Archive for May 25, 2007

वे अब किसके लिए आयेंगे ?

हम पहले भी बता चुके हैं, किस तरह देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबायी जा रही है. डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी के बाद छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के अध्यक्ष राजेंद्र सायल को भी गिरफ़्तार कर लिया गया है. बहुचर्चित शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड मामले में अदालत के फैसले पर टिप्पणी करने के आरोप में उनको आज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। लगभग नौ साल पहले की गई इस टिप्पणी पर जबलपुर हाईकोर्ट ने उन्हें छ: माह की सजा सुनाई थी। श्री सायल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील करने पर सजा की अवधि कम कर एक सप्ताह तय कर दी गई। विस्तार से जानें देशबंधु पर. यहां हम डा विनायक सेन की गिरफ़्तारी पर देशबंधु में छपे अनिल चमड़िया के आलेख को पुनर्प्रस्तुत कर रहे हैं. हम इस मुद्दे को भी नामवर सिंह, चंद्रमोहन, हुसेन आदि मामलों से अलग कर के नहीं देख रहे.

डॉ. विनायक सेन का सिलसिला नहीं रूका तो…

अनिल चमड़िया
दिल्ली के प्रेस क्लब में पूर्व न्यायाधीश राजिन्दर सच्चर, वकील प्रशांत भूषण, लेखिका अरूंधति राय, जेपी आंदोलन के नेता अख्तर हुसैन, विधायक डॉ. सुनीलम और दूसरे कई लोग मीडिया वालों से यह अनुरोध कर रहे थे कि छत्तीसगढ़ में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी की सूचना छापने की कृपा करें। उन्हें चौदह मई को बिलासपुर में जन सुरक्षा विशेष कानून 2005 और गैर कानूनी गतिविधि रोधक कानून 1967 के तहत गिरफ्तार किया गया था। डॉ. विनायक सेन पहले दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में डॉक्टर थे। लेकिन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नेता शंकर गुहा नियोगी के आंदोलन के प्रभाव में आकर वे आदिवासियों के बीच वहां जाकर काम करने लगे। कामगारों द्वारा चलाए जाने वाला शहीद अस्पताल खड़ा किया। इन दिनों खासतौर से यह देखा जाता है कि मीडिया के पत्रकारों की मानसकिता कामगारों की तरह नहीं रही। वे अधिकारियों की तरह सोचते और हुक्म देते हैं। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के संबंध में भी उन्हाेंने पुलिस के आरोपों की तरफ से सोचना शुरू किया। इसीलिए उनके भीतर लोकतंत्र के मूल्य बोध को जगाने की कोशिश करनी पड़ रही है। एक व्यापारी पीयूष गुहा ने पुलिस द्वारा खुद को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखे जाने के दौरान यह बयान दिया है कि डॉ. विनायक सेन का माओवादियों से रिश्ता हैं। स्टिंग आपरेशन में फंसे छत्तीसगढ़ के एक सांसद संसद भवन में तो यह तक कह रहे थे कि उन्हें पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने बताया है कि उनके पास पक्के सबूत हैं। रायपुर जेल तक उड़ाने की योजना थी। इसीलिए एक बड़े नक्सलवादी को (संभवत: नारायण सन्याल) को वहां से बिलासपुर की जेल में भेज दिया गया है। पिछले पचास-साठ वर्षों में ऐसे न जाने कितने उदाहरण मिल सकते हैं जिसमें कि सरकार और पुलिस ने लोगों के लिए लड़ने वाले या लोकतंत्र के पक्ष में बोलने वालों के खिलाफ तरह-तरह के आरोपों में मुकदमें लादे हैं। कांग्रेस की सरकारों ने शासन के ढांचे को इस दिशा में मजबूत किया। इंदिरा गांधी तानाशाही तक पहुंच गईं। आपातकाल लगाया। देश के बडे-बड़े नेताओं को बड़ौदा डायनामाइट कांड में फंसाया था। सरकार अपने विरोधियों को पकड़वाने के बाद हमेशा ही कहती है कि उसके पास पुख्ता सबूत हैं। लेकिन इस देश में क्या कभी देश के किसी बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ पुख्ता सबूत साबित हो सकें?
