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बंगाल में विकास का मिथ : दावों की असलियत

दावे उतने सच भी नहीं
रेयाज-उल-हक /सुष्मिता गोस्वामी

नंदीग्राम नरसंहार को जायज ठहराने का बंगाल सरकार ने एक आसान रास्ता अपनाया था, यह दावा करके कि राज्य में कृषि का विकास इस हद तक हो चुका है कि अब वहां औद्योगिक विकास ही एक मात्र रास्ता बचता है. कृषि से जो अतिरिक्त आय हो रही है और जो अतिरिक्त रोजगार पैदा हुआ है, उसकी खपत उद्योगों में ही हो सकती है और इसीलिए उद्योग इतने जरूरी हैं. सरकार वहां जो कर रही है वह ठीक -ठीक यही है और उसका विरोध कर रही शक्तियां दर असल समाज को पीछे ले जाना चाहती हैं. मगर वास्तव में यह जितना आसान रास्ता था उतना ही क मजोर भी. खुद आंकड़े सीपीएम के दावों पर सवाल उठाते हैं. माकपा पश्चिम बंगाल में कृषि विकास के दावे करती नहीं थकती. लेकिन कृषि से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में इस क्षेत्र में स्थिति भारत से बहुत अलग नहीं है. 1971 से 1981 एवं 1981 से 1991 में भूमिहीन किसानों की वृद्धि दर जमीनवाले किसानों के आंकड़े को भी पार कर गयी. दूसरी तरफ सीमांत किसानों की प्रतिशतता में वृद्धि हुई है. मध्यम एवं छोटे किसानों की संख्या में गिरावट आयी है. छह अक्टूबर, 2005 का गणशक्ति (सीपीएम के बांग्ला मुखपत्र) में कहा गया है कि कृषि के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद इसके विकास का बहुत छोटा हिस्सा भी खेत मजदूरों तक नहीं पहुंचा है. अनुसूचित जाति/जनजातियों एवं अन्य पिछड़ी जातियों से आनेवाले मजदूर सामाजिक व आर्थिक दोनों रूप से पिछड़ रहे हैं. 2001 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में किसानों की कुल संख्या 129.64 लाख थी. इस गणना में वे सीमांत किसान शामिल नहीं थे, जिन्होंने साल में छह महीने से कम काम किया था. उनमें 56.13 लाख किसान सरकारी रिकार्ड में हैं. दूसरे शब्दों में वे या तो जमीन के मालिक हैं या बंटाईदार हैं. बाकी 73.51 लाख भूमिहीन किसान हैं. इस प्रकार किसानों का 53.7 प्रतिशत खेत मजदूर हैं. 1991 में खेत मजदूरों का प्रतिशत 46.11 प्रतिशत था एवं उनकी संख्या 54.82 लाख थी. इस प्रकार वाम मोरचा सरकार का कृषि विकास का दावा खुद ही खारिज हो जाता है. इसके अलावा ऐसे खेत मजदूरों को सामान्यत: साल में तीन महीने से अधिक भी काम नहीं मिलता है. विकास के इस तथाकथित पहिये ने गरीब किसानों को बुरी तरह बरबाद कि या है. 1971 में भूमिहीन खेत मजदूरों की संख्या 32.72 लाख थी. 1981 में 38.92 लाख एवं 1999 में यह बढ़ कर 50.55 लाख हो गयी. अभी बंगाल में भूमिहीन खेत मजदूर 73 लाख 18 हजार हैं. पश्चिम बंगाल में 26 साल के वाम मोरचा शासन काल के दौरान 1977-78 से 2003-04 के बीच अन्न उत्पादन 89.70 लाख टन से बढ़ कर 160 लाख टन हो गया-प्रतिवर्ष 2.3 प्रतिशत से भी कम वृद्धि दर पर. वाम मोरचा सरकार यह दावा करती है कि इसके शासन काल में पश्चिम बंगाल देश में पहले नंबर पर आ गया है. आंकड़े बताते हैं कि 2002-03 में पश्चिम बंगाल 144 लाख टन के साथ देश में चौथे नंबर पर था, (367 लाख टन के साथ उत्तरप्रदेश पहले नंबर पर था). राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (1999-2000) यह स्पष्ट करता है कि भारतीय गांवों में ग्रामीण आबादी का लगभग 27.1 प्रतिशत जीवनयापन करने योग्य स्तर से भी नीचे जी रहा था. पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से भी बदतर है-वह़ां 31.85 प्रतिशत लोग जीवनयापन योग्य स्तर से भी नीचे जी रहे हैं. सर्वेक्षण यह भी बताता है कि प्रति व्यक्ति ग्रामीण रोजगार की राष्ट्रीय दर 1.3 प्रतिशत के उलट पश्चिम बंगाल में यह सिर्फ 1.2 प्रतिशत थी. इस दौरान राज्य में प्रतिव्यक्ति खर्च 454 रुपये था, जबकि संपूर्ण भारत के लिए यह आंकड़ा 486 रुपये था. वाम मोरचे की सरकार का दावा है कि भूमि सुधार का फायदा लगभग 41 फीसदी ग्रामीणों को मिला है (25.44 पट्टेदार एवं 14.88 लाख पंजीकृत बंटाईदार). लेकि न राज्य के सर्वेक्षण पर एक स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार पट्टेदार एवं बंटाईदारों की जमीन में सिंचाई की उपलब्धता आधी जमीन में भी बहुत कम है. उनमें से एक बड़ा हिस्सा आवश्यक खाद का भी इस्तेमाल नहीं कर पाता. इनमें 10 से 15 प्रतिशत लोगों को ही प्राथमिक कृषि समितियों से ऋण मिलता है. छोटी जोत के कारण 90 फीसदी पट्टेदार व 83 प्रतिशत बंटाईदार काम के लिए दूसरे जगहों पर जाने को बाध्य होते हैं. उनमें से 60 प्रतिशत पट्टेदार एवं 52 प्रतिशत बंटाईदार साल में छह महीने कहीं दूसरी जगह काम करते हैं. ये आंकड़े बताते हैं बंगाल की वामपंथी सरकार झूठ के सहारे गढे गये विकास के मिथ की असलियत बताते हैं. अब भी यह सरकार सेज़ के लिए नये इलाकों की तलाश में है.

सुष्मिता गोस्वामी पटना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की छात्रा हैं.

May 14, 2007 at 9:58 pm Leave a comment

1857 और हिंदू फ़ासिस्टों के षड्यंत्र

आज भी उन लोगों की कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि अंगरेज़ों ने देश को मुसलमानों की गुलामी से आज़ाद कराया. वे इसी के साथ कम्युनिस्टों को गरियाते रहते हैं कि वे अंगरेज़ों के हाथों में खेलते रहे हैं और उनके इशारों पर ही वामपंथी इतिहासकार देश का गलत इतिहास लिखते आये हैं. मगर यह लेख आप पढें और हमें बताएं कि कौन अंगरेज़ों की चाकरी में लगा था (और अब भी है), किसने अंगरेज़ों के हाथों की कठपुतली बनना स्वीकार किया और अब भी बना हुआ है, और यह कि कौन अब भी अंगरेज़ों ( अब के साम्राज्यवादियों) के इशारे पर अपने ही देश की जनता के खिलाफ़ युद्धरत है.

