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भारत के बारे में सबसे बड़ा भ्रम है कि यहां लोकतंत्र है : अरुंधति राय

हम इस बातचीत का पहला हिस्सा पढ़ चुके हैं. प्रस्तुत है दूसरा हिस्सा. प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय से बात की है वैभव सिंह ने.
भारत का लोकतंत्र किन सीमाओं और खतरों का शिकार है? क्या जनमत निर्मित कर इस लोकतंत्र को कामयाब बनाया जा सकता है?

दरअसल, भारत के बारे में सबसे बड़ा भ्रम है कि यहां लोकतंत्र है और इस भ्रम को साम्राज्यवादी चिंतन के प्रभाव में रहनेवाली मीडिया भी दिन-रात प्रचारित करती है. यहां विरोध को भी बड़ी आसानी से पचा लिया जाता है. जिस तरह ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्च्न को मीडिया भुनाती है उसी तरह अरुंधति राय को भी स्टूडियो में बुला कर उसे अपने विचारों को रखने का मौका दिया जाता है, क्योंकि दुनिया को दिखाना है कि देखिए हम कितने लोक तांत्रिक हैं. हम एक क्रू ड नहीं बल्कि सॉफिस्टिके टेड समय से गुजर रहे हैं, जहां हर विरोध को खूबसूरती से पहले दिखाया जाता है और फिर उसे दुत्कार दिया जाता है. उन्हें बिग स्टोरीज चाहिए अपने बिजनेस के लिए और बदकिस्मती से लोगों के रोजाना के संघर्षों में उन्हें कुछ भी नया और सनसनीखेज नजर ही नहीं आता. गरीबों के नाम पर जतायी जानेवाली हमदर्दी (पॉलिटिक्स ऑफ पिटी) भी बड़ी खतरनाक होती है और एनजीओ व मिशनरीज इस हमदर्दी जताने की घटिया राजनीति का सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं. उनके द्वारा कई बार एम्पावरमेंट शब्द का इस्तेमाल होता है, जिसके राजनीतिक निहितार्थ बड़े खतरनाक हैं. एम्पावरमेंट के जरिये कमजोर वर्गों को रिप्रजेंट करने का दावा किया जाता है और पैसा कमाया जाता है, जबकि हमें सही अर्थों में लोगों को पावरफुल बनाने की ओर ध्यान देना चाहिए. प्राइवेट सेक्टर लोगों को खुश रखने के लिए पीपुल्स कार तो बना रहा है, लेकिन लोगों को पीने का पानी और खाना कहां से मिलेगा, इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है.

बिजनेस व आर्थिक नीतियों से जुड़े सभी फैसले पूरी तरह राजनीतिक होते हैं, लेकिन उन्हें राजनीति से अलग दिखाने की कोशिश की जाती है. ऐसे फैसलों के प्रतिरोध के लिए कौन से साधन अपनाये जा सकते हैं?

अब कहीं उम्मीद है तो सताये और शोषित लोगों से ही है, जो अपनी भारी संख्या बल का लाभ विरोध करने के लिए उठा सकते हैं. इस संख्या बल का फ़ायदा उठा कर लोग गलत चीजों को खुद आगे बढ़ कर रोक सकते हैं. इसके अलावा पीपुल्स मीडिया विकसित करने के बारे में भी हमें सोचना चाहिए. पीपुल्स वॉयस के नाम पर सारे ही अखबार-चैनल अपना धंधा चमकाने की कोशिश करते हैं और बहुत बड़ा फ्रॉड करते हैं. इससे लड़ते हुए हमें कम्युनिटी रेडियो, सिनेमा और पत्रिकाओं का विकास करना चाहिए. मुख्यधारा की मीडिया के पीछे भागने की आदत छोड़नी होगी. नर्मदा बचाओ आंदोलन को मीडिया में सबसे ज्यादा कवरेज मिला, लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ. दूसरी ओर झारखंड में कोयलकारो में आदिवासियों ने सुवर्णरेखा पर बन रहे बांधों का निर्माण रोक दिया, जबकि वहां मीडिया का ध्यान भी नहीं गया था. इसी तरह ओड़िशा में गंधमर्दन में स्थानीय लोगों के विरोध के चलते बाल्को को वहां से भागना पड़ा और नंदीग्राम में सालेम को प्रचंड विरोध के आगे पसीने छूट गये. मीडिया के हालात को देखते हुए मैं खुद भी टीवी चैनलों की बहस में हिस्सा लेने नहीं जाती हूं, क्योंकि वहां लगता है कि मैं भी सर्कस की जानवरों में से एक हो गयी हूं. वहां मुझे एक शोपीस की तरह सजा कर खड़ा कर दिया जायेगा और जो मैं वास्तव में कहना चाहती हूं, वह कहने के लिए समय नहीं दिया जायेगा. हमें सिनेमा तकनीक की ओर इसलिए भी ध्यान देना होगा, क्योंकि मुख्यधारा का सिनेमा अब इंटरनेशनल एलीट के कब्जे में है. हाल में आयी गुरु फि ल्म को देखिए, जिसमें खुल कर साम्राज्यवाद का पक्ष लिया गया है. धीरू भाई अंबानी की जिंदगी से प्रेरित इस फि ल्म में शक्तिशाली बिजनेसमैनों को ऐसे दिखाया गया है जैसे वे बंधुआ मजदूर हों और राज्य के सताये हुए हों. जबकि हकीकत में यह फ़िल्म लोकल कैपिटलिज्म के पक्ष में बनायी गयी है और ऐसे उद्योगपतियों को हीरो बनाया गया है जो किसी भी तरह की जवाबदेही से बचना चाहते हैं. यानी फिल्मकार भी अब साम्राज्यवाद के सबसे बड़े कारिंदे के रूप में उभर रहे हैं और उन्हें देश के हितों की चिंता नहीं रह गयी है. फिल्मों के अलावा अब सिनेमा हॉल भी ऐसे बनाये जा रहे हैं, जहां सिर्फ अमीरों के लिए ही फिल्में चलतीं और दिखायी जाती हैं. बड़े-बड़े सिनेमा हॉलों को तोड़ कर मल्टीप्लेक्स हॉल बनाये जा रहे हैं, जहां दो-ढाई सौ रुपये से कम का टिकट नहीं होता है. यानी सिनेमा हॉलों और फिल्म निर्माताओं ने अपने दर्शक वर्ग का चुनाव क र लिया है. जो लोग इतना पैसा देकर फिल्में देखेंगे, वे कभी आम जनों की जिंदगी पर बनी फ़िल्में पसंद नहीं करेंगे. वे उन्हीं फ़िल्मों को पसंद करेंगे जो उनकी शानो शौकत और ग्लैमर में डूबी ज़िंदगी को नाटकीय अंदाज में पेश करेंगी. न्यूज चैनल भी आम सच्चाइयों से कटते जा रहे हैं, भले ही वे दिनोंदिन कितने ही बड़े होते जा रहे हों. इसीलिए मैं कहती हूं जनांदोलनों को मीडिया को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए, हमारी सारी ऊर्जा वहीं खप जाती है. हमें अब मीडिया को दिखाने के लिए कोई आंदोलन नहीं करना है, बल्कि किसी मुद्दे के प्रति गंभीरता से प्रेरित होकर आंदोलन करना चाहिए. वैसे भी, मीडिया की आदत ही किसी मुद्दे को चबा कर उसे थूक देने की है. निठारी केस में जिस गैरराजनीतिक तरीके से सारी रिपोर्टिंग हुई वह भी मीडिया के निकम्मेपन को दरसाता है. हमें अपने संघर्ष के लिए अन्य भाषाओं में लिखे साहित्य व उनके अनुवादों की मदद लेनी चाहिए.
साहित्य और संस्कृति की किसी भी समाज में दोहरी जिम्मेदारी होती है. एक ओर वे राष्ट्र के आंतरिक स्वरूप को ज्यादा लोकतांत्रिक और समानतापरक बनाने के लिए संघर्ष करते हैं, दूसरी ओर साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने का काम करते हैं. इन जिम्मेदारियों से रचनाकारों के विचलन की वजह क्या है?
साहित्य-संस्कृति के बारे में आपकी मान्यताएं सहीं हैं, लेकिन विचारधारा पर निष्ठा कायम रख पाना काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन जो लेखक , खासतौर पर भारत के अंगरेजी लेखक यूरोप में रह रहे हैं, वे साम्राज्यवाद के खिलाफ क्या लिखेंगे? उन्हें अभी छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा जिले में रहना पड़ जाये, जहां रोज जीवन-मौत का संघर्ष होता है, तो फिर से विचारधारा और साहित्य के रिश्ते समझ में आने लगेंगे. ऐसे लेखकों की जब अंतरराष्ट्रीय मीट आयोजित होती है, तो वे अपने इंडोनेशिया, कोरिया और हांगकांग के अनुभवों के बारे में बात करते हैं, लेकिन भारत के गांवों में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी उन्हें कम ही रहती है. हम क्रांतिकारी साहित्य की बात तो करते हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि सभी क्रांतियों ने अंत में पूंजीवाद को ही बढ़ावा नहीं दिया है? यानी सभी क्रांतियों का अंत एडवांस्ड कैपिटलिज्म में ही हुआ है, लेकिन यह सभी सही होते हुए भी लेखक के लिए क्रांतियों का आकर्षण हमेशा बना रहेगा. उसे किसी भी तरह के फासीवाद के खिलाफ लिखना और बोलना होगा, क्योंकि उसकी चुप्पी का अर्थ होगा फासीवाद को समर्थन देना, उसके खेमे का हिस्सा बन जाना. लेकिन कई बार लेखक ही समाज में लेखक के क्रांतिकारी रोल को चुनौती देता है. मुझ पर न जाने कितनी बार यह कह कर हमले हुए हैं कि मैं बांध, परमाणु बम और सांप्रदायिक दंगों जैसे विषयों पर क्यों लिखती हूं. यहां तक कहा गया कि मैं अपने सेलेब्रिटी स्टेटस का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश क र रही हूं और अपनी लेखन प्रतिभा व ऊर्जा का दुरुपयोग कर रही हूं. इन सारे हमलों के बाद मैंने अपने आलोचकों से कहा था कि तुम लोग लेखन के विषयों की एक लिस्ट बना कर मुझे दे दो, मैं बस उन्हीं पर लिखती रहूंगी. ऐसी आलोचना करनेवाले सिर्फ दक्षिणपंथी लेखक ही नहीं, लिबरल छविवाले लेखक भी थे और तब मुझे महसूस होता था कि क भी-क भी उदारपंथी लेखक कि सी फासिस्ट लेखक से ज्यादा धूर्त और कट्टर होते हैं. वे सीधे किसी का दमन करने का पक्ष नहीं लेते, लेकिन लेखन के कई विषयों के खिलाफ एक लिटरेरी सेंसरशिप के लिए माहौल निर्मित करने का काम क रते हैं.

देखें संसद पर हमले की सरकारी कहानी पर सवाल करती किताब ’13 दिसंबर : ए रीडर’ के विमोचन पर बोलतीं अरुंधति राय .

May 11, 2007 at 12:04 am 2 comments

भारत के बारे में सबसे बड़ा भ्रम है कि यहां लोकतंत्र है : अरुंधति राय

हम इस बातचीत का पहला हिस्सा पढ़ चुके हैं. प्रस्तुत है दूसरा हिस्सा. प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय से बात की है वैभव सिंह ने.
भारत का लोकतंत्र किन सीमाओं और खतरों का शिकार है? क्या जनमत निर्मित कर इस लोकतंत्र को कामयाब बनाया जा सकता है?

दरअसल, भारत के बारे में सबसे बड़ा भ्रम है कि यहां लोकतंत्र है और इस भ्रम को साम्राज्यवादी चिंतन के प्रभाव में रहनेवाली मीडिया भी दिन-रात प्रचारित करती है. यहां विरोध को भी बड़ी आसानी से पचा लिया जाता है. जिस तरह ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्च्न को मीडिया भुनाती है उसी तरह अरुंधति राय को भी स्टूडियो में बुला कर उसे अपने विचारों को रखने का मौका दिया जाता है, क्योंकि दुनिया को दिखाना है कि देखिए हम कितने लोक तांत्रिक हैं. हम एक क्रू ड नहीं बल्कि सॉफिस्टिके टेड समय से गुजर रहे हैं, जहां हर विरोध को खूबसूरती से पहले दिखाया जाता है और फिर उसे दुत्कार दिया जाता है. उन्हें बिग स्टोरीज चाहिए अपने बिजनेस के लिए और बदकिस्मती से लोगों के रोजाना के संघर्षों में उन्हें कुछ भी नया और सनसनीखेज नजर ही नहीं आता. गरीबों के नाम पर जतायी जानेवाली हमदर्दी (पॉलिटिक्स ऑफ पिटी) भी बड़ी खतरनाक होती है और एनजीओ व मिशनरीज इस हमदर्दी जताने की घटिया राजनीति का सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं. उनके द्वारा कई बार एम्पावरमेंट शब्द का इस्तेमाल होता है, जिसके राजनीतिक निहितार्थ बड़े खतरनाक हैं. एम्पावरमेंट के जरिये कमजोर वर्गों को रिप्रजेंट करने का दावा किया जाता है और पैसा कमाया जाता है, जबकि हमें सही अर्थों में लोगों को पावरफुल बनाने की ओर ध्यान देना चाहिए. प्राइवेट सेक्टर लोगों को खुश रखने के लिए पीपुल्स कार तो बना रहा है, लेकिन लोगों को पीने का पानी और खाना कहां से मिलेगा, इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है.

बिजनेस व आर्थिक नीतियों से जुड़े सभी फैसले पूरी तरह राजनीतिक होते हैं, लेकिन उन्हें राजनीति से अलग दिखाने की कोशिश की जाती है. ऐसे फैसलों के प्रतिरोध के लिए कौन से साधन अपनाये जा सकते हैं?

