Archive for May 23, 2007

आइए, हम अंधेरे समय से बाहर निकलें

हम अंधेरे समय में रह रहे हैं. यहां बोलने, सोचने, लिखने, फ़िल्में बनाने और किसी के बारे में कोई राय व्यक्त करने पर भी लगभग अघोषित पाबंदी है. हमारे सामने एक तरफ़ छत्ती़सगढ़ की मिसाल है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को उग्रवादियों से सांठ-गांठ होने के एक बेहद ढीले-ढाले आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है तो दूसरी ओर नामवर सिंह जैसे वरिष्ठ आलोचक को इसलिए अदालत में तलब किया जाता है कि उन्होंने एक घटिया और अप्रासंगिक हो चुके कवि की असलियत बता दी. हम उसी देश में रह रहे हैं जहां पेंटरों को मनमाने तरीके से तबाह करने की हर कोशिश की जाती है और फ़िल्मों के लिए एक पूरे के पूरे राज्य के दरवाजे बंद कर दिये जाते हैं. हम नहीं जानते कि किसी एक देश में कब एक साथ इस तरह का आतंक कायम किया गया हो. और वह भी आज़ादी और लोकतंत्र की बहरी कर कर देनेवाली नारेबाजी के साथ. और ऐसे में घुघूती बासूती जी का आग्रह है कि हम जब इस अंधे समय के खिलाफ़ बोलें तो दुनिया के इतिहास के हर अंधे समय के खिलाफ़ भी बोलें. हम नहीं जानते कि कोई कैसे अंधे समय को अंधे समय से अलग कर सकता है. हम जब एक अंधेरे के खिलाफ़ बोलते हैं तो हमारी आवाज़ दुनिया की तमाम अंधेरी ताकतों और तारीख के तमाम स्याह पन्नों को खिलाफ़ भी होती है. और जब वे ऐसा कोई आग्रह करती हैं तो हमें उनकी नीयत पर संदेह करना चाहिए. हमें बहस के समकालीन मोर्चों को भोथडा़ होने से बचाना चाहिए. जारी बहस को आगे बढाते हुए नामवर सिंह-पंत मुद्दे और उसके संदर्भ में लेखकों की आज़ादी पर हम आज दो लेखको के विचार दे रहे हैं. इनमें से एक तो अरुंधति राय के हाल ही में आये एक इंटरव्यू का अंश है जो हाशिया पर भी प्रकाशित किया गया था. हम कल भी हाज़िर होंगे पटना के कुछ बडे लेखकों के साथ.

अरुंधति राय
एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सकता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध करते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन करने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था. हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार समेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं.

संतोष सहर भाकपा माले से जुडे़ और एक बेहद खामोश लेखक हैं. हंस, समकालीन जनमत, संप्रति पथ और फ़िलहाल जैसी पत्रिकाओं में छपने के बावजूद वे लिखने के मामले में बहुत सुस्त रहते हैं. वे जसम से जुडे़ रहे हैं.

