Archive for May 13, 2007

1857 और हिंदू फ़ासिस्टों के षड्यंत्र

आज भी उन लोगों की कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि अंगरेज़ों ने देश को मुसलमानों की गुलामी से आज़ाद कराया. वे इसी के साथ कम्युनिस्टों को गरियाते रहते हैं कि वे अंगरेज़ों के हाथों में खेलते रहे हैं और उनके इशारों पर ही वामपंथी इतिहासकार देश का गलत इतिहास लिखते आये हैं. मगर यह लेख आप पढें और हमें बताएं कि कौन अंगरेज़ों की चाकरी में लगा था (और अब भी है), किसने अंगरेज़ों के हाथों की कठपुतली बनना स्वीकार किया और अब भी बना हुआ है, और यह कि कौन अब भी अंगरेज़ों ( अब के साम्राज्यवादियों) के इशारे पर अपने ही देश की जनता के खिलाफ़ युद्धरत है.

प्रणय कृष्ण
अंगरेजों ने सांप्रदायिक आग भड़काने की कोशिशों में
कोई कमी नहीं रखी, फिर भी 1857 के स्वाधीनता संग्राम में साम्राज्यवाद विरोधी धुरी के इर्द-गिर्द हिंदू-मुस्लिम एकता बरकरार रही. वहीं 1857 के विद्रोह के दमन के बाद का राष्ट्रीय आंदोलन अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति का बार-बार शिकार होता रहा. कारण यह था कि कांग्रेसी नेतृत्व कभी उस साझा संस्कृति या
गंगा-जमुनी तहजीब की ताकत को पहचान ही न पाया जो सैकड़ों वर्षों
के दौरान विकसित हुई थी. 1857 के विद्रोहियों ने राष्ट्रवाद और
धर्मनिरपेक्षता को आधुनिक विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में बैठ कर
योरप से नहीं सीखा था, पूरे मध्यकाल के दौरान अनेक मुस्लिम राजवंश जो
दिल्ली की गद्दी पर बैठे उन सभी ने धर्म और धर्माचार्यों को राजकाज
से अलग रखा. शरीयत के कानून को कभी भी राज्य के अपने कानूनों
पर तरजीह नहीं दी गयी. धर्मचार्यों को पठन-पाठन का काम दिया गया
और राजकाज से उन्हें अलग रखा गया. मध्यकाल का भारतीय राज्य कभी भी
धर्मराज्य नहीं बन सका. मुगलकाल के दौरान न केवल हिंदू-मुस्लिम शासक
वर्गों के बीच सत्ता की साझेदारी विकसित हुई बल्कि सूफी और
भक्ति आंदोलनों के प्रभाव से समाज में सांप्रदायिक सौहार्द भी स्थापित
हुआ. 1857 की बेमिसाल हिंदू-मुस्लिम एकता सूअर और गाय की चर्बी
वाले कारतूसों के कारण नहीं पैदा हुई थी (जैसा कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने
षड्यंत्रपूर्वक साबित करने की कोशिश की थी) बल्कि यह इसी दीर्घ पृष्ठभूमि की उपज थी.
साथ ही साथ इस एकता का आधार पूर्णत: लौकिक था. बर्तानवी उपनिवेशवाद ने अपनी लूट-खसोट
की नीति के तहत भारत की कृषि, व्यापार, उद्योग-धंधों सबको चौपट कर
दिया था और उसकी लूट के शिकार सभी धर्मों के लोग बन रहे थे. इस बात
ने धर्मों की भिन्नता के परे पीड़ितों की एकता का भौतिक आधार
मुहैया कराया था.
यह महज संयोग नहीं कि कांग्रेस का जन्मदाता बना एलन
आक्टोवियन ह्यूम, जो इस विद्रोह के समय इटावा का चीफ मजिस्ट्रेट था, 23,
मई 1857 को जब इटावा बुलंदशहर और मैनपुरी में विद्रोह हुआ तो वह
औरत का भेष धर कर भागा था. इस गदर के भुक्तभोगी के रूप में ह्यूम ने
महसूस कि या कि यदि क्रांति से बचना है तो हिंदुस्तानियों के गुस्से
को एक सेफ्टी वाल्व देना जरूरी होगा. इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि
1857 से अंगरेजों ने यह भी सबक लिया कि हिंदू-मुस्लिम एकता को
तोड़े बगैर भारत पर राज करना मुश्किल होगा. इस सिलसिले में 1873-77
