Archive for May 9, 2007

क्यों डरती रही है भारत की सरकारें 1857 से

1857 का प्रसंग कोई निर्विवाद प्रसंग नहीं रहा है. इसे अब तक कई नज़रियों से देखा जाता रहा है. इसको लेकर इतिहासकार भी एकमत नहीं है. जो इसके समर्थक हैं उनके भी और जो इसके आलोचक हैं उनके भी पक्षों को सुना जाना चाहिए, क्योंकी उनकी अपनी साफ़ दलीलें हैं और अपने समुदायगत अनुभव-यादें. 1857 का जश्न साल भर चलेगा और हम भी साल भर तक कोशिश करेंगे इसपर लगातार बहस करने की. शुरुआत प्रणय के लेख से. प्रणय ने 1857 पर विशेष अध्ययन किया है जिसका नतीजा है यह लेख. यह पहली बार समकालीन जनमत में छपा. यहां इस लेख का शुरुआती हिस्सा भर दिया जा रहा है, ताकि पढने में सुविधा रहे. बाकी के हिस्से कल-परसों में.
भारतीय राष्ट्र की प्रसव पीड़ा

प्रणय कृष्ण

भारतीय राष्ट्र के जन्मकाल की प्रसव पीड़ा का प्रतीक था, 1857 का विद्रोह. संभवत: कार्ल मार्क्स वह पहले इनसान थे, जिन्होंने इसे भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम कहा था. दरअसल भारतीय राष्ट्र की ओर से अंगरेजों से आजादी पाने और अपने आप को राष्ट्र के रूप में गठित करने की यही पहली कोशिश थी. इससे पहले हिंदुस्तान नाम का भूखंड था, वह अनेकों बादशाह-नवाबों, राजा-महाराजाओं आदि के राज्यों में बंटा था. उस दौर में चाहे राणा प्रताप और शिवाजी जैसे हिंदू मुगल बादशाह से या हिंदू और मुसलमान सामंत आपस में ही क्यों न लड़ते हों, सभी का उद्देश्य अपनी-अपनी रियासत का बचाव करना होता था. बस उतना ही भूखंड उनका देश था या उनकी मातृभूमि थी, जिसके वे अन्नदाता कहलाते थे. अंगरेजों ने एक -एक करके इन रियासतों को अपने कब्जे में या अपनी छत्रछाया में ले लिया था.
अंगरेज किसी एक हिंदुस्तानी से लड़ते थे तो दूसरा हिंदुस्तानी सामंत उनकी मदद क रता था. जैसे 1857 के विद्रोह के बस 50-60 साल पहले जब अंगरेज टीपू सुलतान के खिलाफ लड़ रहे थे तो उन्होंने मराठों और निजाम को अपने पक्ष में कर रखा था. राष्ट्र नाम की कोई चेतना होती तो टीपू सुलतान के साथ मराठों, निजाम और दिल्ली दरबार का एक संश्रय बन गया होता और उसने अंगरेजों ही नहीं फ्रांसिसियों, डचों, पुर्तगालियों आदि तमाम उपनिवेशवादियों को हिंदुस्तान से निकाल बाहर किया होता. पिछले इतिहास में 1857 का फर्क सबसे बढ़ कर इसी बात में है कि इसके दौरान पूरब से लेक र पश्चिम तक हिंदुस्तान की आम आवाम अंगरेजों के खिलाफ इसी चेतना के साथ संघर्ष में उतरी कि वे बाहरी ताकत हैं जो हमारे देश को गुलाम बना रहे हैं. यह चेतना उन हजारों-हजार किसानों में फैली थी जो अंगरेजी उपनिवेशवाद से हथियारबंद होकर लड़े थे. यानी उसका मूल चरित्र किसान विद्रोह का था. इसे शुरू करनेवाले थे अंगरेजी सेना के भारतीय सिपाही, जो उत्तर भारत के ग्रामीण किसान पृष्ठभूमि से आते थे. इस विद्रोह का नाभिकेंद्र अवध प्रांत था. लेकिन इस विद्रोह के आगोश में समूचा हिंदी-उर्दू क्षेत्र आ गया और साथ ही इसका असर पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र, असम, झारखंड के आदिवासी अंचल तथा सुदूर दक्षिण में गोदावरी जिले तक फैला. भले ही इस विद्रोह को कोई सुसंगठित अखिल भारतीय नेतृत्व न प्राप्त रहा हो, लेकिन राजनीतिक रूप से 1857 का संग्राम भारतीय स्तर के राष्ट्रीय आंदोलन का सूचक था. यूं तो इस विद्रोह की शुरुआत मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में कर दी थी, किंतु इसकी विधिवत शुरुआत 10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में हिंदुस्तानी पलटन के विद्रोह से मानी जाती है. 