क्या पंत और तुलसी का तीन चौथाई काव्य कूड़ा है?

नामवर (वाचिक) आलोचक नामवर सिंह ने पंत काव्य को कूडा़ कहा और वहीं डा सदानंद शाही ने तुलसी साहित्य को भी ऐसा ही कुछ कहा. हम यह मानते हैं कि किसी लेखक को उसकी प्रतिबद्धता और अपने समय को उसके उथलपुथल के साथ दर्ज़ करने की काबिलियत ही उसे महान बनाती है. तुलसी और पंत में ये दोनों ही नहीं हैं. पंत, केवल कल्पना लोक के कवि हैं तो दूसरी ओर तुलसी समाज को रूढियों और सामंती मूल्यों से (ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी…आदि, आदि) लैस करते हैं. यही वजह है कि पंत अब चर्चा से बाहर रह्ते हैं और तुलसी धर्म की सीमा में कैद रह गये. किसी साहित्यिक रचना का धर्मग्रंथ बन जाना उसकी कमजोरी को दिखाता है. इसका मतलब है कि आप उस पर साहित्यिक कसौटियों के साथ विचार करने को स्वतंत्र नहीं रह जाते हैं. यह किसी विचार को धर्मविधान बना देने जैसा ही है. मगर हमारा यह भी मानना है कि किसी लेखक पर इस तरह का फ़ैसला देने का काम लिखित तौर पर होना चाहिए न कि वाचिक तौर पर. और नामवर सिंह जिस तरह हवा का रुख देख कर भाषा बदलते रहते हैं हम उसका भी समर्थन नहीं करते. वे एक समय में नेरुदा को लाल सलाम कहते हैं तो अगले ही पल सहारा राय को सहारा प्रणाम. मगर इसी के साथ हम उनपर हुए मुकदमों का भी विरोध करते हैं. रविभूषण का यह लेख प्रभात खबर में भी छप चुका है.
रविभूषण
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र, भारत कला भवन और बनारस के प्रेमचंद साहित्य संस्थान द्वारा आयोजित दो दिवसीय `महादेवी जन्मशती महोत्सव’ (5-6 मई, 2007) में नामवर सिंह द्वारा सुमित्रानंदन पंत पर की गयी टिप्पणी बनारस और बनारस के बाहर आजकल चर्चा में है. संगोष्ठी महादेवी वर्मा : वेदना और विद्रोह पर केंद्रित थी.नामवर सिंह ने जयशंकर प्रसाद और निराला के बाद महादेवी को स्थान देते हुए पंत काव्य में तीन चौथाई कूड़ा होने की बात कही. उन्होंने महादेवी को पंत से बड़ा कवि घोषित किया. उनकी आपत्ति महादेवी को `वेदना और विद्रोह’ में बांध देने और सीमित करने पर भी थी.

जिस महादेवी ने जीवन को `विरह का जलजात’ कहा और वेदना में जन्म, करुणा में मिला आवास के द्वारा विरह, करुणा और वेदना को व्यापक अर्थों में ग्रहण किया था, उसे नामवर ने दुख के सीमित अर्थ में रख दिया. स्वयं महादेवी ने अपने निबंधों में `वेदना’ पर जो विचार किया है, उसे देखने से यह स्पष्ट हो जायेगा कि महादेवी की वेदना सामान्य और सीमित नहीं थी. उसके दुख को निजी दुख समझना भी गलत है. इस संगोष्ठी में केदरनाथ सिंह, राजेंद्र कुमार, पीएन सिंह आदि ने जो बातें कहीं, उनकी ओर, और नामवर ने भारतीय कविता पर जो विचार किया, उसकी अनदेखी की गयी और यह टिप्पणी विशेष प्रमुख हो गयी कि पंत साहित्य का तीन चौथाई कूड़ा है. कूड़ा और कूड़ेदान किसी को प्रिय नहीं हैं. फालतू व महत्वहीन की तुलना में कूड़ा शब्द ज्यादा तीखा और बेधक है.
बनारस से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान ने इसे एक मुद्दा बना कर बनारस के कवियों, लेखकों, आलोचकों और प्राध्यापकों से नामवर की टिप्पणी पर प्रतिक्रियाएं छापीं. बच्च्न सिंह, चंद्रबली सिंह, ज्ञानेंद्रपति, चौथी राम यादव, पीएन सिंह, कुमार पंकज, अवधेश प्रधान, वाचस्पति, बलराज पांडेय, सदानंद शाही, सुरेंद्र प्रताप, चंद्रकला त्रिपाठी, श्रीप्रकाश शुक्ल आदि में से कुछ ने नामवर के कथन से सहमति प्रकट की और कुछ ने उनकी इस टिप्पणी की आलोचना की. बच्चन सिंह को कूड़ा शब्द के प्रयोग पर घोर आपत्ति है और पीएन सिंह इस शब्द को `मंचीय अभिव्यक्ति’ कह कर इसे गंभीरता से न लेने की बात कहते हैं. ज्ञानेंद्रपति के अनुसार नामवर अवसरानुकूल बयान देते हैं.