अब कहीं उम्मीद है तो सताये और शोषित लोगों से ही है, जो अपनी भारी संख्या बल का लाभ विरोध करने के लिए उठा सकते हैं. इस संख्या बल का फ़ायदा उठा कर लोग गलत चीजों को खुद आगे बढ़ कर रोक सकते हैं. इसके अलावा पीपुल्स मीडिया विकसित करने के बारे में भी हमें सोचना चाहिए. पीपुल्स वॉयस के नाम पर सारे ही अखबार-चैनल अपना धंधा चमकाने की कोशिश करते हैं और बहुत बड़ा फ्रॉड करते हैं. इससे लड़ते हुए हमें कम्युनिटी रेडियो, सिनेमा और पत्रिकाओं का विकास करना चाहिए. मुख्यधारा की मीडिया के पीछे भागने की आदत छोड़नी होगी. नर्मदा बचाओ आंदोलन को मीडिया में सबसे ज्यादा कवरेज मिला, लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ. दूसरी ओर झारखंड में कोयलकारो में आदिवासियों ने सुवर्णरेखा पर बन रहे बांधों का निर्माण रोक दिया, जबकि वहां मीडिया का ध्यान भी नहीं गया था. इसी तरह ओड़िशा में गंधमर्दन में स्थानीय लोगों के विरोध के चलते बाल्को को वहां से भागना पड़ा और नंदीग्राम में सालेम को प्रचंड विरोध के आगे पसीने छूट गये. मीडिया के हालात को देखते हुए मैं खुद भी टीवी चैनलों की बहस में हिस्सा लेने नहीं जाती हूं, क्योंकि वहां लगता है कि मैं भी सर्कस की जानवरों में से एक हो गयी हूं. वहां मुझे एक शोपीस की तरह सजा कर खड़ा कर दिया जायेगा और जो मैं वास्तव में कहना चाहती हूं, वह कहने के लिए समय नहीं दिया जायेगा. हमें सिनेमा तकनीक की ओर इसलिए भी ध्यान देना होगा, क्योंकि मुख्यधारा का सिनेमा अब इंटरनेशनल एलीट के कब्जे में है. हाल में आयी गुरु फि ल्म को देखिए, जिसमें खुल कर साम्राज्यवाद का पक्ष लिया गया है. धीरू भाई अंबानी की जिंदगी से प्रेरित इस फि ल्म में शक्तिशाली बिजनेसमैनों को ऐसे दिखाया गया है जैसे वे बंधुआ मजदूर हों और राज्य के सताये हुए हों. जबकि हकीकत में यह फ़िल्म लोकल कैपिटलिज्म के पक्ष में बनायी गयी है और ऐसे उद्योगपतियों को हीरो बनाया गया है जो किसी भी तरह की जवाबदेही से बचना चाहते हैं. यानी फिल्मकार भी अब साम्राज्यवाद के सबसे बड़े कारिंदे के रूप में उभर रहे हैं और उन्हें देश के हितों की चिंता नहीं रह गयी है. फिल्मों के अलावा अब सिनेमा हॉल भी ऐसे बनाये जा रहे हैं, जहां सिर्फ अमीरों के लिए ही फिल्में चलतीं और दिखायी जाती हैं. बड़े-बड़े सिनेमा हॉलों को तोड़ कर मल्टीप्लेक्स हॉल बनाये जा रहे हैं, जहां दो-ढाई सौ रुपये से कम का टिकट नहीं होता है. यानी सिनेमा हॉलों और फिल्म निर्माताओं ने अपने दर्शक वर्ग का चुनाव क र लिया है. जो लोग इतना पैसा देकर फिल्में देखेंगे, वे कभी आम जनों की जिंदगी पर बनी फ़िल्में पसंद नहीं करेंगे. वे उन्हीं फ़िल्मों को पसंद करेंगे जो उनकी शानो शौकत और ग्लैमर में डूबी ज़िंदगी को नाटकीय अंदाज में पेश करेंगी. न्यूज चैनल भी आम सच्चाइयों से कटते जा रहे हैं, भले ही वे दिनोंदिन कितने ही बड़े होते जा रहे हों. इसीलिए मैं कहती हूं जनांदोलनों को मीडिया को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए, हमारी सारी ऊर्जा वहीं खप जाती है. हमें अब मीडिया को दिखाने के लिए कोई आंदोलन नहीं करना है, बल्कि किसी मुद्दे के प्रति गंभीरता से प्रेरित होकर आंदोलन करना चाहिए. वैसे भी, मीडिया की आदत ही किसी मुद्दे को चबा कर उसे थूक देने की है. निठारी केस में जिस गैरराजनीतिक तरीके से सारी रिपोर्टिंग हुई वह भी मीडिया के निकम्मेपन को दरसाता है. हमें अपने संघर्ष के लिए अन्य भाषाओं में लिखे साहित्य व उनके अनुवादों की मदद लेनी चाहिए.
साहित्य और संस्कृति की किसी भी समाज में दोहरी जिम्मेदारी होती है. एक ओर वे राष्ट्र के आंतरिक स्वरूप को ज्यादा लोकतांत्रिक और समानतापरक बनाने के लिए संघर्ष करते हैं, दूसरी ओर साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने का काम करते हैं. इन जिम्मेदारियों से रचनाकारों के विचलन की वजह क्या है?
साहित्य-संस्कृति के बारे में आपकी मान्यताएं सहीं हैं, लेकिन विचारधारा पर निष्ठा कायम रख पाना काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन जो लेखक , खासतौर पर भारत के अंगरेजी लेखक यूरोप में रह रहे हैं, वे साम्राज्यवाद के खिलाफ क्या लिखेंगे? उन्हें अभी छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा जिले में रहना पड़ जाये, जहां रोज जीवन-मौत का संघर्ष होता है, तो फिर से विचारधारा और साहित्य के रिश्ते समझ में आने लगेंगे. ऐसे लेखकों की जब अंतरराष्ट्रीय मीट आयोजित होती है, तो वे अपने इंडोनेशिया, कोरिया और हांगकांग के अनुभवों के बारे में बात करते हैं, लेकिन भारत के गांवों में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी उन्हें कम ही रहती है. हम क्रांतिकारी साहित्य की बात तो करते हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि सभी क्रांतियों ने अंत में पूंजीवाद को ही बढ़ावा नहीं दिया है? यानी सभी क्रांतियों का अंत एडवांस्ड कैपिटलिज्म में ही हुआ है, लेकिन यह सभी सही होते हुए भी लेखक के लिए क्रांतियों का आकर्षण हमेशा बना रहेगा. उसे किसी भी तरह के फासीवाद के खिलाफ लिखना और बोलना होगा, क्योंकि उसकी चुप्पी का अर्थ होगा फासीवाद को समर्थन देना, उसके खेमे का हिस्सा बन जाना. लेकिन कई बार लेखक ही समाज में लेखक के क्रांतिकारी रोल को चुनौती देता है. मुझ पर न जाने कितनी बार यह कह कर हमले हुए हैं कि मैं बांध, परमाणु बम और सांप्रदायिक दंगों जैसे विषयों पर क्यों लिखती हूं. यहां तक कहा गया कि मैं अपने सेलेब्रिटी स्टेटस का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश क र रही हूं और अपनी लेखन प्रतिभा व ऊर्जा का दुरुपयोग कर रही हूं. इन सारे हमलों के बाद मैंने अपने आलोचकों से कहा था कि तुम लोग लेखन के विषयों की एक लिस्ट बना कर मुझे दे दो, मैं बस उन्हीं पर लिखती रहूंगी. ऐसी आलोचना करनेवाले सिर्फ दक्षिणपंथी लेखक ही नहीं, लिबरल छविवाले लेखक भी थे और तब मुझे महसूस होता था कि क भी-क भी उदारपंथी लेखक कि सी फासिस्ट लेखक से ज्यादा धूर्त और कट्टर होते हैं. वे सीधे किसी का दमन करने का पक्ष नहीं लेते, लेकिन लेखन के कई विषयों के खिलाफ एक लिटरेरी सेंसरशिप के लिए माहौल निर्मित करने का काम क रते हैं.

देखें संसद पर हमले की सरकारी कहानी पर सवाल करती किताब ’13 दिसंबर : ए रीडर’ के विमोचन पर बोलतीं अरुंधति राय .

May 10, 2007 at 6:46 pm 2 comments

कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था : अरुंधति राय

देश और दुनिया में जिस तरह के हालात हैं उनमें लेखकों का क्या दायित्व बनता है और वे कहां खड़े हैं इस पर लगातार बहस होती रही है. साम्राज्यवाद का हमला साहित्य और संस्कृति पर भी हो रहा है. यह जनता को उसके संघर्षों और संवेदना से अलगाव में डाल देने की कोशिश के तहत हो रहा है. ऐसे में जब अरुंधति राय इस पर कुछ कहती हैं तो उसको सुनने का अपना अलग महत्व होता है. वे कम से कम अभी दुनिया की सबसे ज़्यादा सुनी जानेवाली और सबसे विश्वसनीय आवाज़ हैं. उनसे विभिन्न मुद्दों पर बात की है वैभव सिंह ने. यह बातचीत समकालीन जनमत में प्रकाशित हो चुकी है. यहां पूरी बातचीत का पहला आधा हिस्सा ही दिया जा रहा है. बाकी पढ़ेंगे कल.

साम्राज्यवाद का दौर बड़ा खतरनाक होता है और इसका जीवन के हर क्षेत्र पर असर पड़ता है.
कला-संस्कृति भी इससे अछूती नहीं रहती है. ऐसे में साम्राज्यवाद का सामना कर रहे लेखकों का क्या दायित्व होता है?

देखिए, पहले तो मैं साफ कर दूं कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मैं लेखकों के बारे में कोई नियम बनाने के सख्त खिलाफ हूं. हर लेखक दूसरे लेखक से अलग होता है और सामाजिक यथार्थ को समझने की उसकी दृष्टि भी अलग होती है. इसलिए उसे क्या लिखना चाहिए, क्या नहीं, इस पर पहले से कोई तयशुदा मानदंड नहीं विकसित किये जाने चाहिए. ऐसे मानदंड अक्सर ही जड़ होते हैं और जिन गतिशील मानवीय भावों से जीवंत रचनाओं का जन्म होता है, उनके साथ न्याय नहीं कर पाते हैं. वैसे भी हमें अखबारी रिपोर्ट जैसे उपन्यास या कहानियां नहीं चाहिए, क्योंकि उनसे पाठक अपने को लंबे समय तक जोड़ नहीं पाते हैं. सामाजिक थीम को आधार बना कर लिखे गये गीत अन्य गीतों की तुलना में ज्यादा सुंदर होते हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग पहले से तय कर सामाजिक मुद्दों पर लिखने बैठते हैं, अक्सर ही उनकी रचनाएं दोयम दर्जे की और घटिया होती हैं. लेकि न इसका यह मतलब भी नहीं कि जो सामाजिक मुद्दों पर नहीं लिखते हैं, वे हमेशा अच्छी रचनाएं ही लिखते हैं. मैं अंगरेजी में लिखती हूं और जानती हूं कि अंगरेज लेखकों की दुनिया ही अलग होती है. उन्हें इससे फर्क पड़ता ही नहीं कि उनके उपन्यासों में कोई सामाजिक मुद्दा आता है या नहीं और उससे समाज में परिवर्तन का लक्ष्य कहां तक पूरा होता है. वैसे भी लेखकों के दायित्व के बारे में इकतरफा ढंग से विचार करना क ठिन होता है, क्योंकि लेखक भी कई राजनीतिक दलों और विचारधाराओं में बंटे होते हैं. ये प्रगतिशील, रेसिस्ट, फासिस्ट या कम्युनल, कुछ भी हो सकते हैं. उनकी पॉलिटिक्स अलग-अलग होती है.
लेकि न इसके बावजूद कोई लेखक अपनी कलम को प्रतिरोध का अस्त्र तो बना ही सक ता है?
मैं फिर भी कहूंगी कि सभी कलाकार और कवि एक श्रेणी के सदस्य नहीं होते हैं. साहित्य रचना अपने में फैक्चर्ड बिजनेस है. इसके अलावा प्रतिरोध के लिए सिर्फ क लाकार ही क्यों आगे आयें, सिर्फ इसलिए कि वह कोई स्पेशल कैटेगरी हैं. मैं अपने बारे में तो कह सकती हूं कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ मुझे लिखना चाहिए, लेकिन दूसरों को ऐसे किसी नियम में बांध नहीं सकती हूं और न बांधा जाना चाहिए. मेरा काम कोई नेता बनना, मंच से अच्छे भाषण देना या लोगों को खुश रखना नहीं होना चाहिए. मुझे अपनी आजादी और स्पेस भी चाहिए ताकि लिख सकूं, कुछ और सोच सकूं. मैं यह दावा नहीं कर सकती कि मैं कोई बहुत अच्छी इनसान हूं और हर वक्त लोगों के मुक्ति संघर्ष के बारे में सोचती रहती हूं. दुर्भाग्य से अच्छे लोग अक्सर बुरे लेखक साबित होते हैं. इसके अलावा, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम हैं कौन, यह पहचानें और यह किसी उधार के नजरिये से नहीं बल्कि खुद के नजरिये से पहचानी जानेवाली चीज है. एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सक ता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. मैं जो नहीं हूं, वह होने का दिखावा भी नहीं कर सकती. मैं लेखक हूं और किसी नेता की तरह अपनी छवि को निर्मित नहीं कराना चाहती. मैं गलत चीजों के विरोध में तर्क कर सकती हूं, लेकिन उनके खिलाफ अंतिम संघर्ष छेड़ने के लिए दूसरी ही तरह की योग्यता व कौशल की आवश्यक ता होती है, जो हो सकता है कि मेरे पास न हो. मेरे पास एक लेखक की संवेदना (सेंसबिलिटी) है और जिस तरह कि सी मजदूर को अपना रोजगार छिनने, बांध के इलाके में किसी किसान को अपनी जमीन डूबने का डर होता है, उसी तरह मुझे भी अपनी संवेदना के नष्ट होने, बाहरी स्थितियों के प्रवाह में उसके डूबने का खतरा सताता रहता है.
लेखक का उत्पीड़ित वर्ग से जुड़ने, उसके सौंदर्यशास्त्र व यथार्थ को साहित्य में व्यक्त करने के नैतिक दायित्व को कैसे भुलाया जा सकता है?
मुझे नहीं लगता कि लेखन कोई सोशल वर्क या चैरिटी का मामला है, भले ही किसी खास स्ट्रगल में इसका इसी रू प में इस्तेमाल कर लिया जाये. लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध क रते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन क रने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था. हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार समेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं. यानी शासकों को पता रहता है कि लेखकों को क्या ले-देकर खामोश रखा जा सकता है. ऐसा नहीं है कि व्यवस्था के अंग बन कर रहनेवाले ये लेखक इडियट हैं और उन्हें पता नहीं कि देश-दुनिया में हो क्या रहा है. ये लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन जानते हैं कि कहां उन्हें फायदा हो सकता है. लेखकों को बुला कर बड़े-बड़े समारोह किये जाते हैं और ठोस, हाड़-मांस के लोगों की जिंदगी में क्या घटित हो रहा है, इस पर बोलने के मौके इन्हें नहीं दिये जाते हैं. उड़ीसा में वेदांत नामक कंपनी है जो आदिवासी इलाकों में खनन का काम करती है. हमारे वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी उससे जुड़े हुए रहे हैं. वही कपंनी, जिस पर मानवाधिकार कानूनों के उल्लंघन के आरोप हैं, अब करीब एक अरब डॉलर खर्च कर विशाल यूनिवर्सिटी खोलने जा रही है और इसमें लेखकों, अकैडमिशियंश, जर्नलिस्ट और कलाकारों को भी आमंत्रित किया जा सकता है. यानी अब विचार, प्रतिरोध और दमन क मिला कर एक खूबसूरत खेल खेला जा रहा है. कोई भी अब अपने विचार व प्रतिबद्धता के मामले में पूरी तरह से शुद्ध और महान बन कर नहीं रह सकता. हम सब वे लोग हैं जो गंदे पानी के वाटर पूल में तैरने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरफ हैं. ऐसा कोई सपाट निष्क र्ष देना ठीक नहीं होगा कि चूंकि कोई लेखक है, इसलिए प्रगतिशील होना और साम्राज्यवाद का विरोध करना उसके लिए स्वाभाविक हो जाता है. रुडयार्ड किपलिंग एक मशहूर और बड़े लेखक रहे हैं लेकिन उनके लेखन में भयंकर रेसिस्ट और उपनिवेशवादी प्रवृत्तियां दिखायी पड़ सकती हैं.
आप देखें कि कितने युद्धों में कितने लेखक मारे गये. दूसरे विश्वयुद्ध में नाजियों ने भारी पैमाने पर लेखकों का कत्लेआम किया. इराक में भी सैक ड़ों रचनाकार मारे जा चुके हैं और बांग्लादेश में तसलीमा नसरीन को रहने नहीं दिया जा रहा. इन खतरनाक स्थितियों में लेखक क्या सिर्फ आत्मसंतोष की रचनाएं लिख कर जिंदा रह सकता है? हम सिर्फ फूलों और सितारों की कहानियों से दिल बहला सकते हैं?
आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं कहीं भी आत्मसंतोषी होकर जीने और लिखने की वकालत नहीं कर रही हूं और मैं निजी तौर पर अन्याय व लोगों की पीड़ा के अलावा कहीं और देख ही नहीं सकती. मई, 2005 में तुर्की के इस्तांबुल शहर में वर्ल्ड ट्रिब्यूनल ऑन इराक की बैठक में दी गयी स्पीच में मैंने इराक के संदर्भ में ऐसे इतिहास लेखन की बात की थी जो विजेताओं के नजरिये से नहीं बल्कि हारे हुए. कत्लोगारत के शिकार हुए पराजित लोगों के नजरिये से लिखा गया हो. वैसे भी एक -एक लेखक के पास इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं कि वह ईमानदारी से अपने वक्त की क हानियां लिखे. वह वक्त युद्ध का हो सकता है, शांति का हो सकता है और प्रेम का हो सकता है, लेकिन लेखक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते. जैसे कि हाल ही में जयपुर में रायटर्स मीट में बड़े और मशहूर अंगरेजी लेखक जुटे थे, लेकिन वहां भी बड़े गैर राजनीतिक ढंग से दुनिया की परिस्थितियों के बारे में चर्चाएं होती रहीं. उनकी बातें सुन कर तो ऐसा लगता है जैसे समाज के ताकतवर और कमजोर लोगों को जोड़नेवाली भाषा खत्म कर दी गयी है. उनके बीच अब कोई संवाद या कम्युनिकेशन हो ही नहीं सकता है. जयपुर के लेखक सम्मेलन में भारत की गरीबी, बेरोजगारी की दशा पर शायद ही कोई बोला. इसकी जगह हर लेखक भारत की कथित प्रगति और वर्ल्ड पावर बनने की संभावनाओं पर ही आत्ममुग्ध भाव से बात करता रहा. जबकि वर्तमान हालात में विकास के नाम पर ऐसी अंधेरगर्दी और लूटपाट मची है जितनी शायद औपनिवेशिक शासन में भी नहीं रही होगी. एक तरफ रूरल एंप्ल्वायमेंट गारंटी प्रोग्राम चलाये जा रहे हैं तो दूसरी ओर स्पशेल इकॉनामिक जोन (सेज) के नाम पर किसानों की जमीनें छीन कर उनकी खेतीबाड़ी को नष्ट किया जा रहा है. सेज के निर्माण से ज्यादा लोग उजाड़े जायेंगे. दिल्ली के ही हालात देखिए, हर तरफ भयंकर अराजकता नजर आती है और अफ सोस की बात है कि हम इस अराजकता के भी आदी होते जा रहे हैं. मुझे तो लगता है कि 1789 की फ्रेंच क्रांति से पहले पेरिस की जैसी अराजकतापूर्ण स्थितियां थीं, कुछ वैसी ही स्थितियां दिल्ली की भी हो गयी हैं. माफियाओं क राज, जबरन उजाड़ा जाना और नये समृद्ध वर्ग का उदय, यह सभी दिल्ली के वर्तमान चरित्र को तय कर रहे हैं. कोई नहीं पूछ रहा कि इस हवाई प्रगति की कीमत किसके आंसुओं और खून के एवज में चुकायी जा रही है. इस मामले में राज्य की जल्लादी भूमिका देख कर कोई भी चकित हो जाये. सबसे बड़ी दिक्कत असीमित संचय की छूट देने की भी है. जिस तरह से मीडिया कैपिटल, लैंड कैपिटल या राजनीतिक पूंजी एकत्र करने की छूट दी जा रही है, उससे व्यापक विनाश को ही हम दावत दे रहे हैं. लोगों में भी गुस्सा बढ़ेगा और उसी का नतीजा है कि भारत के सैकड़ों इलाके नक्सलियों या उग्रवादियों की चपेट में हैं.
ऐसे में साहित्य यथार्थ के बारे में कैसे हमारी समझदारी को ज्यादा मानवीय और तर्क संगत बना सक ता है?
कोई तो हो जो इस पूरी उथलपुथल को रिकार्ड करे और किसी लेखक का काम उत्पीड़न के खिलाफ लोगों को संवेदनशील बनाना है. उसका लेखन ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों में गुस्सा पैदा हो और वे अपने स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोच सकें . साथ ही उसमें सत्तावर्ग के पतनशील जीवन के चित्र भी होने चाहिए क्योंकि किसी भी लड़ाई को तब तक नहीं जीता जा सकता जब तक कि हम अपने दुश्मन को ठीक से नहीं समझते, उसके इरादों को नहीं जानते. लेखक अपने चारों और फैले यथार्थ के बीच अकेला होता है, उसका सामना करता है और फिर वही यथार्थ कई भाव-स्तरों से छन कर उसकी रचनाओं का अहम हिस्सा बन जाता है. मैं मानती हूं कि लेखक का काम सिर्फ एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का हिस्सा बन जाना नहीं है. उसकी समसामयिक यथार्थ के बारे में प्रखर राजनीतिक समझ होनी चाहिए और वह समझ लेखन में भी रचनात्मक रू प में उभर कर आनी चाहिए. एक लेखक चाहे तो लाखों लोगों की आवाज बन सकता है और लोग उसके लेखन में अपनी जिंदगियां तलाश सकते हैं. परियों की सीधी-सरल कहानियों में ढेर सारी राजनीति छिपी होती है लेकिन उन कहानियों से हमें पता चलता है कि सीधी-सरल ढंग से लिखी गयी चीजों का कितना गहरा असर होता है. इसलिए लेखक को सरल लेखन करने की जटिल साधना से गुजरना चाहिए. लेखकों के दायित्व के अलावा लेखकों के ईद-गिर्द बुना गया कै रियर और ऐश्वर्य का जाल भी कम खतरनाक नहीं होता और हमें इसके बारे में बात करनी चाहिए.
भारत में लोकतंत्र कई तरह के छलावों का शिकार हो रहा है. क्या किसी मुल्क की जनता सिर्फ अहिंसा के सहारे अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के रास्ते में आनेवाले बाधक तत्वों से निपट सकती है?
कु छ दिन पहले दावोस सम्मेलन में जाकर सोनिया गांधी ने बड़े आत्मप्रशंसा के भाव से कहा था कि किस तरह भारतवासी गांधी के अहिंसा सिद्धांतों पर चलने में यकीन क रते हैं. यह वही सरकार है जो गांधी के नाम पर सिर्फ शैंपू और खादी बेचती है और बाकी उसे गांधी से कोई लेना-देना नहीं है. वैसे भी सरकार और सोनिया गांधी अगर अहिंसा के बारे में इतनी तारीफ करें तो हमें अहिंसा पर भी संदेह करना चाहिए. इस वजह से क्योंकि अहिंसा के कारण ही सरकार और पूंजीपतियों को बड़ा फायदा होता है. जब लोग अहिंसक होते हैं तो राज्य और कोर्ट भी जनविरोधी होने से नहीं डरते हैं. वहां अपील करने पर लोगों को न्याय नहीं बल्कि थप्पड़ ही मिलती है. इसीलिए जबर्दस्त दमन के दौर में अब मैं किसी को गांधीवादी उसूलों को अपनाने को नहीं कहती, क्योंकि नर्मदा बचाओ आंदोलन और नार्थ ईस्ट की एक्टिविस्ट शर्मिला जैसे जो लोग गांधीवादी उसूलों के सहारे लड़ाई लड़ते हैं, उनकी आवाज कहीं सुनी नहीं जाती है. मुझे बार-बार हरसूद का एक उदाहरण याद आता है. जब पूरा कस्बा डूबनेवाला था तो मैं हालात का जायजा लेने वहां गयी थी. वहां जब मैंने लोगों से पूछा कि वे अपने कस्बे को बचाने के लिए डट कर विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने जो जवाब दिया उसने मुझे अचंभित कर दिया. उनलोगों का कहना था कि हमलोग इसलिए विरोध नहीं कर रहे हैं क्योंकि ऐसा करना संस्कृति-सभ्यता के खिलाफ होगा. क्या करेंगे ऐसी सभ्यता और उसूलों को लेक र, जिसमें आपकी आवाज सुनी ही नहीं जाती? हम अपने लोकतंत्र पर इतराते हैं. लैटिन अमेरिकी मुल्क चिली के तानाशाह आगस्टो पिनोशे के शासनकाल में 3500 लोग मारे गये और करीब 17000 लोग गायब हो गये, लेकिन हिंदुस्तान में सिर्फ कश्मीर में 68 हजार लोग मारे जा चुके हैं. यानी कभी-क भी लोकतंत्र किसी भी तानाशाही से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.