में प्रकाशित 8 खंडोंवाली पुस्तकमाला ‘हिस्ट्री आफ इंडिया ऐज टोल्ड
बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस’ का जिक्र किया जा सकता है, जिसे ब्रिटेन
के विदेश मंत्री सर हेनरी एलियट द्वारा तैयार कराया गया और प्रो जॉन
डाउसन द्वारा संपादित किया गया था. इस पुस्तकमाला में बड़ी सावधानी से
कल्पना और तथ्यों को मिलानेवाली ऐसी अतिशयोक्तिपूर्ण व सांप्रदायिक
सामग्री का चयन किया गया है, जिससे कि यह सिद्ध किया जा सके कि भारत
में दो राष्ट्र थे. देशी हिंदुओं पर विदेशी मुसलमानों ने विजय प्राप्त की
ओर यह विदेशी मुस्लिम अत्याचार 600 वर्षों तक चलता रहा और वास्तव में
अंगरेजों ने आकर हिंदुओं को इससे मुक्त किया. लेकिन अपने
धूर्ततापूर्ण उद्देश्य से गढे गये इस नये इतिहास में भी अंगरेजों को
मानना पड़ा है कि भारतीय अपनी साझी विरासत से पूरी तरह नावाकिफ नहीं
है. इसलिए पुस्तक की भूमिका में इलियट ने दुख व्यक्त किया है कि भारत
के हिंदू लेखकों ने भी ऐसा विवरण दिया है कि मानो मुस्लिम शासक
भारतीय थे और उन्होंने मुसलमानों के हाथों अपने देशवासियों के
उत्पीड़न की चर्चा नहीं की है. कहना न होगा कि दूसरी ओर भारतीय
इतिहास का हिंदू-मुस्लिम भाष्य तैयार करनेवाले भी अंगरेजों के ही खैरख्वाह
थे और ये दो किस्म के भाष्य ‘द्विराष्ट्रवाद’ के सिद्धांतकारों के काम
आये, इस प्रकार अंगरेजों की कृपा से जो नया इतिहासबोध तैयार हुआ
उसने इस तथ्य को झुठला दिया कि दरअसल मध्यकाल में हिंदू और मुस्लिम
सामंतों की सत्ता में साझेदारी थी. किसान और आम जनता इस साझी सत्ता
से पीड़ित थी, किसी शासक के मुस्लिम या हिंदू होने से नहीं. इसी सामंती
सत्ता के खिलाफ आम जनता के संघर्ष की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के
बतौर भक्ति तथा सूफी आंदोलन पैदा हुए, जिनमें दोनों समुदायों के
किसानों, मेहनतकशों की एकता झलकी. सच तो यह है कि अलग-अलग
धार्मिक पहचानोंवाले राजनैतिक समुदायों के बतौर हिंदू और
मुसलमान पूरे मध्यकाल में दिखाई ही नहीं देते. इसलिए कुछ
इतिहासकारों ने अतीत पर आरोपित इन धार्मिक अस्मिताओं को कल्पित
समुदाय का बना दिया है. हिंदुत्व के सबसे बड़े सिद्धांतकार सावरकर ने
भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा में पितृभूमि और पुण्यभूमि की जुड़वां
कसौटी निर्धारित की. यह कसौटी बड़ी कुटिलता से मुसलमानों और
ईसाइयों को ही भारतीय राष्ट्र से बाहर क रने के लिए बनायी गयी है
क्योंकि उनकी पुण्यभूमि अर्थात उनके धर्मों का उद्गमस्थल भारत से
बाहर हैं. पितृभूमि यदि एकमात्र आधार होता है तो वे भी भारतीय राष्ट्र का
हिस्सा होते क्योंकि वे भी पीढ़ी दर पीढ़ी इस देश में रहते आ रहे हैं.
भारतीय बौद्ध, जैन और सिख, जिनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों ही
भारत है, संघियों के अनुसार हिंदू धर्म में जबरन समेट लिये जाते है.
सावरकर की इस बेहद तंगनजर और बेवकूफीभरी अवधारणा का इस्तेमाल यदि
दूसरे देश में करने लग जायें तो उन देशों में बसे हिंदुओं का क्या
होगा? चीनी, जापानी, सिंहली से लेकर तमाम पूर्व एशियाई देशों के
बौद्धों को तो उन राष्ट्रों का नागरिक ही नहीं कहा जा सकेगा.
अमेरिका, यूरोप से लेकर दुनिया भर के ईसाइयों को इजरायल
फलस्तीन का नागरिक बनना होगा. फिर मुसलमानों, ईसाइयों की