हिंदी दैनिक अमर उजाला ने इस पर संपादकीय (आठ मई) भी लिखा. चंद्रबली सिंह ने नामवर के कथन में उनका दंभ देखा. एक समय चंद्रबली सिंह ने भी पंत की तीखी आलोचना की थी, पर उनके लेखन को कूड़ा नहीं कहा था. अब अक्सर निजी बातचीत में नामवर के कथन को गंभीरता से न लेने की बात कही जाती है. नामवर सदैव गंभीर बातें नहीं करते, पर उनका कथन सदैव तथ्यहीन भी नहीं होता. कविता को वे खेल मानते हैं और अब आलोचना भी उनके लिए खेल है. वे कुशल खिलाड़ी हैं और करीब 60 वर्ष से हिंदी आलोचना के केंद्र में विद्यमान हैं. मीडिया में भी वे सदैव उपस्थित रहते हैं और उनके कथन पर टीका-टिप्पणी होती रहती है. कभी मृणाल पांडे ने नामवर को हिंदी का अमिताभ बच्चन कहा था और अब भाजपा के कुछ प्रबुद्ध उन्हें `हिंदी साहित्य का राखी सावंत’ कह रहे हैं. स्पष्ट है, वैचारिकता व गंभीरता का लोप हो रहा है. दूसरों को आहत करना शिक्षित समुदाय का स्वभाव बन गया है.
पंत अपनी परवर्ती रचनाओं के प्रति आलोचकों के विचार से अवगत थे. उन्होंने कई स्थलों पर इस संबंध में लिखा है. नंद दुलारे वाजपेयी ने सर्वप्रथम छापावाद की `बृहत्रयी’ प्रस्तुत की थी. महादेवी इस बृहत्रयी से बाहर थीं. बाद में एक लघुत्रयी भी बनायी गयी और उसमें महादेवी के साथ रामकुमार वर्मा और भगवती चरण वर्मा को शामिल किया गया. इसे कुछ लोगों ने `वर्मा-त्रयी’ भी कहा. छायावाद को पंत कवि चतुष्टम तक ही सीमित नहीं रखते थे. भगवती चरण वर्मा और रामकुमार वर्मा के साथ उन्होंने छायावाद के षड्मुख व्यक्तित्व की चर्चा की है. महादेवी की काव्य-रचना प्रसाद, निराला, पंत के बाद आरंभ हुई. नीहार (1930) का प्रकाशन अनामिका, पल्लव और परिमल के प्रकाशन के बाद हुआ.
छायावादी कवियों में एक दूसरे के प्रति स्नेह व सम्मान का भाव था. महादेवी ने निराला, प्रसाद और पंत को `पथ के साथी’ कहा है. तुलनात्मक आलोचना बहुत पहले मुरझा चुकी है. महादेवी वर्मा का सुमित्रानंदन पंत से परिचय धीरेंद्र वर्मा ने अपने विवाह के अवसर पर कराया था. वैसे महादेवी ने पंत को पहली बार हिंदू बोर्डिंग हाउस में हुए एक कवि-सम्मेलन में देखा था. महादेवी के अनुसार पंत के जीवन पर संघर्षों ने `अपनी रुक्षता और कठोरता का इतिहास’ नहीं लिखा है. महादेवी की दृष्टि में पंत चिर सृजनशील कलाकार और नये प्रभात के अभिनंदन के लिए उन्मुख थे उन्होंने पंत की `अनंत सृजन संभावनाओं’ की बात कही है. जिन कृतियों से आलोचक पंत में विचलन-फिसलन देखते हैं, महादेवी का ध्यान उधर भी गया था. पंत की ग्राम्या, युगवाणी आदि काव्य कृतियों के संबंध में महादेवी ने लिखा है, `उन्होंने अपनी सद्य: प्राप्त यथार्थ भूमि की संभावनाओं को स्वर-चित्रित करने का प्रयत्न किया है.’

पंत के सामने उनकी काव्य कृतियों का विरोध आरंभ हो चुका था. उस समय आज की तरह `कूड़ा’ शब्द प्रयुक्त नहीं होता था. पंत ने स्वयं अपने विरोधी आलोचकों के दृष्टिकोण का उल्लेख किया है कि वे विचार और दर्शन को आत्मसात न कर, केवल उसके बौद्धिक प्रभावों को अपनी कृतियों में दुहराते हैं. लोकातयन के प्रकाशन (1965) के बाद इलाहाबाद में विवेचना की गोष्ठी में पंत की उपस्थिति में विजयदेव नारायण साही को जब `लोकायतन’ की चर्चा में बोलने को कहा गया, तब उन्होंने खड़े होकर कहा था `यह कृति न मैंने पढ़ी है और न पढूंगा.’ हल्ला मचा कि साही के कथन से पंत का `वध’ हो गया. साही साही थे. उनकी आलोचना में गंभीरता थी. बाद में हो-हल्ला होने पर साही ने अपने कथन का उत्तरांश (और न पढ़ूंगा) वापस ले लिया था.
नामवर अपना कथन वापस नहीं लेंगे. वे तीन चौथाई का तर्क दे सकते हैं और संख्या भी गिना सकते हैं. विजयदेव नारायण साही ने लोकायतन पर ध्यान नहीं दिया. पर पंत को इसी पर सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला. साही इस पुरस्कार की आलोचना कर सकते थे. नामवर कैसे करेंगे? वे पुरस्कार देनेवालों में रहे हैं.
पंत ने लिखा है कि प्रसाद के आंसू के दूसरे संस्करण में उनकी कविता चांदनी की कुछ कल्पनाओं तथा बिंबों का समावेश है और निराला की यमुना में उनकी कविता स्वप्न व छाया आदि की `स्पष्ट अनुगूंज’ है. फिर भी उनका कथन है, `हम यह प्रमाणित नहीं कर सकते कि हमने एक दूसरे का अनुगमन या अनुकरण किया है.’ उन्होंने स्वीकारा है कि `मेरे तुम आती हो में महादेवी के जो तुम आ जाते एक बार का अप्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है.’
पंत ने छायावाद : पुनमूल्यांकन में महादेवी की बहुत प्रशंसा की है. उन्होंने महादेवी को `छायावाद के वसंत वन की सबसे मधुर, भाव-मुखर पिकी’ कहा है. पंत ने शुक्लजी के शब्दों में `कूल की रूह सूंघनेवाले’ आलोचकों की भी बात कही है.
कला और बूढ़ा चांद और चिदंबरा क्या पंत की `तीन चौथाई’ में शामिल होनेवाली रचनाएं हैं? पहले पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और दूसरे पर भारतीय ज्ञानपीठ. पुरस्कार महत्वपूर्ण नहीं हैं, पर क्या नामवर इन पुरस्कारों को खारिज करेंगे? किसी कवि की सभी रचनाएं एक समान नहीं होतीं. खारिजी आलोचना का भी महत्व है, पर यह लिखित रूप में होनी चाहिए.
शांतिप्रिय द्विवेदी ने पंत पर एक मोटी पुस्तक ज्योति विहंग लिखी थी. द्विवेदी की जन्मशती बीत गयी. उन्हें किसी ने याद नहीं किया. तुलसीदास की भी सभी रचनाएं कविता की कसौटी पर खरी नहीं उतरेगी. पर नामवर की भाषा में उन रचनाओं को भी कूड़ा कहना, जैसा कि सदानंद शाही ने कहा है, उचित नहीं है. बनारस के अपने रंग और और ठाठ हैं. मस्ती और फिकरेबाजी है. नामवर सिंह और सदानंद शाही के खिलाफ लंका (बनारस) थाने में तहरीर दाखिल करना सस्ते किस्म की प्रचारप्रियता है. मगर फिलहाल यही हो रहा है. आलोचना का स्तर खुद आलोचक गिरा रहे हैं और आलम यह है कि हमारे समय में आलोचना से अधिक टिप्पणियां महत्वपूर्ण बन रही हैं.