1857 से 1859, तीन वर्षों तक अंगरेजों के खिलाफ खुला छापामार युद्ध चला, जिसमें सैनिकों और किसानों के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों ने यहां तक कि देशभक्त सामंतों ने भी हिस्सा लिया. झांसी में कोरी और कांछी तथा लखनऊ में सुरंगों की लड़ाई में पासियों की अदभुत वीरता से लेकर सिंहभूम और मानभूम के आदिवासियों की शौर्य की गाथाएं इतिहास में दर्ज हैं. इस विद्रोह में हजारों अनाम शहीद समाज के ऊंचे वर्गों या वर्णों से ही नहीं निचले वर्गों व वर्णों से भी थे. सिंधिया, पटियाला, नाभा, जिंद तथा कश्मीर व नेपाल जैसे गद्दार राजे-रजवाड़े के सहयोग से अंगरेजों को इस विद्रोह को कु चलने में सहायता जरूर मिली, लेकिन भारतीय राष्ट्र की नींव पड़ चुकी थी. इसलिए राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम को कुचलना अब अंगरेजों के बूते की बात नहीं रही. 1857 के विद्रोह को कुचलने के बाद भी अंगरेज उस विद्रोह को बदनाम करने, उसके महान योद्धाओं के चरित्र हनन करने तथा उसे भारतीय जनता की सामूहिक स्मृति से मिटा देने की लगातार कोशिश करते रहे. 19 वीं सदी के अंतिम भाग से लेकर 20 वीं सदी के मध्य तक जो स्वाधीनता संग्राम कांग्रेसी नेतृत्व में चला, उस पर समझौतापरस्त उद्योगपति वर्ग और मध्यमवर्गीय बौद्धिक तत्वों का दबदबा रहा. दुर्भाग्य की बात है कि उनके लिए भी 1857 शुरू से ही दु:स्वप्न बना रहा. इसी वजह से कांग्रेसी धारा किसानों, मजदूरों के संगठित क्रांतिकारी आंदोलनों तथा भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी देशभक्तों के राष्ट्रवाद से उसी तरह भयभीत रही जैसे कि अंगरेज. आजादी के आंदोलन की जो क हानी सरकारी तौर पर प्रचारित की जाती रही है, उसके अनुसार देश की आजादी अहिंसात्मक आंदोलन द्वारा प्राप्त की गयी थी. इस कहानी का सीधा सा मतलब यह है कि आजादी के आंदोलन में 1857 से लेकर भगत सिंह और नौसैनिक विद्रोह (1946) तक का कोई खास योगदान नहीं है. साम्राज्यवाद के खिलाफ सशस्त्र और सक्रिय प्रतिरोध से जन्मे किसानों व मजदूरों के तमाम आंदोलनों का कोई खास महत्व नहीं है. भारत की आजादी में अगर कहीं आम आदमी, मजदूर या किसान को जगह भी दी गयी तो महज संख्या के बतौर. बिना चेहरेवाले के गुमनाम लोगों की संख्या के बतौर. जाहिर है कि मेहनतकश जनता को न सिर्फ वर्तमान में उनके हक से वंचित कि या जा रहा है वरन अतीत में उनकी भूमिका को नकारा भी जा रहा है. आज अपनी इस शानदार विरासत का पुनरुद्धार करने और भारतीय जनता की अस्मिता के न्यायोचित गौरव को पुनर्स्थापित करने का कार्यभार इसलिए भी जरूरी हो उठा है, क्योंकि देश की सत्ता पर काबिज रही ताकतें न सिर्फ हमारे पूरे इतिहास को विकृत करने पर आमादा हैं बल्कि हमारी राष्ट्रीय भावना को, आजादी के आंदोलन के सारे मूल्यों को ही मटियामेट कर रही है. 1857 ने जिस राष्ट्रवाद का आगाज किया था, उसकी विरोधी शक्तियां आजाद भारत में सत्ता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं. यानी पहली जंग-ए-आजादी ने नया हिंदुस्तान बनाने की जो चुनौतियां हमारे सामने उपस्थित की थीं, जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, जो सपने देखे थे, वे आज न सिर्फ अधूरे हैं बल्कि सबसे बड़ी बाधा का सामना कर रहे हैं.