यहां इस बात से ज्यादा चिंता हो रही है कि सरकारी मशीनरियां तेजी से फासीवाद की तरफ बढ़ रही हैं। आपातकाल लगा तो विरोध हुआ। न्यायपालिका ने घुटने टेके। लेकिन मीडिया के कम से कम एक हिस्से ने तो लड़ाई लड़ी। कई पत्रकार जेल गए। संसदीय राजनीतिक पाटयों से लेकर नक्सलवादियों तक ने तानाशाही के खिलाफ एकजुटता दिखाई। लेकिन आपातकाल के बाद सत्ता मशीनरी ने दमन के साथ-साथ उसके विरोध की ताकतों को तरह-तरह से अलग-थलग किया और अब अमेरिकी शासन शैली को स्वीकृति मिलने के बाद तो वह आक्रमकता की स्थिति में आ गई है। मीडिया की पूरी मानसिकता इस तरह से तैयार की जा रही है कि वह सरकारी मशीनरी की तरह सोचे। वह लोकतंत्र का कोई सवाल ही नहीं खड़ा करें। सरकारी नीतियों की वजह से संघर्ष की परिस्थितियां खड़ी हो तो वह नीतियों के बजाय संघर्ष को विकास विरोधी बताने की मुहिम में शामिल हो। संघर्षों को राष्ट्र विरोधी तक करार करने के तर्कों में मददगार हो। शासन व्यवस्था के पास एक बड़ा हथियार पहले ही मौजूद है। किसी संघर्ष को हिंसक बताकर उसे कानून एवं व्यवस्था के समस्या के रूप में खड़ी करे। वह शांति की एकतरफा जिम्मेदारी स्थापित करने में कामयाब होती रही है। इस गणतांत्रिक ढांचे में यह भी किया गया है कि राय और केन्द्र की नीतियों को एक रूप करने के तरीके खोजे गए। छत्तीसगढ़ की सरकार जब दमन करे तो केन्द्र सरकार कानून एवं व्यवस्था को राय का विषय बता दे और जब छत्तीसगढ़ में कानून एवं व्यवस्था के नाम पर दमन की कार्रवाइयां चलाने के लिए फौज की जरूरत हो तो केन्द्र सरकार उसे अपना राष्ट्रीय और संवैधानिक कर्तव्य बताए। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल से एक प्रतिनिधिमंडल मिला तो उन्होंने कहा कि ये छत्तीसगढ़ का मामला है और वे केवल सरकार को लिखकर पूछ सकते हैं। प्रतिनिधिमंडल चाहें तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायालय में जा सकता है। देश का गृहमंत्री किन मामलों में लाचार दिखने लगा है?
छत्तीसगढ़ एक ऐसा उदाहरण है जहां संसदीय लोकतंत्र में संस्थाओं के स्तर पर दिखने वाले भेद मिट गए हैं। छत्तीसगढ़ आदिवासियों के राय के रूप में अलग हुआ। आदिवासी विधायक बहुमत में चुनाव जीते लेकिन सरकार का नेतृत्व गैर आदिवासी करता है। भाजपा की सरकार है और सलवा-जुडूम कांग्रेस के नेतृत्व चलता में हैं। सलवा-जुडूम के जुर्मों के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग चुप है। न्यायालय में इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने वहां की स्थितियां बयान की है। अनुभव रहा है कि सत्ता मशीनरी जिस संघर्ष को राष्ट्र विरोधी, विकास विरोधी और हिंसक के रूप में स्थापित करने के तर्कों को समाज के मध्य वर्ग तक ले जाने में सफल हो जा रहा है तो उसके खिलाफ तमाम संस्थाओं की राय एक सी बन जाती है। सरकारी मशीनरियों को कौन सा एक आक्रमक विचार संचालित कर रहा है?