May 21, 2007 at 12:16 am 4 comments

जनता के अधिकारों का क्या हो?

छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन के प्रादेशिक महासचिव व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा विनायक सेन को छत्तीसगढ पुलिस ने पिछले दिनों यह कह कर गिरफ़्तार कर लिया कि उनके संबंध नक्सलियों से हैं. इसकी निंदा देश भर के जाने-माने लोगों ने की है जिनमें अरुंधति राय, प्रभाष जोशी, मेधा पाटकर, निर्मला देशपांडे आदि शामिल हैं. हम इसे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के कार्य को दायरों में समेटने और सरकार के लिए एक आरामदेह स्थिति कायम करने के कदम के रूप में देखते हैं. इसी सिलसिले में प्रस्तुत है रायपुर से प्रकाशित देशबंधु समाचार पत्र का संपादकीय, आभार के साथ.

जनाधिकार : संवाद की जरूरत

छत्तीसगढ़ सरकार फिलहाल इस खुशफहमी में रह सकती है कि डॉ. विनायक सेन को गिरफ्तार कर उसने कोई बड़ा तीर मार लिया है। लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि इस कदम से सरकार की साख में गिरावट ही आई है। नक्सल समस्या का समाधान खोजने में उसकी असफलता भी इस तरह से उजागर हो रही है। जून 2005 याने आज से ठीक दो साल पहिले छत्तीसगढ़ सरकार ने सलवा जुडूम अभियान प्रारंभ किया था। उसी शृंखला में उसने संदिग्ध ख्याति प्राप्त ‘सुपरकॉप’ केपीएस गिल को भी नक्सल विरोधी अभियान के लिए सलाहकार नियुक्त किया था। संघ परिवार से ताल्लुक रखने वाले रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों की सेवाएं भी राज्य ने ली थीं। लेकिन इन सबका क्या हुआ, यह सबके सामने है। सलवा जुडूम पूरी तरह विफल हो चुका है, और केपीएस गिल ही नहीं, उनके हॉकी मित्र तथा पूर्व मुख्य सचिव आरपी बगई भी सरकार को कोसते नहीं थक रहे हैं। अपने मनपसंद पत्रकारों को जांच कमेटी में शामिल करने के बाद भी एर्राबोर हत्याकांड की जांच अब तक कहीं नहीं पहुंच सकी है। इस बीच एक ओर नक्सली हिंसा की खबरें, दूसरी ओर फर्जी मुठभेड़ में निरीह व्यक्तियों को मार कर गड़ा देने की वारदातें और तीसरी तरफ नागा और मिजो बटालियनों के अत्याचार के प्रकरण आए दिन प्रकाश में आ रहे हैं। इसके बावजूद सरकार तथा पुलिस न तो गलतियां स्वीकार करने, न ही अपनी कार्यनीति में बदलाव लाने के लिए तैयार दिख रहे हैं। डॉ. विनायक सेन को गिरफ्तार कर सरकार ने अपनी एकांगी सोच का ही परिचय दिया है। डॉ. सेन छत्तीसगढ़ लोक स्वातंत्र्य संगठन के प्रादेशिक महासचिव व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। एक सुयोग्य चिकित्सक के रूप में वे जनसामान्य को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिले, इस मिशन पर लगातार काम करते रहे हैं, फिर चाहे सेवाग्राम हो या दल्लीराजहरा का शहीद अस्पताल या बिलासपुर के गांवों में जनस्वास्थ्य अभियान। छत्तीसगढ़ में वे पिछले पच्चीस साल से मानव अधिकारों के लिए निरंतर काम करते रहे हैं। उनके विचारों से अथवा कार्यप्रणाली से किसी को असहमति हो सकती है, व्यवस्था व तंत्र को उनकी सक्रियता से तकलीफ भी पहुंच सकती है, लेकिन इस वजह से वे अपराधी नहीं हो जाते। देश के एक प्रमुख व प्रभावशाली मानव अधिकार संगठन के कार्यकर्ता होने के नाते वे नक्सलियों के संपर्क में हैं, इस आधार पर उन्हें अपराधी मान लेना एक पूर्वाग्रह ही कहा जा एगा। यह याद रखने की जरूरत है कि देश इस वक्त अभूतपूर्व सामाजिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। देश का कोई भी हिस्सा नहीं है जहां स्थापित व्यवस्था के विरुध्द जनता का गुस्सा न उबल रहा हो। सरकारों की विश्वसनीयता आज अपने निम्नतर स्तर पर है। कितनी सारी घटनाएं हाल में ही घटी हैं। ऐसे में संवेदी समाज की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। पीयूसीएल और पीयूडीआर ही नहीं अनेकानेक संगठन हैं जो सरकार और जनता के बीच हुक्मरानों और जनआकांक्षाओं के बीच पुल बनाने का काम कर रहे हैं। अगर गैर सरकारी स्तर पर संवाद कायम करने की, स्थितियों को समझने की, उनका विश्लेषण प्रस्तुत करने की और अंतत: समाधान सुझाने की कोशिशें न हों तो सरकार और जनता अपने ही विचारों तथा उनसे उपजे निर्णयों के कैदी होकर रह जाएंगे। इसका दुष्परिणाम एक गहरी और लंबी अराजकता में जाकर हो सकता है। राजाओं और तानाशाहों के खिलाफ दुनिया में बहुत सी लड़ाइयां हुई हैं, लेकिन निर्वाचित सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वे इतिहास से सबक लें और जनता की आवाज सुनें। छत्तीसगढ़ सरकार को अपना कदम वापस लेते हुए डॉ. सेन को अविलंब रिहा करने के साथ-साथ जनाधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया कायम रहने को भी सुनिश्चित करना चाहिए।