जारी
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May 9, 2007 at 7:00 pm Leave a comment

गुनाहों का देवता : 40 की उम्र में 40 अभियोग

शहाबुद्दीन पर अब तक चले कुल मामले
क्र. थाना कांड संख्या, दिनांक धारा
१ सीवान नगर १३४/८५ ,११.५.८५ ३६४, ३६५, ३७९, ३४ आइपीसी (आरोपित)
२. सीवान नगर २१७/ ८५,०२.०९.८५ ३०७,३२३, ३४ आइपीसी, २७ आ एक्ट
३. सीवान नगर २२२/८५, ०९.०९.८५ ३०७, ३४१, ३२३, ३२४, ३४ आइपीसी, २७ आ एक्ट
४. सीवान नगर ०७९/८६, १०.०४.८६ ३९७, ४०२, ४११, ४१२, ४१४, २१६ ए आइपीसी, २५ ए, २६/३५ आ एक्ट
५. सीवान मु २२८/८६, ३१.१२.८६ १४७, १४८, ३२५, ३०२ आइपीसी, २७ आ एक्ट, ५ वि पदार्थ अधि
६. १२.०९.६६ ३०४, ३२४, ३२३, ३४ आइपीसी
७. सीवान नगर ०५७/८९, १९.०३.८९ ३०७, ३०२, ३४ आइपीसी, ३/४ वि पदार्थ अधि
८. सीवान मु ०९१/८९, ०१.०६.८९ ३५३, ३६४, ३०४, ३४ आइपीसी, २७आए
९. मैरवां १३४/८९, २२.११.८९ ३०२, ३४ आइपीसी, ३/४ वि पदार्थ अधि
१०. सीवान मु ०६१/९०,१२.०४.९० ३६३ आइपीसी
११. सीवान नगर २०५/९०, ०३.०९.९० ३६५, ३३७ आइपीसी
१२. सीवान नगर १२९/८५, ०६.०५.८५ ३२४, ३०७, ३४ आइपीसी, २७ आर्म्स एक्ट
१३. सीवान नगर ०७७/८६, ०८.०४.८६ ३०४ आइपीसी (संदिग्ध)
१४. सीवान नगर १८३/८८, १०.०९.८८ ३०७ आइपीसी, २७ आर्म्स एक्ट
१५. हुसैनगंज १८६/९३, ०३.१०.९३ १४७, १४८, १४९, ३३४, ३०७ आइपीसी, २७ आए(आरोपित)
१६. जीरादेई २३९/९३, २३.१२.९३ भाक पा (माले) के तीन समर्थकों की हत्या
१६.पंचरुखी ०६०/९४, २४.०५.९४ १४७, ३२३, ३२७, ३७९ आइपीसी
१७. सीवान नगर १०८/९४, २२.०५.९४ १४७, १४८, १४९, ३२४, ३०७, २७ आए
१८. सीवान नगर १५५/९४, ०७.०८.९४ ३०२, ३०७, ३२४, १२० (बी) आइपीसी
१९. पंचरुखी ००८/९५, २०.१०.९५
२०. सीवान नगर ०११/९६,१८.०१.९६ ३४, ३४२, ३२३, ३०७, ३४ आइपीसी, २७ आए (अनुसंधान में)