प्रणय कृष्ण
अंगरेजों ने सांप्रदायिक आग भड़काने की कोशिशों में
कोई कमी नहीं रखी, फिर भी 1857 के स्वाधीनता संग्राम में साम्राज्यवाद विरोधी धुरी के इर्द-गिर्द हिंदू-मुस्लिम एकता बरकरार रही. वहीं 1857 के विद्रोह के दमन के बाद का राष्ट्रीय आंदोलन अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति का बार-बार शिकार होता रहा. कारण यह था कि कांग्रेसी नेतृत्व कभी उस साझा संस्कृति या
गंगा-जमुनी तहजीब की ताकत को पहचान ही न पाया जो सैकड़ों वर्षों
के दौरान विकसित हुई थी. 1857 के विद्रोहियों ने राष्ट्रवाद और
धर्मनिरपेक्षता को आधुनिक विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में बैठ कर
योरप से नहीं सीखा था, पूरे मध्यकाल के दौरान अनेक मुस्लिम राजवंश जो
दिल्ली की गद्दी पर बैठे उन सभी ने धर्म और धर्माचार्यों को राजकाज
से अलग रखा. शरीयत के कानून को कभी भी राज्य के अपने कानूनों
पर तरजीह नहीं दी गयी. धर्मचार्यों को पठन-पाठन का काम दिया गया
और राजकाज से उन्हें अलग रखा गया. मध्यकाल का भारतीय राज्य कभी भी
धर्मराज्य नहीं बन सका. मुगलकाल के दौरान न केवल हिंदू-मुस्लिम शासक
वर्गों के बीच सत्ता की साझेदारी विकसित हुई बल्कि सूफी और
भक्ति आंदोलनों के प्रभाव से समाज में सांप्रदायिक सौहार्द भी स्थापित
हुआ. 1857 की बेमिसाल हिंदू-मुस्लिम एकता सूअर और गाय की चर्बी
वाले कारतूसों के कारण नहीं पैदा हुई थी (जैसा कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने
षड्यंत्रपूर्वक साबित करने की कोशिश की थी) बल्कि यह इसी दीर्घ पृष्ठभूमि की उपज थी.
साथ ही साथ इस एकता का आधार पूर्णत: लौकिक था. बर्तानवी उपनिवेशवाद ने अपनी लूट-खसोट
की नीति के तहत भारत की कृषि, व्यापार, उद्योग-धंधों सबको चौपट कर
दिया था और उसकी लूट के शिकार सभी धर्मों के लोग बन रहे थे. इस बात
ने धर्मों की भिन्नता के परे पीड़ितों की एकता का भौतिक आधार
मुहैया कराया था.
यह महज संयोग नहीं कि कांग्रेस का जन्मदाता बना एलन
आक्टोवियन ह्यूम, जो इस विद्रोह के समय इटावा का चीफ मजिस्ट्रेट था, 23,
मई 1857 को जब इटावा बुलंदशहर और मैनपुरी में विद्रोह हुआ तो वह
औरत का भेष धर कर भागा था. इस गदर के भुक्तभोगी के रूप में ह्यूम ने
महसूस कि या कि यदि क्रांति से बचना है तो हिंदुस्तानियों के गुस्से
को एक सेफ्टी वाल्व देना जरूरी होगा. इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि
1857 से अंगरेजों ने यह भी सबक लिया कि हिंदू-मुस्लिम एकता को
तोड़े बगैर भारत पर राज करना मुश्किल होगा. इस सिलसिले में 1873-77
में प्रकाशित 8 खंडोंवाली पुस्तकमाला ‘हिस्ट्री आफ इंडिया ऐज टोल्ड
बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस’ का जिक्र किया जा सकता है, जिसे ब्रिटेन
के विदेश मंत्री सर हेनरी एलियट द्वारा तैयार कराया गया और प्रो जॉन
डाउसन द्वारा संपादित किया गया था. इस पुस्तकमाला में बड़ी सावधानी से
कल्पना और तथ्यों को मिलानेवाली ऐसी अतिशयोक्तिपूर्ण व सांप्रदायिक
सामग्री का चयन किया गया है, जिससे कि यह सिद्ध किया जा सके कि भारत
में दो राष्ट्र थे. देशी हिंदुओं पर विदेशी मुसलमानों ने विजय प्राप्त की
ओर यह विदेशी मुस्लिम अत्याचार 600 वर्षों तक चलता रहा और वास्तव में
अंगरेजों ने आकर हिंदुओं को इससे मुक्त किया. लेकिन अपने
धूर्ततापूर्ण उद्देश्य से गढे गये इस नये इतिहास में भी अंगरेजों को
मानना पड़ा है कि भारतीय अपनी साझी विरासत से पूरी तरह नावाकिफ नहीं
है. इसलिए पुस्तक की भूमिका में इलियट ने दुख व्यक्त किया है कि भारत
के हिंदू लेखकों ने भी ऐसा विवरण दिया है कि मानो मुस्लिम शासक
भारतीय थे और उन्होंने मुसलमानों के हाथों अपने देशवासियों के
उत्पीड़न की चर्चा नहीं की है. कहना न होगा कि दूसरी ओर भारतीय
इतिहास का हिंदू-मुस्लिम भाष्य तैयार करनेवाले भी अंगरेजों के ही खैरख्वाह
थे और ये दो किस्म के भाष्य ‘द्विराष्ट्रवाद’ के सिद्धांतकारों के काम
आये, इस प्रकार अंगरेजों की कृपा से जो नया इतिहासबोध तैयार हुआ
उसने इस तथ्य को झुठला दिया कि दरअसल मध्यकाल में हिंदू और मुस्लिम
सामंतों की सत्ता में साझेदारी थी. किसान और आम जनता इस साझी सत्ता
से पीड़ित थी, किसी शासक के मुस्लिम या हिंदू होने से नहीं. इसी सामंती
सत्ता के खिलाफ आम जनता के संघर्ष की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के
बतौर भक्ति तथा सूफी आंदोलन पैदा हुए, जिनमें दोनों समुदायों के
किसानों, मेहनतकशों की एकता झलकी. सच तो यह है कि अलग-अलग
धार्मिक पहचानोंवाले राजनैतिक समुदायों के बतौर हिंदू और
मुसलमान पूरे मध्यकाल में दिखाई ही नहीं देते. इसलिए कुछ
इतिहासकारों ने अतीत पर आरोपित इन धार्मिक अस्मिताओं को कल्पित
समुदाय का बना दिया है. हिंदुत्व के सबसे बड़े सिद्धांतकार सावरकर ने
भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा में पितृभूमि और पुण्यभूमि की जुड़वां
कसौटी निर्धारित की. यह कसौटी बड़ी कुटिलता से मुसलमानों और
ईसाइयों को ही भारतीय राष्ट्र से बाहर क रने के लिए बनायी गयी है
क्योंकि उनकी पुण्यभूमि अर्थात उनके धर्मों का उद्गमस्थल भारत से
बाहर हैं. पितृभूमि यदि एकमात्र आधार होता है तो वे भी भारतीय राष्ट्र का
हिस्सा होते क्योंकि वे भी पीढ़ी दर पीढ़ी इस देश में रहते आ रहे हैं.
भारतीय बौद्ध, जैन और सिख, जिनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों ही
भारत है, संघियों के अनुसार हिंदू धर्म में जबरन समेट लिये जाते है.
सावरकर की इस बेहद तंगनजर और बेवकूफीभरी अवधारणा का इस्तेमाल यदि
दूसरे देश में करने लग जायें तो उन देशों में बसे हिंदुओं का क्या
होगा? चीनी, जापानी, सिंहली से लेकर तमाम पूर्व एशियाई देशों के
बौद्धों को तो उन राष्ट्रों का नागरिक ही नहीं कहा जा सकेगा.
अमेरिका, यूरोप से लेकर दुनिया भर के ईसाइयों को इजरायल
फलस्तीन का नागरिक बनना होगा. फिर मुसलमानों, ईसाइयों की
पुण्यभूमि भी क्या सिर्फ़ मक्क, मदीना या येरूशलम तक ही सीमित है? उनकी
हजारों दरगाहें खानकाहें, मस्जिद और गिरिजाघर तो इसी देश में आबाद
है. अधिकतर भारतीय मुसलमान अपनी कथित पुण्यभूमि अर्थात मक्का-मदीना
कभी गये ही नहीं. आम लोगों की बात छोड़िए बहुतेरे मुगल बादशाहों तक
ने हज नहीं किया था. इसलिए पुण्यभूमि की बात ही उठानी बेमानी है, देश तो
उनका होता है जिनका देश की सत्ता और संपत्ति में हिस्सा होता है. इसे
अच्छी तरह जाननेवाले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकार संघी लोग देश
की बहुसंख्यक जनता को अपने ही देश की संपत्ति से महरूम करके
साम्राज्यवाद और उसके मुट्टी भर दलालों की झोली में देश की प्रभुसत्ता
और संपत्ति की अर्पित करते जाने के सत्ता षड्यंत्र के सहभागी हैं.
जाहिर है कि सच्चे राष्ट्रवाद को अमल में लाने के लिए देश की सत्ता और
संपत्ति पर देश की बहुसंख्यक मेहनतकशों के अधिकार की स्थापना करनी
होगी और यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धूर्ततापूर्ण कुचक्र को
धूल में मिला कर ही संभव है. आजादी के आंदोलन के दौरान कांग्रेस
के अंदर अंगरेजी राज के प्रति ढुलमुल रुख तो था ही, जमींदारी और कट्टर
पूंजीवादी हितों के ऐसे पैरोकार भी मौजूद रहे जिन्होंने हिंदुत्व
को हवा दी. कई बार मदन मोहन मालवीय जैसे हिंदू महासभाई तत्व
कांग्रेस की नेतृत्वकारी भूमिका में रहे. तिलक , लाजपत राय की पीढी़
के हिंदू आग्रहों को छोड़ भी दिया जाये तो स्वयं महात्मा गांधी द्वारा
हिंदू प्रतीकों के इस्तेमाल ने अवश्य ही राष्ट्रीयता की संकल्पना को एक
हिंदू रंग देने में सहायता की और मुसलमानों के अलगाव को बढा़या.
गांधी जी द्वारा साम्राज्यवाद विरोधी जनकार्रवाइयों के ऊंचाई पर
पहुंचने के समय आंदोलन वापस लेने की घटनाओं ने भी बार-बार
सांप्रदायिक ताकतों को राजनीतिक शून्य भरने का अवसर दिया. सरकारी
इतिहास विभाजन का दोष महज जिन्ना और मुस्लिम लीग पर मढ़ता है, लेकिन
वास्तविकता यह है कि हिंदू कट्टरपंथ को कांग्रेस के भीतर लगातार
संरक्षण मिला है. पहले तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस ने दो
राष्ट्र के सिद्धांत (सावरकर और जिन्ना दोनों ही जिसके पैरोकार थे) के
समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और बंटवारा होने दिया, और फिर बंटवारे
के बाद भी उसकी आग को बीच-बीच में होनेवाले सांप्रदायिक दंगों के
जरिये और पाकिस्तान विरोधी युद्धोन्माद के सहारे लगातार जीवित रखा गया.
यहां तक कि नेहरू के दौर से ही कम्युनिस्टों का विरोध करने के
लिए संघ को संरक्षण दिया गया, और इंदिरा व राजीव के दौर में तो
हिंदू वोटों के लिए कांग्रेस और संघ परिवार की सांठ-गांठ अब
सर्वज्ञात तथ्य है. जहां आजादी के बाद भी देश की नसों में इस तरह
सांप्रदायिक जहर लगातार घोला जाता रहा हो,वहां क्या आश्चर्य कि अनुकूल
परिस्थिति आने पर एक पक्की सांप्रदायिक और फासिस्ट विचारधारा सत्ता की
मंजिल पा ले. कांग्रेसी राष्ट्रवाद और भाजपाई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में
जरूर कई फर्क हो सकते हैं, मगर इतना तो तय है कि 1857 की
जुझारू हिंदू-मुस्लिम एकता का दोनों निषेध करते हैं. इस निषेध का
निषेध करके ही हम अपनी क्रांतिकारी राष्ट्रवादी विरासत को फि र से प्राप्त
कर सकते हैं.