साथ में यह भी

सामाजिक कार्यकर्ता राज्यपाल व मुख्यमंत्री से मिलेंगे

विनायक सेन के समर्थन में, कविता श्रीवास्तव, हर्षमंदर, अजीत भट्टाचार्जी,
प्रभाष जोशी, अरुण खोटे शामिल होंगे।
रायपुर (छत्तीसगढ़‌)। पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी को लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मिलकर विरोध दर्ज कराने सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईएएस हर्षमंदर, पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव कविता श्रीवास्तव पहुंच चुके हैं। कल प्रख्यात पत्रकार अजीत भट्टाचार्जी और अरुण खोटे दलित मानवाधिकार के राष्ट्रीय सदस्य राजधानी पहुंच रहे हैं।
कल राज्यपाल से मिलने का समय संगठन को मिल गया है। बताया जाता है कि संगठन की ओर से कल 12 बजे का समय मुख्यमंत्री से मांगा गया है, जिसकी स्वीकृति बाकी है।
संगठन के राज्य ईकाई के अध्यक्ष राजेन्द्र सायल ने बताया कि कल गांधीवादी नेता निर्मला देशपांडे के भी पहुंचने की संभावना है। उन्होंने बताया कि डॉ. विनायक सेन के घर की तलाशी के बाद पुलिस का झूठ उजागर हो गया है। उनके घर में कोई सबूत हासिल नहीं कर पाई है। घर से जो किताबें और आलेख जब्त किए गए हैं, वे प्रतिबंधित नहीं हैं। नक्सली नेता नारायण सान्याल का जेल से लिखा पोस्टकार्ड बरामद किया गया है, जिसमें उन्होंने अपने स्वास्थ्य की जानकारी दी है। यह पत्र जेल के माध्यम से ही आया है। एक अन्य कैदी का पत्र डॉ. सेन को मिला था, जिसमें जेल की बदहाली का जिक्र है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारी कार्यकर्ता के घर ऐसी चीजें मिलना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि डॉ. सेन के खिलाफ जन सुरक्षा अधिनियम और गैर कानूनी गतिविधियां निरोधक कानून के तहत कार्रवाई की गई है। इस कानून को रद्द करने के लिए संगठन अपनी लड़ाई और तेज करेगा।
उन्होंने मांग की है कि पुलिस के पास इस बात का कोई सबूत होता भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं के तहत कार्रवाई करे।

देशबंधु की खबर, साभार

May 20, 2007 at 8:57 pm 1 comment

क्या पंत और तुलसी का तीन चौथाई काव्य कूड़ा है?

नामवर (वाचिक) आलोचक नामवर सिंह ने पंत काव्य को कूडा़ कहा और वहीं डा सदानंद शाही ने तुलसी साहित्य को भी ऐसा ही कुछ कहा. हम यह मानते हैं कि किसी लेखक को उसकी प्रतिबद्धता और अपने समय को उसके उथलपुथल के साथ दर्ज़ करने की काबिलियत ही उसे महान बनाती है. तुलसी और पंत में ये दोनों ही नहीं हैं. पंत, केवल कल्पना लोक के कवि हैं तो दूसरी ओर तुलसी समाज को रूढियों और सामंती मूल्यों से (ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी…आदि, आदि) लैस करते हैं. यही वजह है कि पंत अब चर्चा से बाहर रह्ते हैं और तुलसी धर्म की सीमा में कैद रह गये. किसी साहित्यिक रचना का धर्मग्रंथ बन जाना उसकी कमजोरी को दिखाता है. इसका मतलब है कि आप उस पर साहित्यिक कसौटियों के साथ विचार करने को स्वतंत्र नहीं रह जाते हैं. यह किसी विचार को धर्मविधान बना देने जैसा ही है. मगर हमारा यह भी मानना है कि किसी लेखक पर इस तरह का फ़ैसला देने का काम लिखित तौर पर होना चाहिए न कि वाचिक तौर पर. और नामवर सिंह जिस तरह हवा का रुख देख कर भाषा बदलते रहते हैं हम उसका भी समर्थन नहीं करते. वे एक समय में नेरुदा को लाल सलाम कहते हैं तो अगले ही पल सहारा राय को सहारा प्रणाम. मगर इसी के साथ हम उनपर हुए मुकदमों का भी विरोध करते हैं. रविभूषण का यह लेख प्रभात खबर में भी छप चुका है.
रविभूषण
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र, भारत कला भवन और बनारस के प्रेमचंद साहित्य संस्थान द्वारा आयोजित दो दिवसीय `महादेवी जन्मशती महोत्सव’ (5-6 मई, 2007) में नामवर सिंह द्वारा सुमित्रानंदन पंत पर की गयी टिप्पणी बनारस और बनारस के बाहर आजकल चर्चा में है. संगोष्ठी महादेवी वर्मा : वेदना और विद्रोह पर केंद्रित थी.नामवर सिंह ने जयशंकर प्रसाद और निराला के बाद महादेवी को स्थान देते हुए पंत काव्य में तीन चौथाई कूड़ा होने की बात कही. उन्होंने महादेवी को पंत से बड़ा कवि घोषित किया. उनकी आपत्ति महादेवी को `वेदना और विद्रोह’ में बांध देने और सीमित करने पर भी थी.