छत्तीसगढ़ में जन सुरक्षा विशेष कानून 2005 बना है, वह पोटा से भी ज्यादा दमनकारी है। लेकिन उसे लेकर कोई मतभेद छत्तीसगढ़ की दोनों सत्ताधारी पाटयों के बीच नहीं दिखा। दरअसल कांग्रेस और भाजपा की नीतियों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। कांग्रेस ने जो दमनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया है, भाजपा उसका इस्तेमाल ही नहीं करना चाहती है बल्कि उसे और मजबूत करना चाहती है। कांग्रेस ने टाडा लगाया तो भाजपा ने पोटा लगाया। पोटा खत्म किया तो राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर गैरकानूनी गतिविधि रोधक कानून 1967 में उसके प्रावधानों को जोड़ दिया गया। दोनों ही पाटयों का सामाजिक, आथक और राजनीतिक आधार एक है। कांग्रेस के जमाने में जिस तरह से दलितों और आदिवासियों को नक्सलवादी के नाम पर मारा गया है उसी तरह से भाजपा शासित रायों में भी मारा गया है। छत्तीसगढ़ में सलवा-जुडूम की ज्यादतियों को लेकर देश के उन बड़े अधिकारियों एवं न्यायाधीशों ने कई कई रिपोटर्ें पेश की हैं जो भारत सरकार के महत्वपूर्ण ओहदे पर रह चुके हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने वाले प्रोफेसर्स, पत्रकारों, वकीलों ने बताया कि कैसे छत्तीसगढ़ में आदिवासी मारे जा रहे हैं। अमेरिका ने कहा था कि जो हमारे साथ नहीं है वह आतंकवाद के साथ है। छत्तीसगढ़ में इसी वाक्य को दोहराया गया कि जो सलवा-जुडूम के साथ नहीं है वो माओवादियों के साथ है। जब राजनैतिक सत्ता इस तरह से आक्रमक हो जाए तो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है। यहां तो सरकार के साथ हां में हां नहीं मिलाने वाले सभी के सभी माओवादी माने जा सकते हैं। संसदीय लोकतंत्र का ढांचा इस तरह का समझा जाता रहा है कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों और मूल्यों पर हमलों पर अंकुश लगाने की गुंजाइश रहती है। लेकिन अनुभव बताता है कि पूरा ढांचा एकरूप हो चुका है। ऐसी स्थितियों के लिए ही मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। मीडिया भी जब सरकारी संस्थाओं की तरह सोचने लगे तो लोकतंत्र में लोग अपनी बात कहने के लिए कहां जा सकते हैं? जब लोकतंत्र ही नहीं बचेगा तो मीडिया अपनी ताकत को कैसे बचाकर रख सकेगा। लोकतंत्र एक सिद्धांत है और यह सोचना कि वह किसी मामले में तो लोकतंत्र की आवाज उठाएगा और किसी में नहीं तो वह गफलत में है। स्टार न्यूज के मुंबई दफ्तर पर हमले के बाद पिछले दिनों दिल्ली के प्रेस क्लब में हुई विरोध सभा में चंद ही लोग जमा हो सके।
लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए पिछले वर्षों में जो कुछ हासिल किया उस पर तेजी से हमले हो रहे है। लोकतंत्र के मूल्यों पर हमले के लिए राष्ट्रवाद और शांति की आड़ ली जाती है। सत्ता मशीनरी बराबर इस किस्म की दुविधा पैदा करने की कोशिश करती है। राष्ट्र चाहिए या लोकतंत्र? लेकिन जागरूकता इसी में सिद्ध होती है कि वह दो में से एक के चुनाव करने के प्रश्न के तरीके को ही ध्वस्त कर दे। राष्ट्र अपनी व्यवस्था के लिए जाना जाता है। राष्ट्र की जब व्यवस्था ही लोकतांत्रिक नहीं होगी तो उसका क्या अर्थ रह जाता है? लगातार शांतिपूर्ण संघर्षों की उपेक्षा जानबूझकर की जा रही है। उन बुद्धिजीवियों को ठिकाने लगाने का है जो जन संघर्षों के साथ रहते हैं। छत्तीसगढ़ भारतीय समाज व्यवस्था की भविष्य की नीति की जमीन तैयार कर रहा है। देश का बड़ा हिस्सा आदिवासियों जैसा ही होता जा रहा है। यह सोचना कि वहां आदिवासी मारे जा रहे हैं, ऐसा नहीं है। आदिवासी जैसे हालात में रहने वाले लोग मारे जा रहे हैं।