समाप्त

May 13, 2007 at 6:23 pm 2 comments

भारतीय राष्ट्र की प्रसव पीडा़ 2

प्रणय कृष्ण
1857 का पहला स्वाधीनता संग्राम प्रगतिशील राष्ट्रवाद का प्रस्थान बिंदु है. उसकी विरासत राष्ट्र निर्माण के कांग्रेसी मॉडल का भी सकारात्मक निषेध करती है जिसकी कमजोरियों का लाभ उठा कर सांप्रदायिक फासिस्ट ताकतें पिछले 8 दशकों से शक्ति संचय करती रही हैं. यह विरासत हमारे लिए अविस्मरणीय है क्योंकि आज भी दूसरी आजादी के लिए, साम्राज्यवाद और सांप्रदायिक फासीवाद की दोहरी चुनौतियों का सामना महज संसदीय और संवैधानिक दायरे में ही कैद रह कर नहीं किया जा सकता. 1857 के विद्रोह के पीछे 18वीं सदी से ही चली आ रही किसान और आदिवासी विद्रोहों की लंबी परंपरा थी. ये सारे विद्रोह क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर घनघोर सामाजिक उत्पीड़न, सामंती जुल्म और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के संरक्षण में गांवों में जमींदार-महाजन गंठजोड़ की अमानवीय लूट खसोट के खिलाफ फूट पड़े थे. स्मरणीय है कि उन दिनों देहाती इलाकों में इसी लूट-खसोट के चलते अकालों का सिलसिला बना रहता था. यह सच है कि इन विद्रोहों के पीछे आजाद व लोकतांत्रिक भारत बनाने का कोई सचेत सिद्धांत नहीं था, लेकिन इनमें कोई ऐसी संजीदा और दमदार बात जरूर थी जो बाद के वर्षों में चले आजादी के कांग्रेसी आंदोलन में व्यापारिक तबके और उभरते मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के बड़े हिस्सों की सांठगांठ की राजनीति और नपे-तुले विरोध से इन विद्रोहों को बिल्कुल अलग दिखाती है. 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने इन विद्रोहों को एक बड़ा साम्राज्यवाद और सामंतवाद विरोधी फलक दिया और सही मायने में एक राष्ट्रीय आयाम भी. ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ग्रामीण समाज में उसके प्रमुख स्तंभ जमींदार और महाजन विद्रोहियों के निशाने पर थे. जाहिर है कि एक ही साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति और सामाजिक शक्ति संतुलन में बदलाव लाकर ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदार-महाजनों के खिलाफ किसान जनता का वर्चस्व कायम करना विद्रोहियों का ध्येय था.
1857 की लड़ाई की सबसे बड़ी भिन्नता तो यही थी कि इसमें हिंदुस्तानियों ने सशस्त्र संघर्ष के जरिये ब्रिटिश शासन और उसके दलालों को बलपूर्वक उखाड़ फेंकने की कोशिश की थी, जबकि बाद के कांग्रेसी नेतृत्व ने आजादी की लड़ाई को निष्क्रिय प्रतिरोध, सत्याग्रह, कानून लड़ाइयों और अंग्रेजों के साथ मोल-तोल के दायरे में ही सीमित रखने की भरसक कोशिश की. 1857 की मूल चालक शक्ति किसान थे, जबकि कांग्रेसी नेतृत्ववाले स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व व्यापारिक तबकों और उभरते मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों ने किया. यही कारण था कि जब-जब निचली जनता और किसान-मजदूर निर्णायक हस्तक्षेप की स्थिति में पहुंचते थे, कांग्रेसी नेतृत्व आंदोलन स्थगित कर देता था. 5 फरवरी, 1922 को चौरी चौरा कांड के बाद गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेना इसी प्रवृत्ति का जीता-जागता उदाहरण है.