जिस महादेवी ने जीवन को `विरह का जलजात’ कहा और वेदना में जन्म, करुणा में मिला आवास के द्वारा विरह, करुणा और वेदना को व्यापक अर्थों में ग्रहण किया था, उसे नामवर ने दुख के सीमित अर्थ में रख दिया. स्वयं महादेवी ने अपने निबंधों में `वेदना’ पर जो विचार किया है, उसे देखने से यह स्पष्ट हो जायेगा कि महादेवी की वेदना सामान्य और सीमित नहीं थी. उसके दुख को निजी दुख समझना भी गलत है. इस संगोष्ठी में केदरनाथ सिंह, राजेंद्र कुमार, पीएन सिंह आदि ने जो बातें कहीं, उनकी ओर, और नामवर ने भारतीय कविता पर जो विचार किया, उसकी अनदेखी की गयी और यह टिप्पणी विशेष प्रमुख हो गयी कि पंत साहित्य का तीन चौथाई कूड़ा है. कूड़ा और कूड़ेदान किसी को प्रिय नहीं हैं. फालतू व महत्वहीन की तुलना में कूड़ा शब्द ज्यादा तीखा और बेधक है.
बनारस से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान ने इसे एक मुद्दा बना कर बनारस के कवियों, लेखकों, आलोचकों और प्राध्यापकों से नामवर की टिप्पणी पर प्रतिक्रियाएं छापीं. बच्च्न सिंह, चंद्रबली सिंह, ज्ञानेंद्रपति, चौथी राम यादव, पीएन सिंह, कुमार पंकज, अवधेश प्रधान, वाचस्पति, बलराज पांडेय, सदानंद शाही, सुरेंद्र प्रताप, चंद्रकला त्रिपाठी, श्रीप्रकाश शुक्ल आदि में से कुछ ने नामवर के कथन से सहमति प्रकट की और कुछ ने उनकी इस टिप्पणी की आलोचना की. बच्चन सिंह को कूड़ा शब्द के प्रयोग पर घोर आपत्ति है और पीएन सिंह इस शब्द को `मंचीय अभिव्यक्ति’ कह कर इसे गंभीरता से न लेने की बात कहते हैं. ज्ञानेंद्रपति के अनुसार नामवर अवसरानुकूल बयान देते हैं.

हिंदी दैनिक अमर उजाला ने इस पर संपादकीय (आठ मई) भी लिखा. चंद्रबली सिंह ने नामवर के कथन में उनका दंभ देखा. एक समय चंद्रबली सिंह ने भी पंत की तीखी आलोचना की थी, पर उनके लेखन को कूड़ा नहीं कहा था. अब अक्सर निजी बातचीत में नामवर के कथन को गंभीरता से न लेने की बात कही जाती है. नामवर सदैव गंभीर बातें नहीं करते, पर उनका कथन सदैव तथ्यहीन भी नहीं होता. कविता को वे खेल मानते हैं और अब आलोचना भी उनके लिए खेल है. वे कुशल खिलाड़ी हैं और करीब 60 वर्ष से हिंदी आलोचना के केंद्र में विद्यमान हैं. मीडिया में भी वे सदैव उपस्थित रहते हैं और उनके कथन पर टीका-टिप्पणी होती रहती है. कभी मृणाल पांडे ने नामवर को हिंदी का अमिताभ बच्चन कहा था और अब भाजपा के कुछ प्रबुद्ध उन्हें `हिंदी साहित्य का राखी सावंत’ कह रहे हैं. स्पष्ट है, वैचारिकता व गंभीरता का लोप हो रहा है. दूसरों को आहत करना शिक्षित समुदाय का स्वभाव बन गया है.
पंत अपनी परवर्ती रचनाओं के प्रति आलोचकों के विचार से अवगत थे. उन्होंने कई स्थलों पर इस संबंध में लिखा है. नंद दुलारे वाजपेयी ने सर्वप्रथम छापावाद की `बृहत्रयी’ प्रस्तुत की थी. महादेवी इस बृहत्रयी से बाहर थीं. बाद में एक लघुत्रयी भी बनायी गयी और उसमें महादेवी के साथ रामकुमार वर्मा और भगवती चरण वर्मा को शामिल किया गया. इसे कुछ लोगों ने `वर्मा-त्रयी’ भी कहा. छायावाद को पंत कवि चतुष्टम तक ही सीमित नहीं रखते थे. भगवती चरण वर्मा और रामकुमार वर्मा के साथ उन्होंने छायावाद के षड्मुख व्यक्तित्व की चर्चा की है. महादेवी की काव्य-रचना प्रसाद, निराला, पंत के बाद आरंभ हुई. नीहार (1930) का प्रकाशन अनामिका, पल्लव और परिमल के प्रकाशन के बाद हुआ.
छायावादी कवियों में एक दूसरे के प्रति स्नेह व सम्मान का भाव था. महादेवी ने निराला, प्रसाद और पंत को `पथ के साथी’ कहा है. तुलनात्मक आलोचना बहुत पहले मुरझा चुकी है. महादेवी वर्मा का सुमित्रानंदन पंत से परिचय धीरेंद्र वर्मा ने अपने विवाह के अवसर पर कराया था. वैसे महादेवी ने पंत को पहली बार हिंदू बोर्डिंग हाउस में हुए एक कवि-सम्मेलन में देखा था. महादेवी के अनुसार पंत के जीवन पर संघर्षों ने `अपनी रुक्षता और कठोरता का इतिहास’ नहीं लिखा है. महादेवी की दृष्टि में पंत चिर सृजनशील कलाकार और नये प्रभात के अभिनंदन के लिए उन्मुख थे उन्होंने पंत की `अनंत सृजन संभावनाओं’ की बात कही है. जिन कृतियों से आलोचक पंत में विचलन-फिसलन देखते हैं, महादेवी का ध्यान उधर भी गया था. पंत की ग्राम्या, युगवाणी आदि काव्य कृतियों के संबंध में महादेवी ने लिखा है, `उन्होंने अपनी सद्य: प्राप्त यथार्थ भूमि की संभावनाओं को स्वर-चित्रित करने का प्रयत्न किया है.’