देखें : सितंबर 11 की घटना पर अरुंधति का मशहूर भाषण.

अमेरिका भी अपने को लोकतांत्रिक मुल्क कहता है लेकिन वहीं एक पूर्व सेना अधिकारी और वर्ल्ड बैंक के पूर्व प्रेजिडेंट रॉबर्ट मैक नामरा ने कहा था कि वियतनाम के लोग अपनी जिंदगी का मूल्य नहीं समझते, इसीलिए अमेरिका को उनका हजारों-लाखों की संख्या में नरसंहार करना पड़ा. अमेरिका ही नहीं बल्कि रूस, जर्मनी, जापान, चीन जैसी सभी महान सभ्याताएं और देश दूसरों को लूटने और खून-खराबे की बुनियाद पर टिकी हैं. अजीब बात है कि भारत में मुख्यधारा के वामदल एक और इराक में जारी कत्लेआम का विरोध क रते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद की आड़ में कश्मीर पर चुप्पी साध लेते हैं. इराक में अगर भारी तादाद में अमेरिकी फौजे हैं तो कश्मीर में भी करीब सात लाख भारतीय फौजें हैं. इसके अलावा नॉर्थ ईस्ट का आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट तो बड़े से बड़े तानाशाहीवाले कानून का बाप है. क श्मीर में तो फौजें भी आतंकवाद को हवा दे रही हैं और किसी युवक या युवती का अचानक गुम हो जाना अब बड़ी खबर नहीं है. कश्मीर वैसे भी कभी भारत का हिस्सा नहीं था और 1947 में उसे जबरन भारत में मिला लिया गया था. कोई नहीं जानना चाहता कि कश्मीर के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं और यह जानने में अगर उनकी थोड़ी भी रुचि होती तो वहां पर जनमत संग्रह अब तक करा दिया जाता. लेकिन हमारा दिमागी दिवालियापन हमें बताता है कि संसद कांड के अभियुक्त अफजल को फांसी पर लटका देने भर से हम आतंक वाद से मुक्त हो जायेंगे. सब जानते हैं कि अफजल को निचली अदालत में वकील नहीं मिला और कोई भी सबूत उसे फांसी पर लटकाने के लिए काफी नहीं है. पुलिस ने जो थ्योरी गढ़ी है उसमें काफी कु छ झूठ है. हमें संसद कांड में सच को नहीं बताया जा रहा, उल्टे कश्मीर में अब पुलिस दमन में मारे गये लोगों की कब्रें बरामद हो रही हैं और राज्य सरकार अपने ही पुलिस अफसरों को जेल भेज रही है.

May 7, 2007 at 11:39 pm 7 comments

कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था : अरुंधति राय

देश और दुनिया में जिस तरह के हालात हैं उनमें लेखकों का क्या दायित्व बनता है और वे कहां खड़े हैं इस पर लगातार बहस होती रही है. साम्राज्यवाद का हमला साहित्य और संस्कृति पर भी हो रहा है. यह जनता को उसके संघर्षों और संवेदना से अलगाव में डाल देने की कोशिश के तहत हो रहा है. ऐसे में जब अरुंधति राय इस पर कुछ कहती हैं तो उसको सुनने का अपना अलग महत्व होता है. वे कम से कम अभी दुनिया की सबसे ज़्यादा सुनी जानेवाली और सबसे विश्वसनीय आवाज़ हैं. उनसे विभिन्न मुद्दों पर बात की है वैभव सिंह ने. यह बातचीत समकालीन जनमत में प्रकाशित हो चुकी है. यहां पूरी बातचीत का पहला आधा हिस्सा ही दिया जा रहा है. बाकी पढ़ेंगे कल.

साम्राज्यवाद का दौर बड़ा खतरनाक होता है और इसका जीवन के हर क्षेत्र पर असर पड़ता है.
कला-संस्कृति भी इससे अछूती नहीं रहती है. ऐसे में साम्राज्यवाद का सामना कर रहे लेखकों का क्या दायित्व होता है?