पुण्यभूमि भी क्या सिर्फ़ मक्क, मदीना या येरूशलम तक ही सीमित है? उनकी
हजारों दरगाहें खानकाहें, मस्जिद और गिरिजाघर तो इसी देश में आबाद
है. अधिकतर भारतीय मुसलमान अपनी कथित पुण्यभूमि अर्थात मक्का-मदीना
कभी गये ही नहीं. आम लोगों की बात छोड़िए बहुतेरे मुगल बादशाहों तक
ने हज नहीं किया था. इसलिए पुण्यभूमि की बात ही उठानी बेमानी है, देश तो
उनका होता है जिनका देश की सत्ता और संपत्ति में हिस्सा होता है. इसे
अच्छी तरह जाननेवाले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकार संघी लोग देश
की बहुसंख्यक जनता को अपने ही देश की संपत्ति से महरूम करके
साम्राज्यवाद और उसके मुट्टी भर दलालों की झोली में देश की प्रभुसत्ता
और संपत्ति की अर्पित करते जाने के सत्ता षड्यंत्र के सहभागी हैं.
जाहिर है कि सच्चे राष्ट्रवाद को अमल में लाने के लिए देश की सत्ता और
संपत्ति पर देश की बहुसंख्यक मेहनतकशों के अधिकार की स्थापना करनी
होगी और यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धूर्ततापूर्ण कुचक्र को
धूल में मिला कर ही संभव है. आजादी के आंदोलन के दौरान कांग्रेस
के अंदर अंगरेजी राज के प्रति ढुलमुल रुख तो था ही, जमींदारी और कट्टर
पूंजीवादी हितों के ऐसे पैरोकार भी मौजूद रहे जिन्होंने हिंदुत्व
को हवा दी. कई बार मदन मोहन मालवीय जैसे हिंदू महासभाई तत्व
कांग्रेस की नेतृत्वकारी भूमिका में रहे. तिलक , लाजपत राय की पीढी़
के हिंदू आग्रहों को छोड़ भी दिया जाये तो स्वयं महात्मा गांधी द्वारा
हिंदू प्रतीकों के इस्तेमाल ने अवश्य ही राष्ट्रीयता की संकल्पना को एक
हिंदू रंग देने में सहायता की और मुसलमानों के अलगाव को बढा़या.
गांधी जी द्वारा साम्राज्यवाद विरोधी जनकार्रवाइयों के ऊंचाई पर
पहुंचने के समय आंदोलन वापस लेने की घटनाओं ने भी बार-बार
सांप्रदायिक ताकतों को राजनीतिक शून्य भरने का अवसर दिया. सरकारी
इतिहास विभाजन का दोष महज जिन्ना और मुस्लिम लीग पर मढ़ता है, लेकिन
वास्तविकता यह है कि हिंदू कट्टरपंथ को कांग्रेस के भीतर लगातार
संरक्षण मिला है. पहले तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस ने दो
राष्ट्र के सिद्धांत (सावरकर और जिन्ना दोनों ही जिसके पैरोकार थे) के
समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और बंटवारा होने दिया, और फिर बंटवारे
के बाद भी उसकी आग को बीच-बीच में होनेवाले सांप्रदायिक दंगों के
जरिये और पाकिस्तान विरोधी युद्धोन्माद के सहारे लगातार जीवित रखा गया.
यहां तक कि नेहरू के दौर से ही कम्युनिस्टों का विरोध करने के
लिए संघ को संरक्षण दिया गया, और इंदिरा व राजीव के दौर में तो
हिंदू वोटों के लिए कांग्रेस और संघ परिवार की सांठ-गांठ अब
सर्वज्ञात तथ्य है. जहां आजादी के बाद भी देश की नसों में इस तरह
सांप्रदायिक जहर लगातार घोला जाता रहा हो,वहां क्या आश्चर्य कि अनुकूल
परिस्थिति आने पर एक पक्की सांप्रदायिक और फासिस्ट विचारधारा सत्ता की
मंजिल पा ले. कांग्रेसी राष्ट्रवाद और भाजपाई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में
जरूर कई फर्क हो सकते हैं, मगर इतना तो तय है कि 1857 की
जुझारू हिंदू-मुस्लिम एकता का दोनों निषेध करते हैं. इस निषेध का
निषेध करके ही हम अपनी क्रांतिकारी राष्ट्रवादी विरासत को फि र से प्राप्त
कर सकते हैं.