पंत के सामने उनकी काव्य कृतियों का विरोध आरंभ हो चुका था. उस समय आज की तरह `कूड़ा’ शब्द प्रयुक्त नहीं होता था. पंत ने स्वयं अपने विरोधी आलोचकों के दृष्टिकोण का उल्लेख किया है कि वे विचार और दर्शन को आत्मसात न कर, केवल उसके बौद्धिक प्रभावों को अपनी कृतियों में दुहराते हैं. लोकातयन के प्रकाशन (1965) के बाद इलाहाबाद में विवेचना की गोष्ठी में पंत की उपस्थिति में विजयदेव नारायण साही को जब `लोकायतन’ की चर्चा में बोलने को कहा गया, तब उन्होंने खड़े होकर कहा था `यह कृति न मैंने पढ़ी है और न पढूंगा.’ हल्ला मचा कि साही के कथन से पंत का `वध’ हो गया. साही साही थे. उनकी आलोचना में गंभीरता थी. बाद में हो-हल्ला होने पर साही ने अपने कथन का उत्तरांश (और न पढ़ूंगा) वापस ले लिया था.
नामवर अपना कथन वापस नहीं लेंगे. वे तीन चौथाई का तर्क दे सकते हैं और संख्या भी गिना सकते हैं. विजयदेव नारायण साही ने लोकायतन पर ध्यान नहीं दिया. पर पंत को इसी पर सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला. साही इस पुरस्कार की आलोचना कर सकते थे. नामवर कैसे करेंगे? वे पुरस्कार देनेवालों में रहे हैं.
पंत ने लिखा है कि प्रसाद के आंसू के दूसरे संस्करण में उनकी कविता चांदनी की कुछ कल्पनाओं तथा बिंबों का समावेश है और निराला की यमुना में उनकी कविता स्वप्न व छाया आदि की `स्पष्ट अनुगूंज’ है. फिर भी उनका कथन है, `हम यह प्रमाणित नहीं कर सकते कि हमने एक दूसरे का अनुगमन या अनुकरण किया है.’ उन्होंने स्वीकारा है कि `मेरे तुम आती हो में महादेवी के जो तुम आ जाते एक बार का अप्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है.’
पंत ने छायावाद : पुनमूल्यांकन में महादेवी की बहुत प्रशंसा की है. उन्होंने महादेवी को `छायावाद के वसंत वन की सबसे मधुर, भाव-मुखर पिकी’ कहा है. पंत ने शुक्लजी के शब्दों में `कूल की रूह सूंघनेवाले’ आलोचकों की भी बात कही है.
कला और बूढ़ा चांद और चिदंबरा क्या पंत की `तीन चौथाई’ में शामिल होनेवाली रचनाएं हैं? पहले पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और दूसरे पर भारतीय ज्ञानपीठ. पुरस्कार महत्वपूर्ण नहीं हैं, पर क्या नामवर इन पुरस्कारों को खारिज करेंगे? किसी कवि की सभी रचनाएं एक समान नहीं होतीं. खारिजी आलोचना का भी महत्व है, पर यह लिखित रूप में होनी चाहिए.
शांतिप्रिय द्विवेदी ने पंत पर एक मोटी पुस्तक ज्योति विहंग लिखी थी. द्विवेदी की जन्मशती बीत गयी. उन्हें किसी ने याद नहीं किया. तुलसीदास की भी सभी रचनाएं कविता की कसौटी पर खरी नहीं उतरेगी. पर नामवर की भाषा में उन रचनाओं को भी कूड़ा कहना, जैसा कि सदानंद शाही ने कहा है, उचित नहीं है. बनारस के अपने रंग और और ठाठ हैं. मस्ती और फिकरेबाजी है. नामवर सिंह और सदानंद शाही के खिलाफ लंका (बनारस) थाने में तहरीर दाखिल करना सस्ते किस्म की प्रचारप्रियता है. मगर फिलहाल यही हो रहा है. आलोचना का स्तर खुद आलोचक गिरा रहे हैं और आलम यह है कि हमारे समय में आलोचना से अधिक टिप्पणियां महत्वपूर्ण बन रही हैं.