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May 25, 2007 at 1:17 am Leave a comment

गुजरात बनता सारा देश

जब-जब फ़ासीवाद समाज, कला और राजनीति को खरोंचने की कोशिश करता है, याद आती है पिकासो की गुएर्निका. यह आज भी गुजरातों और केसरिया फ़ासीवाद समेत सभी तरह के फ़ासीवाद के खिलाफ़ लडा़ई में हमारे लिए रोशनी की मीनार की तरह है.

अपने समय के कई सवाल हमारे समय जवाब के इंतज़ार में हैं. क्या हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बंधक समय में यों ही रहते रहेंगे? क्या इस समय से निकलने का रास्ता नहीं? क्या सारा देश इसी तरह गुजरात में बदलता रहेगा और हम अपने दड़बों में सिकुडे़ सहमे बैठे रहेंगे? क्या इस गुजरात का मुकाबला करने का समय अब नहीं आ गया है? क्या इस देश की बहुप्रचारित आज़ादी का यही मतलब रह गया है कि भगवाधारी अपना मध्ययुगीन कचडा़ हम पर उंडे़लते रहें, पूरे देश को एक भयावह मोदीयुग में धकेलते रहें और देश का पूरा ढांचा उसके आगे दंडवत हो जाये? जैसा अपूर्वानंद जी ने सवाल उठाया है क्या आज गा़लिब होते, कबीर होते, मीरां होतीं तो हम उन्हें यों ही अदालतों में घसीटते और अदालतें यह तय करतीं कि गालिब कौन-सा दोहा लिखें और कौन जला दें, मीरां क्या गायें और क्या न गायें और गा़लिब की कौन-सी गज़ल आपत्तिजनक है? आप भले इससे इनकार करें, हम ठीक ऐसे ही दौर से गुज़र रहे हैं. और हमें अपने समय के इन सवालों से कतरा कर निकलने के बजाय उनसे जूझने की ज़रूरत है.

तर्क और तरकश
अपूर्वानंद

क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है?

