में हम पाकिस्तान से कमज़ोर हैं? हम उन्हें क्यों नहीं बहका पा रहे हैं? आज ही पटना में संजय काक ने अपनी फ़िल्म दिखायी है ‘जश्ने आज़ादी’. यह कश्मीरियों की उस पीडा के बारे में है जो वे झेल रहे हैं. यह फ़िल्म बताती है कि किस तरह वहां के लोग आज़ाद होना चाहते हैं और भारत सेना के बल पर उन्हें अपने साथ रखने पर तुला हुआ है. संजय खुद एक कश्मीरी पंडित हैं. पर फ़िल्म के ज़रिये वे पूछते हैं कि उस आज़ादी का कश्मीरियों के लिए क्या मतलब है जिस पर भारतीय इतना इतराते हैं? क्या यह कि कश्मीर दुनिया का सबसे सघन मिलिटराइज़ ज़ोन है? इराक में हर 95-96 आदमी पर एक फ़ौज़ी है. कश्मीर में हर 15 आदमी पर एक फ़ौज़ी. हम नहीं कहते कि कश्मीर को पाकिस्तान को दे दो. मगर क्या यह भी नहीं कह सकते कि कम से कम यह जान तो लो कि कश्मीरी क्या चाहते हैं. वहां जनमत संग्रह तो करवा लो. जय प्रकाश नारायण ने भी यही कहा था. और अगर आप जनमत संग्रह कराने से डरते हैं तो इसका मतलब है कि कश्मीर मामले में आपके पास कोई नैतिक बल नहीं है कश्मीरियों के मुकाबले.

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  • 5. Reyaz-ul-haque  |  May 12, 2007 at 11:44 pm

    प्रतीक भाई
    सवाल यह नहीं है कि कौन किसका हिस्सा था. सवाल यह है कि लोग क्या चाहते हैं. अब अगर वे आपका साथ नहीं चाह्ते तो आप उन्हें कैसे रोक सकते हैं? मगर फ़िर भी हम यह कहते हैं कि वहां जनमत संग्रह तो करवाया ही जाना चाहिए. हम जातियों के आत्मनिर्णय के अधिकार के हिमायती हैं. हम भी एक अखंड भारत चाहते हैं मगर क्या यह डंडे और तोप के बल पर होगा? क्या ऐसी अखंडता स्थाई रह पायेगी?

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  • 6. Neeraj  |  May 17, 2007 at 7:18 pm

    भाई रेयाज़, मुझे यक़ीन था कि आप मेरी बातों का भलीभांति जवाब देंगे. हालांकि मैने सवाल की तर्ज पर कुछ उठाया नहीं था. यह तो हमें पता है कि कश्मीर का बहुसंख्यक (ख़ासकर वादी का) भारतीय संप्रभुता के तले नहीं रहना चाहता. हम ही सैन्य धौंस से उसे समेटे हुए हैं. तभी मैने कहा कि इतने भोले बने बैठकर सियासत कैसे करोगे.

    आपकी मार्के वाली बात यह है ‘सच्चा लोकतंत्र’. यह अमूर्त अवधारणा है. जैसे शांति किन्ही दो युद्धों के बीच का अंतराल. हरेक मुल्क़ में हालात के हिसाब से लोकतंत्र के सुर कुंद, मंद और तीव्र होते रहते हैं.

    मुझे कश्मीर की समस्या में मुस्लिम बहुमत की धौंस नज़र आ रही है. देश के अन्य राज्यों में बेरोज़गारी, आर्थिक विषमता कश्मीर से कहीं ज़्यादा है. फिर कश्मीर में इस बिनाह पर विघटन की बात अपचनीय है. बात मज़हब के क़रीब नज़र आती है. अब मैं या तो सोच का दायरा नहीं बढ़ा सका हूं या फिर कोई तथ्य ही पचा नहीं पाया हूं.

    प्रतीक जो बात उठा रहे हैं वो क्या कम महत्वपूर्ण है? कई रियासतों में राजाओं का दंभ, निज़ाम का अड़ियलपन और लगभग सारे हिन्दू प्रांत. कई को साम-दाम-दंड और भेद से एक छतरी मे लाना पड़ा था, तब जाकर भारत गणराज्य बना. जो भी है टूटा-फूटा रहने दो दादा. इतना फैलाकर चलेंगे तो जो हाथ हैं वो भी सरक जाएगा.