कल पढें अंतिम किस्त.

May 10, 2007 at 6:34 pm Leave a comment

क्या महाबली लौटेगा अपनी मांद में

एमजे अकबर के लिए अलग से कोई परिचय देने की ज़रूरत नहीं है. आजकल वे अंतररष्ट्रीय मुद्दों,कखासकर अमेरिकी नीतियों, पर लगातार लिख रहे हैं.अपने इस लेख में वे अमेरिका के इराक से लौटने को लेकर अमेरिका में चल रहे राजनीति की चर्चा कर रहे हैं. यह लेख प्रभात खबर में हाल ही में प्रकाशित हो चुका है. वहां से साभार.

पुनर्वापसी की ओर दुनिया
एमजे अकबर
शांति की बात करना क्या देशभक्ति है? अमेरिका आज बहस के इसी मुद्दे से गुजर रहा है. इराक में उसकी हार का निहितार्थ और जीत का अर्थ तलाशा जा रहा है. निश्चय ही युद्ध को सदैव देशभक्ति से जोड़ा गया है. किसी भी नेतृत्व के लिए एक हाथ में बंदूक और दूसरे हाथ में बिगुल जीत का ध्वज माना गया. जो जितना ज्यादा अपनी मातृभूमि का कर्ताधर्ता बनता जाता है, वह अपने लोगों को उतना ही अधिक कब्र की ओर धकेल सकता है. आतंक वादियों की देशभक्ति भी ऐसा ही मजबूत लबादा है, जो अपने पापों को ऐसे ही गैरजिम्मेदार तरीके से घालमेल कर बहाना-बनाना चाहते हैं.
इसी तरह आज कमांडर इन चीफ की महिमा की रक्षा करना भी देशभक्ति का तकाजा बन गया है. भले ही यह कोई बाध्यता नहीं है. राजनीतिज्ञ वोट की तलाश में शांति प्रयासों को युद्ध में तब्दील करने की मंशा रखते हैं. वजह यह कि शांति अस्पष्ट होती है, जबकि युद्ध में बल की प्रधानता दिखती है. यद्यपि आम धारणा यही है कि मतदाता शांति को ही पसंद करते हैं, पर सामान्य अनुभव हमें बताता है कि युद्ध के बाद मतदाता ज्यादा प्रभावित किये जा सकते हैं, जबकि डर की भावना को सर्वाधिक मुखर रू प में युद्ध के माध्यम से व्यक्त कि या जा सक ता है. भावनाओं और तर्क का यही वह शक्तिशाली समिश्रण है, जिसे बुश ने पिछले पांच वर्ष से बनाये रखा है. अमेरिकी चेतना में डर की भावना बुश के कारण नहीं, बल्कि 9/11 की घटना से पैदा हुई. इस पूरे मुद्दे को जॉर्ज बुश ने ब़डी होशियारी से भुनाया है. उन्होंने अमेरिकन एजेंडा के बजाय बुश बजेंडा को सर्वोपरि रखा. यही वह सामान्य कारण है, जिस बिना पर आफ गानिस्तान और इराक युद्ध के बीच अंतर तलाशा जा सकता है. ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौंपने से तालिबानियों के इनकार करने से अमेरिका को उस पर हमला क रने की वैधता मिल गयी, लेकिन सद्दाम हुसैन के खिलाफ युद्ध आतंकवाद के खिलाफ युद्ध जैसा नहीं माना जा सकता.
इराक युद्ध ने इस बात को बार-बार सिद्ध किया कि जॉर्ज बुश और उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने इस पूरे प्रकरण को उपहास का विषय बना दिया. इसके लिए तथ्यों को तोड़ मोड़ कर और अतिशयोक्ति पूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया. सद्दाम हुसैन पर लादेन का सहयोगी होने का झूठा आरोप थोपा गया. आतंक के खिलाफ युद्ध का मुहावरा लोगों में उत्सुकताका विषय बना दिया गया. एक अदृश्य आतंक की सत्ता के खिलाफ किस तरह लड़ा जाये, यह बात अचानक ही नहीं पैदा हुई. अपने शत्रुओं को निशाने पर लेने और व्हाइट हाउस को सशक्त बनाने के लिए इन बातों को जानबूझ कर हवा दी गयी. बुश से जो सबसे बड़ी गलती हुई वह यह थी कि अपने दुश्मनों को सजा देने की उनकी इच्छा इन सबके बावजूद एक अधूरा सपना ही रह गयी. उनकी आशाओं के विपरीत इराक में चरमपंथियों के उभार से यह बात सिद्ध हुई कि उनके लक्ष्य ने उन्हीं के लिए विध्वंसक परिणाम पैदा कि ये. वहां रोज हो रही हिंसक घटनाएं, सेना पर अतिरिक्त दबाव, बढ़ रहे वित्तीय खर्च और जनविरोध बताते हैं कि बुश और उनकी रिपब्लिक न पार्टी के लिए यह पूरा अभियान बहुत महंगा सिद्ध हुआ. फिर भी युद्ध को सही ठहराने की कोशिश से बुश की दृढ़ता का पता चलता है. हालांकि इसकी उपयोगिता खत्म हो गयी है, लेकि न इसका राजनीतिक फ़ायदा तो उठाया ही जा सकता है. अब बुश और डेमोक्रे ट्स के बीच बहस का मुद्दा यह है कि क्या इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की कोई समय सीमा तय होनी चाहिए? डेमोक्रे ट्स चाहते हैं कि अगले 18 महीनों के अंदर, यानी नया राष्ट्रपति चुने जाने से पूर्व सैनिकों की वापसी हो जानी चाहिए. लेकि न बुश का मानना है कि इसकी समय सीमा तय करने से वे युद्ध हार जायेंगे. वस्तुत: बुश की इन बातों से उनका खोखलापन ही उजागर होता है. वह अपनी नयी चरमपंथी पुनरुत्थान रणनीति के तहत इराक में शांति लाने के लिए अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं. ऐसी बातों से जॉर्ज बुश नाराज रिपब्लिक नों का समर्थन पा रहे हैं, क्योंकि इससे कहीं न क हीं एक समय सीमा बंधती है. यदि अक्तूबर-नवंबर माह तक यह रणनीति कारगर नहीं होती है, तो बुश अपनी नीतियों में बदलाव करेंगे. और इस बदलाव से एक प्रकार से इराक से मुक्ति मिल सकेगी. इस तरह डेमोक्रेट की अपेक्षा रिपब्लिक न बुश को और भी कम समय दे रहे हैं. वस्तुत: बुश के लफ्ज कुछ अलग हैं, जबकि अमेरिकी सेना और जनता इराक से मुक्ति चाहती है. पेंटागन ने स्वीकार किया है कि इधर सशस्त्र बलों पर बहुत दबाव रहा है, इस कारण इराक में सैनिकों की सामान्य ड्यूटी सुधार कर उसे 15 महीने कर दिया गया है. वियतनाम युद्ध के काल में भी यह समय सीमा अधिक तम 15 महीने ही थी. सेना का कहना है कि बहुत ऊ़चे वेतन पर पिछले वर्ष 80 हजार लोगों की भर्ती के बावजूद उसने 14 लाख सैनिकों की निर्धारित संख्या को बनाये रखा है. इस संख्या को सामान्य अवकाश का सूचक नहीं माना जा सकता. इससे इराक में सैनिकों की कमश: घटती संख्या का भी पता चलता है. युद्ध के समय अधिकतर युवा अपने बेहतर भविष्य, अधिक लाभ और मिलनेवाले ढेर पैसे की वजह से सेना में भर्ती हुए थे. कुछ डेमोक्रेट राजनीतिज्ञ पहले के मसौदे में बदलाव चाहते हैं, ताकि धनी बच्चें को युद्ध के मैदान में लाया जाये. उनका मानना है कि यदि जॉर्ज बुश की नीतियों के लिए अभिजात्य वर्ग अपने बच्चें को मरने के लिए भेजता है, तो इससे युद्ध बहुत जल्दी समाप्त होगा.
कोई नहीं जानता कि इसका परिणाम अमेरिका की किस पीढ़ी को भुगतना होगा. इस युद्ध की लागत 500 बिलियन डॉलर पार कर चुकी है. इसका सबसे बड़ा नुकसान वित्तीय मोर्चे पर हुआ है. युद्ध में बहाये जा रहे खून की कीमत बिगड़ते बैलेंस सीट के रूप में सामने आया है. इराक में उपयोग में आ रहे हेलिकॉप्टरों को सितंबर में नयी मशीनों द्वारा बदल दिया जायेगा. यह नया बेड़ा वी-22 विमानों का होगा, जो हेलिकॉप्टर की तुलना में अधिक गतिवाला और युद्धक किस्म का होगा. हालांकि चरमपंथियों के विरुद्ध इसकी उपयोगिता के बारे में काफी अनिश्चय की स्थिति है, पर इसकी लागत कम से कम प्रति विमान 20 बिलियन डॉलर तो है ही. इससे सामरिक उद्योगों को बहुत धनी होने का मौका जरूर मिल जायेगा.

