Archive for May 17, 2007

फ्रांस : सरकोजी की जीत का मतलब

हरि किशोर सिंह
फ़्रांस में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव पर पूरे विश्व की नजर थी. सिर्फ इसलिए नहीं कि फ्रांस के इतिहास में सत्ता के सर्वोच्च् पद पर पहली बार किसी महिला के स्थापित होने की संभावना थी, बल्कि इसलिए भी नजर थी कि फ्रांस इस दफा अनुदारपंथियों के चंगुल से छुटकारा पा सकेगा या नहीं. 1958 में पांचवें गणतंत्र के गठन के बाद फांसवां मित्तरां के अलावा कोई उदारवादी प्रगतिशील, समाजवादी नेता इस पद पर आसीन नहीं हो पाया था. मित्तरां के बाद बीते 12 वर्ष से इस पद पर अनुदार (कंजरवेटिव) जॉक शिराक का आधिपत्य रहा. वे तीसरी बार भी राष्ट्रपति बनने की इच्छा रखते थे. लेकिन इसके लिए पर्याप्त् माहौल के अभाव में उन्होंने गृह मंत्री सरकोजी के लिए मैदान खुला छोड़ दिया था. इस प्रकार निकोलस सरकोजी के लिए पूरे दक्षिणपंथ के समर्थन का खुला द्वार मिला, जिससे द्वितीय मतदान में उन्हें अपने समाजवादी प्रतिद्वंद्वी सेगल रोयाल को प्रभावशाली बहुमत से पराजित करने का अवसर मिल गया.
हंगेरियन पिता और ग्रीक-यहूदी मां के पुत्र 51 वर्षीय सरकोजी अपने दृढ़ विचार और अविलंब कार्रवाई के लिए प्रसिद्ध रहे हैं. जर्मन फासीवाद से आक्रांत उनके पिता 1941 में हंगरी से पलायन कर फ्रांस में आ बसे थे. लेकिन पुत्र सरकोजी आव्रजन के संबंध में कठोर नीति के लिए काफी मशहूर रहे हैं. पिछले वर्षोंा में पेरिस के उपनगर में नस्लभेद के प्रश्न पर हुए दंगों को भी उन्होंने गृह मंत्री की हैसियत से काफी कठोरता से नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त् की थी. इस कारण इन इलाकों में दंगे की आशंका से प्रशासन भयभीत था. इसलिए भारी संख्या में दंगा दमन दल और सेना की टुक़़डियों की भारी तैनाती की गयी थी. इस चुनाव में लगभग 85 फीसदी मतदाताआें ने हिस्सा लिया था और चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद पेरिस सहित फ्रांस के विभिन्न शहरों में जश्न के माहौल से स्पष्ट है कि निकोलस सरकोजी का राष्ट्रपति काल अपने दक्षिणपंथी रुझान के लिए प्रसिद्धि प्राप्त् करने के लिए सचेष्ट रहेगा. निकोलस सरकोजी फ्रांस की राष्ट्रीय अस्मिता की आव्रजक नीति में कठोरता, कर में छूट और सामाजिक सुरक्षा के मद में दी जाने वाली सुविधाआें में भारी कटौती, नयी कार्य संस्कृति और भारी भरकम फ्रांस की प्रशासकीय ढांचे में प्रभावशाली सुधार पर हर प्रकार के प्रयास के लिए पहल करने में जरा भी नहीं हिचकेंगे.
विदेश नीति के संदर्भ में यूरोपीय संगठन की एकता और अमेरिका से दोस्ताना संबंधों की प्रगाढ़ता होगी. साथ ही फ्रेंच भाषी उत्तरी और पश्चिमी अफ्रीकी देशों से गहरे आर्थिक संबंधों को ठोस रूप देने का भी उनका प्रयास रहेगा. विजय की घोषणा के बाद उन्होंने अपने संक्षिप्त् भाषण में वाशिंगटन के प्रति मित्रता का उद्गार व्यक्त करने में जरा भी कोताही नहीं की. उन्होंने स्पष्ट तौर पर घोषणा की कि अब अमेरिका फ्रांस को अपना एक विश्वसनीय दोस्त के रूप में देख सकेगा. उनका स्पष्ट संकेत राष्ट्रपति जॉक शिराक द्वारा इराक पर अमेरिकी आक्रमण के विरोध की ओर था. मगर उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग के प्रति अमेरिकी नेतृत्व से अपेक्षा के संबंध में भी अपनी भावना उजागर की है. स्पष्ट है कि अब फ्रांस पर्यावरण के संबंध में क्योटो घोषणा पत्र को लागू कराने में प्रयासरत रहेगा. फिर भी अंतरराष्ट्रीय मंचों विशेषतौर पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के स्तर पर फ्रांस जो स्वतंत्र रूप से निर्णय लिया करता था, अब अमेरिकी नीति से प्रभावित रहेगा.
विकासशील देशों के लिए निकोलस सरकोजी का राष्ट्रपति बनना बहुत शुभ नहीं कही जा सकता. भारत और चीन को व्यापारिक क्षेत्र में नयी व्यवस्था के अंतर्गत काफी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि चुनाव अभियान के दौरान निकोलस ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि विजय की स्थिति में उनकी सरकार चीन और भारत के माल के खिलाफ आयात कर में भारी वृद्धि कर अपने देश की उत्पादित वस्तुआें का बचाव करेंगे. उनका कहना है कि ये देश फ्रांस के बाजार में अपने देश की उत्पादित वस्तुआें को सस्ते दर पर निर्यात करते हैं, अत: फ्रांस सरकार को यह अधिकार है कि वह स्वदेशी माल की रक्षा में करे.
निश्चय ही यह विश्व व्यापार में खुलेपन के लिए एक स्पष्ट चुनौती होगी, जिसका भारत और चीन को संयुक्त रूप से सामना करना पड़ेगा. अत: भारत को नये राष्ट्रपति की रीति नीति के प्रति सावधानी बरतनी पड़ेगी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता के प्रति फ्रांस की पिछली सरकार काफी उत्साहित थी. अब देखना है कि नयी सरकार इस संबंध में क्या नीति अपनाती है. इसी प्रकार भारत की आणविक क्लब की सदस्यता का सवाल है, इस संदर्भ में जॉक शिराक भारत के एक अति उत्साही समर्थक माने जाते थे. देखना है कि नयी सरकार का इस संबंध में क्या रुख होता है.