भारतीय न्याय व्यवथा की आरंभिक इकाइयों की निगाह में नामवर सिंह, एमएफ हुसेन और चंद्रमोहन एक मायने में समान हैं. अलग-अलग जगहों पर निचली अदालतों ने तीनों को ही अलग-अलग मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 295ए के तहत मुकदमों में हाजिर होने का हुक्म सुनाया है. इन धाराओं का संबंध में ऐसे अपराध से है, जो विभिन्न समुदायों के बीच धर्म, नस्ल, जन्मस्थल, निवास, जाति या समुदाय के आधार पर शत्रुता पैदा करने और सौहार्द बिगाड़ने की नीयत से और किसी समुदाय के धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के लिए जान-बूझ कर द्वेषपूर्ण कृत्य के रूप में किया गया हो.
हुसेन पर कई शहरों की निचली अदालतों में इन धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज हुए और हर जगह से उन्हें अदालत में पेश होने का हुक्म सुनाया गया. ध्यान देने की बात यह है कि इन धाराओं में वर्णित अपराधों की सुनवाई प्रथम श्रेणी मजिस्टेट द्वारा की जानी होती है और ये गैर-जमानती हैं. पुलिस को मामले की तहकीकात करनी ही होगी. विधिवेत्ता राजीव धवन के अनुसार ऐसे मामले में पुलिस को गिरफ्तार करने का हक है, लेकिन जमानत देने का अधिकार नहीं है. हालांकि गिरफ्तारी की अवधि साठ दिनों की है, लेकिन धवन के मुताबिक उस व्यक्ति को दिमागी, शारीरिक और आत्मिक नुकसान हो ही चुका होता है. 2006 के पहले ऐसे मामलों में आगे बढ़ने के पहले राज्य की अनुमति जरूरी होती थी. पर 2006 में उच्च्तम न्यायालय ने पैस्टर राजू बनाम कर्नाटक राज्य के मुकदमे में कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस निर्णय को पलट दिया, जिसके हिसाब से तहकीकात के दौरान, पुलिस अभियुक्त को हिरासत में नहीं ले सकती. इसके चलते अब हुसेन हों या चंद्रमोहन या नामवर सिंह, गिरफ्तारी का खतरा तीनों पर है.
हुसेन अब तक किसी मामले में गिरफ्तार नहीं हुए हैं, लेकिन पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली और मुंबई पुलिस को उनके खिलाफ मुनासिब कार्रवाई के आदेश देने के बाद यह खतरा उन पर बढ़ तो गया ही है. महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा के कला संकाय के अंतिम वर्ष के छात्र चंद्रमोहन को छह दिनों तक हिरासत में रहना पड़ा. नामवर सिंह को अभी बनारस के मजिस्ट्रेट ने अपने सामने हाजिर होने को कहा है.
नामवर सिंह ने पिछले दिनों बनारस में आयोजित किसी गोष्ठी में सुमित्रानंदन पंत की एक चौथाई रचनाओं को कूड़ा कहा, ऐसा बताते हैं. इससे पंत जी के समर्थकों या उपासकों की भावनाओं को चोट पहुंची. जख्म इतना गहरा था कि वे अदालत तक नामवर सिंह के खिलाफ गुहार लगाने पहुंच गये. जिन्होंने भी इस लायक समझा कि मामला दर्ज किया जाये, वे निश्चय ही आहत भावनाओं के प्रति सहानुभूतिशील होंगे. न्यायिक प्रावधानों का इतने हास्यास्पद ढंग से दुरुपयोग भारत में सभ्य विचार-विमर्श को किस तरह के झटके दे सकता है, इसका अनुमान संबंधित न्यायिक अधिकारियों को शायद नहीं है. अमर्त्य सेन भारत को तर्क करनेवालों की परंपरा का देश कहते हैं. उनकी इस गर्वपूर्ण उक्ति पर पिछले सालों में जिम्मेदारी की जगह से होनेवाले ऐसे फैसलों की वजह से निश्चय ही सवालिया निशान लग गया है. चंद्रमोहन पर हमले के बाद हमलावर द्वारा ही की गयी शिकायत के बाद उसे गिरफ्तार कर लेना अत्यंत ही गंभीर घटना थी.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने ठीक ही सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा को नोटिस जारी किया और पूरे मामले पर रिपोर्ट मांगी. कुछ लोग इसे केंद्रीय हस्तक्षेप के रूप में देखेंगे, लेकिन वडोदरा का मामला लितना कला और अभिव्यक्ति पर आक्रमण का नहीं था, उतना एक अकादेमिक संस्था का खुद को विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल जैसे आततायियों के सुपुर्द कर देने का था. प्रासंगिक प्रश्न यह है कि कला संकाय में होनेवाले इम्तहान में कौन-सा छात्र कौन-सी कृति प्रविष्टि के रूप में देने जा रहा है, यह खबर बाहर कैसे गयी? यह अधिकार क्या किसी को दिया जा सकता है कि वह परीक्षा कक्ष में घुस जाये? क्या इम्तहान में लिखे जाने या दिये जानेवाले उत्तरों पर परीक्षक के अलावा किसी को टिप्पणी करने का हक है? ये वे आरंभिक प्रश्न हैं जो चंद्रमोहन के मामले में संबंधित न्यायिक अधिकारी को पूछने चाहिए थे, पर शायद पूछे नहीं गये. हुसेन के मामले में भी मामला दर्ज करने के पहले यह पूछा जा सकता था कि क्या वे सार्वजनिक प्रचार सामग्री तैयार कर रहे थे. कलाकृतियों को क्या सार्वजनिक बयान या भाषण के बराबर का दर्जा दिया जाना उचित है? किसी निजी-संग्रह में या सीमित पहुंचवाली कला दीर्घा में लगी कलाकृति को क्या दो समुदायों के बीच विद्वेष भड़काने के उद्देश्य से प्रेरित बताना तर्कपूर्ण है?
नामवर सिंह के खिलाफ दर्ज मामला चंद्रमोहन या हुसेनवाले मामलों की श्रेणी का नहीं क्योंकि पहले दोनों ही प्रसंगों में संघ से जुड़े संगठन की योजना है, जबकि नामवर सिंह के प्रसंग में ऐसा नहीं है. लेकिन तीनों के ही सिलसिले में यह प्रश्न तो प्रसंगिक है ही: क्या हमारे देश में सार्वजनिक विचार-विमर्श या व्यक्तिगत रचनाशीलता के लिए स्थान घटता जा रहा है? क्या 21वीं सदी में गालिब का होना खतरनाक नहीं? क्या वे धर्म और धर्मोपदेशक की खिल्ली उड़ाने को स्वतंत्र होंगे? उसी प्रकार क्या प्रेमचंद या हरिशंकर परसाई का लेखन अबाधित रह पायेगा? मजाक उड़ाना, व्यंग्य करना कला और साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा रहा है. कलाकार अपनी ही मूर्ति बनाता और ढालना नहीं है, वह बने बनाये गये बुतों को ध्वस्त कर सकता है. अगर बुतपरस्ती वह करता है, तो बुतशिकन भी उसे होना ही होगा. पर क्या हमारे दौर में कला के क्या रचना के स्वभाव से अंतर्भूत बुतशिकनी की इजाजत है?