देखें फ़ारेनहाइट 9.11. सितंबर 11, 2001 को ट्रेड सेंटर टावरों पर हमले की असली कहानी. इसी घटना को आधार बना कर अफ़गानिस्तान और इराक पर हमला किया गया.

अब अमेरिका की जनता को एहसास होने लगा है कि पैसे या सुंदर लफ्जों के छद्म से जमीनी युद्ध नहीं जीता जा सकता. बुश के लफ्जों के छद्म की रणनीति के बने रहने की सामान्य वजह यह है कि यहां युद्ध की कोई परिभाषा नहीं है. इसलिए हासिल किये गये निश्चित लक्ष्यों की बात भी नहीं की जाती. वास्तव में देखा जाये, तो इराक युद्ध के दोनों घोषित उद्देश्य पूरे हो चुके हैं. अब यह निश्चित हो चुका है कि वहां न तो सामूहिक विनाश के हथियार हैं और न ही सद्दाम हुसैन. इराक अगले सौ वर्ष तक उन्हें पाने की सामर्थ्य भी नहीं रखता है. अब सद्दाम मर चुके हैं और उनकी सत्ता नष्ट हो चुकी है. इसलिए अब अमेरिका और ब्रिटेन की सेना बगदाद में पुलिस मैन के रूप में क्यों बनी हुई है? यदि यही उनका मिशन है, तो यह असंभव मिशन है. इससे किसी भी दिन पता चलेगा कि अमेरिका और ब्रिटेन की मुख्य जगहों पर जवाबी हमला किया गया. जब तक इराकी धरती पर विदेशी सैन्य टुकड़ियां बनी रहेंगी, तब तक वहां से उग्रवाद को नहीं मिटाया जा सकता. जब कोई प्रशासन बिखरना शुरू होता है, तो केवल एक खंभा ही नहीं गिरता; विश्वास के क्षरण का प्रभाव पूरी संरचना पर पड़ता है. इस सरकार के सभी महत्वाकांक्षी लोग गलत कारणों से पहले पन्ने पर छाये हुए हैं. इस विजय के सूत्रधार कार्ल रावे यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि व्हाइट हाउस के अभिलेखागार से लाखों करोड़ों ई-मेल क्यों हटाये गये. इराक के मुख्य मस्तिष्क पॉल वोल्फोविट्ड अब विश्व बैंक के अध्यक्ष हैं. वह अभी अपने गर्ल फ्रेंड को बहुत ऊंचे वेतनमान पर नौकरी देने के मामले में अपने प्रभाव के दुरुपयोग मामले में सफाई दे रहे हैं. उन पर आरोप लगोनवालों का मानना है कि वह विश्व बैंक की परवाह नहीं करते. वास्तव में पॉल वोल्फोविट्ज, कार्ल रावे, डिक चेनी और जार्ज बुश विश्व बैंक की बहुत ज्यादा परवाह करते हैं. यदि वह किसी की परवाह नहीं करते तो शेष पूरे विश्व की. इस तरह दुनिया पुनर्वापसी की राह पर है.

अनुवादक – योगेंद्र/कमलेश

April 27, 2007 at 6:31 pm Leave a comment

बंगाल में पोंगापंथ

वाकई देश में सीपीएम किस तरह से मार्क्स का नाम लेकर धार्मिक ब्रह्मणों और आर्थिक ब्राह्मणों (अमेरिकनों) के लिए लाल कालीन बिछाये हुए है, यह देखने लायक है. हंस के मार्च अंक से साभार
पलाश विश्वास