समाप्त
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May 13, 2007 at 11:41 pm 2 comments

हाथी सबका साथी

बहुजन समाज से सर्वजन समाज तक
रविभूषण

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम उन लोगों को मालूम थे, जिन्होंने प्रदेश के मतदाताओं को नजदीक से देखा था. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के अतिथि गृह में गत 10 मई को रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर के मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ वंशगोपाल सिंह दो-तीन बार यह कह चुके थे कि मायावती को बहुमत प्राप्त होगा. वे गोरखपुर के इलाके से लौटे थे और बसपा को बहुमत मिलने के प्रति आश्वस्त थे. एक्जिट पोल के अनुमान गलत सिद्ध हुए और चुनाव विश्लेषकों तक को इस अदभुत परिणाम का अनुमान नहीं था. पंडितों ने शंख बजाये और हाथी आगे बढ़ता गया. अब मायावती आंबेडकर व कांशीराम के बाद देश में दलितों की सर्वमान्य नेता हैं.
14 अप्रैल, 1984 को कांशीराम ने जब बहुजन समाज पार्टी बनायी थी, मायावती एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में उपस्थित हुई थीं. समय के अनुसार उन्होंने अपने विचार बदले और राजनीतिक रूप से निरंतर परिपक्व होती गयीं. 1989 तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का शासन था. ब्राह्मण, मुसलिम और कमजोर वर्ग उसके साथ थे. 1989 के बाद बदले राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस की हालत निरंतर पतली होती गयी. बसपा पहले आक्रामक थी. मायावती ब्राह्मणों और मनुवादियों को कोसती और फटकारती थीं, पर राजनीतिक अनुभवों ने उनकी आक्रामकता कम की और अब वे परिपक्व राजनीतिज्ञ के रूप में राजनीतिक रंगमंच पर उपस्थित हैं. पहले उनका नारा था `तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार.’ यह नारा बदल गया और हाथी को गणेश रूप में प्रस्तुत किया गया- `हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है.’ राज्य के 15वें विधानसभा चुनाव में मायावती ने 139 सवर्णों को बसपा का प्रत्याशी बनाया था. इनमें 86 ब्राह्मण थे. इन 86 स्थानों पर बसपा के 70 ब्राह्मण प्रत्याशी विजयी हुए हैं. ब्राह्मण और दलित कांग्रेस के पुराने वोट बैंक रहे हैं. कांग्रेस से ये दूर होते गये और उत्तर प्रदेश के इस बार के विधानसभा चुनाव में `एमबीडी फैक्टर’-मुसलिम, ब्राह्मण औप दलित महत्वपूर्ण रहा. प्रदेश में दलित 21 प्रतिशत, ब्राहम्ण 9 प्रतिशत, राजपूत 8 प्रतिशत, जाटव 13 प्रतिशत, यादव 9 प्रतिशत, वैश्य, कुर्मी, लोध, गरड़िया, कहार और केवट 2-2 प्रतिशत तथा मुसलिम 16 प्रतिशत हैं. मायावती ने ब्राह्मण- दलित पुल बनाया और बहुजन समाज से सर्वजन समाज तक की यात्रा की. उत्तर प्रदेश की सामान्य जनता ही नहीं, भारत की सामान्य जनता भी गंठजोड़ की छीना-झपटीवाली राजनीति से परेशान हो चुकी है. उत्तर प्रदेश के चुनावी परिणाम आगामी दिनों में पूरे देश में असरदायक हो सकते हैं. राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं और उसके साथ देश का राजनीतिक परिदृश्य भी बदल सकता है. उत्तर प्रदेश के चुनावी परिणाम देश की राजनीति के लिए अधिक महत्वपूर्ण होंगे. उत्तर प्रदेश में लगभग 16 वर्ष बाद किसी एक राजनीतिक दल की सरकार बन रही है. आजादी के बाद अब तक वहां किसी मुख्यमंत्री ने पांच वर्ष का अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है. मायावती पहली बार 5 महीने, दूसरी बार 7 महीने और तीसरी बार 16 महीने मुख्यमंत्री रही हैं. 1993 के बाद राज्य में पहली बार बहुमत की सरकार बन रही है. इसे मतदाताओं की राजनीतिक परिपक्वता के रूप में देखा जाना चाहिए. अमर सिंह, अमिताभ बच्चन और सुंदर अभिनेत्रियों से सामान्य जनता को कोई मतलब नहीं है. उसे कैबरे डांस देखने की इच्छा नहीं है. भाजपा की `इंडिया शाइनिंग’ और `फील गुड’ की तरह के तारे फिर धूल में मिल गये. बीसवीं सदी का महानायक सब की दृष्टि में झूठा था, क्योंकि उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश नहीं था और यूपी में जुर्म कम नहीं था. बिग बी के नारे हवा हो गये और चुनाव में होनेवाले भोंडे प्रदर्शन कामयाब नहीं हो सके. मतदाताओं ने उत्तर प्रदेश को खंडित नहीं, स्पष्ट जनादेश दिया. वर्षों पहले हिंदी की एक फिल्म हिट हुई थी- `हाथी मेरे साथी.’ अब हाथी सबका साथी है. मायावती ने विभेद और विभाजन की राजनीति छोड़ कर समन्वय तथा सहयोग की राजनीति को महत्व दिया. पहले से चले आते हुए जातीय राजनीतिक समीकरण नष्ट हुए और एक नया राजनीतिक-सामाजिक समीकरण बना. उत्तर प्रदेश के चुनाव ने मंडल-कमंडल की राजनीति को किनारे कर दिया है. 1990-91 से अब तक जाति और धर्म की राजनीति ने जो सामाजिक क्षति पहुंचायी है, वह सबके सामने है. क्या इस चुनाव परिणाम से राष्ट्रीय स्तर पर एक नया राजनीतिक समीकरण बनने की संभावना नहीं है? कॉरपोरेट राजनीतिक संस्कृति पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है. भाजपा इसी में फिसली, गिरी और पराजित हुई. सपा को भी अमर सिंह ने इसी कॉरपोरेट संस्कृति से क्षतिग्रस्त किया. बसपा ने इस चुनाव में किसी का दामन नहीं पकड़ा. उसने 402 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किये थे और उसके 206 प्रत्याशी विजयी हुए. बसपा के इस राजनीतिक आत्मविश्वास को समझने की जरूरत है, क्योंकि प्राय: सभी राजनीतिक दल अपना आत्मविश्वास खो चुके हैं. बीते 18 वर्ष में उत्तर प्रदेश में बसपा के विधायकों की संख्या में लगभग 16 गुना वृद्धि हुई है. पिछले चुनाव की तुलना में उसका वोट लगभग सात प्रतिशत बढ़ा है. 1989 से अब तक के पांच विधानसभा चुनावों में उसके जनाधार में वृद्धि होती गयी है. 1993 का मध्यावधि चुनाव बसपा ने सपा के साथ मिल कर लड़ा था. 1996 में वह कांग्रेस के साथ चुनाव में उतरी थी. इस बार वह अकेले लड़ी और विजयी हुई. मतदाताओं ने छोटे दलों और निर्दलीयों में रुचि नहीं ली. इस बार निर्दलीयों की संख्या बहुत घटी है. इस चुनाव में सपा, भाजपा और कांग्रेस का अपना अलग-अलग गंठबंधन था-छोटा ही सही. सपा के साथ माकपा, लोकतांत्रिक कांग्रेस और कुछ निर्दलीय थे. भाजपा के साथ जदयू और अपना दल था. कांग्रेस के साथ समाजवादी क्रांति दल, भारतीय किसान दल और राजद था. तीनों गंठजोड़ों का हश्र सामने है. बसपा केवल विधानसभा चुनाव में ही नहीं, प्रदेश की तीन संसदीय सीटों पर भी विजयी हुई है. चुनाव में मीडिया का खेल-तमाशा अधिक नहीं चला. मंच पर डांस का कोई फायदा नहीं हुआ. धन बल की भी अधिक भूमिका नहीं रही. परिवार का जयगान और राहुल गांधी का रोड शो भी प्रभावशाली नहीं बन सका. जयललिता ने 23 अप्रैल, 2007 को इलाहाबाद की एक चुनाव सभा में मुलायम सिंह के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा था-`एक है मुलायम इस वतन में, एक है चंदा जैसे गगन में.’ यह सब धरा का धरा रह गया और अब मुलायम सिंह अपनी हार का सारा दोष चुनाव आयोग को दे रहे हैं. उत्तर प्रदेश में गुंडाराज था और मुलायम सिंह ने बिहार में लालू प्रसाद की हार से कुछ भी नहीं सीखा. मुलायम सिंह द्वारा त्याग पत्र दिये जाने के बाद उत्तर प्रदेश के संसदीय कार्य और नगर विकास मंत्री मोहम्मद आजम खां के कार्यालय में उनके स्टॉफ द्वारा सरकारी फाइलों को जलाने की घटना को उत्तर प्रदेश के सुशासन के रूप में लिया जाना चाहिए या कुशासन के रूप में? मुलायम सिंह का कन्या विद्या धन और बेरोजगारी भत्ता भी कुछ नहीं कर सका. कांग्रेस, भाजपा और सपा को आत्ममंथन करना चाहिए. केशरीनाथ त्रिपाठी, रामनरेश यादव, जगदंबिका पाल, हरिशंकर तिवारी, बेनी प्रसाद वर्मा और चंद्रशेखर के भतीजे प्रवीण सिंह बब्बू की हार सामान्य नहीं है. हालांकि कुछ बाहुबली फिर जीते हैं. वाम दलों ने बसपा को भाजपा की कोटि में रखा था और इसे बुरी बताया था. उत्तर प्रदेश के चुनावी परिणाम स्पष्ट हैं. जनता खिचड़ी सरकार नहीं चाहती. एकदलीय सरकार में उसकी निष्ठा है. ऐसी सरकार अपनी विफलता के लिए किसी दूसरे राजनीतिक दल को दोषी नहीं ठहरा सकती. गंठबंधन की सरकार पर उत्तर प्रदेश में प्रश्न चिह्र लगा दिया है. ऐसी सरकार विकास कार्य नहीं कर सकती. सहयोगी दलों के तीसरे मोरचे व संयुक्त मोरचे की सरकारें बन- बिगड़ चुकी हैं. क्या अब दलित, आदिवासी और वामपंथी दलों का कोई व्यापक राष्ट्रीय मोरचा बन सकता है? मायावती को इसकी जरूरत नहीं है. बसपा आज राष्ट्रीय परिदृश्य पर विराजमान है और जाहिर है कि वह बहुजन समाज से सर्वजन समाज की ओर बढ़ चुकी है.