संतोष सहर
नामवर सिंह ने सुमित्रानंदन पंत के बारे में जो टिप्पणी कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. ये बातें कहीं लिखित रूप में हों तब बात दूसरी है. क्योंकि ऐसा माना जा सकता है कि वे उनके विचार हैं. लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर ऐसा बोलना विवादों में रहने की मानसिकता को दरसाता है. जब उनसे पूछा जायेगा तो हो सकता है वे अपने कहे से मुकर जायें.
हिंदी साहित्य की अपनी एक लंबी परंपरा रही है. इसमें हर तरह की चीजें हैं. कुछ जनपक्षीय हैं तो कुछ क्रांतिकारी भी. किसी भी लेखक या साहित्यकार का निरंतर विकास होता ही है. इसलिए पहले लिखित साहित्य को कूड़ा
कहना कहीं से भी ठीक नहीं है. फिर चाहे वह पंत जी के संदर्भ में बात कही गयी हो या तुलसीदास के बारे में. हां कम या ज्यादा के पैमाने पर इसका मूल्यांकन किया जा सकता है.
सुमित्रानंदन पंत छायावाद के पहले लेखक माने जाते हैं और छायावाद का संबंध हिंदी साहित्य में प्रगतिशील साहित्य से बिलकुल स्पष्ट रूप सें जुड़ा हुआ है. छायावाद के चार स्तंभ कहे जाने में प्रसाद सबसे पहले पायदान पर आते हैं. यह भी सच है कि छायावाद की सबसे कमजोर कड़ी पंत जी ही माने जाते हैं. लेकि न इसका मतलब कहीं से भी यह नहीं निकाला जा सकता है कि उनका शुरुआती साहित्य कूड़ा था.
साहित्य में इन बातों पर बहस की जा सकती है. इसके जरिये सही विचारों को भी सामने लाया जा सकता है. अदालत का हस्तक्षेप इसमें सही जान नहीं पड़ता है. साहित्य की चीजों को साहित्य के अंदर ही सुलझा लेना चाहिए. बाहरी हस्तक्षेप बेमानी है. क्योंकि इससे कोई ठोस हल नहीं निकलेगा. आज जरूरत है साहित्य के सम्यक विवेचन की. नामवर सिंह की आदतों में शामिल है कि वे कहीं भी किसी विषय पर टिप्पणी कर देते हैं. साहित्य का मूल्यांकन करना तो उन्होंने लगभग छोड़ दिया है. वे खुद ही कहते हैं कि आजकल की कविता उनकी समझ से बाहर की चीज है. समकालीन कविताएं उन्हें रास नहीं आती हैं. इसलिए भी उन्होंने कविताओं के मूल्यांकन से अपना पल्ला झाड़ लिया है. मेरे कहने का मतलब है कि ऐसा कह कर उन्होंने खुद ही अपने लिए सीमाएं निर्धारित कर ली हैं. इसलिए अच्छा तो यही होगा कि वे अपनी सीमा में ही रहें और उल्टी-सीधी टिप्पणी से बचें.

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May 23, 2007 at 11:10 pm 1 comment

आइए, हम अंधेरे समय से बाहर निकलें

हम अंधेरे समय में रह रहे हैं. यहां बोलने, सोचने, लिखने, फ़िल्में बनाने और किसी के बारे में कोई राय व्यक्त करने पर भी लगभग अघोषित पाबंदी है. हमारे सामने एक तरफ़ छत्ती़सगढ़ की मिसाल है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को उग्रवादियों से सांठ-गांठ होने के एक बेहद ढीले-ढाले आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है तो दूसरी ओर नामवर सिंह जैसे वरिष्ठ आलोचक को इसलिए अदालत में तलब किया जाता है कि उन्होंने एक घटिया और अप्रासंगिक हो चुके कवि की असलियत बता दी. हम उसी देश में रह रहे हैं जहां पेंटरों को मनमाने तरीके से तबाह करने की हर कोशिश की जाती है और फ़िल्मों के लिए एक पूरे के पूरे राज्य के दरवाजे बंद कर दिये जाते हैं. हम नहीं जानते कि किसी एक देश में कब एक साथ इस तरह का आतंक कायम किया गया हो. और वह भी आज़ादी और लोकतंत्र की बहरी कर कर देनेवाली नारेबाजी के साथ. और ऐसे में घुघूती बासूती जी का आग्रह है कि हम जब इस अंधे समय के खिलाफ़ बोलें तो दुनिया के इतिहास के हर अंधे समय के खिलाफ़ भी बोलें. हम नहीं जानते कि कोई कैसे अंधे समय को अंधे समय से अलग कर सकता है. हम जब एक अंधेरे के खिलाफ़ बोलते हैं तो हमारी आवाज़ दुनिया की तमाम अंधेरी ताकतों और तारीख के तमाम स्याह पन्नों को खिलाफ़ भी होती है. और जब वे ऐसा कोई आग्रह करती हैं तो हमें उनकी नीयत पर संदेह करना चाहिए. हमें बहस के समकालीन मोर्चों को भोथडा़ होने से बचाना चाहिए. जारी बहस को आगे बढाते हुए नामवर सिंह-पंत मुद्दे और उसके संदर्भ में लेखकों की आज़ादी पर हम आज दो लेखको के विचार दे रहे हैं. इनमें से एक तो अरुंधति राय के हाल ही में आये एक इंटरव्यू का अंश है जो हाशिया पर भी प्रकाशित किया गया था. हम कल भी हाज़िर होंगे पटना के कुछ बडे लेखकों के साथ.