बंगाल के शरतचन्द्रीय बंकिमचन्द्रीय उपन्यासों से हिंदी जगत भली-भांति परिचित है, जहां कुलीन ब्राह्मण जमींदार परिवारों की गौरवगाथाएं लिपिबद्ध हैं. महाश्वेता देवी समेत आधुनिक बांग्ला गद्य साहित्य में स्त्राी अस्मिता व उसकी देहमुक्ति का विमर्श और आदिवासी जीवन यंत्राणा व संघर्षों की सशक्त प्रस्तुति के बावजूद दलितों की उपस्थिति नगण्य है. हिंदी, मराठी, पंजाबी, तमिल, कन्नड़ और तेलुगू भाषाओं की तरह बांग्ला में दलित साहित्य आंदोलन की कोई पहचान नहीं बन पाई है और न ही कोई महत्त्वपूर्ण दलित आत्मकथा सामने आई है, बेबी हाल्दार के आलोआंधारि जैसे अपवादों को छोड़कर. आलो आंधारि का भी हिंदी अनुवाद पहले छपा, मूल बांग्ला आत्मकथा बाद में आयी.
यह ब्राह्मणत्व का प्रबल प्रताप ही है कि १९४७ में भारत विभाजन के बाद हुए बहुसंख्य जनसंख्या स्थानांतरण के तहत पंजाब से आनेवाले दंगापीड़ितों को शरणार्थी मानकर उनके पुनर्वास को राष्ट्रीय दायित्व मानते हुए युद्धस्तर पर पुनर्वास का काम पूरा किया गया. जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरू और आधुनिक बंगाल के निर्माता तत्कालीन मुख्यमंत्राी विधानचंद्र राय ने पूर्वी बंगाल के दलित आंदोलन के आधार क्षेत्रा जैशोर, खुलना, फरीदपुर, बरिशाल से लेकर चटगांव, कलकत्तिया सवर्ण वर्चस्व और ब्राह्मणवादी एकाधिकार को चुनौती देने वाली कोई ताकत नहीं है. भारत भर में ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक पिछड़े वर्ग की जनसंख्या चालीस प्रतिशत से ज्य़ादा है. भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बाकी देश में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का जोरदार समर्थन करती है. मलाईदार तबके को प्रोन्नति से अलग रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में ओबीसी कोर ग्रुप की बैठक हुई जिसमें त्रिापुरा के समाज कल्याण मंत्राी कवि अनिल सरकार, जो माकपा की हैदराबाद कांग्रेस में गठित दलित सेल में बंगाल वाममोर्चा चेयरमैन विमान बसु के साथ महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं, शामिल हुए. पार्टी का दलित एजेंडा भी बसु और सरकार ने तय किया. इन्हीं अनिल सरकार ने उस बैठक में दलितों और पिछड़ों के आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमा ५० फ़ीसदी से बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की मांग उठाई, मलाईदार तबक़े को प्रोन्नति से अलग रखने के फ़ैसले की प्रतिक्रिया में उन्होंने सवर्ण मलाईदार तबकेश् को चिन्हित करके उन्हें भी प्रोन्नति के अवसरों से वंचित रखने की सिफ़ारिश की है. उनका दावा है कि त्रिापुरा में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों का आरक्षण लागू किया जा चुका है.
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में अभी तक पिछड़ी जातियों की पहचान का काम पूरा नहीं हुआ है, आरक्षण तो दूर. अनिल सरकार कहते हैं कि पचास फ़ीसद आरक्षण के बावजूद सिर्फ दस प्रतिशत नौकरियां ही दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को मिलती हैं, नब्बे फ़ीसदी नौकरियों पर सवर्ण काबिज़ हैं.
पश्चिम बंगाल में निजी क्षेत्रा में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को प्रोन्नति के अवसर तो सिरे से नहीं हैं. आरक्षित पदों पर रिक्तियां अनंत हैं पर योग्य प्रार्थी न मिलने की वजह दिखाकर अमूमन आरक्षित पदों को सामान्य बनाना आम है. गैर बंगाली नागरिकों को तो किसी भी क़ीमत पर जाति प्रमाण-पत्रा नहीं ही मिलता पर अब दलितों, आदिवासियों की संतानों को भी जाति प्रमाण-पत्रा जारी नहीं किए जाते.
सबसे सदमा पहुंचाने वाली बात यह है कि बाक़ी देश में जहां अखब़ार और मीडिया गैर-ब्राह्मणों की खब़रों को प्रमुखता देते हैं, वहीं बंगाल में ब्राह्मणवादी मीडिया और अखब़ार दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और शरणार्थियों के बारे में एक पंक्ति की खब़र तक नहीं छापते. जबकि कमज़ोर तबकेश् की आवाज़ उठाने वाली माकपा बंगाल में ३५ सालों से सत्ता में हैं.
पिछले दिनों सुभाष चक्रवर्ती के तारापीठ जाकर तारा मां की पूजा पर पार्टी पोलित ब्यूरो, केंद्रीय समिति, राज्य वाम मोर्चा से लेकर मीडिया में काफ़ी बवेला मचा. पार्टी, विचारधारा और धर्म पर वैचारिक बहस छिड़ गई. प्रतिक्रिया में सुभाष चक्रवर्ती ने कहा, ‘पहले मैं हिंदू हूं और फिर ब्राह्मण`. वे दुर्गोत्सव में १२० पंडालों के संरक्षक थे. विवाद से चिढ़कर उन्होंने परिवहनकर्मियों को धूमधाम से विश्वकर्ता पूजा मनाने के निर्देश दिए. हक़ीक़त यह है कि सुभाष चक्रवर्ती और उनके चार भाइयों ने जनेऊ धारण नहीं किया. ब्राह्मण समाज ने आज़ादी से पहले उनके परिवार का बहिष्कार कर दिया था, वे एकमात्रा सवर्ण मंत्राी हैं जो दलितों का साथ देते हैं. पर वे अपनी पहचान और संस्कृति के यथार्थ पर जोर देते हैं. ज़मीनी जड़ें होने के कारण उनका जनाधार मजबूत है. सुभाष चक्रवर्ती के इस विवादास्पद बयान पर बंगाल में धर्म पर बहस तो छिड़ी, मनुस्मृति और उसके अभिशाप पर चर्चा तक नहीं हुई, चक्रवर्ती वाम आंदोलन के बंगाल, त्रिापुरा और केरल तक सिमट जाने की वजह भारतीय संस्कृति और लोक से अलगाव को मानते हैं.
बाक़ी भारत में दलित आंदोलन से अलगाव भी माकपा को राष्ट्रीय नहीं बनाती, यह पार्टी के हैदराबाद कांग्रेस में मानकर बाक़ायदा आज़ादी के इतने सालों बाद दलित एजेंडा भी पास किया गया पर अपने चरित्रा में आज भी माकपा और सारे वामपंथी दल दलित विरोधी हैं. इसीलिए दिनों दिन बंगाल में ब्राह्मणवाद की जडें मजबूत हो रही हैं. इसी हक़ीक़त की ओर बागी मंत्राी सुभाष चक्रवर्ती ने उंगली उठाई है. पूंजीवाद विकास के लिए अधाधुंध, ज़मीन अधिग्रहण के शिकार हो रहे हैं दलित पिछड़े आदिवासी और अल्पसंख्यक, पर इस मुद्दे पर तमाम हो हल्ले के बावजूद बंगाल में दलितों के अधिकार को लेकर लड़ने वाली कोई ताकत कहीं नहीं है.
इधर के वर्षों में बचे-खुचे दलित आंदोलन के तहत खा़सकर कोलकाता और आस-पास विवाह, श्राद्ध जैसे संस्कारों में ब्राह्मणों का बहिष्कार होने लगा है. श्राद्ध की बजाय स्मृति-सभाएं होने लगी है, कई बरस पहले यादवपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी करने वाले एक दलित ने अपढ़ पुरोहित से पिता का श्राद्ध कराने की बजाय कृष्णनगर के पास अपने गांव में स्मृति सभा का आयोजन किया तो पूरे इलाक़े में तनाव फैल गया.
ताजा घटना सुभाष चक्रवर्ती के ब्राह्मणत्व के विवाद के बाद की है.
सुंदरवन इलाक़े में दलितों-पिछड़ों की आबादी ज्य़ादा रही है. इसी इलाक़े में दक्षिण २४ परगना जिले के गोसाबा थाना अंतर्गत सातजेलिया लाक्स़बागान ग्लासखाली गांव के निवासी मदन मोहन मंडल स्थानीय लाक्सबागान प्राथमिक विद्यालय के अवैतनिक शिक्षक हैं. पर चूंकि उन्होंने पुरोहित बुलाकर पिता का श्राद्ध नहीं किया और न ही मृत्युभोज दिया इसलिए पिछले चार महीने से उनका सामाजिक बहिष्कार चल रहा हैं. वे अपवित्रा और अछूत हो गए हैं और पिछले चार महीने से वे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं.
मदनमोहन मंडल के इस स्कूल के विद्यार्थी ज्य़ादातर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के बच्चे हैं. बतौर शिक्षक छात्रा-छात्रााओं में मदनमोहन बाबू अत्यंत लोकप्रिय हैं, पर पवित्रा ब्राह्मणवाद के पुण्य प्रताप से शनि की दशा है उन पर. पिता की मृत्यु पर बंगाली रिवाज़ के मुताबिक सफ़ेद थान कपड़े नहीं पहने उन्होंने. हविष्य अन्न नहीं खाया. सामान्य भोजन किया. नंगे पांव नहीं चले. और न ही पुरोहित का विधान लिया या श्राद्ध कराया.
ब्राह्मणवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस दलित बहुल इलाक़े में, ब्राह्मणों ने नहीं, दलितों और पिछड़ों ने उनके स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी. प्रधानाचार्य शिवपद मंडल का कहना है, ”मदनमोहन बाबू सूतक (अशौच अवस्था में) में हैं. वे स्कूल आएंगे तो यह नन्हें बच्चों के लिए अशुभ होगा. मदनमोहन बाबू को फ़तवा जारी किया गया है कि ब्राह्मणों से विधान लेकर पुरोहित बुलाकर पहले पितृश्राद्ध कराएं, फिर स्कूल आएं.
मदनमोहन मंडल ने हार नहीं मानी और विद्यालय निरीक्षक की शरण में चले गए. उन्होंने लाक्सबागान के पड़ोसी गांव बनखाली प्राथमिक विद्यालय में अपना तबादला करवा लिया पर इस स्कूल में भी उनके प्रवेशाधिकार पर रोक लग गई.
इलाक़े के मातबर लाहिड़ीपुर ग्राम पंचायत के पूर्व सदस्य व वामपंथी आरएसपी के नेता श्रीकांत मंडल का सवाल है, ”जो व्यक्ति अपने पिता का श्राद्ध नहीं करता, वह बच्चों को क्या शिक्षा देगा.“ गौरतलब है कि सुंदरवन इलाके में माकपा के अलावा आरएसपी का असर ज्य़ादा है. अभिभावकों की ओर से कन्हाई सरदार का कहना है, ”जो शिक्षक गीता, शास्त्रा नहीं मानता, उसके यहां बच्चों को भेजने के बजाय उन्हें अपढ़ बनाए रखना ही बेहतर है.“
आखिऱकार अपने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ़ मदनमोहन मंडल गोसाबा थाना पहुंच गए, पर पुलिस ने रपट लिखने से मना कर दिया. मदनमोहन बाबू ने गोसाबा अंचल के विद्यालय निरीक्षक ब्रजेन मंडल से लिखित शिकायत की. ब्रजेन बाबू ने खुद शिक्षक संगठन के प्रतिनिधियों के साथ मौक़े पर गए, पर ब्राह्मणवादी कर्मकांड विरोधी शिक्षक का सामाजिक बहिष्कार खत़्म नहीं हुआ.
मदनमोहन मंडल आरएसपी के कृषक आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं. पर स्थानीय आरएसपी विधायक चित्तरंजन मंडल ने मदनमोहन बाबू के आचरण को ‘अशोभनीय` करार दिया.
दक्षिण चौबीस परगना के वामपंथी शिक्षक संगठन के सभापति अशोक बंद्योपाध्याय का कहना है, ”अगर कोई संस्कार तोड़ना चाहे तो उनका स्वागत है, पर यह देखना होगा कि उसकी इस कार्रवाई को स्थानीय लोग किस रूप में लेते हैं.“ अशोक बाबू ने मदनमोहन मंडल के मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.
मदनमोहन बाबू अब भी स्कूल नहीं जा पाते, वे गोसाबा स्थित अपर विद्यालय निरीक्षक के दफ्त़र में हाज़िरी लगाकर अपनी नौकरी बचा रहे हैं. पर वे किसी क़ीमत पर पितृश्राद्ध के लिए तैयार नहीं हैं.
माकपा के बागी मंत्राी के ब्राह्मणत्व पर विचारधारा का हव्वा खड़ा करने वाले तमाम लोग परिदृश्य से गायब हैं.