May 13, 2007 at 7:25 pm 1 comment

1857 और हिंदू फ़ासिस्टों के षड्यंत्र

आज भी उन लोगों की कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि अंगरेज़ों ने देश को मुसलमानों की गुलामी से आज़ाद कराया. वे इसी के साथ कम्युनिस्टों को गरियाते रहते हैं कि वे अंगरेज़ों के हाथों में खेलते रहे हैं और उनके इशारों पर ही वामपंथी इतिहासकार देश का गलत इतिहास लिखते आये हैं. मगर यह लेख आप पढें और हमें बताएं कि कौन अंगरेज़ों की चाकरी में लगा था (और अब भी है), किसने अंगरेज़ों के हाथों की कठपुतली बनना स्वीकार किया और अब भी बना हुआ है, और यह कि कौन अब भी अंगरेज़ों ( अब के साम्राज्यवादियों) के इशारे पर अपने ही देश की जनता के खिलाफ़ युद्धरत है.

प्रणय कृष्ण
अंगरेजों ने सांप्रदायिक आग भड़काने की कोशिशों में
कोई कमी नहीं रखी, फिर भी 1857 के स्वाधीनता संग्राम में साम्राज्यवाद विरोधी धुरी के इर्द-गिर्द हिंदू-मुस्लिम एकता बरकरार रही. वहीं 1857 के विद्रोह के दमन के बाद का राष्ट्रीय आंदोलन अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति का बार-बार शिकार होता रहा. कारण यह था कि कांग्रेसी नेतृत्व कभी उस साझा संस्कृति या
गंगा-जमुनी तहजीब की ताकत को पहचान ही न पाया जो सैकड़ों वर्षों
के दौरान विकसित हुई थी. 1857 के विद्रोहियों ने राष्ट्रवाद और
धर्मनिरपेक्षता को आधुनिक विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में बैठ कर
योरप से नहीं सीखा था, पूरे मध्यकाल के दौरान अनेक मुस्लिम राजवंश जो
दिल्ली की गद्दी पर बैठे उन सभी ने धर्म और धर्माचार्यों को राजकाज
से अलग रखा. शरीयत के कानून को कभी भी राज्य के अपने कानूनों
पर तरजीह नहीं दी गयी. धर्मचार्यों को पठन-पाठन का काम दिया गया
और राजकाज से उन्हें अलग रखा गया. मध्यकाल का भारतीय राज्य कभी भी
धर्मराज्य नहीं बन सका. मुगलकाल के दौरान न केवल हिंदू-मुस्लिम शासक
वर्गों के बीच सत्ता की साझेदारी विकसित हुई बल्कि सूफी और
भक्ति आंदोलनों के प्रभाव से समाज में सांप्रदायिक सौहार्द भी स्थापित
हुआ. 1857 की बेमिसाल हिंदू-मुस्लिम एकता सूअर और गाय की चर्बी
वाले कारतूसों के कारण नहीं पैदा हुई थी (जैसा कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने
षड्यंत्रपूर्वक साबित करने की कोशिश की थी) बल्कि यह इसी दीर्घ पृष्ठभूमि की उपज थी.
साथ ही साथ इस एकता का आधार पूर्णत: लौकिक था. बर्तानवी उपनिवेशवाद ने अपनी लूट-खसोट
की नीति के तहत भारत की कृषि, व्यापार, उद्योग-धंधों सबको चौपट कर
दिया था और उसकी लूट के शिकार सभी धर्मों के लोग बन रहे थे. इस बात
ने धर्मों की भिन्नता के परे पीड़ितों की एकता का भौतिक आधार
मुहैया कराया था.
यह महज संयोग नहीं कि कांग्रेस का जन्मदाता बना एलन
आक्टोवियन ह्यूम, जो इस विद्रोह के समय इटावा का चीफ मजिस्ट्रेट था, 23,
मई 1857 को जब इटावा बुलंदशहर और मैनपुरी में विद्रोह हुआ तो वह
औरत का भेष धर कर भागा था. इस गदर के भुक्तभोगी के रूप में ह्यूम ने
महसूस कि या कि यदि क्रांति से बचना है तो हिंदुस्तानियों के गुस्से
को एक सेफ्टी वाल्व देना जरूरी होगा. इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि
1857 से अंगरेजों ने यह भी सबक लिया कि हिंदू-मुस्लिम एकता को
तोड़े बगैर भारत पर राज करना मुश्किल होगा. इस सिलसिले में 1873-77