२१. हुसैनगंज ०९९/९६, ०२.०५.९६ १४७, १४८, १४९, ३२७, ३०७, ३०२ आइपीसी, २७ आ एक्ट (अनुसंधान में)
२२. आंदर थाना ०३२/९६, ०२.०५.९६ १४७, १४८, १४९, ३०२, ४८६,आइपीसी, आ एक्ट (अनुसंधान में)
२३. आंदर थाना ०३२/९६, ०२.०५.९६ १४७, १४८, १४९,३०७ आइपीसी(अनु में)
२४. दरौली थाना ०३४/९६, ०४.०५.९६ ३०७, ३५३, ३४ आइपीसी, २७ आए, एसपी सिंधाल पर जानलेवा हमला (अनु में)
२५. हुसैनगंज १८८/९६, ०३.०९.९६ ३०२ आइपीसी, माले नेता सुरेंद्र यादव की हत्या
२६. सीवान नगर १३०/९६, २१.०६.९६ थानाप्रभारी संदेश बैठा के साथ मारपीट
२७. सीवान नगर २२४/९६, १८.१०.९६ ३०२ आइपीसी, माले नेता केदार साह की हत्या
२८. सीवान नगर ०५४/९७, ३१.०३.९७ ३०२ आइपीसी चंद्रशेखर-श्यामनारायण यादव क ी हत्या
२९. सीवान मु १८१/९८, १९.०९.९८ १४७, ३२३, ३४१, ३४२, ४४८, ५०४ आइपीसी माले क ार्यालय सीवान पर हमला, केशव बैठा का अपहरण (दो साल कारावास)
३०. सीवान नगर १४५/९८, ०९.०९.९८ १४७, १४८, १४९, ३०७, ३७९, ५०४ आइपीसी, माले के धरना पर हमला
३१. सीवान नगर १४७/९८, ०९.०९.९८ १४७, १४८, १४९, ३०७, ३५३, ३३३, ३७९ आइपीसी
३२. सीवान नगर ०१४/९९, ०५.०२.९९ ३६४/३४ आइपीसी, माले कार्यक र्ता छोटेलाल का अपहरण-हत्या (आजीवन कारावास)
३३. सीवान मु ८/२००१, ०६.०१.०१ ३६९/३४ आइपीसी, रामपूर गांव से मुन्ना चौधरी का अपहरण
३४. हुसैनगंज ३२/२००१, १६.०५.०१ १४७,१४८, ३०७, ३०२, ३३४, ३३५, ३३२, ३३३, ४३५, ४२७, १२०, २५ (१) बी, ए २६/३५
३५. हुसैनगंज ३३/२००१, १६.०५.०१ १४७, १४८, ३०७, ३०२, ३३४, ३३५, ३३२,३३३, ३१५, ४३५, ४२७, १२०, २५ (१) बी, ए २६/३५
३६. हुसैनगंज ३९/२००५ प्रतापपुर कांड
३७. हुसैनगंज ४२/२००५ प्रतापपुर कांड
३८. हुसैनगंज ४३/२००५ प्रतापपुर कांड
३९. हुसैनगंज ४४/२००५ प्रतापपुर कांड
४०. हुसैनगंज ४५/२००५ प्रतापपुर कांड
४१. हुसैनगंज ४८/२००५ प्रतापपुर कांड