May 20, 2007 at 6:58 pm 4 comments

एक मुलाकात लतिका रेणु से

एक ठुमरीधर्मा जीवन का अंतर्मार्ग
रेयाज-उल-हक

राजेंद्रनगर के ब्लॉक नंबर दो में पटना इंप्रूवमेंट ट्रस्ट का एक पुराना मकान. दूसरी मंजिल पर हरे रंग का एक दरवाजा. जंग लगा एक पुराना नेम प्लेट लगा है-
फणीश्वरनाथ रेणु .
एक झुर्रीदार चेहरेवाली औसत कद की एक बूढ़ी महिला दरवाजा खोलती हैं-लतिका रेणु. रेणु जी की पत्नी. मेरे साथ गये बांग्ला कवि विश्वजीत सेन को देख कर कुछ याद करने की कोशिश करती हैं. वे हमें अंदर ले जाती हैं.
कमरे में विधानचंद्र राय, नेहरू और रेणु जी की तसवीर. 1994 का एक पुराना कैलेंडर. किताबों और नटराज की प्रतिमा पर धूल जमी है. बाहर फोटो टंगे हैं-रेणु और उनके मित्रों के. घर में लगता है, रेणु का समय अब भी बचा हुआ है.
एक ओर कटी सब्जी का कटोरा रखा हुआ है-शायद वे सब्जी काट रही थीं. बातें शुरू होती हैं. वे रेणु जी पर प्राय: बात नहीं करना चाहतीं. अगर मेरे साथ विश्वजीत दा नहीं होते तो उनसे बात कर पाना मुश्किल था. पुराना परिचय है उनका. काफी कुछ दिया है इस महिला ने रेणु को. प्रकारांतर से हिंदी साहित्य को. हजारीबाग के सेंट कोलंबस कॉलेज के एक प्रोफेसर की बेटी लतिका जी इंटर करने के बाद पटना आयी थीं-नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए. फिर पटना की ही होकर रह गयीं. पटना मेडिकल कॉलेज में ही भेंट हुई फणीश्वरनाथ रेणु से. उनके फेफड़ों में तकलीफ थी. नेपाल में राणाशाही के खिलाफ संघर्ष में शामिल थे रेणु. एक बार वे गिर गये और पुलिस ने उनकी पीठ को अपने बूटों से रौंद डाला था. तब से खराब हो गये फेफ ड़े. खून की उल्टी तभी से शुरू हुई.
लतिका जी उन दिनों को याद करते हुए कभी उदास होती हैं, कभी हंसती हैं, वैसी हंसी जैसी
जुलूस की पवित्रा हंसती है. ट्रेनिंग खत्म होने के बाद पटना में ही गर्दनीबाग में चाइल्ड वेल्फेयर सेंटर में नियुक्ति हुई. छह माह बाद सब्जीबाग के सिफ्टन चाइल्ड वेल्फेयर सेंटर में आ गयीं. तब तक रेणु जी से उनकी शादी हो चुकी थी. रेणु जी ने उन्हें बताया नहीं कि उनकी एक पत्नी औराही हिंगना में भी हैं. शादी के काफी समय बाद जब वे पूर्णिया उनके घर गयीं तो पता चला. इस पर वे नाराज भी हुईं, पर मान गयीं.

इस रचना को देशबंधु पर भी पढें.

लतिका जी शादी से जुड़े इन प्रसंगों को याद नहीं करना चाहतीं. काफी कटु अनुभव हैं उनके. रेणु जी के पुत्र ने उनकी किताबों का उत्तराधिकार उनसे छीन लिया. वह यह फ्लैट भी ले लेना चाहता था, जिसमें अभी वे हैं और जिसे उन्होंने अपने पैसे से खरीदा था. रेणु जी ने इस फ्लैट के आधार पर 20000 रुपये कर्ज लिये थे बैंक से. बैंक ने कहा कि जो पैसे चुका देगा फ्लैट उसका. लतिका जी ने कैसे-कैसे वे पैसे चुकाये और फ्लैट हासिल किया.
वे भुला दी गयी हैं. अब उन किताबों पर उनका कोई अधिकार नहीं रहा, जिनकी रचना से लेकर प्रकाशन तक में उनका इतना योगदान रहा. मैला आंचल के पहले प्रकाशक ने प्रकाशन से हाथ खींच लिया, कहा कि पहले पूरा पैसा जमा करो. लतिका जी ने दो हजार दिये तब किताब छपी. नेपाल के बीपी कोइराला को किताब की पहली प्रति भेंट की गयी. उसका विमोचन सिफ्टन सेंटर में ही सुशीला कोइराला ने किया.