    चलो अब सच्चे लोकतंत्र पर बतियां लें. हम पक्के लोकतंत्र रहे भी नहीं कभी.. जो बचा-खुचा है वो उदारवाद हड़प रहा है. कितनी सरकारें आईं और गईं क्या किसी को कश्मीर के वास्तविक हालात का भान नहीं होगा? सबको पता होता है. लेकिन हल नहीं सूझता. जनमत संग्रह कराना है तो कराओ !! किंतु ये ध्यान रहे कि अरुंधति की बात सच हो जाएगी और कश्मीर हमारा नहीं होगा. तब क्या शांति होगी? नहीं!! हम तो अपना दिल खोलकर सच्चे लोकतंत्र को अपनाने का दावा करते हुए एक सर कटा बैठेंगे अगली बारी पाकिस्तान जैसे ”उच्चगुणवत्तायुक्त लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य” की होगी. वे खुरापाती दायरा बढ़ाएंगे और अगली बारी आसाम, बंगाल की होगी. यहां तक कि पजाब फिर सुलग जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

    कश्मीर को कल अलग कर दें. हो गया जनमत संग्रह… अब क्या? कश्मीर को पाक आज़ाद रहने देगा? क्या कश्मीर के बाज़ार पर उसकी नज़र नहीं है? क्या सामरिक दृष्टि से यह मोर्चा उसके लिए मुफ़ीद नहीं है? है ना उलझनभरी बातें?

    इतना कहने के बाद भी मुझे नहीं लग रहा है कि मैं जो कह रहा हूं वही सच है. क्योंकि सच तो मैं भी जानता हूं कि सच्चा लोकतंत्र यह नहीं है जो हमने कश्मीर में दे रखा है किंतु मज़हबी उन्माद के पगलाए लोगों का क्या किया जाए? कश्मीर की हिंसा के बीच एक लाख लोगों ने अपने प्राणों की आहूति दी है तो वहीं हज़ारों कश्मीरी पंडितों और हिन्दुओं पर भी अत्याचार हुए हैं. हज़ारों सैनिक भी मारे जा रहे हैं. यदि आपके पास इन सवालों के जवाब हों तो अवश्य दें. मैं अपने विचारों का फैलाव अवश्य करूंगा.

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  • 7. Reyaz-ul-haque  |  May 18, 2007 at 1:06 am

    नीरज भाई
    अच्छा लगा कि कुछ बातों पर हम सहमत हैं. मगर कुछ बातें ऐसी हैं जिन पर अब भी बात करने की गुंजाइश है.
    कश्मीर समस्या में आपको मुसलिम बहुमत की धौंस नज़र आती है. दुर्भाग्य से अब यह मसला मुसलमानों के साथ जुड़ गया है. मगर वास्तव में ऐसा है नहीं. जब कश्मीर की अज़ादी के आंदोलन का नया दौर शुरू हुआ तब इसका यह चरित्र नहीं था. उस शांतिपूर्ण दौर में जब भारत के (अहंकारी) लोकतंत्र ने अपने एक हिस्से को नहीं सुना बल्कि उसे जितना हो सकता था नज़रंदाज़ किया तो आज जो हालात हैं उनके लिए ज़मीन बनी. तब यह केवल मुसलमानों का मुद्दा नहीं था. हां यह सही है कि कश्मीर में मुसलमान बहुमत में हैं तो वे एक तरह से पर्याय बना दिये जाते हैं या बन गये हैं. 1991 के आसपास जब 200 कश्मीरी हिंदुओं की ह्त्या हुई तो इस आंदोलन को इसलामी रंग मिलना शुरू हुआ. हालांकि उसी दौरान 700 मुसलमान भी मारे गये, इस तथ्य पर किसी का ध्यान नहीं गया. संजय काक ने कुछ तथ्य हमें दिये. मैं आपको बताना चाहूंगा. वहां इतनी सेना थी, क्या कश्मीरी पंडितों को वहां से जाने से रोका नहीं जा सकता था? गुजरात में भी तो नरसंहार हुआ था. क्या वहां से मुसलमान भाग लिये? क्या वे भाग सकते थे? मगर कश्मीरी पंडित भागे. और अब उनमें से बहुत सारे कैंपों में हैं. कैंपों की हालत बेहद खराब है, मगर वे लोग इंटर्नली डिस्प्लेस्ड पीपुल होने के लिए आवेदन नहीं करते. क्योंकि तब उनके कैंप यूएन की निगरानी में आ जायेंगे और फ़िर सरकारों के लिए उनके हालात का फ़ायदा उठाना मुश्किल हो जायेगा.
    यह थी इसलामीकरण की शुरुआत. मगर एक मारके की बात है. क्या कश्मीरी इसलिए आज़ादी चाह्ते हैं कि वे मुसलमान हैं? मुझे नहीं लगता. मगर आप मुझे इग्नोर कर सकते हैं. मैंने संजय काक और उनकी टीम से भी यह पूछा था. उनका जवाब था, नहीं-कश्मीरी इसलिए आज़ादी चाहते हैं क्योंकि वे कश्मीरी हैं.
    इस सिलसिले में उन्होंने एक रोचक बात बतायी. कश्मीरी लोगों के मन में चल रहे उतार चढा़व के बारे में उन्होंने बताया कि कश्मीरी अब इस हिंसा और संघर्ष के आदी हो गये हैं. कश्मीरी कहते हैं कि वे पिछले 500 सालों से अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं. वे थके नहीं हैं और जीत तक लडे़गे. इन 500 सालों में वे साल भी आते हैं जब देश पर मुसलमानों का शासन था.
    क्या यह बात हमें कुछ इशारा नहीं करती? और क्यों हम हर चीज़ को हिंदु-मुसलमान में बांट कर देखें? क्या यही प्रधान कारण हैं किसी चीज़ के होने का?
    आगे. कश्मीर में आज़ादी का आंदोलन इसलिए नहीं हो रहा है कि वहां बेरोज़गारी, आर्थिक विषमता अधिक है.
    प्रतीक की बात. हमने राज्यों को किस तरह मिलाया उसे आपने खुद ही कहा है. यह अपने आप में किसी लोकतंत्र के लिए बहुत शानदार और गौरवान्वित करनेवाली बात नहीं है. क्या हम इस बुनियादी बात पर भी बहस करेंगे कि कोई राष्ट्र अपने नागरिकों से होता है या नागरिक उसके लिए होते हैं? क्या एक राष्ट्र बहुत विशाल हो यह ज़रूरी है या उसके नागरिक आज़ादी से रहें, संपन्न रहें और आदमी-आदमी के बीच हर तरह का भेद-भाव खत्म हो जाये यह ज़रूरी है?