अरुंधति राय
एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सकता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध करते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन करने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था. हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार समेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं.

संतोष सहर भाकपा माले से जुडे़ और एक बेहद खामोश लेखक हैं. हंस, समकालीन जनमत, संप्रति पथ और फ़िलहाल जैसी पत्रिकाओं में छपने के बावजूद वे लिखने के मामले में बहुत सुस्त रहते हैं. वे जसम से जुडे़ रहे हैं.

संतोष सहर
नामवर सिंह ने सुमित्रानंदन पंत के बारे में जो टिप्पणी कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. ये बातें कहीं लिखित रूप में हों तब बात दूसरी है. क्योंकि ऐसा माना जा सकता है कि वे उनके विचार हैं. लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर ऐसा बोलना विवादों में रहने की मानसिकता को दरसाता है. जब उनसे पूछा जायेगा तो हो सकता है वे अपने कहे से मुकर जायें.
हिंदी साहित्य की अपनी एक लंबी परंपरा रही है. इसमें हर तरह की चीजें हैं. कुछ जनपक्षीय हैं तो कुछ क्रांतिकारी भी. किसी भी लेखक या साहित्यकार का निरंतर विकास होता ही है. इसलिए पहले लिखित साहित्य को कूड़ा
कहना कहीं से भी ठीक नहीं है. फिर चाहे वह पंत जी के संदर्भ में बात कही गयी हो या तुलसीदास के बारे में. हां कम या ज्यादा के पैमाने पर इसका मूल्यांकन किया जा सकता है.
सुमित्रानंदन पंत छायावाद के पहले लेखक माने जाते हैं और छायावाद का संबंध हिंदी साहित्य में प्रगतिशील साहित्य से बिलकुल स्पष्ट रूप सें जुड़ा हुआ है. छायावाद के चार स्तंभ कहे जाने में प्रसाद सबसे पहले पायदान पर आते हैं. यह भी सच है कि छायावाद की सबसे कमजोर कड़ी पंत जी ही माने जाते हैं. लेकि न इसका मतलब कहीं से भी यह नहीं निकाला जा सकता है कि उनका शुरुआती साहित्य कूड़ा था.
साहित्य में इन बातों पर बहस की जा सकती है. इसके जरिये सही विचारों को भी सामने लाया जा सकता है. अदालत का हस्तक्षेप इसमें सही जान नहीं पड़ता है. साहित्य की चीजों को साहित्य के अंदर ही सुलझा लेना चाहिए. बाहरी हस्तक्षेप बेमानी है. क्योंकि इससे कोई ठोस हल नहीं निकलेगा. आज जरूरत है साहित्य के सम्यक विवेचन की. नामवर सिंह की आदतों में शामिल है कि वे कहीं भी किसी विषय पर टिप्पणी कर देते हैं. साहित्य का मूल्यांकन करना तो उन्होंने लगभग छोड़ दिया है. वे खुद ही कहते हैं कि आजकल की कविता उनकी समझ से बाहर की चीज है. समकालीन कविताएं उन्हें रास नहीं आती हैं. इसलिए भी उन्होंने कविताओं के मूल्यांकन से अपना पल्ला झाड़ लिया है. मेरे कहने का मतलब है कि ऐसा कह कर उन्होंने खुद ही अपने लिए सीमाएं निर्धारित कर ली हैं. इसलिए अच्छा तो यही होगा कि वे अपनी सीमा में ही रहें और उल्टी-सीधी टिप्पणी से बचें.

May 23, 2007 at 5:52 pm 1 comment


calander

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