में प्रकाशित 8 खंडोंवाली पुस्तकमाला ‘हिस्ट्री आफ इंडिया ऐज टोल्ड
बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस’ का जिक्र किया जा सकता है, जिसे ब्रिटेन
के विदेश मंत्री सर हेनरी एलियट द्वारा तैयार कराया गया और प्रो जॉन
डाउसन द्वारा संपादित किया गया था. इस पुस्तकमाला में बड़ी सावधानी से
कल्पना और तथ्यों को मिलानेवाली ऐसी अतिशयोक्तिपूर्ण व सांप्रदायिक
सामग्री का चयन किया गया है, जिससे कि यह सिद्ध किया जा सके कि भारत
में दो राष्ट्र थे. देशी हिंदुओं पर विदेशी मुसलमानों ने विजय प्राप्त की
ओर यह विदेशी मुस्लिम अत्याचार 600 वर्षों तक चलता रहा और वास्तव में
अंगरेजों ने आकर हिंदुओं को इससे मुक्त किया. लेकिन अपने
धूर्ततापूर्ण उद्देश्य से गढे गये इस नये इतिहास में भी अंगरेजों को
मानना पड़ा है कि भारतीय अपनी साझी विरासत से पूरी तरह नावाकिफ नहीं
है. इसलिए पुस्तक की भूमिका में इलियट ने दुख व्यक्त किया है कि भारत
के हिंदू लेखकों ने भी ऐसा विवरण दिया है कि मानो मुस्लिम शासक
भारतीय थे और उन्होंने मुसलमानों के हाथों अपने देशवासियों के
उत्पीड़न की चर्चा नहीं की है. कहना न होगा कि दूसरी ओर भारतीय
इतिहास का हिंदू-मुस्लिम भाष्य तैयार करनेवाले भी अंगरेजों के ही खैरख्वाह
थे और ये दो किस्म के भाष्य ‘द्विराष्ट्रवाद’ के सिद्धांतकारों के काम
आये, इस प्रकार अंगरेजों की कृपा से जो नया इतिहासबोध तैयार हुआ
उसने इस तथ्य को झुठला दिया कि दरअसल मध्यकाल में हिंदू और मुस्लिम
सामंतों की सत्ता में साझेदारी थी. किसान और आम जनता इस साझी सत्ता
से पीड़ित थी, किसी शासक के मुस्लिम या हिंदू होने से नहीं. इसी सामंती
सत्ता के खिलाफ आम जनता के संघर्ष की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के
बतौर भक्ति तथा सूफी आंदोलन पैदा हुए, जिनमें दोनों समुदायों के
किसानों, मेहनतकशों की एकता झलकी. सच तो यह है कि अलग-अलग
धार्मिक पहचानोंवाले राजनैतिक समुदायों के बतौर हिंदू और
मुसलमान पूरे मध्यकाल में दिखाई ही नहीं देते. इसलिए कुछ
इतिहासकारों ने अतीत पर आरोपित इन धार्मिक अस्मिताओं को कल्पित
समुदाय का बना दिया है. हिंदुत्व के सबसे बड़े सिद्धांतकार सावरकर ने
भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा में पितृभूमि और पुण्यभूमि की जुड़वां
कसौटी निर्धारित की. यह कसौटी बड़ी कुटिलता से मुसलमानों और
ईसाइयों को ही भारतीय राष्ट्र से बाहर क रने के लिए बनायी गयी है
क्योंकि उनकी पुण्यभूमि अर्थात उनके धर्मों का उद्गमस्थल भारत से
बाहर हैं. पितृभूमि यदि एकमात्र आधार होता है तो वे भी भारतीय राष्ट्र का
हिस्सा होते क्योंकि वे भी पीढ़ी दर पीढ़ी इस देश में रहते आ रहे हैं.
भारतीय बौद्ध, जैन और सिख, जिनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों ही
भारत है, संघियों के अनुसार हिंदू धर्म में जबरन समेट लिये जाते है.
सावरकर की इस बेहद तंगनजर और बेवकूफीभरी अवधारणा का इस्तेमाल यदि
दूसरे देश में करने लग जायें तो उन देशों में बसे हिंदुओं का क्या
होगा? चीनी, जापानी, सिंहली से लेकर तमाम पूर्व एशियाई देशों के
बौद्धों को तो उन राष्ट्रों का नागरिक ही नहीं कहा जा सकेगा.
अमेरिका, यूरोप से लेकर दुनिया भर के ईसाइयों को इजरायल
फलस्तीन का नागरिक बनना होगा. फिर मुसलमानों, ईसाइयों की
पुण्यभूमि भी क्या सिर्फ़ मक्क, मदीना या येरूशलम तक ही सीमित है? उनकी