देखिए, पहले तो मैं साफ कर दूं कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मैं लेखकों के बारे में कोई नियम बनाने के सख्त खिलाफ हूं. हर लेखक दूसरे लेखक से अलग होता है और सामाजिक यथार्थ को समझने की उसकी दृष्टि भी अलग होती है. इसलिए उसे क्या लिखना चाहिए, क्या नहीं, इस पर पहले से कोई तयशुदा मानदंड नहीं विकसित किये जाने चाहिए. ऐसे मानदंड अक्सर ही जड़ होते हैं और जिन गतिशील मानवीय भावों से जीवंत रचनाओं का जन्म होता है, उनके साथ न्याय नहीं कर पाते हैं. वैसे भी हमें अखबारी रिपोर्ट जैसे उपन्यास या कहानियां नहीं चाहिए, क्योंकि उनसे पाठक अपने को लंबे समय तक जोड़ नहीं पाते हैं. सामाजिक थीम को आधार बना कर लिखे गये गीत अन्य गीतों की तुलना में ज्यादा सुंदर होते हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग पहले से तय कर सामाजिक मुद्दों पर लिखने बैठते हैं, अक्सर ही उनकी रचनाएं दोयम दर्जे की और घटिया होती हैं. लेकि न इसका यह मतलब भी नहीं कि जो सामाजिक मुद्दों पर नहीं लिखते हैं, वे हमेशा अच्छी रचनाएं ही लिखते हैं. मैं अंगरेजी में लिखती हूं और जानती हूं कि अंगरेज लेखकों की दुनिया ही अलग होती है. उन्हें इससे फर्क पड़ता ही नहीं कि उनके उपन्यासों में कोई सामाजिक मुद्दा आता है या नहीं और उससे समाज में परिवर्तन का लक्ष्य कहां तक पूरा होता है. वैसे भी लेखकों के दायित्व के बारे में इकतरफा ढंग से विचार करना क ठिन होता है, क्योंकि लेखक भी कई राजनीतिक दलों और विचारधाराओं में बंटे होते हैं. ये प्रगतिशील, रेसिस्ट, फासिस्ट या कम्युनल, कुछ भी हो सकते हैं. उनकी पॉलिटिक्स अलग-अलग होती है.
लेकि न इसके बावजूद कोई लेखक अपनी कलम को प्रतिरोध का अस्त्र तो बना ही सक ता है?
मैं फिर भी कहूंगी कि सभी कलाकार और कवि एक श्रेणी के सदस्य नहीं होते हैं. साहित्य रचना अपने में फैक्चर्ड बिजनेस है. इसके अलावा प्रतिरोध के लिए सिर्फ क लाकार ही क्यों आगे आयें, सिर्फ इसलिए कि वह कोई स्पेशल कैटेगरी हैं. मैं अपने बारे में तो कह सकती हूं कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ मुझे लिखना चाहिए, लेकिन दूसरों को ऐसे किसी नियम में बांध नहीं सकती हूं और न बांधा जाना चाहिए. मेरा काम कोई नेता बनना, मंच से अच्छे भाषण देना या लोगों को खुश रखना नहीं होना चाहिए. मुझे अपनी आजादी और स्पेस भी चाहिए ताकि लिख सकूं, कुछ और सोच सकूं. मैं यह दावा नहीं कर सकती कि मैं कोई बहुत अच्छी इनसान हूं और हर वक्त लोगों के मुक्ति संघर्ष के बारे में सोचती रहती हूं. दुर्भाग्य से अच्छे लोग अक्सर बुरे लेखक साबित होते हैं. इसके अलावा, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम हैं कौन, यह पहचानें और यह किसी उधार के नजरिये से नहीं बल्कि खुद के नजरिये से पहचानी जानेवाली चीज है. एक लेखक अगर जनसंघर्षों में अपनी जान दे सक ता है, तो अपनी लेखकीय आजादी के लिए भी संघर्ष कर सकता है. मैं जो नहीं हूं, वह होने का दिखावा भी नहीं कर सकती. मैं लेखक हूं और किसी नेता की तरह अपनी छवि को निर्मित नहीं कराना चाहती. मैं गलत चीजों के विरोध में तर्क कर सकती हूं, लेकिन उनके खिलाफ अंतिम संघर्ष छेड़ने के लिए दूसरी ही तरह की योग्यता व कौशल की आवश्यक ता होती है, जो हो सकता है कि मेरे पास न हो. मेरे पास एक लेखक की संवेदना (सेंसबिलिटी) है और जिस तरह कि सी मजदूर को अपना रोजगार छिनने, बांध के इलाके में किसी किसान को अपनी जमीन डूबने का डर होता है, उसी तरह मुझे भी अपनी संवेदना के नष्ट होने, बाहरी स्थितियों के प्रवाह में उसके डूबने का खतरा सताता रहता है.
लेखक का उत्पीड़ित वर्ग से जुड़ने, उसके सौंदर्यशास्त्र व यथार्थ को साहित्य में व्यक्त करने के नैतिक दायित्व को कैसे भुलाया जा सकता है?
मुझे नहीं लगता कि लेखन कोई सोशल वर्क या चैरिटी का मामला है, भले ही किसी खास स्ट्रगल में इसका इसी रू प में इस्तेमाल कर लिया जाये. लेखकों में रेडिकल, फासिस्ट और हरामी, हर तरह के लेखक शामिल हैं. ऐसे लेखक हैं जो परमाणु अस्त्रों का विरोध क रते हैं, तो ऐसे भी हैं जो बीजेपी शासनों के दौरान न्यूक्लियर टेस्ट का समर्थन क रने के लिए बीजेपी के साथ खड़े हो गये थे. दूसरे विश्वयुद्ध में ऐसे तथाक थित संस्कृतिकर्मी भी थे जो यहूदियों के सफाये को जर्मनी के उत्थान के लिए सही ठहराते थे और हिटलर के पक्ष में डॉक्यूमेंटरीज भी तैयार की गयी थीं. कुछ दिन पहले सलमान रुश्दी को एक मैग्जीन में अमरीकी झंडे में लिपटे दिखाया गया था. हिंदुस्तान में आज गुजरात में भयानक हालात हैं, लेकिन कितने गुजराती लेखक हैं जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुल कर लिख रहे हैं? वहां तो मुसलमानों के घेटो तैयार हो रहे हैं और उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. उन्हें खुलेआम मारो तो लोगों का ध्यान जाता है, लोगों से गालियां सुननी पड़ती हैं. लेकिन अब तो वहां ऐसा माहौल बना दिया गया है कि मुसलमान खुद ही अपना कारोबार समेट कर, घर-बार बेच कर चुपचाप भागने की तैयारी कर रहे हैं. यानी शासकों को पता रहता है कि लेखकों को क्या ले-देकर खामोश रखा जा सकता है. ऐसा नहीं है कि व्यवस्था के अंग बन कर रहनेवाले ये लेखक इडियट हैं और उन्हें पता नहीं कि देश-दुनिया में हो क्या रहा है. ये लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन जानते हैं कि कहां उन्हें फायदा हो सकता है. लेखकों को बुला कर बड़े-बड़े समारोह किये जाते हैं और ठोस, हाड़-मांस के लोगों की जिंदगी में क्या घटित हो रहा है, इस पर बोलने के मौके इन्हें नहीं दिये जाते हैं. उड़ीसा में वेदांत नामक कंपनी है जो आदिवासी इलाकों में खनन का काम करती है. हमारे वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी उससे जुड़े हुए रहे हैं. वही कपंनी, जिस पर मानवाधिकार कानूनों के उल्लंघन के आरोप हैं, अब करीब एक अरब डॉलर खर्च कर विशाल यूनिवर्सिटी खोलने जा रही है और इसमें लेखकों, अकैडमिशियंश, जर्नलिस्ट और कलाकारों को भी आमंत्रित किया जा सकता है. यानी अब विचार, प्रतिरोध और दमन क मिला कर एक खूबसूरत खेल खेला जा रहा है. कोई भी अब अपने विचार व प्रतिबद्धता के मामले में पूरी तरह से शुद्ध और महान बन कर नहीं रह सकता. हम सब वे लोग हैं जो गंदे पानी के वाटर पूल में तैरने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरफ हैं. ऐसा कोई सपाट निष्क र्ष देना ठीक नहीं होगा कि चूंकि कोई लेखक है, इसलिए प्रगतिशील होना और साम्राज्यवाद का विरोध करना उसके लिए स्वाभाविक हो जाता है. रुडयार्ड किपलिंग एक मशहूर और बड़े लेखक रहे हैं लेकिन उनके लेखन में भयंकर रेसिस्ट और उपनिवेशवादी प्रवृत्तियां दिखायी पड़ सकती हैं.
आप देखें कि कितने युद्धों में कितने लेखक मारे गये. दूसरे विश्वयुद्ध में नाजियों ने भारी पैमाने पर लेखकों का कत्लेआम किया. इराक में भी सैक ड़ों रचनाकार मारे जा चुके हैं और बांग्लादेश में तसलीमा नसरीन को रहने नहीं दिया जा रहा. इन खतरनाक स्थितियों में लेखक क्या सिर्फ आत्मसंतोष की रचनाएं लिख कर जिंदा रह सकता है? हम सिर्फ फूलों और सितारों की कहानियों से दिल बहला सकते हैं?
आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं कहीं भी आत्मसंतोषी होकर जीने और लिखने की वकालत नहीं कर रही हूं और मैं निजी तौर पर अन्याय व लोगों की पीड़ा के अलावा कहीं और देख ही नहीं सकती. मई, 2005 में तुर्की के इस्तांबुल शहर में वर्ल्ड ट्रिब्यूनल ऑन इराक की बैठक में दी गयी स्पीच में मैंने इराक के संदर्भ में ऐसे इतिहास लेखन की बात की थी जो विजेताओं के नजरिये से नहीं बल्कि हारे हुए. कत्लोगारत के शिकार हुए पराजित लोगों के नजरिये से लिखा गया हो. वैसे भी एक -एक लेखक के पास इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं कि वह ईमानदारी से अपने वक्त की क हानियां लिखे. वह वक्त युद्ध का हो सकता है, शांति का हो सकता है और प्रेम का हो सकता है, लेकिन लेखक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते. जैसे कि हाल ही में जयपुर में रायटर्स मीट में बड़े और मशहूर अंगरेजी लेखक जुटे थे, लेकिन वहां भी बड़े गैर राजनीतिक ढंग से दुनिया की परिस्थितियों के बारे में चर्चाएं होती रहीं. उनकी बातें सुन कर तो ऐसा लगता है जैसे समाज के ताकतवर और कमजोर लोगों को जोड़नेवाली भाषा खत्म कर दी गयी है. उनके बीच अब कोई संवाद या कम्युनिकेशन हो ही नहीं सकता है. जयपुर के लेखक सम्मेलन में भारत की गरीबी, बेरोजगारी की दशा पर शायद ही कोई बोला. इसकी जगह हर लेखक भारत की कथित प्रगति और वर्ल्ड पावर बनने की संभावनाओं पर ही आत्ममुग्ध भाव से बात करता रहा. जबकि वर्तमान हालात में विकास के नाम पर ऐसी अंधेरगर्दी और लूटपाट मची है जितनी शायद औपनिवेशिक शासन में भी नहीं रही होगी. एक तरफ रूरल एंप्ल्वायमेंट गारंटी प्रोग्राम चलाये जा रहे हैं तो दूसरी ओर स्पशेल इकॉनामिक जोन (सेज) के नाम पर किसानों की जमीनें छीन कर उनकी खेतीबाड़ी को नष्ट किया जा रहा है. सेज के निर्माण से ज्यादा लोग उजाड़े जायेंगे. दिल्ली के ही हालात देखिए, हर तरफ भयंकर अराजकता नजर आती है और अफ सोस की बात है कि हम इस अराजकता के भी आदी होते जा रहे हैं. मुझे तो लगता है कि 1789 की फ्रेंच क्रांति से पहले पेरिस की जैसी अराजकतापूर्ण स्थितियां थीं, कुछ वैसी ही स्थितियां दिल्ली की भी हो गयी हैं. माफियाओं क राज, जबरन उजाड़ा जाना और नये समृद्ध वर्ग का उदय, यह सभी दिल्ली के वर्तमान चरित्र को तय कर रहे हैं. कोई नहीं पूछ रहा कि इस हवाई प्रगति की कीमत किसके आंसुओं और खून के एवज में चुकायी जा रही है. इस मामले में राज्य की जल्लादी भूमिका देख कर कोई भी चकित हो जाये. सबसे बड़ी दिक्कत असीमित संचय की छूट देने की भी है. जिस तरह से मीडिया कैपिटल, लैंड कैपिटल या राजनीतिक पूंजी एकत्र करने की छूट दी जा रही है, उससे व्यापक विनाश को ही हम दावत दे रहे हैं. लोगों में भी गुस्सा बढ़ेगा और उसी का नतीजा है कि भारत के सैकड़ों इलाके नक्सलियों या उग्रवादियों की चपेट में हैं.
ऐसे में साहित्य यथार्थ के बारे में कैसे हमारी समझदारी को ज्यादा मानवीय और तर्क संगत बना सक ता है?
कोई तो हो जो इस पूरी उथलपुथल को रिकार्ड करे और किसी लेखक का काम उत्पीड़न के खिलाफ लोगों को संवेदनशील बनाना है. उसका लेखन ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों में गुस्सा पैदा हो और वे अपने स्वार्थों से ऊपर उठ कर सोच सकें . साथ ही उसमें सत्तावर्ग के पतनशील जीवन के चित्र भी होने चाहिए क्योंकि किसी भी लड़ाई को तब तक नहीं जीता जा सकता जब तक कि हम अपने दुश्मन को ठीक से नहीं समझते, उसके इरादों को नहीं जानते. लेखक अपने चारों और फैले यथार्थ के बीच अकेला होता है, उसका सामना करता है और फिर वही यथार्थ कई भाव-स्तरों से छन कर उसकी रचनाओं का अहम हिस्सा बन जाता है. मैं मानती हूं कि लेखक का काम सिर्फ एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का हिस्सा बन जाना नहीं है. उसकी समसामयिक यथार्थ के बारे में प्रखर राजनीतिक समझ होनी चाहिए और वह समझ लेखन में भी रचनात्मक रू प में उभर कर आनी चाहिए. एक लेखक चाहे तो लाखों लोगों की आवाज बन सकता है और लोग उसके लेखन में अपनी जिंदगियां तलाश सकते हैं. परियों की सीधी-सरल कहानियों में ढेर सारी राजनीति छिपी होती है लेकिन उन कहानियों से हमें पता चलता है कि सीधी-सरल ढंग से लिखी गयी चीजों का कितना गहरा असर होता है. इसलिए लेखक को सरल लेखन करने की जटिल साधना से गुजरना चाहिए. लेखकों के दायित्व के अलावा लेखकों के ईद-गिर्द बुना गया कै रियर और ऐश्वर्य का जाल भी कम खतरनाक नहीं होता और हमें इसके बारे में बात करनी चाहिए.
भारत में लोकतंत्र कई तरह के छलावों का शिकार हो रहा है. क्या किसी मुल्क की जनता सिर्फ अहिंसा के सहारे अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के रास्ते में आनेवाले बाधक तत्वों से निपट सकती है?
कु छ दिन पहले दावोस सम्मेलन में जाकर सोनिया गांधी ने बड़े आत्मप्रशंसा के भाव से कहा था कि किस तरह भारतवासी गांधी के अहिंसा सिद्धांतों पर चलने में यकीन क रते हैं. यह वही सरकार है जो गांधी के नाम पर सिर्फ शैंपू और खादी बेचती है और बाकी उसे गांधी से कोई लेना-देना नहीं है. वैसे भी सरकार और सोनिया गांधी अगर अहिंसा के बारे में इतनी तारीफ करें तो हमें अहिंसा पर भी संदेह करना चाहिए. इस वजह से क्योंकि अहिंसा के कारण ही सरकार और पूंजीपतियों को बड़ा फायदा होता है. जब लोग अहिंसक होते हैं तो राज्य और कोर्ट भी जनविरोधी होने से नहीं डरते हैं. वहां अपील करने पर लोगों को न्याय नहीं बल्कि थप्पड़ ही मिलती है. इसीलिए जबर्दस्त दमन के दौर में अब मैं किसी को गांधीवादी उसूलों को अपनाने को नहीं कहती, क्योंकि नर्मदा बचाओ आंदोलन और नार्थ ईस्ट की एक्टिविस्ट शर्मिला जैसे जो लोग गांधीवादी उसूलों के सहारे लड़ाई लड़ते हैं, उनकी आवाज कहीं सुनी नहीं जाती है. मुझे बार-बार हरसूद का एक उदाहरण याद आता है. जब पूरा कस्बा डूबनेवाला था तो मैं हालात का जायजा लेने वहां गयी थी. वहां जब मैंने लोगों से पूछा कि वे अपने कस्बे को बचाने के लिए डट कर विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं तो कुछ लोगों ने जो जवाब दिया उसने मुझे अचंभित कर दिया. उनलोगों का कहना था कि हमलोग इसलिए विरोध नहीं कर रहे हैं क्योंकि ऐसा करना संस्कृति-सभ्यता के खिलाफ होगा. क्या करेंगे ऐसी सभ्यता और उसूलों को लेक र, जिसमें आपकी आवाज सुनी ही नहीं जाती? हम अपने लोकतंत्र पर इतराते हैं. लैटिन अमेरिकी मुल्क चिली के तानाशाह आगस्टो पिनोशे के शासनकाल में 3500 लोग मारे गये और करीब 17000 लोग गायब हो गये, लेकिन हिंदुस्तान में सिर्फ कश्मीर में 68 हजार लोग मारे जा चुके हैं. यानी कभी-क भी लोकतंत्र किसी भी तानाशाही से ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.

देखें : सितंबर 11 की घटना पर अरुंधति का मशहूर भाषण.

अमेरिका भी अपने को लोकतांत्रिक मुल्क कहता है लेकिन वहीं एक पूर्व सेना अधिकारी और वर्ल्ड बैंक के पूर्व प्रेजिडेंट रॉबर्ट मैक नामरा ने कहा था कि वियतनाम के लोग अपनी जिंदगी का मूल्य नहीं समझते, इसीलिए अमेरिका को उनका हजारों-लाखों की संख्या में नरसंहार करना पड़ा. अमेरिका ही नहीं बल्कि रूस, जर्मनी, जापान, चीन जैसी सभी महान सभ्याताएं और देश दूसरों को लूटने और खून-खराबे की बुनियाद पर टिकी हैं. अजीब बात है कि भारत में मुख्यधारा के वामदल एक और इराक में जारी कत्लेआम का विरोध क रते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद की आड़ में कश्मीर पर चुप्पी साध लेते हैं. इराक में अगर भारी तादाद में अमेरिकी फौजे हैं तो कश्मीर में भी करीब सात लाख भारतीय फौजें हैं. इसके अलावा नॉर्थ ईस्ट का आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट तो बड़े से बड़े तानाशाहीवाले कानून का बाप है. क श्मीर में तो फौजें भी आतंकवाद को हवा दे रही हैं और किसी युवक या युवती का अचानक गुम हो जाना अब बड़ी खबर नहीं है. कश्मीर वैसे भी कभी भारत का हिस्सा नहीं था और 1947 में उसे जबरन भारत में मिला लिया गया था. कोई नहीं जानना चाहता कि कश्मीर के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं और यह जानने में अगर उनकी थोड़ी भी रुचि होती तो वहां पर जनमत संग्रह अब तक करा दिया जाता. लेकिन हमारा दिमागी दिवालियापन हमें बताता है कि संसद कांड के अभियुक्त अफजल को फांसी पर लटका देने भर से हम आतंक वाद से मुक्त हो जायेंगे. सब जानते हैं कि अफजल को निचली अदालत में वकील नहीं मिला और कोई भी सबूत उसे फांसी पर लटकाने के लिए काफी नहीं है. पुलिस ने जो थ्योरी गढ़ी है उसमें काफी कु छ झूठ है. हमें संसद कांड में सच को नहीं बताया जा रहा, उल्टे कश्मीर में अब पुलिस दमन में मारे गये लोगों की कब्रें बरामद हो रही हैं और राज्य सरकार अपने ही पुलिस अफसरों को जेल भेज रही है.