May 9, 2007 at 1:36 am 1 comment

शहाबुद्दीन और उसके बाद का बिहार

समाज की अपनी एक गति होती है. वह बुरी चीज़ों को बहुत देर तक स्वीकर नहीं करता. उसमें अच्छे को बुरे से अलग करने की एक प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. इतिहास का कूडे़दान यहीं आकर प्रासंगिक बनता है. एक समय था जब डान और अपराधी अपने समाज में बडी़ प्रतिष्ठा के साथ सामने आये. कुछ जातियों ने उनमें अपनी जातिगत पहचान भी तलाश की. मगर अब वह दौर लगता है कुछ कम हो रहा है. अब वह स्वीकृति उतने निर्बाध तरीके से नहीं मिल रही है बाहुबलियों को. मगर यह भी नहीं है कि यह एकदम खत्म ही हो गया है. वे अब भी हैं और अपनी जगहों पर मज़बूती से जमे हुए हैं. शहाबुद्दीन को सज़ा सिर्फ़ उनके घटते रुतबे को दरसाती है. मगर हमारा यह कहना भी है कि इस सज़ा से ज़्यादा उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है. हमारी व्यवस्था का जो चरित्र है उसमें अंतत: वे बच निकलेंगे. यह व्यवस्था सिर्फ़ अपने विरोधियों को सज़ा देने में यकीन रखती है, ‘अपनों’ को नहीं. शहाबुद्दीन जो भी हों, उसके अपने ही हैं. वह उसका बाल भी बांका नहीं होने देगी, जैसे वह पंढेर का नहीं होने दे रही है. खैर देखते हैं अनिल जी क्या कह रहे हैं.
कुमार अनिल
सब दिन होत न एक समाना. एक समय था जब शहाबुद्दीन की मरजी के बिना सीवान में एक पत्ता भी नहीं हिलता था. चुनावों में उनके पोस्टर व झंडे के अलावा किसी और का पोस्टर लगाना जुर्म था. चपरासी से अफसर तक हां-में-हां- मिलाते रहते. जिसने विरोध क रने की कोशिश की, वह मारा गया. कई अफसर अपमानित हुए. क इयों ने तबादला करा लिया. शहाबुद्दीन को साहेब कहा जाता था. मगर लगता है अब समय का एक चक्र पूरा हो गया है. 1990 के बाद का समय बिहार की राजनीति में काफी उथल-पुथल भरा रहा है. इसी दौर में लालू ने सामाजिक न्याय का नारा दिया. गरीबों में अभूतपूर्व सक्रियता देखने को मिली. पुरानी सामंती व ब्राह्मणवादी शक्तियों में हड़कंप मच गया. 1993-94 के दौर में ही गंगा के दक्षिणी हिस्से में रणवीर सेना का उदय हुआ. इसी समय उत्तर बिहार में शहाबुद्दीन चमके . देखते-देखते रणवीर सेना का कई जिलों में विस्तार हो गया. उसने एक -के -बाद एक कत्लेआम करके बिहार की राजनीति में भारी उलट-फेर कर दिया. उधर शहाबुद्दीन से प्रेरणा पाकर क ई-क ई शहाबुद्दीन राजनीतिक पटल पर चमकने लगे. शहाबुद्दीन ने राजनीति की परिभाषा बदल कर रख दी. यह माना जाने लगा कि नेता बनना है, तो बाहुबली बनना होगा. पैसा व हथियार बुनियादी अवयव बन गये. मूल्य व विचार फालतू चीजें बन गये. ऐसे नेताओं को अपनी जाति का भरपूर समर्थन मिलने लगा. वे खुद को जाति विशेष का हीरो जतलाने लगे. शहाबुद्दीन ने अपनी यात्रा को यहीं समाप्त नहीं किया. उन्होंने माले को उखाड़ फेंक ने का नारा देकर पुरानी सामंती शक्तियों को आकर्षित कि या. इसीलिए हम देखते हैं कि बाद के दौर में जब राज्य स्तर पर `माय’ समीकरण में बिखराव आया, तब भी शहाबुद्दीन चुनाव जीतने में सफल रहे. ग्रामीण गरीब जब `साहेब’ से दूर हुए, तो उन्होंने चट सामंती शक्तियों से गंठबंधन बना लिया. राजनीतिक दलों ने इस दौर में अवसरवादिता दिखायी. हर दल में शहाबुद्दीन की कार्बन कॉपी तैयार की जाने लगी. शहाबुद्दीन के घर प्रतापपुर में जब पुलिस ने छापेमारी की, तब सभी, पक्ष-विपक्ष के, प्रमुख दल `साहेब’ के बचाव में आ गये. विधानसभा की कार्यवाही पुस्तिका इसकी गवाह है. राजनीतिक दलों का यह तर्क था कि केवल मुकदमा हो जाने से कोई अपराधी नहीं हो जाता. चंद्रशेखर की हत्या के बाद से `साहेब’ पर उंगलियां उठने लगीं. यह टर्निंग प्वाइंट था. 2005 के बाद बिहारी समाज का मिजाज तेजी से बदलने लगा. अपराधियों को मिल रहा सामाजिक समर्थन कमजोर पड़ने लगा.समाज में रुतबा घटते ही दलों में भी पूछ घटने लगी. साहेब को सजा मिलने के बाद अब देखना यह है कि बिहारी समाज व राजनीति किस दिशा में किस तेवर से आगे बढ़ती है.

