हम एक असहिष्णु समाज का हिस्सा नहीं हो सकते

May 22, 2007 at 6:35 pm 5 comments

आजकल देश में आप कुछ भी कहिए तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और न जाने दंड विधान की कितनी धाराओं का उल्लंघन हो जाता है. अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब एक कलाकार द्वारा बनायी गयी कुछ तसवीरों पर संघी गुंडों ने उत्पात मचाया था. अभी नामवर जी द्वारा पंत साहित्य और सदानंद शाही द्वारा तुलसी सहित्य में कूडा़ नज़र आने पर उसी तरह लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं जिस तरह गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम को दिखाये जाने पर भगवाधारियों की होती हैं. हमारे देश का नरेंद्र मोदीकरण बढ़ रहा है और ऐसी जगहें लगातार कम होती जा रही हैं जहां बैठ कर कोई कलाकार, फ़िल्मकार, लेखक अपना काम कर सके. और अदालतें इस मोदीकरण में एक अहम हिस्सेदार बन कर सामने आयी हैं, चाहे वह हुसैन का मामला हो या नामवर सिंह का. देखने में ये सभी मामले अलग-अलग भले लगें पर सभी जुडे़ हुए हैं. इस मुद्दे पर हाशिया पर रविभूषण जी का लेख आ चुका है. आगे पटना के कई लेखकों-पत्रकारों का नज़रिया हम सामने रखेंगे. आज हम कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बीबीसी के विनोद वर्मा का आलेख दे रहे हैं, सभार- (इस टिप्पणी के साथ कि विनोद जी को जिन दलों से बडी़ मासूम-सी उम्मीदें हैं, वे दल खुद ऐसी ही हरकतें करते रहे हैं, इसलिए हमें उनसे कोई उम्मीद नहीं है) यह बीबीसी हिंदी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. हमें इन मुद्दों पर बहस करनी ही होगी क्योंकि बकौल भाई अविनाश, ‘हम एक असहिष्णु समाज के हिस्से नहीं हो सकते.’
अभिव्यक्ति की एकतरफ़ा स्वतंत्रता
विनोद वर्मा
वड़ोदरा के सुप्रसिद्ध कला संस्थान में जो विवाद खड़ा हुआ है उसने कई पुराने सवालों को कुरेद कर एक बार फिर सतह पर ला दिया है. इस सवाल ने पहले की ही तरह बुद्धिजीवियों, लेखकों, बड़े समाचार पत्रों और अन्य प्रगतिशील ताक़तों को एकसाथ ला दिया है. और कहना न होगा कि कट्टरपंथी ताक़तें हमेशा की तरह एकजुट हैं और सारे विरोधों को अनदेखा, अनसुना करते हुए वही कर रही हैं जो वे कहना-करना चाहती हैं.
इस बार का विवाद देवी-देवताओं के कथित अश्लील चित्र बनाने को लेकर शुरु हुआ. इसके बाद भारतीय संस्कृति के तथाकथित रखवालों ने वही सब किया जो वे करते आए हैं. पेंटिंग बनाने वाले छात्र को गिरफ़्तार कर लिया गया और कला विभाग के डीन को निलंबित कर दिया गया.
संयोग भर नहीं है कि विवाद गुजरात में हुआ. नरेंद्र मोदी शासित गुजरात में ऐसे विवादों और उसकी ऐसी परिणति पर अब किसी को आश्चर्य भी नहीं होता. आश्चर्य तो यह होता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहाँ सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग अलापते नहीं थकतीं, वहाँ यह यह सब होता है.
भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना जैसे कुछ संगठनों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपना एकाधिकार मान लिया है. पिछले कुछ बरसों में उन्होंने बार-बार इसे साबित भी किया है.
उनकी मर्ज़ी के बिना न कोई चित्रकार ऐसे चित्र बना सकता है जो उनको न जँचे. न कोई ऐसा नाटक कर सकता है जो उनको न रुचे.
कोई फ़िल्मकार फ़िल्म नहीं बना सकता. बना भी ले तो उसे प्रदर्शित नहीं कर सकता. जैसा कि गुजरात में ‘परज़ानिया’ फ़िल्म के साथ हुआ. एमएफ़ हुसैन जैसे देश के प्रतिष्ठित कलाकार के साथ पिछले कुछ सालों में जो कुछ घटा है वह भारत के सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक इतिहास में एक काला अध्याय है.
आश्चर्य नहीं होता जब मोदी सरकार के संरक्षण में यह सब होता है. उनका एजेंडा साफ़ है. आश्चर्य तब भी नहीं होता जब देश की समाजवादी पार्टियाँ चुप रहती हैं क्योंकि वे सत्ता पाने के लिए भाजपा के पहलू में ही बैठी हुई हैं. खजुराहो के मंदिर अपने समय के समाज की सहिष्णुता के प्रतीक हैं.आश्यर्च होता है जब वामपंथी दल और कांग्रेस पार्टी इस मामले में अपने प्रवक्ताओं के भरोसे काम चलाने की कोशिश करते हैं और ऐसी घटनाओं का विरोध केवल बयानों तक सीमित होकर रह जाता है.
आश्चर्य तब भी होता है जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का गृहमंत्रालय हुसैन की पेंटिंग्स को लेकर उन्हें नोटिस भेजता है और जवाबतलब करता है. कलाकारों को संयम की सलाह देना अपनी जगह सही है. दूसरों की भावनाओं को आहत न करने का मशविरा भी ठीक है. कलाकारों की स्वतंत्रता की भी सीमाएँ हैं.
लेकिन सलाह-मशविरे की जगह सबक सिखाने की इच्छा अपने आपमें घातक है. सवाल यह है कि क्या विरोध का वही एक रास्ता है जो विश्वहिंदू परिषद, शिवसेना और बजरंग दल के कार्यालयों में तय होता है?
यह ठीक है कि भारत में कलाकारों और साहित्यकारों को अपनी अपेक्षित जगह पाने के लिए अब संघर्ष करना पड़ता है और आख़िर में वे हाशिए पर ही नज़र आते हैं. लेकिन उन्हें धकेलकर हाशिए से भी बाहर कर देने की कोशिश अपने आपमें अश्लीलता है.
अच्छा ही है कि वात्सायन ने बीते ज़माने में कामसूत्र की रचना कर ली, चंदेलों ने एक हज़ार साल पहले खजुराहो के मंदिर बनवा दिए और राजा नरसिंहदेव ने तेरहवीं शताब्दी में कोणार्क में मिथुन मूर्तियाँ लगवाने की हिम्मत कर ली. अगर इन संगठनों को इतिहास में जाने की अनुमति हो तो वे वात्सायन का मुँह काला कर दें और चंदेलों को सरेआम फाँसी देकर खजुराहो के मंदिरों को तहस-नहस कर दें. वैसे जो कुछ ये कर रहे हैं वह भारत की सांस्कृतिक विरासत पर कालिख़ पोतने से कोई कम भी नहीं है.