May 7, 2007 at 6:21 pm 7 comments

यह ठीक-ठीक एक युद्ध है और हर पक्ष अपने हथियार चुन रहा है : अरुंधति राय

प्रख्यात लेखिका और समाजकर्मी अरुंधति राय ने लगातार बदलते वैश्विक परिदृश्य और घटनाक्रम के साथ जिस तरह अपने को मोडिफ़ाइ किया है, और अपने सोच को विकसित किया है, उसका उदाहरण है यह बातचीत. इसमें अरुंधति ने अपने पहले के कई नज़रियों पर नये सिरे से विचार किया है और ज़रूरत पड़ने पर उनको एक दूसरी दिशा भी दी है. जैसे कि उनमें पहले अहिंसक प्रतिरोध की का व्यापक आग्रह दिखता था. वे मानतीं थीं कि प्रतिरोध हिंसक होने से उसकी सुंदरता नष्ट होती है. मगर इस बार वे सरकार द्वारा अहिंसक प्रतिरोधों को नज़रअंदाज़ किये जाने और उनको अपमानित किये जाने से काफ़ी क्षुब्ध दिखती हैं. उनमे अब अहिंसक प्रतिरोध का वह आग्रह नहीं दिखता और वे काफ़ी हद तक देश में चल रहे सशस्त्र आंदोलनों के पक्ष में बोलती दिखती हैं. उनका यह बदलाव उन जड़ बुद्धि महामानवों, इसी युग के, के लिए एक नज़ीर है, जिन्होंने एक बार एक ढेरी चुन ली तो जीवन भर उस पर कुंडली मारे बैठे रहते हैं, उसकी गर्द साफ़ करने को भी उससे नहीं डोलते. अंगरेज़ी साप्ताहिक तहलका में छपी यह बातचीत हिंदी में जन विकल्प के अप्रैल अंक में प्रकाशित हुई है. यहां इसकी साभार प्रस्तुति.

  • अनुवाद : रेयाज-उल-हक

शोमा चौधरी : पूरे देश में बढ़ती हुई हिंसा का माहौल है. आप संकेतों को किस तरह ले रही हैं? इन्हें किस परिप्रेक्ष्य में लेना चाहिए?
अरुंधति राय : आप उतने प्रतिभासंपन्न नहीं हो सकते कि आप संकेतों को पढ़ सकें. हमारे पास उग्र उपभोक्तावाद और आक्रामक लिप्सा पर पलता हुआ एक बढ़ता मध्यवर्ग है. पश्चिमी देशों के औद्योगीकरण के विपरीत, जिनके पास उनके उपनिवेश थे, जहां से वे संसाधन लूटते थे और इस प्रक्रिया की खुराक के लिए दास मजदूर पैदा करते थे, हमने खुद को ही, अपने निम्नतम हिस्सों को, अपना उपनिवेश बना लिया है. हमने अपने अंगों को ही खाना शुरू कर दिया है. लालच, जो पैदा हो रही है (और जो एक मूल्य की तरह राष्ट्रवाद के साथ घालमेल करते हुए बेची जा रही है ) केवल अशक्त लोगों से भूमि, जल और संसाधनों की लूट से ही शांत हो सकती है. हम जिसे देख रहे हैं वह स्वतंत्र भारत में लड़ा गया सबसे सफल अलगाववादी संघर्ष है-मध्यवर्ग और उच्चवर्ग का बाकी देश से अलगाव. यह एक स्पष्ट अलगाव है न कि छुपा हुआ. वे इस धरती पर मौजूद दुनिया के अभिजात के साथ मिल जाने के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं. वे सेनापति और संसाधनों का प्रबंध कर चुके हैं, कोयला, खनिज, बक्साइट, पानी और बिजली. अब वे अधिक जमीन चाहते हैं, अधिक कारें, अधिक बम, अधिक माइंस-नयी महाशक्ति के नये महानागरिकों के लिए महाखिलौने-बनाने के लिए. इसलिए यह ठीक-ठीक युद्ध है और दोनों तरफ के लोग अपने हथियार चुन रहे हैं. सरकार और निगम संरचनागत समायोजन के लिए पहुंच गये हैं, विश्वबैंक, एडीबी, एफडीआइ, दोस्ताना अदालती आदेश, दोस्ताना नीति निर्माता, कार्पोरेट मीडिया और पुलिस बल की दोस्ताना मदद इन सब को गरीब आदमियों के गले में बांध देंगे. जो इस प्रक्रिया का विरोध करना चाहते हैं, अब तक धरना, भूख हड़ताल, सत्याग्रह, अदालत और दोस्ताना मीडिया का सहारा लेते रहे हैं, मगर अब अधिक-से-अधिक लोग बंदूकों के साथ जा रहे हैं. क्या हिंसा बढ़ेगी? जी हां, यदि ‘वृद्धि दर` और सेंसेक्स सरकार द्वारा प्रगति और लोगों की बेहतरी मापने के बैरोमीटर बने रहेंगे तब निस्संदेह, यह होगा. मैं संकेतों को कैसे पढ़ती हूं? आकाश पर लिखी चीज पढ़ना मुश्किल नहीं है. वहां जो वाक्य बड़े-बड़े अक्षरों में अंकित है, वह यह है कि मल जाकर पंखे से चिपक गया है (गरीब लोग सिर चढ़ गये हैं – अनु.).

शोमा चौधरी : आपने एक बार टिप्पणी की थी कि आप खुद हालांकि हिंसा का आश्रय नहीं लेंगी, आप सोचती हैं कि देश की वर्तमान परिस्थतियों में इसकी निंदा करना अनैतिक हो गया है. क्या आप अपने इस नजरिये को विस्तृत कर सकती हैं?
अरुंधति राय : एक गुरिल्ले के रूप में मैं बोझ भर रह जाऊंगी. मुझे संदेह है कि मैंने शब्द ‘अनैतिक` का प्रयोग किया होगा-नैतिकता एक भ्रामक विचार है, मौसम की तरह बदलनेवाला. जो मैं महसूस करती हूं वह यह है कि अहिंसक आंदोलन दशकों से देश की प्रत्येक
लोकतांत्रिक संस्था का दरवाजा खटखटा चुके हैं और ठुकराये और अपमानित हो चुके हैं. भोपाल गैस कांड के पीड़ितों और नर्मदा बचाओ आंदोलन को देखिए. एनबीए के पास क्या नहीं है? बहुचर्चित नेतृत्व, मीडिया कवरेज, किसी भी दूसरे जनांदोलन से अधिक संसाधन. क्या गलती हुई? लोग अपनी रणनीति पर फिर से सोचने को बाध्य किये जा रहे हैं. जब सोनिया गांधी दाओस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से सत्याग्रह को प्रोत्साहित करने की शुरुआत करती हैं, यह हमारे लिए बैठ कर सोचने का समय होता है. जैसे कि क्या आम सिविल नाफरमानी एक लोकतांत्रिक राष्ट्र राज्य की संरचना के अंतर्गत संभव है? क्या यह गलत सूचनाओं और कारपोरेट नियंत्रित मास मीडिया के युग में संभव है? क्या भूख हड़तालों की नाभिनाल सेलिब्रिटी पॉलिटिक्स से जुड़ी हुई है? क्या कोई परवाह करेगा यदि नागला माछी या भट्टी माइंस के लोग भूख हड़ताल पर चले जायें? इरोम शर्मिला पिछले छह वर्षों से भूख हड़ताल पर है. यह हमलोगों में से कइयों के लिए एक सबक होना चाहिए. मैंने हमेशा महसूस किया है कि यह एक मजाक ही है कि भूख हड़ताल को ऐसी जगह में एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाये, जहां अधिकतर लोग किसी-न-किसी तरीके से भूखे रहते हों. हमलोग एक भिन्न समय और स्थान में हैं. हमारे सामने एक भिन्न, अधिक जटिल शत्रु है. हम एनजीओ युग में दाखिल हो चुके हैं- या क्या मुझे कहना चाहिए पालतू शेरों के युग में-जिसमें जन कार्रवाई एक जोखिमभरा (अविश्वसनीय) काम हो गया है. प्रदर्शन अब फंडेड होते हैं, धरना और सोशल फोरम प्रायोजित होते हैं, जो तेवर तो काफी उग्र दिखाते हैं मगर जो वे उपदेश देते हैं, उन पर कभी चलते नहीं. हमारे यहां ‘वर्चुअल` प्रतिरोध की तमाम किस्में मौजूद हैं. सेज के खिलाफ मीटिंग सेज के सबसे बड़े प्रमोटर द्वारा प्रायोजित होती है. पर्यावरण एक्टिविज्म और सामुदायिक कार्रवाइयों को सम्मान और अनुदान उन कारपोरेशनों द्वारा दिये जाते हैं जो पूरे पारिस्थितिक तंत्र की तबाही के लिए जिम्मेवार हैं. ओड़िशा के जंगलों में बक्साइट की खुदाई करनेवाली एक कंपनी, वेदांत, अब एक यूनिवर्सिटी खोलना चाहती है. टाटा के पास दो दाता ट्रस्ट हैं, जो सीधे या छुपे तौर पर देश भर के एक्टिविस्टों और जनांदोलनों को धन देते हैं। क्या यही वजह नहीं है कि सिंगुर में नंदीग्राम के मुकाबले कम आकर्षण है? निस्संदेह टाटाओं और बिड़लाओं ने गांधी तक को धन दिया-शायद वह हमारा पहला एनजीओ था. मगर अब हमारे पास ऐसे एनजीओ हैं, जो खूब शोर मचाते हैं, खूब रिपोर्टें लिखते हैं, मगर जिनके साथ सरकार अधिक राहत महसूस करती है. कैसे हम इन सब को उचित ठहरा सकते हैं? असली राजनीतिक कार्रवाइयों को मटियामेट करनेवाले सर्वत्र किलबिला रहे हैं. ‘वर्चुअल` प्रतिरोध अब बोझ बन गये हैं.
एक समय था जब जनांदोलन न्याय के लिए अदालतों की ओर देखते थे. अदालतों ने ऐसे फैसलों की झड़ी लगा दी, जो इतने अन्यायपूर्ण, इतने अपमानजनक थे, गरीबों के लिए उनके द्वारा इस्तेमाल की जानेवाली भाषा इतनी अपमानजनक थी कि सुन कर सांस रुक-सी जाती है. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले, जिसमें वसंत कुंज मॉल को कंस्ट्रक्शन पुन: शुरू करने की अनुमति दी गयी है और जिसमें जरूरी स्पष्टता नहीं है, में बार-बार कहा गया है कि कार्पोरेशंस की अपराध में लिप्तता का सवाल ही नहीं उठता. कार्पोरेट ग्लोबलाइजेशन के दौर में, कार्पोरेट भूमि लूट, एनरॉन, मोनसेंटो, हेलीबर्टन और बेकटेल के दौर में ऐसा कहने का गहरा अर्थ है. यह इस देश में सर्वोच्च शक्तिशाली संस्थानों के वैचारिक मानस को उजागर करता है. न्यायपालिका, कार्पोरेट प्रेस के साथ अब उदारवादी परियोजना की धुरी की कील लगने लगी है. इस तरह की परिस्थिति में जब लोग महसूस करते हैं कि वे हार रहे हैं, अंतत: केवल अपमानित होने के लिए इन बेहद लंबी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में थका दिये जा रहे हैं, तब उनसे क्या आशा की जा सकती है? निस्संदेह, क्या यह ऐसा नहीं है मानो रास्ते हां या ना में हों-हिंसा बनाम अहिंसा. कई राजनीतिक दल हैं जो सशस्त्र संघर्ष में यकीन रखते हैं, पर अपनी समग्र राजनीतिक रणनीति के एक हिस्से के रूप में. इन संघर्षों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ क्रूर व्यवहार होता है, उनकी हत्या कर दी जाती है, वे पीटे जाते हैं, झूठे आरोपों में कैद कर लिये जाते हैं. लोग इस बात से पूरी तरह अवगत हैं कि हथियार उठाने मतलब है भारतीय राजसत्ता की हर तरह की हिंसा को न्योता देना. जिस पल हथियारबंद लड़ाई एक रणनीति बन जाती है, आपकी पूरी दुनिया सिकुड़ जाती है और रंग फीके पड़ कर काले और सफेद में बदल जाते हैं. लेकिन जब लोग ऐसा कदम उठाने का फैसला करते हैं, क्योंकि हरेक दूसरा रास्ता निराशा में बंद हो चुका हो, तो क्या हमें इसकी निंदा करनी चाहिए? क्या कोई यकीन करेगा कि नंदीग्राम के लोग धरना पर बैठ जाते और गीत गाते तो पश्चिम बंगाल सरकार पीछे हट जाती? हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब निष्प्रभावी रहने का मतलब है -यथास्थिति का समर्थन करना (जो बेशक हममें से कइयों के अनुकूल है). और प्रभावी होना एक भयावह कीमत पर होता है. मैं उनकी निंदा करना कठिन समझती हूं, जो ये कीमत चुकाने को तैयार हैं.

शोमा चौधरी : आपने विभिन्न जगहों के दौरे किये हैं. क्या आपने जिन समस्याओं को पाया उनके अनुभव हमें बता सकती हैं? क्या आप इन जगहों में लड़ी जानेवाली लड़ाइयों का खाका खींच सकती हैं?
अरुंधति राय : बड़ा सवाल है-मैं क्या कह सकती हूं? कश्मीर में सैन्य कब्जा, गुजरात में नव फासीवाद, छत्तीसगढ़ में गृह युद्ध, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ओड़िशा का बलात्कार, नर्मदा घाटी में सैकड़ों गांवों को जलमग्न कर दिया जाना, भुखमरी के कगार पर जीते लोग, वन भूमि का विध्वंस, भोपाल गैस कांड पीड़ितों का पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा नंदीग्राम में यूनियन कार्बाइड, जो अब खुद को दाउ केमिकल्स कहती है, की फिर से चिरौरी करते देखने के लिए जीवित रहना. मैं हाल में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र नहीं गयी हूं, मगर हम जानते हैं कि सैकड़ों-हजारों किसानों ने खुद को मार डाला. इनमें से प्रत्येक जगह का अपना इतिहास रहा है, अर्थव्यवस्था रही है, पारिस्थितिक तंत्र रहा है. किसी की भी सरलीकृत ढंग से व्याख्या नहीं की जा सकती. और कुछ जुड़े हुए तार हैं, बड़े अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक और आर्थिक दबाव हैं, जो उन पर डाले जा रहे हैं. मैं कैसे हिंदुत्व परियोजना के बारे में बात नहीं कर सकती जो एक बार फिर फूट पड़ने की प्रतीक्षा में निरंतर अपना जहर फैला रही है? मैं कहूंगी कि हमारा सबसे बड़ा दोष यही है कि हम अब भी एक देश हैं, संस्कृति हैं, एक समाज हैं, जो लगातार अस्पृश्यता की धारणा को पोषित करता है और व्यवहार में लाता है. जब हमारे अर्थशात्री आंकड़ों की जुगाली करते हैं और वृद्धि दर के बारे में डींग हांकते हैं, दस लाख लोग-मैला ढोनेवाले-अपनी जीविका चलाते हैं-रोज अपने सिर पर दूसरों का कई किलो मल ढोकर. और अगर वे अपने सर पर पाखाना न ढोयें तो वे भूखे मर जायेंगे.

शोमा चौधरी : बंगाल में हालिया सरकारी और पुलिसिया हिंसा को कैसे देखा जाये?
अरुंधति राय : कहीं भी पुलिस और सरकारी हिंसा में कोई फर्क नहीं होता, दोगलेपन और दोमुंहेपन का मुद्दा भी इसमें शामिल है, जिन्हें सभी राजनीतिक दल, मुख्यधारा के वामपंथ सहित सभी, व्यवहार में लाते हैं. क्या एक कम्यूनिस्ट गोली पूंजीवादी गोली से अलग होती है? अजीब घटनाएं घट रही हैं. सऊदी अरब में बर्फ पड़ी. उल्लू दिन के उजाले में बाहर आये. चीनी सरकार ने निजी संपत्ति को मंजूरी देनेवाला बिल स्वीकृत किया. मैं कुछ नहीं जानती यदि इन सबका लेना-देना जलवायु परिवर्तन से है. चीनी कम्यूनिस्ट 21 वीं सदी के सबसे बड़े पूंजीवादी बनने की ओर अग्रसर हैं. हमें क्यों अपने यहां के संसदीय वामपंथ से कुछ अलग होने की उम्मीद करनी चाहिए? नंदीग्राम और सिंगुर स्पष्ट संकेत हैं. यह आपको आश्चर्य में डाल देगा-क्या हरेक क्रांति का अंतिम पड़ाव पूंजीवाद को और आगे बढ़ा देता है? इसके बारे में सोचें-फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रांति, वियतनाम युद्ध, रंगभेदविरोधी संघर्ष, और मान लेते हैं कि भारत में गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम, किस अंतिम पड़ाव पर वे पहुंचे? क्या यह कल्पना का अंत है?