May 9, 2007 at 1:06 am 1 comment

शहाबुद्दीन : इतिहास के कूडेदान में अब भी जगह काफ़ी है

साहेब को सजा
रजनीश उपाध्याय
बिहार के युवा पत्रकारों की उस पांत से आते हैं जो राजनीतिक रूप से सबसे सचेत और सबसे उर्वर-संभावनाशील है. राज्य की राजनीतिक घटनाओं पर इनकी पैनी नज़र रहती है. फ़िलहाल प्रभात खबर, पटना के ब्यूरो प्रमुख हैं. साथ ही इतिहास और वर्तमान की एक अहम पत्रिका ‘इतिहासबोध’ से भी जुड़े रहे हैं.

रजनीश उपाध्याय

शहाबुद्दीन पर कानून के लंबे हाथ पहुंचने में 22 साल लगे. 11 मई, 1985 को उन पर पहला मुकदमा दर्ज हुआ था, आठ मई को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी अभी कई और मुकदमों में फैसला आना बाकी है. वे ट्रायल की प्रक्रिया में हैं
ठीक दो दिन बाद (10 मई को) शहाबुद्दीन 40 के हो जायेंगे. 40 साल की उम्र में उन पर 40 मुकदमे दर्ज हुए. कु छ पहले ही खत्म हो गये, बाकी 31 अभी चल रहे हैं इस अवधि में वे सीवान में पहले शहाब, फिर साहेब और लोक सभा में डॉक्टर शहाबुद्दीन के नाम से जाने जाते रहे. शहाबुद्दीन के खिलाफ पहला मुक दमा 11 मई, 1985 को सीवान नगर थाना में कांड संख्या 134/85 के तहत मारपीट के आरोप में दर्ज हुआ था. तब उनकी उम्र महज 18 साल की थी और वे `शहाब’ के नाम से जाने जाते थे . 1990 के विधानसभा चुनाव में जीरादेई से पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधायक चुने गये . उन्होंने बाहुबली पाल सिंह को हराया था. यहीं से शहाबुद्दीन का राजनीतिक सफर शुरू हुआ. तब बिहार में मंडल की लहर पर सवार होक र लालू प्रसाद सत्ता में पहुंचे थे. शहाबुद्दीन की तत्कालीन जनता दल से निकटता बढ़ी और 1996 में वे जनता दल के प्रत्याशी के रूप में सीवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव में उतरे. चुनाव में उन्हें भारी बहुमत मिला शहाबुद्दीन ने क भी कोई चुनाव नहीं हारा. 1998, 1999 तथा 2004 के लोक सभा चुनावों में वे राजद के टिकट पर सांसद चुने गये. 1990 में जब शहाबुद्दीन विधायक चुने गये थे, तब तक उन पर दर्जन भर मुकदमे हो चुके थे, जिनमें तीन हत्या के थे. 1988 में जमशेदपुर में एक हत्या में भी वह नामजद किये गये थे. 1996 में लोकसभा चुनाव के दिन ही एक बूथ पर गड़बड़ी फैलाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार करने निकले तत्कालीन एसपी एसके सिंघल पर गोलियां चलायी गयीं. आरोप था कि खुद शहाबुद्दीन ने ये गोलियां दागीं और सिंघल को जान बचा कर भागना पड़ा. शहाबुद्दीन का करीब एक दशक तक सीवान पर `राज’ रहा है. इस दौरान सीवान शहर में न तो किसी को उनकी इजाजत के बगैर जुलूस निकालने की इजाजत थी और न ही कोई राजनीतिक गतिविधि संचालित करने की. अपने राजनीतिक विरोधियों से वे अपने अंदाज में निबटते रहे हैं. भाकपा माले के साथ उनका तीखा टकराव रहा. ले-देकर सीवान में दो ही राजनीतिक धुरी थी- एक शहाबुद्दीन, तो दूसरा भाकपा माले. 