    ‘जनमत संग्रह कराना है तो कराओ !! किंतु ये ध्यान रहे कि अरुंधति की बात सच हो जाएगी और कश्मीर हमारा नहीं होगा.’

    अगर कश्मीर में ऐसे हालात हैं तो क्या हमारे लिए कुछ सवाल पूछने का वक्त नहीं है? वहां ऐसे हालत क्यों हैं? ऐसा होने कैसे दिया गया? क्या इस तरह के हालात किसी भी लोकतंत्र पर सवालिया निशान नहीं लगाते?
    यह तो होगा ही कि कश्मीर आज़ाद होगा तो उसे पाकिस्तान हड़प लेगा. भौगोलिक तौर पर न सही, राजनीतिक तौर पर ही. मगर कोई हमारे दुश्मन के खेमे में न जा पडे़ इसलिए उसे अपने पास उसकी गरदन दबा कर रखना क्या उचित है? अगर हम आदमी की गरिमा, मानवाधिकार और किसी के कहीं भी आज़ाद रहने के अधिकार को तुच्छ समझते हों तो फिर हमारा उत्तर हां में होना चाहिए.

    ‘वे खुरापाती दायरा बढ़ाएंगे और अगली बारी आसाम, बंगाल की होगी. यहां तक कि पजाब फिर सुलग जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.’

    मैं बेहद आत्मीयता से पूछना चाहता हूं, आखिर क्यों इन सभी राज्यों के हमसे अलग हो जाने का खतरा है? अगर हम सबसे महान हैं तो फिर कोई क्यों हमसे अलग हो जाना चाहता है? क्या सिर्फ़ इसलिए कि वह बहकावे में आ गया है? आप बतायें. क्या यह सब सिर्फ़ खुराफ़ात भर से ही संभव है?
    कश्मीरी पंडितों की स्थिति से मुझे गहरी सहानुभूति है. मगर कश्मीरी पंडितों का मामला कोई अलग मामला नहीं है. वह कश्मीर मसले से जुडा़ हुआ है. प्रधान मामला तो कश्मीर ही है न? उसी से सैनिकों की शहादत और कश्मीरी पंडितों का मामला बनता है. तो क्यों न हम पहले कश्मीर की ही बात करें. अगर यह सुलझा तो वे सब भी सुलझ जायेंगे.
    और हां, मैं वहां के कट्टरपंथी ‘मज़हबी उन्माद के पगलाए लोगों ‘ का समर्थन नहीं करता. वे कश्मीर को अंतत: बरबाद कर देंगे(अगर हमसे वह बचा तो).मगर उनके पाले में गेंद किसने जाने दी?
    आपका इंतज़ार रहेगा.

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