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जनता के अधिकारों का क्या हो? हम एक असहिष्णु समाज का हिस्सा नहीं हो सकते

5 Comments Add your own

  • 1. Mired Mirage  |  May 22, 2007 at 11:01 pm

    बिल्कुल सही कह रहे हैं आप । मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ । बस एक कमी रह गई है, उस पर भी ध्यान दें तो लेख पूरा हो जाएगा व धर्म ,जाति, प्रान्त निरपेक्ष भी हो जाएगा । इस विषय में हजरत जी के कार्टून बनाने वालों का विरोध करने वालों, सलमान रुशदी की सैटानिक वर्सेज पर पाबंदी लगाने वाली सरकार( वह हिन्दुत्व वाली न थी), डेरा सच्चा सौदा का विरोध करने वालों, डा विंसी कोड पर बनी फिल्म का विरोध करने वालों के भी नाम आते तो हमें लगता आप सभी असहिष्णुओं के कान समान रूप से उमेठते हैं । तब शायद हमारे कान यह दर्द आसानी से सह लेते ।
    हम तो अपने कान स्वयं ही उमेठ लेते हैं और दूसरों के छोड़ देते हैं सो अब आप बाँकी सबके कान भी उमेठिये तब हमारे कानों को कुछ राहत मिलेगी । आजकल वे कुछ अधिक ही खींचे जा रहे हैं कुछ अपने हाथों व कुछ बाँकी संसार के हाथों ।
    जहाँ तक गुजरात का प्रश्न है तो वह कक्षा के उस शरारती बच्चे जैसा हो गया है जो इतना बदनाम हो गया है कि शरारत कोई भी करे दो धौल उसे जमाकर शिक्षक अपने अनुशासन की इति समझ लेता है । ऐसा सब करते समय लोग दिल्ली व आधे उत्तर भारत को भूल जाते हैं जहाँ एक नेता की हत्या के लिए हजारों सिक्खों को मार दिया गया था ।क्यों बार बार उस बर्बरता को याद नहीं किया जाता ? अब जब गुजरात पर उँगली उठाइये तो यह न भूलियेगा कि राजधानी की तरफ तीन उँगलियाँ उठ रही हैं । याद रखिये इसी गुजरात ने एक पूरे के पूरे धर्म को तब अपने यहाँ शरण दी जब किसी और धर्म वाले उन धर्मावलम्बियों को उन्हीं के अपने देश में अपना धर्म का पालन करते हुए जीने नहीं दे रहे थे । हाँ मैं पारसियों की बात कर रही हूँ । यदि गुजराती सहिष्णु न होते तो आज पारसियों का नामों निशां संसार से मिट गया होता । यदि यह बात पुरानी है तो फिर मनु की बात, खजुराहो की बात भी पुरानी है । अवगुणों के साथ गुण भी याद रखिये ।
    बुरा बुरा ही होता है, चाहे इसका नाम न.मो. हो या रा.गाँ, चाहे वे हिन्दुत्व वाले हों या काँग्रेसी या किसी और दल के या किसी और धर्म के । गाँव व मोहल्लों में टी वी देखने पर पाबंदी लगाने वालों का भी नाम आना चाहिये, स्त्रियों को जबरन सिर या मुँह ढकने पर मजबूर करने वालों की भी भर्त्सना होनी चाहिये । तभी सिद्ध होगा कि आप सब असहिष्णुओं का विरोध करते हैं ।
    घुघूती बासूती
    पुनःश्च : टी वी पर समाचार दिखाया जा रहा था कि किसी नए नाम वाली हिन्दुओं की रक्षा करने वाली संस्था ,गुट या जो भी हो, ने नामों की एक लिस्ट जारी की है ,( लगता है खिमायनी से सीखे हैं, नहीं नहीं कार्टून वाले किस्से से सीखे हैं ),लिस्ट में दिये लोगों को मारने पर २५ लाख रूपये मिलेंगे । लेने किसके पास जाना है यह पता नहीं दिया । अब तो हमारे कानों की क्या नाक की भी खैर नहीं । चलिये लग जाइये मरोड़ने !
    घुघूती बासूती

    Reply
  • 2. अभय तिवारी  |  May 23, 2007 at 12:59 am

    रियाज़.. घुघूती जी की बातों को गम्भीरता से सोचिये.. उन्होने कहा है तो आप निश्चित चूक कर रहे हैं..