शोमा चौधरी : ीजापुर में माओवादी हमला- ५५ पुलिसकर्मियों की मौत. क्या विद्रोही राजसत्ता के ही दूसरे पहलू हैं?
अरुंधति राय : विद्रोही कैसे राज्य के दूसरे पहलू हो सकते हैं? क्या कोई कह सकता है कि जो रंगभेद के विरुद्ध लड़े-फिर भी उनके तरीके क्रूर थे-राज्य के दूसरे पहलू थे? उनके बारे में क्या जो अल्जीरिया में फ्रांस से लड़े? या वे जो नाजियों से लडे? या वे जो औपनिवेशिक शासन से लड़े? या वे जो इराक पर अमेरिकी कब्जे से लड़ रहे हैं? क्या ये राज्य के दूसरे पहलू हैं? यह सतही, नव खबरचालित `मानवाधिकार` विमर्श है, यह निरर्थक निंदा खेल, जिसे खेलने के लिए हम बाध्य किये जा रहे हैं, हमें राजनीतिज्ञ बनाता है और सही राजनीति को हमसे छीनता है. छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रायोजित और निर्मित गृहयुद्ध चल रहा है, जो खुलेआम बुश डॉक्ट्रिन का हिमायती है-अगर आप हमारे साथ नहीं हैं तो आप आतंकवादियों के साथ हैं. इस युद्ध की धुरी की कील औपचारिक सुरक्षा बलों के अतिरिक्त सलवा जुडूम है, उन आम लोगों की सरकार पोषित मिलिशिया, जो हथियार उठाने और विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनने को बाध्य कर दिये गये. भारतीय राजसत्ता इसे कश्मीर, मणिपुर, नागालैंड में आजमा चुकी है. दसियों हजार मारे जा चुके हैं, हजारों ने यातनाएं सही हैं, हजारों गायब कर दिये गये हैं. कोई भी बनाना रिपब्लिक इन तथ्यों पर गर्व करेगा. अब सरकार इन विफल रणनीतियों को देश के हृदयस्थल में उठा कर ले आयी है. हजारों आदिवासी अपनी खनिज संपन्न जमीन से पुलिस कैंपों में जबरन भेज दिये गये. सैकड़ों गांव जबरन उजाड़ दिये गये. यह भूमि लौह अयस्क से भरपूर है, जिस पर टाटा और एस्सार जैसे कार्पोरेशनों की आंख गड़ी हुई है. एमओयू पर हस्ताक्षर किये जा चुके हैं, पर कोई नहीं जानता कि उनमें क्या है. भूमि अधिग्रहण शुरू हो चुका है. जिन देशों में ऐसी घटनाएं घटी हैं, जैसे कि कोलंबिया, वे दुनिया के सबसे तबाह देशों में से हैं. जब हरेक की नजर सरकार पोषित मिलिशिया और गुरिल्ला दस्तों की निरंतर हिंसा पर लगी थी, बहुराष्ट्रीय कार्पोरेशन बड़ी खामोशी से खनिज संपदा चुरा कर भाग रहे थे. यह उस नाटक का एक छोटा-सा हिस्सा है, जो छत्तीसगढ़ में हमारे लिए रचा गया है.
बेशक यह भयावह है कि 55 पुलिसकर्मी मार दिये गये. मगर वे उसी तरह सरकारी नीतियों के शिकार हुए जैसा दूसरा कोई होता है. सरकार और कार्पोरेशनों के लिए वे तोप का चारा भर हैं- जहां से वे आये थे, वहां इसकी भरमार है. घड़ियाली आंसू बहाये जायेंगे, प्राइम टीवी एंकर हम पर रोब जमायेंगे और तब चारे की और अधिक सप्लाई का इंतजाम कर लिया जायेगा. माओवादी गुरिल्लों के लिए, पुलिस और एसपीओ, जिनको उन्होंने मारा, भारतीय राजसत्ता के सशस्त्र आदमी थे, दमन, यातना, हिरासती हत्याओं और झूठे मुकदमों के मुख्य कर्ताधर्ता थे. कल्पना के किसी भी विस्तार में वे निर्दोष नागरिक, अगर ऐसी कोई चीज होती हो, नहीं थे. मुझे कोई संदेह नहीं कि माओवादी आतंक, और जबरदस्ती के भी, वाहक हो सकते हैं. मुझे कोई संदेह नहीं कि वे अवर्णनीय अत्याचारों के भी आरोपित हैं. मुझे कोई संदेह नहीं कि वे स्थानीय जनता के निर्विवाद समर्थन का दावा नहीं कर सकते, पर कौन कर सकता है? फिर भी कोई गुरिल्ला आर्मी बिना स्थानीय समर्थन के नहीं टिक सकती. यह असंभव है. आज माओवादियों के प्रति समर्थन बढ़ रहा है, न कि घट रहा है. वे कुछ कहते हैं, लोगों के पास रास्ता नहीं है, लेकिन वे उस तरफ हो जाते हैं, जिसे वे कम खराब समझते हैं.
लेकिन तीव्र अन्याय से जूझते प्रतिरोध आंदोलन की तुलना सरकार से करना, जो अन्याय थोपती है, बेतुका है. सरकार ने अहिंसक प्रतिरोध की हरेक कोशिश के सामने दरवाजा भिड़ा दिया है. जब लोग हथियार ले लेते हैं, हर तरह की हिंसा शुरू हो जाती है-क्रांतिकारी, लंपट और एकदम आपराधिक भी. सरकार इस डरावनी स्थिति के लिए खुद जिम्मेवार है.

शोमा चौधरी : ‘नक्सल`, ‘माओवादी, ‘बाहरी`, ये वे शब्द हैं जो इन दिनों व्यापकता से प्रयुक्त हो रहे हैं.
अरुंधति राय : ‘बाहरी` एक आम अभियोग था, जिसका उपयोग सरकारें दमन के शुरुआती दिनों में करती थीं, जो अपनी लोकप्रियता में यकीन रखती थीं और यह कल्पना नहीं कर सकती थीं कि उनके अपने लोग उनके खिलाफ उठ खड़े होंगे. इस समय बंगाल में सीपीएम की यही स्थिति है, हालांकि कुछ लोग कहेंगे कि बंगाल में दमन नया नहीं है, यह केवल चरम पर पहुंच गया है. किसी मामले में ‘बाहरी` क्या होता है? सीमाएं कौन तय करेगा? क्या वे गांव की सीमाएं हैं? तहसील? प्रखंड? जिला? राज्य? क्या संकीर्ण क्षेत्रीय और जातिवादी राजनीति नया कम्यूनिस्ट मंत्र है? नक्सलियों और माओवादियों के बारे में-अच्छा… भारत लगभग एक पुलिस स्टेट बन गया है, जिसमें हरेक, जो वर्तमान हालात से असहमत है, आतंकवादी होने का जोखिम उठाता है. इसलामी आतंकवादियों को इसलामी होना होगा-अत: यह हम सबको अपने में समेटने के लिए बेहतर नहीं है. वे एक बड़ा कैचमेंट एरिया चाहते हैं. इसलिए परिभाषाओं को ढीला, अपरिभाषित, छोड़ना प्रभावी रणनीति है, क्योंकि वह समय दूर नहीं जब हम सभी माओवादी या नक्सलवादी, आतंकवादी या आतंकवादियों के हमदर्द कहे जायें और लोगों द्वारा मार दिये जायें, जो ये वास्तव में नहीं जानते या परवाह करते कि कौन माओवादी या नक्सलवादी है. गांवों में, निस्संदेह, यह सब शुरू हो चुका है, देश भर में हजारों लोग जेलों में बंद पड़े हैं, सरकार को उखाड़ फेंकने की कोशिश करनेवाले आतंकवादी होने के ढीले-ढाले आरोपों के तहत. असली माओवादी या नक्सलवादी कौन है? मेरा इस विषय पर बहुत अधिकार नहीं है, लेकिन यह एक बेहद प्राथमिक इतिहास है.
भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी-भाकपा, 1925 में बनी थी. भाकपा (मार्क्सवादी), जिसे हम सीपीएम कहते हैं, 1964 में भाकपा से टूटी थी और एक नयी पार्टी बनी थी. दोनों निस्संदेह, संसदीय राजनीतिक दल थे. 1967 में सीपीएम कांग्रेस से अलग हुए एक समूह के साथ बंगाल में शासन में आयी. उस समय देहातों में भारी भुखमरी चल रही थी. स्थानीय सीपीएम नेताओं, कानू सान्याल और चारू मजूमदार ने नक्सलबाड़ी जिले में किसान विद्रोह का नेतृत्व किया, जहां से नक्सलवादी शब्द आया है. 1969 में सरकार गिर गयी और कांग्रेस सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में सत्ता में आयी. नक्सली उभार निर्दयता से कुचल दिया गया. महाश्वेता देवी ने इस दौर पर सशक्त ढंग से लिखा है. 1969 में सीपीआइ (एमएल)-मार्क्सवादी लेनिनवादी सीपीएम से टूटी. कुछ समय बाद, 1971 के आसपास, सीपीआइ (एमएल) अनेक पार्टियों में विभक्त हो गयी; मुख्यत: बिहार में केंद्रित सीपीआइ-एमएल (लिबरेशन), आंध्रप्रदेश और बिहार के अधिकतर हिस्सों में कार्यरत सीपीआइ-एमएल (न्यू डेमोक्रेसी) और मुख्यत: बंगाल में सीपीआइ-एमएल (क्लास स्ट्रगल). ये पार्टियां सामान्यत: नक्सलाइट कही गयीं. वे खुद को मार्क्सवादी लेनिनवादी के तौर पर देखती रहीं, न कि माओवादी के रूप में. वे चुनाव, जन कार्रवाई-और जब उन्हें विवश किया गया या उन पर हमला किया गया-तो सशस्त्र संघर्ष में यकीन रखती हैं. तब मुख्यत: बिहार में सक्रिय एमसीसी-माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर 1968 में बना था. हाल में, 2004 में, एमसीसी और पीपुल्स वार ने आपस में विलय कर सीपीआइ- माओवादी का गठन किया. वे एकदम सशस्त्र संघर्ष और राजसत्ता को उखाड़ फेंकने में यकीन रखते हैं. वे चुनाव में भाग नहीं लेते. यह वह पार्टी है जो बिहार, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में गुरिल्ला युद्ध चला रही है.

शोमा चौधरी : भारतीय राजसत्ता और मीडिया समान्यत: माओवादियों को एक ‘आंतरिक सुरक्षा’ के खतरे के रूप में देखते हैं. क्या उन्हें देखने का यह तरीका है?
अरुंधति राय : मैं इसको लेकर निश्चित हूं कि माओवादी खुद को इस तरीके से देखे जाने से खुश ही होंगे.

शोमा चौधरी : माओवादी राजसत्ता को गिराना चाहते हैं. इन निरंकुश सिद्धांतों से, जिनसे वे प्रेरणा लेते हैं, वे क्या विकल्प बना पायेंगें? क्या उनका शासन उत्पीड़क, निरंकुश, अहिंसक नहीं होगा? क्या उनकी कार्रवाई पहले से ही आम जनता की उत्पीड़क नहीं है?
अरुंधति राय : मैं सोचती हूं कि यह जानना हमारे लिए महत्वपूर्ण है कि माओ और स्टालिन दोनों हत्यारे अतीत के संदिग्ध नायक रहे हैं. करोड़ों लोग उनके शासनकाल में मारे गये. जो चीन और सोवियत संघ में हुआ उसके अलावा, पोलपोट ने चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के समर्थन से (जब पश्चिम जान-बूझ कर दूसरी ओर देख रहा था) 20 लाख लोगों को कंबोडिया से भगा दिया और लाखों लोगों को बीमारियों और भुखमरी से विलुप्त होने की कगार पर पहुंचा दिया. क्या हम यह दावा कर सकते हैं कि सांस्कृतिक क्रांति नहीं हुई होती. अथवा सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के लाखों लोग लेबर कैंपों, यातना कक्षों, जासूसों और मुखबिरों के जाल और खुफिया पुलिस के शिकर न हुए होते. इन शासनकालों का इतिहास उतना ही काला है, जितना कि पश्चिमी साम्राज्यवाद का इतिहास, अपवाद स्वरूप यह तथ्य है कि उनका जीवनकाल बेहद छोटा रहा है. हम इराक, फलस्तीन और कश्मीर पर कब्जे की निंदा नहीं कर सकते हैं, यदि हम तिब्बत और चेचेन्या के बारे में चुपी साधे रहें. मैं माओवादियों-नक्सलवादियों-के लिए कल्पना करूंगी, उसी तरह जैसे मुख्यधारा के वामपंथ के लिए, अपने अतीत के प्रति ईमानदार होने की, जो कि लोगों में भविष्य के प्रति विश्वास को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है. हम उम्मीद कर सकते हैं कि इतिहास दोहराया नहीं जायेगा, लेकिन यह दावा करना कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद नहीं करेगा. इस पर भी नेपाल में माओवादियों ने राजशाही के खिलाफ एक बहादुराना और सफल लड़ाई लड़ी. अभी भारत में माओवादी और विभिन्न मार्क्सवादी-लेनिनवादी समूह तीव्र अन्याय के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं. वे केवल राजसत्ता से ही नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि सामंती जमींदारों और उनकी सशस्त्र सेना से भी. वे अकेले लोग हैं जो कुछ सार्थक कर रहे हैं. और मैं इसकी प्रशंसक हूं. यह हो सकता है कि जब वे सत्ता में आयें, जैसा आप कह रही हैं, वे निर्दयी, अन्यायी और निरंकुश हो जायें, या वर्तमान सरकार से भी बदतर हो जायें. हो सकता है, मगर मैं इसे इतना पहले से मान लेने को तैयार नहीं हूं. यदि वे वैसा हुए तो हम उनके खिलाफ लड़ेंगे. और यह ज्यादा संभव है कि मेरे जैसा ही कोई वह पहला आदमी होगा, जिसे वे नजदीक के पेड़ पर लटकायेंगे. लेकिन फिर भी, यह जानना महत्वपूर्ण है कि वे प्रतिरोध के अग्रिम मोरचे का आवेग झेल रहे हैं. हममें से अनेक ऐसी स्थिति में हैं, जहां हम खुद को उनकी तरफ खिंचते हुए पाते हैं, जिनके धर्म में या विचारधारात्मक परिकल्पना में हमारे लिए कोई जगह नहीं है. यह सही है कि हरेक आदमी तेजी से बदलता है, जब वह सत्ता में आता है-मंडेला की एएनसी को देखिए. भ्रष्ट, पूंजीवादी, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सामने दंडवत, गरीबों को उनके घरों खदेड़नेवाले, लाखों कम्यूनिस्टों के हत्यारे सुहार्तो को दक्षिण अफ्रीका के सबसे बड़े नागरिक सम्मान से सम्मानित करती है. किसने सोचा था कि ऐसा हो सकता है? लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि दक्षिण अफ्रीकियों को रंगभेद के खिलाफ संघर्ष से पीछे हट जाना चाहिए था? या उन्हें इस पर पछताना चाहिए? क्या इसका मतलब यह है कि अल्जीरिया को फ्रांसीसी उपनिवेश बने रहना चाहिए था, कि कश्मीरियों, इराकियों और फलस्तीनियों को सैन्य कब्जा स्वीकार कर लेना चाहिए? उन लोगों को, जिनकी गरिमा अपमानित हुई हो, लड़ना चाहिए, क्योंकि वे लड़ाई में नेतृत्व के लिए संतों को नहीं पा सकते.

शोमा चौधरी : क्या हमारे समाज में परस्पर संवाद भंग हुआ है?
अरुंधति राय : हां.