हजारों दरगाहें खानकाहें, मस्जिद और गिरिजाघर तो इसी देश में आबाद
है. अधिकतर भारतीय मुसलमान अपनी कथित पुण्यभूमि अर्थात मक्का-मदीना
कभी गये ही नहीं. आम लोगों की बात छोड़िए बहुतेरे मुगल बादशाहों तक
ने हज नहीं किया था. इसलिए पुण्यभूमि की बात ही उठानी बेमानी है, देश तो
उनका होता है जिनका देश की सत्ता और संपत्ति में हिस्सा होता है. इसे
अच्छी तरह जाननेवाले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकार संघी लोग देश
की बहुसंख्यक जनता को अपने ही देश की संपत्ति से महरूम करके
साम्राज्यवाद और उसके मुट्टी भर दलालों की झोली में देश की प्रभुसत्ता
और संपत्ति की अर्पित करते जाने के सत्ता षड्यंत्र के सहभागी हैं.
जाहिर है कि सच्चे राष्ट्रवाद को अमल में लाने के लिए देश की सत्ता और
संपत्ति पर देश की बहुसंख्यक मेहनतकशों के अधिकार की स्थापना करनी
होगी और यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धूर्ततापूर्ण कुचक्र को
धूल में मिला कर ही संभव है. आजादी के आंदोलन के दौरान कांग्रेस
के अंदर अंगरेजी राज के प्रति ढुलमुल रुख तो था ही, जमींदारी और कट्टर
पूंजीवादी हितों के ऐसे पैरोकार भी मौजूद रहे जिन्होंने हिंदुत्व
को हवा दी. कई बार मदन मोहन मालवीय जैसे हिंदू महासभाई तत्व
कांग्रेस की नेतृत्वकारी भूमिका में रहे. तिलक , लाजपत राय की पीढी़
के हिंदू आग्रहों को छोड़ भी दिया जाये तो स्वयं महात्मा गांधी द्वारा
हिंदू प्रतीकों के इस्तेमाल ने अवश्य ही राष्ट्रीयता की संकल्पना को एक
हिंदू रंग देने में सहायता की और मुसलमानों के अलगाव को बढा़या.
गांधी जी द्वारा साम्राज्यवाद विरोधी जनकार्रवाइयों के ऊंचाई पर
पहुंचने के समय आंदोलन वापस लेने की घटनाओं ने भी बार-बार
सांप्रदायिक ताकतों को राजनीतिक शून्य भरने का अवसर दिया. सरकारी
इतिहास विभाजन का दोष महज जिन्ना और मुस्लिम लीग पर मढ़ता है, लेकिन
वास्तविकता यह है कि हिंदू कट्टरपंथ को कांग्रेस के भीतर लगातार
संरक्षण मिला है. पहले तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस ने दो
राष्ट्र के सिद्धांत (सावरकर और जिन्ना दोनों ही जिसके पैरोकार थे) के
समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और बंटवारा होने दिया, और फिर बंटवारे
के बाद भी उसकी आग को बीच-बीच में होनेवाले सांप्रदायिक दंगों के
जरिये और पाकिस्तान विरोधी युद्धोन्माद के सहारे लगातार जीवित रखा गया.
यहां तक कि नेहरू के दौर से ही कम्युनिस्टों का विरोध करने के
लिए संघ को संरक्षण दिया गया, और इंदिरा व राजीव के दौर में तो
हिंदू वोटों के लिए कांग्रेस और संघ परिवार की सांठ-गांठ अब
सर्वज्ञात तथ्य है. जहां आजादी के बाद भी देश की नसों में इस तरह
सांप्रदायिक जहर लगातार घोला जाता रहा हो,वहां क्या आश्चर्य कि अनुकूल
परिस्थिति आने पर एक पक्की सांप्रदायिक और फासिस्ट विचारधारा सत्ता की
मंजिल पा ले. कांग्रेसी राष्ट्रवाद और भाजपाई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में
जरूर कई फर्क हो सकते हैं, मगर इतना तो तय है कि 1857 की
जुझारू हिंदू-मुस्लिम एकता का दोनों निषेध करते हैं. इस निषेध का
निषेध करके ही हम अपनी क्रांतिकारी राष्ट्रवादी विरासत को फि र से प्राप्त
कर सकते हैं.

समाप्त

May 13, 2007 at 6:23 pm 2 comments


calander

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