संपर्क : द्वारा श्रीमती आरती राय, गोस्टोकानन, सोदपुर, कोलकाता-७००११०
फोन : ०३३-२५६५९५५१

April 26, 2007 at 7:58 pm 1 comment

देखें : ज़ुल्म और अमन

दलजीत अमी की यह फ़िल्म(गीत) दरअसल दुनिया को चला रहे तानाशाहों के असली गुनाहों और इसकी क्रूरता के बारे में है.

April 8, 2007 at 7:48 pm Leave a comment

एक कवि जिहादी की अंतिम दिनलिपि


केन सारो वीवा का परिचय पाठक उनकी कविताओं के साथ जान चुके हैं. यहां उनकी गिरफ़्तारी और अंतिम जेल प्रवास का बयान उन्हीं की जुबानी, किस्तों में, दिया जा रहा है. आज पढ़िए पहली किस्त.
अचानक चीख मार कर मेरी कार रुक गयी. चौंक कर मैंने अपना सिर उठाया. मेरे सामने हथियारबंद एक सैनिक था, जिसके संकेत ने कार को रोक दिया, उसकी राइफल मेरे शोफ़र के सिर को निशाना बनाये हुए थी. तभी, उसी तरह अचानक सादे लिबास में और कई सुरक्षाकर्मी कार के पीछे के दरवाज़े की ओर बढ़े और घुमा कर उसे जोरदार ढंग से खोला व मुझे उतरने के लिए कहा. ऐसा करने को मैंने अस्वीकार किया. उन्होंने और रूखे स्वर में कहा, मगर मैं अडिग रहा. फिर उन्होंने मेरे शोफ़र को अवैध रूप से यु-टर्न लेने का आदेश दिया. उसने वैसा ही किया. हम लोगों की कार के पीछे सुरक्षाकर्मियों से खचाखच भरी हुई सुरक्षाबलों की एक कार थी.
यह 1993 के 21 जून की बात है. हम लोग पोर्ट हारकोर्ट के एक चौराहे पर, आबा शहर को उत्तर से जोड़नेवाली बहुत ही व्यस्त एक्सप्रेस-वे के समान रूप से व्यस्त जंकशन पर थे. यह नाटक सफ़र कर रहे लोगों के सामने घटा और मैं कल्पना कर सकता हूं कि बहुतों ने अंदाज़ा भी लगा लिया कि मैं गिरफ़्तार हो चुका हूं. इसके बारे में मैं तो निश्चिंत था. तीन महीने में यह मेरी चौथी गिरफ़्तारी थी. मेरे मन में कोई शक नहीं था कि हम कहां जा रहे हैं : असंबद्ध टुकडे़-टुकडे़ में बनी राज्य सुरक्षा सेवा(एसएसएस) के दफ़्तर में जा रहे हैं. जैसा कि नाइजीरिया में कहा जाता है, मैं वहां का पुराना ग्राहक हूं. मैं खुद-ब-खुद हंसा.
दीवारों से घिरे डरावने एसएसएस के अहाते में जब हम पहुंचे, वहां काफ़ी सरगर्मी थी. मुझे गिरफ़्तार करनेवालों में जो वरिष्ठतम अफ़सर थे, वे जर्जर सीढ़ियों से ऊपर-नीचे भागदौड़ कर रहे थे. मैं क्या कर रहा हूं, उसके बारे में किसी को ज्यादा फ़िक्र नहीं थी. इससे पहले जब भी मैं आया तो युवा सुरक्षा एजेंटों से मैं हंसी-मज़ाक किया करता था. इस बार आसपास के माहौल से मैंने मह्सूस किया कि मामला काफ़ी गंभीर हो गया है और ऐसी स्थिति में वहां मज़ाक की कोई गुंजाइश नहीं है. क्यारी की हुई लान से घिरी हुई इमारत, जो कभी बहुत ही खूबसूरत जगह थी, अब गिरती हालत में और गंदगी से भरी हुई है-आज वहां अशुभ हवा बह रही है.
थोडी़ देर बाद अफ़सर, जो ऊपर गया था, काग़ज़ का एक टुकड़ा नचाते हुए लौटा. इंतज़ार कर रही कारों में से एक की पिछली सीट पर अगल-बगल मुस्कानरहित दो रूखे सुरक्षकर्मियों की निगरानी में मुझे ले जाने का आदेश हुआ. एसएसएस के अहाते से हम बाहर चल पड़े. दस मिनट में हम केंद्रीय थाने में पहुंच गये. इस जगह से मैं अपरिचित नहीं था. नाइजीरियाई पुलिस बल का यह राज्य मुख्यालय रहा, मगर जब बल के नये दफ़्तर की इमारत बन गयी, तो यह राज्य गुप्तचर तथा खोज ब्यूरो को सौंप दिया गया. नाइजीरिया की जन-संपत्ति की यह जीर्ण दशा आम है.
एक छोटी-सी कोठरी में, कुछ जांच करनेवाले पुलिस अधिकारियों के लिए जो दफ़्तर के तौर पर इस्तेमाल होती होती है, मुझे ले जाया गया, और लकडी़ की बेंच पर बैठने के लिए कहा गया. वहां बैठे-बैठे में पाइप का तना चबा रहा था, जबकि जांच करनेवाले अधिकारियों में से एक ने, जो अभियुक्त का बयान लिख रहा था, अविश्वाश भरी निगाह से मेरी ओर देखा. वह शायद स्तंभित हुआ था. पिछले दिनों मैं बहुत अधिक खबरों में था, और अक्सर ऐसे लोगों की, जिनकी वह बदकिस्मती होती है, वे अक्सर खून-मांस के एक जीवित व्यक्ति के बजाय एक न्यूज़ आइटम माने जाते हैं. मेरी हालत देख मेरे उपरोक्त मित्र अचंभे में पड़ गये. उनकी घबराहट को मैंने समझा और मुस्कुराया.
अगले 15 मिनट में मेरे सामने एक फ़ार्म बढा़ दिया गया और 12 जून, 1993 को चुनाव के दिन की मेरी गतिविधि पर एक बयान लिखने के लिए कहा गया.
पढ़िए बाकी हिस्सा कल…