April 5, 2007 at 10:59 pm 4 comments

यह ठीक-ठीक एक युद्ध है और हर पक्ष अपने हथियार चुन रहा है : अरुंधति राय

प्रख्यात लेखिका और समाजकर्मी अरुंधति राय ने लगातार बदलते वैश्विक परिदृश्य और घटनाक्रम के साथ जिस तरह अपने को मोडिफ़ाइ किया है, और अपने सोच को विकसित किया है, उसका उदाहरण है यह बातचीत. इसमें अरुंधति ने अपने पहले के कई नज़रियों पर नये सिरे से विचार किया है और ज़रूरत पड़ने पर उनको एक दूसरी दिशा भी दी है. जैसे कि उनमें पहले अहिंसक प्रतिरोध की का व्यापक आग्रह दिखता था. वे मानतीं थीं कि प्रतिरोध हिंसक होने से उसकी सुंदरता नष्ट होती है. मगर इस बार वे सरकार द्वारा अहिंसक प्रतिरोधों को नज़रअंदाज़ किये जाने और उनको अपमानित किये जाने से काफ़ी क्षुब्ध दिखती हैं. उनमे अब अहिंसक प्रतिरोध का वह आग्रह नहीं दिखता और वे काफ़ी हद तक देश में चल रहे सशस्त्र आंदोलनों के पक्ष में बोलती दिखती हैं. उनका यह बदलाव उन जड़ बुद्धि महामानवों, इसी युग के, के लिए एक नज़ीर है, जिन्होंने एक बार एक ढेरी चुन ली तो जीवन भर उस पर कुंडली मारे बैठे रहते हैं, उसकी गर्द साफ़ करने को भी उससे नहीं डोलते. अंगरेज़ी साप्ताहिक तहलका में छपी यह बातचीत हिंदी में जन विकल्प के अप्रैल अंक में प्रकाशित हुई है. यहां इसकी साभार प्रस्तुति.

  • अनुवाद : रेयाज-उल-हक

शोमा चौधरी : पूरे देश में बढ़ती हुई हिंसा का माहौल है. आप संकेतों को किस तरह ले रही हैं? इन्हें किस परिप्रेक्ष्य में लेना चाहिए?
अरुंधति राय : आप उतने प्रतिभासंपन्न नहीं हो सकते कि आप संकेतों को पढ़ सकें. हमारे पास उग्र उपभोक्तावाद और आक्रामक लिप्सा पर पलता हुआ एक बढ़ता मध्यवर्ग है. पश्चिमी देशों के औद्योगीकरण के विपरीत, जिनके पास उनके उपनिवेश थे, जहां से वे संसाधन लूटते थे और इस प्रक्रिया की खुराक के लिए दास मजदूर पैदा करते थे, हमने खुद को ही, अपने निम्नतम हिस्सों को, अपना उपनिवेश बना लिया है. हमने अपने अंगों को ही खाना शुरू कर दिया है. लालच, जो पैदा हो रही है (और जो एक मूल्य की तरह राष्ट्रवाद के साथ घालमेल करते हुए बेची जा रही है ) केवल अशक्त लोगों से भूमि, जल और संसाधनों की लूट से ही शांत हो सकती है. हम जिसे देख रहे हैं वह स्वतंत्र भारत में लड़ा गया सबसे सफल अलगाववादी संघर्ष है-मध्यवर्ग और उच्चवर्ग का बाकी देश से अलगाव. यह एक स्पष्ट अलगाव है न कि छुपा हुआ. वे इस धरती पर मौजूद दुनिया के अभिजात के साथ मिल जाने के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं. वे सेनापति और संसाधनों का प्रबंध कर चुके हैं, कोयला, खनिज, बक्साइट, पानी और बिजली. अब वे अधिक जमीन चाहते हैं, अधिक कारें, अधिक बम, अधिक माइंस-नयी महाशक्ति के नये महानागरिकों के लिए महाखिलौने-बनाने के लिए. इसलिए यह ठीक-ठीक युद्ध है और दोनों तरफ के लोग अपने हथियार चुन रहे हैं. सरकार और निगम संरचनागत समायोजन के लिए पहुंच गये हैं, विश्वबैंक, एडीबी, एफडीआइ, दोस्ताना अदालती आदेश, दोस्ताना नीति निर्माता, कार्पोरेट मीडिया और पुलिस बल की दोस्ताना मदद इन सब को गरीब आदमियों के गले में बांध देंगे. जो इस प्रक्रिया का विरोध करना चाहते हैं, अब तक धरना, भूख हड़ताल, सत्याग्रह, अदालत और दोस्ताना मीडिया का सहारा लेते रहे हैं, मगर अब अधिक-से-अधिक लोग बंदूकों के साथ जा रहे हैं. क्या हिंसा बढ़ेगी? जी हां, यदि ‘वृद्धि दर` और सेंसेक्स सरकार द्वारा प्रगति और लोगों की बेहतरी मापने के बैरोमीटर बने रहेंगे तब निस्संदेह, यह होगा. मैं संकेतों को कैसे पढ़ती हूं? आकाश पर लिखी चीज पढ़ना मुश्किल नहीं है. वहां जो वाक्य बड़े-बड़े अक्षरों में अंकित है, वह यह है कि मल जाकर पंखे से चिपक गया है (गरीब लोग सिर चढ़ गये हैं – अनु.).

शोमा चौधरी : आपने एक बार टिप्पणी की थी कि आप खुद हालांकि हिंसा का आश्रय नहीं लेंगी, आप सोचती हैं कि देश की वर्तमान परिस्थतियों में इसकी निंदा करना अनैतिक हो गया है. क्या आप अपने इस नजरिये को विस्तृत कर सकती हैं?
अरुंधति राय : एक गुरिल्ले के रूप में मैं बोझ भर रह जाऊंगी. मुझे संदेह है कि मैंने शब्द ‘अनैतिक` का प्रयोग किया होगा-नैतिकता एक भ्रामक विचार है, मौसम की तरह बदलनेवाला. जो मैं महसूस करती हूं वह यह है कि अहिंसक आंदोलन दशकों से देश की प्रत्येक
लोकतांत्रिक संस्था का दरवाजा खटखटा चुके हैं और ठुकराये और अपमानित हो चुके हैं. भोपाल गैस कांड के पीड़ितों और नर्मदा बचाओ आंदोलन को देखिए. एनबीए के पास क्या नहीं है? बहुचर्चित नेतृत्व, मीडिया कवरेज, किसी भी दूसरे जनांदोलन से अधिक संसाधन. क्या गलती हुई? लोग अपनी रणनीति पर फिर से सोचने को बाध्य किये जा रहे हैं. जब सोनिया गांधी दाओस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से सत्याग्रह को प्रोत्साहित करने की शुरुआत करती हैं, यह हमारे लिए बैठ कर सोचने का समय होता है. जैसे कि क्या आम सिविल नाफरमानी एक लोकतांत्रिक राष्ट्र राज्य की संरचना के अंतर्गत संभव है? क्या यह गलत सूचनाओं और कारपोरेट नियंत्रित मास मीडिया के युग में संभव है? क्या भूख हड़तालों की नाभिनाल सेलिब्रिटी पॉलिटिक्स से जुड़ी हुई है? क्या कोई परवाह करेगा यदि नागला माछी या भट्टी माइंस के लोग भूख हड़ताल पर चले जायें? इरोम शर्मिला पिछले छह वर्षों से भूख हड़ताल पर है. यह हमलोगों में से कइयों के लिए एक सबक होना चाहिए. मैंने हमेशा महसूस किया है कि यह एक मजाक ही है कि भूख हड़ताल को ऐसी जगह में एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाये, जहां अधिकतर लोग किसी-न-किसी तरीके से भूखे रहते हों. हमलोग एक भिन्न समय और स्थान में हैं. हमारे सामने एक भिन्न, अधिक जटिल शत्रु है. हम एनजीओ युग में दाखिल हो चुके हैं- या क्या मुझे कहना चाहिए पालतू शेरों के युग में-जिसमें जन कार्रवाई एक जोखिमभरा (अविश्वसनीय) काम हो गया है. प्रदर्शन अब फंडेड होते हैं, धरना और सोशल फोरम प्रायोजित होते हैं, जो तेवर तो काफी उग्र दिखाते हैं मगर जो वे उपदेश देते हैं, उन पर कभी चलते नहीं. हमारे यहां ‘वर्चुअल` प्रतिरोध की तमाम किस्में मौजूद हैं. सेज के खिलाफ मीटिंग सेज के सबसे बड़े प्रमोटर द्वारा प्रायोजित होती है. पर्यावरण एक्टिविज्म और सामुदायिक कार्रवाइयों को सम्मान और अनुदान उन कारपोरेशनों द्वारा दिये जाते हैं जो पूरे पारिस्थितिक तंत्र की तबाही के लिए जिम्मेवार हैं. ओड़िशा के जंगलों में बक्साइट की खुदाई करनेवाली एक कंपनी, वेदांत, अब एक यूनिवर्सिटी खोलना चाहती है. टाटा के पास दो दाता ट्रस्ट हैं, जो सीधे या छुपे तौर पर देश भर के एक्टिविस्टों और जनांदोलनों को धन देते हैं। क्या यही वजह नहीं है कि सिंगुर में नंदीग्राम के मुकाबले कम आकर्षण है? निस्संदेह टाटाओं और बिड़लाओं ने गांधी तक को धन दिया-शायद वह हमारा पहला एनजीओ था. मगर अब हमारे पास ऐसे एनजीओ हैं, जो खूब शोर मचाते हैं, खूब रिपोर्टें लिखते हैं, मगर जिनके साथ सरकार अधिक राहत महसूस करती है. कैसे हम इन सब को उचित ठहरा सकते हैं? असली राजनीतिक कार्रवाइयों को मटियामेट करनेवाले सर्वत्र किलबिला रहे हैं. ‘वर्चुअल` प्रतिरोध अब बोझ बन गये हैं.
एक समय था जब जनांदोलन न्याय के लिए अदालतों की ओर देखते थे. अदालतों ने ऐसे फैसलों की झड़ी लगा दी, जो इतने अन्यायपूर्ण, इतने अपमानजनक थे, गरीबों के लिए उनके द्वारा इस्तेमाल की जानेवाली भाषा इतनी अपमानजनक थी कि सुन कर सांस रुक-सी जाती है. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले, जिसमें वसंत कुंज मॉल को कंस्ट्रक्शन पुन: शुरू करने की अनुमति दी गयी है और जिसमें जरूरी स्पष्टता नहीं है, में बार-बार कहा गया है कि कार्पोरेशंस की अपराध में लिप्तता का सवाल ही नहीं उठता. कार्पोरेट ग्लोबलाइजेशन के दौर में, कार्पोरेट भूमि लूट, एनरॉन, मोनसेंटो, हेलीबर्टन और बेकटेल के दौर में ऐसा कहने का गहरा अर्थ है. यह इस देश में सर्वोच्च शक्तिशाली संस्थानों के वैचारिक मानस को उजागर करता है. न्यायपालिका, कार्पोरेट प्रेस के साथ अब उदारवादी परियोजना की धुरी की कील लगने लगी है. इस तरह की परिस्थिति में जब लोग महसूस करते हैं कि वे हार रहे हैं, अंतत: केवल अपमानित होने के लिए इन बेहद लंबी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में थका दिये जा रहे हैं, तब उनसे क्या आशा की जा सकती है? निस्संदेह, क्या यह ऐसा नहीं है मानो रास्ते हां या ना में हों-हिंसा बनाम अहिंसा. कई राजनीतिक दल हैं जो सशस्त्र संघर्ष में यकीन रखते हैं, पर अपनी समग्र राजनीतिक रणनीति के एक हिस्से के रूप में. इन संघर्षों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ क्रूर व्यवहार होता है, उनकी हत्या कर दी जाती है, वे पीटे जाते हैं, झूठे आरोपों में कैद कर लिये जाते हैं. लोग इस बात से पूरी तरह अवगत हैं कि हथियार उठाने मतलब है भारतीय राजसत्ता की हर तरह की हिंसा को न्योता देना. जिस पल हथियारबंद लड़ाई एक रणनीति बन जाती है, आपकी पूरी दुनिया सिकुड़ जाती है और रंग फीके पड़ कर काले और सफेद में बदल जाते हैं. लेकिन जब लोग ऐसा कदम उठाने का फैसला करते हैं, क्योंकि हरेक दूसरा रास्ता निराशा में बंद हो चुका हो, तो क्या हमें इसकी निंदा करनी चाहिए? क्या कोई यकीन करेगा कि नंदीग्राम के लोग धरना पर बैठ जाते और गीत गाते तो पश्चिम बंगाल सरकार पीछे हट जाती? हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब निष्प्रभावी रहने का मतलब है -यथास्थिति का समर्थन करना (जो बेशक हममें से कइयों के अनुकूल है). और प्रभावी होना एक भयावह कीमत पर होता है. मैं उनकी निंदा करना कठिन समझती हूं, जो ये कीमत चुकाने को तैयार हैं.

शोमा चौधरी : आपने विभिन्न जगहों के दौरे किये हैं. क्या आपने जिन समस्याओं को पाया उनके अनुभव हमें बता सकती हैं? क्या आप इन जगहों में लड़ी जानेवाली लड़ाइयों का खाका खींच सकती हैं?
अरुंधति राय : बड़ा सवाल है-मैं क्या कह सकती हूं? कश्मीर में सैन्य कब्जा, गुजरात में नव फासीवाद, छत्तीसगढ़ में गृह युद्ध, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ओड़िशा का बलात्कार, नर्मदा घाटी में सैकड़ों गांवों को जलमग्न कर दिया जाना, भुखमरी के कगार पर जीते लोग, वन भूमि का विध्वंस, भोपाल गैस कांड पीड़ितों का पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा नंदीग्राम में यूनियन कार्बाइड, जो अब खुद को दाउ केमिकल्स कहती है, की फिर से चिरौरी करते देखने के लिए जीवित रहना. मैं हाल में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र नहीं गयी हूं, मगर हम जानते हैं कि सैकड़ों-हजारों किसानों ने खुद को मार डाला. इनमें से प्रत्येक जगह का अपना इतिहास रहा है, अर्थव्यवस्था रही है, पारिस्थितिक तंत्र रहा है. किसी की भी सरलीकृत ढंग से व्याख्या नहीं की जा सकती. और कुछ जुड़े हुए तार हैं, बड़े अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक और आर्थिक दबाव हैं, जो उन पर डाले जा रहे हैं. मैं कैसे हिंदुत्व परियोजना के बारे में बात नहीं कर सकती जो एक बार फिर फूट पड़ने की प्रतीक्षा में निरंतर अपना जहर फैला रही है? मैं कहूंगी कि हमारा सबसे बड़ा दोष यही है कि हम अब भी एक देश हैं, संस्कृति हैं, एक समाज हैं, जो लगातार अस्पृश्यता की धारणा को पोषित करता है और व्यवहार में लाता है. जब हमारे अर्थशात्री आंकड़ों की जुगाली करते हैं और वृद्धि दर के बारे में डींग हांकते हैं, दस लाख लोग-मैला ढोनेवाले-अपनी जीविका चलाते हैं-रोज अपने सिर पर दूसरों का कई किलो मल ढोकर. और अगर वे अपने सर पर पाखाना न ढोयें तो वे भूखे मर जायेंगे.

शोमा चौधरी : बंगाल में हालिया सरकारी और पुलिसिया हिंसा को कैसे देखा जाये?
अरुंधति राय : कहीं भी पुलिस और सरकारी हिंसा में कोई फर्क नहीं होता, दोगलेपन और दोमुंहेपन का मुद्दा भी इसमें शामिल है, जिन्हें सभी राजनीतिक दल, मुख्यधारा के वामपंथ सहित सभी, व्यवहार में लाते हैं. क्या एक कम्यूनिस्ट गोली पूंजीवादी गोली से अलग होती है? अजीब घटनाएं घट रही हैं. सऊदी अरब में बर्फ पड़ी. उल्लू दिन के उजाले में बाहर आये. चीनी सरकार ने निजी संपत्ति को मंजूरी देनेवाला बिल स्वीकृत किया. मैं कुछ नहीं जानती यदि इन सबका लेना-देना जलवायु परिवर्तन से है. चीनी कम्यूनिस्ट 21 वीं सदी के सबसे बड़े पूंजीवादी बनने की ओर अग्रसर हैं. हमें क्यों अपने यहां के संसदीय वामपंथ से कुछ अलग होने की उम्मीद करनी चाहिए? नंदीग्राम और सिंगुर स्पष्ट संकेत हैं. यह आपको आश्चर्य में डाल देगा-क्या हरेक क्रांति का अंतिम पड़ाव पूंजीवाद को और आगे बढ़ा देता है? इसके बारे में सोचें-फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रांति, वियतनाम युद्ध, रंगभेदविरोधी संघर्ष, और मान लेते हैं कि भारत में गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम, किस अंतिम पड़ाव पर वे पहुंचे? क्या यह कल्पना का अंत है?