    Reply
  • 3. yogesh samdarshi  |  May 23, 2007 at 5:16 am

    घूघुती जी से मेरी भी सहमति है

    Reply
  • 4. avinash  |  May 23, 2007 at 5:35 am

    घुघुती जी और अभय जी, आप दोनों सही कह रहे हैं… और रियाज़ और हमारी सबकी मंशा भी यही है। क्‍योंकि जब हम नामवर सिंह, चंद्रमोहन के संदर्भ में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की बात करते हैं- तो उसका यह निहितार्थ नहीं होता कि हम हजरत के कार्टून बनाने वालों का विरोध करनेवालों और रूश्‍दी की किताब पर पाबंदी लगाने वाली सरकार के साथ खड़े हैं। डेरा सच्‍चा सौदा और अकालतख्‍त का विवाद धर्म की जंग नहीं, राजनीति की साज़‍िशों का विवाद है- इससे किसी को कोई असहमति नहीं सकती। लेकिन संभव है, रियाज़ या हमें ये पूरा मामला समझने में अभी वक्‍त लगाना होगा और नामवर-चंद्रमोहन का संदर्भ ज्‍यादा समझ में आता होगा। इसलिए ज़रूरी नहीं कि एक संदर्भ उठाते हुए हम तमाम दूसरे संदर्भों का सामान्‍य ज्ञान बताएं। बल्कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की लड़ाई का एक संदर्भ दूसरे कई संदर्भों को मदद पहुंचाता है। साथ ही मुझे ये भी लगता है कि एक संदर्भ उठने पर अगर आप कहते हैं कि दूसरे संदर्भ भी उठने चाहिए, तो ये मंशा मुझे सही नहीं लगती, क्‍योंकि हर आदमी मसले उठाने के लिए अपनी संवेदनात्‍मक तीव्रता के साथ आज़ाद है… (बकौल अभय तिवारी)।

    Reply
  • 5. Reyaz-ul-haque  |  May 23, 2007 at 6:54 pm

    आप सभी असहिष्णुओं के कान समान रूप से उमेठते तब शायद हमारे कान यह दर्द आसानी से सह लेते

    घुघूती बासूती जी
    इसका मतलब हम यह क्यों न लगायें कि आप सिर्फ़ कान उमेठने में ही यकीन रखती हैं न कि सवालों के जवाब देने में. आपको ईर्ष्या है कि हम दूसरों की निंदा क्यों नहीं कर रहे (अगर कर दें तो शायद आप हमसे सहमत हो जायें, जैसा आप लिखती भी हैं). मगर आप एक कमजोर ज़मीन पर खडी़ हैं.
    आप कैसे दुनिया के तमाम असहिष्णुओं को आपस में विलगा कर देख सकती हैं. अविनाश भाई ने सही लिखा है कि जब हम इस तरह की कोई बात करते हैं तो हमारा मतलब तमाम तरह की असहिष्णुताओं से होता है. मगर क्या यह ज़रूरी है कि कोई लेख लिखते वक्त हम उसके साथ एक सूची भी संलग्न करें कि यह लेख इन तमाम मुद्दों पर है और इन तमाम लोगों के खिलाफ़ लिखा गया है? आप जानती हैं कि यह हास्यास्पद होगा.
    रही बात गुजरात की. कोई चीज़ इतिहास में क्या थी इससे उसका मूल्यांकन वर्तमान में नहीं होता बल्कि वह आज क्या है और अपने समय पर वह किस तरह के दाग (निशानी) छोड़ रही है, इससे होता है.
    गुजरात ने पारसियों के साथ क्या किया यह आज कोई मुद्दा है ही नहीं बल्कि आज का मुद्दा तो यह है कि वह वहां के मुसलमानों के साथ क्या कर रहा है, और उसके बारे में लोगों के विचार इसी तथ्य पर बनेंगे.
    हमारा कहना है कि देश में सबको बोलने, लिखने, सोचने का अधिकार है. और यह कोई फ़ासिस्ट गिरोह नहीं तय कर सकता कि हम क्या बोलें, क्या सोचें, क्या लिखें.

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