क्या अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब परीक्षा भवनों में, अखबारों में संपादकों के कक्ष में, फिल्मों में सेट पर, गानों के स्टूडियो में ऐसे लोग बैठे रहेंगे जो लिखे जानेवाले उत्तरों, संपादक के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट, फिल्मों के दृश्यांकन और गानों के बोल की निर्माण के स्तर पर ही चौकसी करेंगे और उनमें काट-छांट करेंगे? या क्या वह समय पहले ही नहीं आ पहुंचा है? आखिरकार, दीपा मेहता अपनी फिल्म वाटर भारत में नहीं बना सकीं, हुसेन लंबे समय से भारत से निर्वासन में हैं, कला दीर्घाओं के मालिक गुजरात में ही नहीं, अन्यत्र भी कलाकारों को असुविधाजनक कलाकृतियां प्रदर्शित न करने की भद्र सलाह दे रहे हैं. जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी किताब पर अदालत द्वारा पाबंदी हटाये जाने के बाद भी शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के आक्रामक बयानों पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.
क्या तर्क वागीशों का यह देश मूर्खता के प्रदेश में बदल रहा है? 1857 के 150वें, भगत सिंह के 100वें और आजादी के 60वें साल में यह दुर्भाग्यपूर्ण प्रश्न हमारे सामने है.

अपूर्वानंद जी का यह आलेख जनसता के 23 मई के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ है. वहां से साभार.

May 25, 2007 at 12:40 am Leave a comment


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