शोमा चौधरी : ीजापुर में माओवादी हमला- ५५ पुलिसकर्मियों की मौत. क्या विद्रोही राजसत्ता के ही दूसरे पहलू हैं?
अरुंधति राय : विद्रोही कैसे राज्य के दूसरे पहलू हो सकते हैं? क्या कोई कह सकता है कि जो रंगभेद के विरुद्ध लड़े-फिर भी उनके तरीके क्रूर थे-राज्य के दूसरे पहलू थे? उनके बारे में क्या जो अल्जीरिया में फ्रांस से लड़े? या वे जो नाजियों से लडे? या वे जो औपनिवेशिक शासन से लड़े? या वे जो इराक पर अमेरिकी कब्जे से लड़ रहे हैं? क्या ये राज्य के दूसरे पहलू हैं? यह सतही, नव खबरचालित `मानवाधिकार` विमर्श है, यह निरर्थक निंदा खेल, जिसे खेलने के लिए हम बाध्य किये जा रहे हैं, हमें राजनीतिज्ञ बनाता है और सही राजनीति को हमसे छीनता है. छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रायोजित और निर्मित गृहयुद्ध चल रहा है, जो खुलेआम बुश डॉक्ट्रिन का हिमायती है-अगर आप हमारे साथ नहीं हैं तो आप आतंकवादियों के साथ हैं. इस युद्ध की धुरी की कील औपचारिक सुरक्षा बलों के अतिरिक्त सलवा जुडूम है, उन आम लोगों की सरकार पोषित मिलिशिया, जो हथियार उठाने और विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनने को बाध्य कर दिये गये. भारतीय राजसत्ता इसे कश्मीर, मणिपुर, नागालैंड में आजमा चुकी है. दसियों हजार मारे जा चुके हैं, हजारों ने यातनाएं सही हैं, हजारों गायब कर दिये गये हैं. कोई भी बनाना रिपब्लिक इन तथ्यों पर गर्व करेगा. अब सरकार इन विफल रणनीतियों को देश के हृदयस्थल में उठा कर ले आयी है. हजारों आदिवासी अपनी खनिज संपन्न जमीन से पुलिस कैंपों में जबरन भेज दिये गये. सैकड़ों गांव जबरन उजाड़ दिये गये. यह भूमि लौह अयस्क से भरपूर है, जिस पर टाटा और एस्सार जैसे कार्पोरेशनों की आंख गड़ी हुई है. एमओयू पर हस्ताक्षर किये जा चुके हैं, पर कोई नहीं जानता कि उनमें क्या है. भूमि अधिग्रहण शुरू हो चुका है. जिन देशों में ऐसी घटनाएं घटी हैं, जैसे कि कोलंबिया, वे दुनिया के सबसे तबाह देशों में से हैं. जब हरेक की नजर सरकार पोषित मिलिशिया और गुरिल्ला दस्तों की निरंतर हिंसा पर लगी थी, बहुराष्ट्रीय कार्पोरेशन बड़ी खामोशी से खनिज संपदा चुरा कर भाग रहे थे. यह उस नाटक का एक छोटा-सा हिस्सा है, जो छत्तीसगढ़ में हमारे लिए रचा गया है.
बेशक यह भयावह है कि 55 पुलिसकर्मी मार दिये गये. मगर वे उसी तरह सरकारी नीतियों के शिकार हुए जैसा दूसरा कोई होता है. सरकार और कार्पोरेशनों के लिए वे तोप का चारा भर हैं- जहां से वे आये थे, वहां इसकी भरमार है. घड़ियाली आंसू बहाये जायेंगे, प्राइम टीवी एंकर हम पर रोब जमायेंगे और तब चारे की और अधिक सप्लाई का इंतजाम कर लिया जायेगा. माओवादी गुरिल्लों के लिए, पुलिस और एसपीओ, जिनको उन्होंने मारा, भारतीय राजसत्ता के सशस्त्र आदमी थे, दमन, यातना, हिरासती हत्याओं और झूठे मुकदमों के मुख्य कर्ताधर्ता थे. कल्पना के किसी भी विस्तार में वे निर्दोष नागरिक, अगर ऐसी कोई चीज होती हो, नहीं थे. मुझे कोई संदेह नहीं कि माओवादी आतंक, और जबरदस्ती के भी, वाहक हो सकते हैं. मुझे कोई संदेह नहीं कि वे अवर्णनीय अत्याचारों के भी आरोपित हैं. मुझे कोई संदेह नहीं कि वे स्थानीय जनता के निर्विवाद समर्थन का दावा नहीं कर सकते, पर कौन कर सकता है? फिर भी कोई गुरिल्ला आर्मी बिना स्थानीय समर्थन के नहीं टिक सकती. यह असंभव है. आज माओवादियों के प्रति समर्थन बढ़ रहा है, न कि घट रहा है. वे कुछ कहते हैं, लोगों के पास रास्ता नहीं है, लेकिन वे उस तरफ हो जाते हैं, जिसे वे कम खराब समझते हैं.
लेकिन तीव्र अन्याय से जूझते प्रतिरोध आंदोलन की तुलना सरकार से करना, जो अन्याय थोपती है, बेतुका है. सरकार ने अहिंसक प्रतिरोध की हरेक कोशिश के सामने दरवाजा भिड़ा दिया है. जब लोग हथियार ले लेते हैं, हर तरह की हिंसा शुरू हो जाती है-क्रांतिकारी, लंपट और एकदम आपराधिक भी. सरकार इस डरावनी स्थिति के लिए खुद जिम्मेवार है.

शोमा चौधरी : ‘नक्सल`, ‘माओवादी, ‘बाहरी`, ये वे शब्द हैं जो इन दिनों व्यापकता से प्रयुक्त हो रहे हैं.
अरुंधति राय : ‘बाहरी` एक आम अभियोग था, जिसका उपयोग सरकारें दमन के शुरुआती दिनों में करती थीं, जो अपनी लोकप्रियता में यकीन रखती थीं और यह कल्पना नहीं कर सकती थीं कि उनके अपने लोग उनके खिलाफ उठ खड़े होंगे. इस समय बंगाल में सीपीएम की यही स्थिति है, हालांकि कुछ लोग कहेंगे कि बंगाल में दमन नया नहीं है, यह केवल चरम पर पहुंच गया है. किसी मामले में ‘बाहरी` क्या होता है? सीमाएं कौन तय करेगा? क्या वे गांव की सीमाएं हैं? तहसील? प्रखंड? जिला? राज्य? क्या संकीर्ण क्षेत्रीय और जातिवादी राजनीति नया कम्यूनिस्ट मंत्र है? नक्सलियों और माओवादियों के बारे में-अच्छा… भारत लगभग एक पुलिस स्टेट बन गया है, जिसमें हरेक, जो वर्तमान हालात से असहमत है, आतंकवादी होने का जोखिम उठाता है. इसलामी आतंकवादियों को इसलामी होना होगा-अत: यह हम सबको अपने में समेटने के लिए बेहतर नहीं है. वे एक बड़ा कैचमेंट एरिया चाहते हैं. इसलिए परिभाषाओं को ढीला, अपरिभाषित, छोड़ना प्रभावी रणनीति है, क्योंकि वह समय दूर नहीं जब हम सभी माओवादी या नक्सलवादी, आतंकवादी या आतंकवादियों के हमदर्द कहे जायें और लोगों द्वारा मार दिये जायें, जो ये वास्तव में नहीं जानते या परवाह करते कि कौन माओवादी या नक्सलवादी है. गांवों में, निस्संदेह, यह सब शुरू हो चुका है, देश भर में हजारों लोग जेलों में बंद पड़े हैं, सरकार को उखाड़ फेंकने की कोशिश करनेवाले आतंकवादी होने के ढीले-ढाले आरोपों के तहत. असली माओवादी या नक्सलवादी कौन है? मेरा इस विषय पर बहुत अधिकार नहीं है, लेकिन यह एक बेहद प्राथमिक इतिहास है.
भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी-भाकपा, 1925 में बनी थी. भाकपा (मार्क्सवादी), जिसे हम सीपीएम कहते हैं, 1964 में भाकपा से टूटी थी और एक नयी पार्टी बनी थी. दोनों निस्संदेह, संसदीय राजनीतिक दल थे. 1967 में सीपीएम कांग्रेस से अलग हुए एक समूह के साथ बंगाल में शासन में आयी. उस समय देहातों में भारी भुखमरी चल रही थी. स्थानीय सीपीएम नेताओं, कानू सान्याल और चारू मजूमदार ने नक्सलबाड़ी जिले में किसान विद्रोह का नेतृत्व किया, जहां से नक्सलवादी शब्द आया है. 1969 में सरकार गिर गयी और कांग्रेस सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में सत्ता में आयी. नक्सली उभार निर्दयता से कुचल दिया गया. महाश्वेता देवी ने इस दौर पर सशक्त ढंग से लिखा है. 1969 में सीपीआइ (एमएल)-मार्क्सवादी लेनिनवादी सीपीएम से टूटी. कुछ समय बाद, 1971 के आसपास, सीपीआइ (एमएल) अनेक पार्टियों में विभक्त हो गयी; मुख्यत: बिहार में केंद्रित सीपीआइ-एमएल (लिबरेशन), आंध्रप्रदेश और बिहार के अधिकतर हिस्सों में कार्यरत सीपीआइ-एमएल (न्यू डेमोक्रेसी) और मुख्यत: बंगाल में सीपीआइ-एमएल (क्लास स्ट्रगल). ये पार्टियां सामान्यत: नक्सलाइट कही गयीं. वे खुद को मार्क्सवादी लेनिनवादी के तौर पर देखती रहीं, न कि माओवादी के रूप में. वे चुनाव, जन कार्रवाई-और जब उन्हें विवश किया गया या उन पर हमला किया गया-तो सशस्त्र संघर्ष में यकीन रखती हैं. तब मुख्यत: बिहार में सक्रिय एमसीसी-माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर 1968 में बना था. हाल में, 2004 में, एमसीसी और पीपुल्स वार ने आपस में विलय कर सीपीआइ- माओवादी का गठन किया. वे एकदम सशस्त्र संघर्ष और राजसत्ता को उखाड़ फेंकने में यकीन रखते हैं. वे चुनाव में भाग नहीं लेते. यह वह पार्टी है जो बिहार, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में गुरिल्ला युद्ध चला रही है.

शोमा चौधरी : भारतीय राजसत्ता और मीडिया समान्यत: माओवादियों को एक ‘आंतरिक सुरक्षा’ के खतरे के रूप में देखते हैं. क्या उन्हें देखने का यह तरीका है?
अरुंधति राय : मैं इसको लेकर निश्चित हूं कि माओवादी खुद को इस तरीके से देखे जाने से खुश ही होंगे.

शोमा चौधरी : माओवादी राजसत्ता को गिराना चाहते हैं. इन निरंकुश सिद्धांतों से, जिनसे वे प्रेरणा लेते हैं, वे क्या विकल्प बना पायेंगें? क्या उनका शासन उत्पीड़क, निरंकुश, अहिंसक नहीं होगा? क्या उनकी कार्रवाई पहले से ही आम जनता की उत्पीड़क नहीं है?
अरुंधति राय : मैं सोचती हूं कि यह जानना हमारे लिए महत्वपूर्ण है कि माओ और स्टालिन दोनों हत्यारे अतीत के संदिग्ध नायक रहे हैं. करोड़ों लोग उनके शासनकाल में मारे गये. जो चीन और सोवियत संघ में हुआ उसके अलावा, पोलपोट ने चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के समर्थन से (जब पश्चिम जान-बूझ कर दूसरी ओर देख रहा था) 20 लाख लोगों को कंबोडिया से भगा दिया और लाखों लोगों को बीमारियों और भुखमरी से विलुप्त होने की कगार पर पहुंचा दिया. क्या हम यह दावा कर सकते हैं कि सांस्कृतिक क्रांति नहीं हुई होती. अथवा सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के लाखों लोग लेबर कैंपों, यातना कक्षों, जासूसों और मुखबिरों के जाल और खुफिया पुलिस के शिकर न हुए होते. इन शासनकालों का इतिहास उतना ही काला है, जितना कि पश्चिमी साम्राज्यवाद का इतिहास, अपवाद स्वरूप यह तथ्य है कि उनका जीवनकाल बेहद छोटा रहा है. हम इराक, फलस्तीन और कश्मीर पर कब्जे की निंदा नहीं कर सकते हैं, यदि हम तिब्बत और चेचेन्या के बारे में चुपी साधे रहें. मैं माओवादियों-नक्सलवादियों-के लिए कल्पना करूंगी, उसी तरह जैसे मुख्यधारा के वामपंथ के लिए, अपने अतीत के प्रति ईमानदार होने की, जो कि लोगों में भविष्य के प्रति विश्वास को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है. हम उम्मीद कर सकते हैं कि इतिहास दोहराया नहीं जायेगा, लेकिन यह दावा करना कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद नहीं करेगा. इस पर भी नेपाल में माओवादियों ने राजशाही के खिलाफ एक बहादुराना और सफल लड़ाई लड़ी. अभी भारत में माओवादी और विभिन्न मार्क्सवादी-लेनिनवादी समूह तीव्र अन्याय के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं. वे केवल राजसत्ता से ही नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि सामंती जमींदारों और उनकी सशस्त्र सेना से भी. वे अकेले लोग हैं जो कुछ सार्थक कर रहे हैं. और मैं इसकी प्रशंसक हूं. यह हो सकता है कि जब वे सत्ता में आयें, जैसा आप कह रही हैं, वे निर्दयी, अन्यायी और निरंकुश हो जायें, या वर्तमान सरकार से भी बदतर हो जायें. हो सकता है, मगर मैं इसे इतना पहले से मान लेने को तैयार नहीं हूं. यदि वे वैसा हुए तो हम उनके खिलाफ लड़ेंगे. और यह ज्यादा संभव है कि मेरे जैसा ही कोई वह पहला आदमी होगा, जिसे वे नजदीक के पेड़ पर लटकायेंगे. लेकिन फिर भी, यह जानना महत्वपूर्ण है कि वे प्रतिरोध के अग्रिम मोरचे का आवेग झेल रहे हैं. हममें से अनेक ऐसी स्थिति में हैं, जहां हम खुद को उनकी तरफ खिंचते हुए पाते हैं, जिनके धर्म में या विचारधारात्मक परिकल्पना में हमारे लिए कोई जगह नहीं है. यह सही है कि हरेक आदमी तेजी से बदलता है, जब वह सत्ता में आता है-मंडेला की एएनसी को देखिए. भ्रष्ट, पूंजीवादी, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सामने दंडवत, गरीबों को उनके घरों खदेड़नेवाले, लाखों कम्यूनिस्टों के हत्यारे सुहार्तो को दक्षिण अफ्रीका के सबसे बड़े नागरिक सम्मान से सम्मानित करती है. किसने सोचा था कि ऐसा हो सकता है? लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि दक्षिण अफ्रीकियों को रंगभेद के खिलाफ संघर्ष से पीछे हट जाना चाहिए था? या उन्हें इस पर पछताना चाहिए? क्या इसका मतलब यह है कि अल्जीरिया को फ्रांसीसी उपनिवेश बने रहना चाहिए था, कि कश्मीरियों, इराकियों और फलस्तीनियों को सैन्य कब्जा स्वीकार कर लेना चाहिए? उन लोगों को, जिनकी गरिमा अपमानित हुई हो, लड़ना चाहिए, क्योंकि वे लड़ाई में नेतृत्व के लिए संतों को नहीं पा सकते.

शोमा चौधरी : क्या हमारे समाज में परस्पर संवाद भंग हुआ है?
अरुंधति राय : हां.

April 5, 2007 at 5:41 pm 3 comments


calander

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