1993 से लेकर 2001 के बीच सीवान में भाकपा माले के 18 समर्थकों या कार्यकर्ताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी, उनमें जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर और वरिष्ठ नेता श्यामनारायण भी शामिल थे, जिनकी हत्या सीवान शहर में 31 मार्च, 1997 को कर दी गयी थी. इसकी जांच सीबीआइ कर रही है. माले के कार्यालय सचिव संतोष सहर का क हना है कि शहाबुद्दीन के आतंक राज के खिलाफ लड़ाई में ये कार्यकर्ता शहीद हुए. 2001 में शहाबुद्दीन देश भर में चर्चा में आये. सीवान के एक परीक्षा केंद्र पर एक डीएसपी को उन्होंने थप्पड़ जड़ दी. इस पर पुलिसकर्मी बौखला गये. तत्कालीन एसपी बच्च् सिंह मीणा के नेतृत्व में प्रतापपुर में 16 मई, 2001 को छापेमारी के लिए पहुंची पुलिस के साथ शहाबुद्दीन समर्थकों की मुठभेड़ हुई. इसमें 11 लोग मारे गये थे. इस कांड के बाद तत्कालीन मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी और शिवानंद तिवारी ने आरोप लगाया था कि पुलिस शहाबुद्दीन को प्रताड़ित क र रही है. इसके बाद लालू प्रसाद को भी प्रतापपुर गांव का दौरा करना पड़ा था. मीणा वहां से हटा दिये गये. शहाबुद्दीन पर शिकंजा कसने की शुरुआत 2003 में तब हुई, जब डीपी ओझा डीजीपी बने. उन्होंने शहाबुद्दीन के खिलाफ सबूत इकट्ठे किये क ई पुराने मामले फिर से खोल दिये, जिन मामलों की जांच का जिम्मा सीआइडी को सौंपा गया था, उनकी भी समीक्षा करायी गयी माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण और हत्या के मामले में शहाबुद्दीन पर वारंट जारी हुआ और अंतत: उन्हें अदालत में आत्मसमर्पण करना पड़ा लेकिन, मामला आगे बढ़ता कि डीपी ओझा चलता कर दिये गये सत्ता से टकराव के कारण उन्हें वीआरएस लेना पड़ा.
ओझा अब भी मानते हैं कि ऊंचे राजनीतिक रिश्ते के कारण शहाबुद्दीन अब तक बचते रहे हैं. 2005 में रत्न संजय सीवान के एसपी बने, तो शहाबुद्दीन के खिलाफ एक बार फिर कार्रवाई शुरू हुई. तब राज्य में राष्ट्रपति शासन था 24 अप्रैल, 2005 को शहाबुद्दीन के पैतृक गांव प्रतापपुर में की गयी छापेमारी में भारी संख्या में आग्नेयास्त्र, अवैध हथियार, चोरी की गाड़ियां, विदेशी मुद्रा आदि बरामद किये गये. इससे संबंधित छह मुकदमे अभी चल रहे हैं. लंबे समय तक फरार रहने के बाद सांसद को दिल्ली स्थित उनके निवास से पुलिस ने छह नवंबर, 2005 को गिरफ्तार किया तब से लेकर अभी तक वे न्यायिक हिरासत में ही हैं.

May 9, 2007 at 12:32 am 2 comments


calander

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