March 19, 2007 at 5:38 pm Leave a comment

अब भी चमत्कृत करती है ‘माँ’

अब भी चमत्कृत करती है ‘माँ’

विष्णु खरे
साहित्यकार और समीक्षक

यह एक सुखद संयोग है कि इस वर्ष मक्सिम गोर्की की कालजयी कृति ‘माँ’ की प्रकाशन-शती है और मैंने उसे पहली बार आधी सदी पहले पढ़ा था.
मुझे अब यह याद नहीं है कि उसका हिंदी अनुवाद किसने किया था लेकिन उसकी पठनीयता मुझे अब भी चमत्कृत करती है.
यह शायद पहला उपन्यास था जिसमें एक युवक नायक तो था किंतु उसकी नायिका दरअसल इस युवक पावेल की विधवा माँ पेलागेइया निलोव्ना व्लासोबा थी जो पहले तो अपने निकम्मे बेटे से निराश थी और ईश्वर और ईसाइयत में आस्था रखती थी.
लेकिन जब पावेल गुंडागर्दी छोड़कर कम्युनिस्ट बन जाता है तब उसकी यह माँ भी धीरे-धीरे अपने बेटे की राजनीतिक आस्था और उसकी ख़तरनाक गुप्त, क्रांतिकारी गतिविधियों में विश्वास करने लगती है. अनुवाद में भी गोर्की की भाषा अदभुत है.
एक भोली-भाली घरेलू वृद्धा का इस तरह महान रूसी क्रांति की विराट प्रक्रिया में शामिल हो जाना एक रोमांचक, प्रेरक कथानक है. ‘माँ’ गोर्की की कल्पना का अविष्कार नहीं थी-वे अन्ना ज़ातोमोवा नामक एक औरत को जानते थे जो अपने क्रांतिकारी बेटे की गिरफ़्तारी के बाद सारे रूस में बग़ावत के पर्चे बाँटती घूमती थी.
निस्संदेह गोर्की ने अपने बचपन और कैशोर्य के अनुभवों का भी ‘माँ’ में इस्तेमाल किया है. मैं रूसी नहीं जानता लेकिन बाद में मैंने ‘माँ’ का अंग़्रेजी अनुवाद भी पढ़ा किंतु हिंदी अनुवाद ने जो गहरा प्रभाव मुझपर छोड़ा वह अमिट है.
1956-1957 के आसपास प्रकाशित मेरी प्रारंभिक कहानियों में गोर्की का असर बहुत है, बल्कि एक रचना में तो मैंने बाकायदा ‘माँ’ का उल्लेख किया है. यदि आज भी साम्यवाद में मेरी आस्था है तो उसके पीछे गोर्की की कई रचनाएं और विशेषतः ‘माँ’ का योगदान है.
सच तो यह है कि पहली बार ‘माँ’ की अंतिम पंक्तियाँ पढ़कर मैं रो दिया था और आज भी इस अमर माँ के अंतिम शब्द मुझे उसी तरह विचलित करते हैं.यह सच है कि अब पावेल और व्लासोवा जैसे पात्र वास्तविक जीवन में नहीं हैं और सामाजिक परिस्थितियाँ भी बहुत बदली हैं लेकिन मानव संघर्ष का अंत अब भी नहीं हुआ है.
गोर्की की ‘माँ’ मुझे हमेशा भारत की लाखों-करोड़ों माँएं लगी है और कहीं यह भारत और रूस के संस्कृति-साम्य की ओर भी संकेत करता है. हॉवर्ड फ़ास्ट आजीवन ‘माँ’ के भक्त रहे और स्वयं लेनिन ने इसे ‘बहुत ज़रूरी’ और ‘बहुत मौज़ूँ’ किताब कहा था.
मुझे नहीं मालूम आज कितने पाठक ‘माँ’ पढ़ते हैं किंतु यह अकारण नहीं है कि ‘आर्तामोनोफ़’, ‘मेरे विश्वविद्यालय’ और विशेषतः ‘माँ’ को विश्व-संहिता में कालजयी कृति का दर्ज़ा दिया जाता है. मेरे लिए तो वह वैसी ही है.

March 1, 2007 at 3:33 pm Leave a comment

अरुण कमल की तीन कविताएँ

लगातार

लगातार बारिश हो रही है लगातार तार-तार
कहीं घन नहीं न गगन बस बारिश एक धार
भींग रहे तरुवर तट धान के खेत मिट्टी दीवार
बाँस के पुल लकश मीनार स्तूप
बारिश लगातार भुवन में भरी ज्यों हवा ज्यों धूप

कोई बरामदे में बैठी चाय पी रही है पाँव पर पाँव धर
सोखती है हवा अदरक की गंध
मेरी भींगी बरौनियाँ उठती हैं और सोचता हूँ
देखूँ और कितना जल सोखता है मेरा शरीर

तुम इंद्रधनुष हो.

वापस

घूमते रहोगे भीड़ भरे बाज़ार में
एक गली से दूसरी गली एक घर से दूसरे घर
बेवक़्त दरवाजा खटखटाते कुछ देर रुक फिर बाहर भागते
घूमते रहोगे बस यूँ ही
लगेगा भूल चुके हो लगेगा अंधेरे में सब दब चुका है
पर अचानक करवट बदलते कुछ चुभेगा
और फिर वो हवा काँख में दबाए तुम्हें बाहर ले जाएगी
दूर तारे हैं ऐसा प्रकाश अंधकार से भरा हुआ
कहीं कोई उल्का पिंड गिर रहा है
ऐसी कौंध कि देख न सको कुछ भी
दूर तक चलते चले जाओगे पेड़ों के नीचे लंबी सड़क पर
पेड़ तुम पर झुकते आते
चाँद दिखेगा और खो जाएगा
और तुम लौटोगे वापस थक कर.

शायर की कब्र
(नज़ीर अक़बराबादी के प्रति)

न वहाँ छतरी थी न घेरा
बस एक क़ब्र थी मिट्टी से उठती
मानों कोई सो गया हो लेटे-लेटे
जिस पर उतनी ही धूप पड़ती जितनी बाकी धरती पर
उतनी ही ओस और बारिश
और दो पेड़ थे आसपास बेरी और नीम के.

मेमने बच्चे और गौरैया दिन भर कूदते वहाँ
और शाम होते पूरा मुहल्ला जमा हो जाता
तिल के लड्डू गंडे-ताबीज वाले
और डुगडुगी बजाता जमूरा लिए रीछ का बच्चा
और रात को थका मांदा कोई मँगता सो रहता सट कर.

और वो सब कुछ सुनता
एक-एक तलवे की धड़कन एक कीड़े की हरकत
हर रेशे का भीतर ख़ाक में सरकना
और ऊपर उड़ते पतंगों की सिहरन
हर बधावे हर मातम में शामिल.

वह महज़ एक क़ब्र थी एक शायर की क़ब्र
जहाँ हर बसंत में लगते हैं मेले
जहाँ दो पेड़ हैं पास-पास बेरी के नीम के.

March 1, 2007 at 3:29 pm Leave a comment


calander

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