निकोलस सरकोजी की चुनावी सफलता से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि जर्मनी के पिछले चुनाव में दक्षिणपंथियों की सफलता से अनुदारपंथियों की सफलता की जो शुरुआत हुई थी, वह अब फ्रांस की राजनीति में प्रभावशाली तौर पर अपनी जड़ें जमा चुकी है. शीघ्र ही ब्रिटेन में भी नेतृत्व परिवर्तन होनेवाला है. अभी तक जॉर्ज ब्राउन का 10, डाउनिंग स्ट्रीट में जाना तय माना जा रहा है. उनकी भी लेबर पार्टी में बहुत उदारवादी छवि नहीं है. ब्रिटेन में स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम ने कंजरवेटिव पार्टी को काफी प्रोत्साहित किया है. लेबर पार्टी की त्रासदी देखने लायक है. फिलहाल फ्रांस में संसदीय चुनाव अगले छह सप्तहों में होनेवाले हैं. अगर उन चुनावों में भी अनुदारपंथियों का बोलबाला रहा तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि जर्मनी से दक्षिणपंथी शुरुआत का असर यूरोपीय राजनीति पर और भी व्यापक होगा.
विरोध पक्ष की नेता सेगल रोयाल ने भी चुनाव में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी थी. इसलिए समाजवादियों में आयी हताशा स्वाभाविक है. इस चुनाव परिणाम ने वामपंथियों की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है. यूरोप में आयी समृद्धि के असर से वामपंथी विचारधारा के प्रति आम जनता के आकर्षण में कमी आयी है. इस दृष्टि से यूरोप के समाजवादियों के लिए वर्तमान परिस्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है. उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा के २१ वीं सदी की चुनौतियों के अनुकूल नीति अपनानी होगी.
मारग्रेट थैचर के नेतृत्व से लगातार विफलता पाने पर ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने अपने नये नेता टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में न्यू लेबर के सिद्धांत को अपना कर अरसे के बाद 10, डाउनिंग स्ट्रीट पर अपना आधिपत्य जमाया था. वे तीन बार आम चुनाव में लेबर पार्टी को सफलता की राह पर ले गये. परंतु इराक के संदर्भ में अमेरिकापरस्त नीति के कारण उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट आयी और पार्टी के अंदर उन पर पद त्याग करने का दबाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. उन्हें अपना पद छोड़ने की घोषणा करनी पड़ी और अब वे 5 जून को अपने पद से मुक्त हो रहे हैं. लेबर पार्टी के नये नेता चांसलर ऑफ एक्सचेकर जॉर्ज ब्राउन के लिए अपनी पार्टी की गिरती लोकप्रियता को न केवल विराम लगाना होगा, बल्कि उसे ब्रिटिश जनमानस में पुन: इस तरह प्रतिस्थापित करना होगा कि उसे फिर से शासन की पार्टी के तौर पर ब्रिटिश जनता के समक्ष पेश किया जा सके.
यूरोपीय समाजवादियों की इस त्रासदी और यूरोपीय जनता के रुझान से विकासशील देशों के जनतांत्रिक तत्वों को भी सबक लेना होगा. भारत जैसे देश में अभी 24 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने पर मजबूर हो रहे हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में गरीबी तथा जीवन यापन के लिए रोजगार के अवसर की कमी से उत्पन्न समस्याआें के समाधान में व्यवस्था की विफलता ने ही हिंसात्मक आंदोलन को जन्म दिया है. नेपाल में जनतांत्रिक, वामपंथी एवं माओवादी तत्वों का आपसी समझौता इस दिशा में आशा की एक किरण के तौर पर दिखायी पड़ रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि नेपाल में चल रहे प्रयास को सफलता मिलेगी. जहां तक फ्रांस की नयी सरकार का प्रश्न है, विकासशील दुनिया को इंतजार करना पड़ेगा कि वह अपने पत्ते किस प्रकार खोलता है.

लेखक पूर्व विदेश राज्यमंत्री हैं.
प्रभात खबर से साभार.
Advertisements

May 17, 2007 at 7:51 pm Leave a comment

महाश्वेता देवी की एक ज़रूरी अपील : यह आप सभी के लिए है

प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी नंदीग्राम के शहीदों के नाम पर एक शहीद अस्पताल बनवाना चाहती हैं. इसके लिए उन्हें सभी संवेदनशील लोगों से मदद चाहिए. अगर आप डाक्टर या चिकित्सा सेवा से जुडे़/जुडी़ हैं तब और बेहतर है. इस सिलसिले में मुझे हाल ही में उनकी एक अपील मिली है जिसे मैं यहां डाल रहा हूं. अपील महाश्वेता देवी की हस्तलिपि में ही है. इसे (पीडीएफ़ में) डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें.

May 17, 2007 at 12:13 am Leave a comment


calander

May 2007
M T W T F S S
« Apr    
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
28293031