इसके बाद, जब उसे राजकमल प्रकाशन ने छापा तो उस पर देश भर में चर्चा होने लगी. लतिका जी बताती हैं कि रेणु दिन में कभी नहीं
लिखते, घूमते रहते और गपशप करते. हमेशा रात में लिखते, मुसहरी लगा कर. इसी में उनका हेल्थ खराब हुआ. लिख लेते तो कहते-सारा काम छोड़ कर सुनो. बीच में टोकाटाकी मंजूर नहीं थी उन्हें. कितना भी काम हो वे नहीं मानते. अगर कह दिया कि अभी काम है तो गुस्सा जाते, कहते हम नहीं बोलेंगे जाओ. फिर उस दिन खाना भी नहीं खाते. जब तीसरी कसम फिल्म बन रही थी तो रेणु मुंबई गये. उनकी बीमारी का टेलीग्राम पाकर वे अकेली मुंबई गयीं. मगर रेणु ठीक थे. वहां उन्होंने फिल्म का प्रेस शो देखा. तीसरी कसम पूरी हुई. लतिका जी ने पटना के वीणा सिनेमा में रेणु जी के साथ फ़िल्म देखी. उसके बाद कभी नहीं देखी तीसरी कसम.
रेणु के निधन के बाद उनके परिवारवालों से नाता लगभग टूट ही गया. उनकी एक बेटी कभी आ जाती है मिलने. गांववाली पत्नी भी पटना आती हैं तो आ जाती हैं मिलने, पर लगाव कभी नहीं हुआ. नर्सिंग का काम छोड़ने के बाद कई स्कूलों में पढ़ाती रही हैं. अब घर पर खाली हैं. आय का कोई जरिया नहीं है. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद 700 रुपये प्रतिमाह देता है, पर वह भी साल भर-छह महीने में कभी एक बार. पूछने पर कि इतने कम में कैसे काम चलता है, वे हंसने लगती हैं-चल ही जाता है.
अब वे कहीं आती-जाती नहीं हैं. किताबें पढ़ती रहती हैं, रेणु की भी. सबसे अधिक मैला आंचल पसंद है और उसका पात्र डॉ प्रशांत. अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में अनुदित रेणु की किताबें हैं लतिका जी के पास. खाली समय में बैठ कर उनको सहेजती हैं, जिल्दें लगाती हैं.
लतिका जी ने अपने जीवन के बेहतरीन साल रेणु को दिये. अब 80 पार की अपनी उम्र में वे न सिर्फ़ अकेली हैं, बल्कि लगभग शक्तिहीन भी. उनकी सुधि लेनेवाला कोई नहीं है. रेणु के पुराने मित्र भी अब नहीं आते.
एक ऐसी औरत के लिए जिसने हिंदी साहित्य की अमर कृतियों के लेखन और प्रकाशन में इतनी बड़ी भूमिका निभायी, सरकार के पास नियमित रूप से देने के लिए 700 रुपये तक नहीं हैं. हाल ही में
पटना फिल्म महोत्सव में तीसरी कसम दिखायी गयी. किसी ने लतिका जी को पूछा तक नहीं. शायद सब भूल चुके हैं उन्हें, वे सब जिन्होंने रेणु और उनके लेखन से अपना भविष्य बना लिया. एक लेखक और उसकी विरासत के लिए हमारे समाज में इतनी संवेदना भी नहीं बची है.

May 19, 2007 at 11:27 pm 7 comments

एक मुलाकात लतिका रेणु से

एक ठुमरीधर्मा जीवन का अंतर्मार्ग
रेयाज-उल-हक

राजेंद्रनगर के ब्लॉक नंबर दो में पटना इंप्रूवमेंट ट्रस्ट का एक पुराना मकान. दूसरी मंजिल पर हरे रंग का एक दरवाजा. जंग लगा एक पुराना नेम प्लेट लगा है-
फणीश्वरनाथ रेणु .
एक झुर्रीदार चेहरेवाली औसत कद की एक बूढ़ी महिला दरवाजा खोलती हैं-लतिका रेणु. रेणु जी की पत्नी. मेरे साथ गये बांग्ला कवि विश्वजीत सेन को देख कर कुछ याद करने की कोशिश करती हैं. वे हमें अंदर ले जाती हैं.
कमरे में विधानचंद्र राय, नेहरू और रेणु जी की तसवीर. 1994 का एक पुराना कैलेंडर. किताबों और नटराज की प्रतिमा पर धूल जमी है. बाहर फोटो टंगे हैं-रेणु और उनके मित्रों के. घर में लगता है, रेणु का समय अब भी बचा हुआ है.
एक ओर कटी सब्जी का कटोरा रखा हुआ है-शायद वे सब्जी काट रही थीं. बातें शुरू होती हैं. वे रेणु जी पर प्राय: बात नहीं करना चाहतीं. अगर मेरे साथ विश्वजीत दा नहीं होते तो उनसे बात कर पाना मुश्किल था. पुराना परिचय है उनका. काफी कुछ दिया है इस महिला ने रेणु को. प्रकारांतर से हिंदी साहित्य को. हजारीबाग के सेंट कोलंबस कॉलेज के एक प्रोफेसर की बेटी लतिका जी इंटर करने के बाद पटना आयी थीं-नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए. फिर पटना की ही होकर रह गयीं. पटना मेडिकल कॉलेज में ही भेंट हुई फणीश्वरनाथ रेणु से. उनके फेफड़ों में तकलीफ थी. नेपाल में राणाशाही के खिलाफ संघर्ष में शामिल थे रेणु. एक बार वे गिर गये और पुलिस ने उनकी पीठ को अपने बूटों से रौंद डाला था. तब से खराब हो गये फेफ ड़े. खून की उल्टी तभी से शुरू हुई.
लतिका जी उन दिनों को याद करते हुए कभी उदास होती हैं, कभी हंसती हैं, वैसी हंसी जैसी
जुलूस की पवित्रा हंसती है. ट्रेनिंग खत्म होने के बाद पटना में ही गर्दनीबाग में चाइल्ड वेल्फेयर सेंटर में नियुक्ति हुई. छह माह बाद सब्जीबाग के सिफ्टन चाइल्ड वेल्फेयर सेंटर में आ गयीं. तब तक रेणु जी से उनकी शादी हो चुकी थी. रेणु जी ने उन्हें बताया नहीं कि उनकी एक पत्नी औराही हिंगना में भी हैं. शादी के काफी समय बाद जब वे पूर्णिया उनके घर गयीं तो पता चला. इस पर वे नाराज भी हुईं, पर मान गयीं.

इस रचना को देशबंधु पर भी पढें.

लतिका जी शादी से जुड़े इन प्रसंगों को याद नहीं करना चाहतीं. काफी कटु अनुभव हैं उनके. रेणु जी के पुत्र ने उनकी किताबों का उत्तराधिकार उनसे छीन लिया. वह यह फ्लैट भी ले लेना चाहता था, जिसमें अभी वे हैं और जिसे उन्होंने अपने पैसे से खरीदा था. रेणु जी ने इस फ्लैट के आधार पर 20000 रुपये कर्ज लिये थे बैंक से. बैंक ने कहा कि जो पैसे चुका देगा फ्लैट उसका. लतिका जी ने कैसे-कैसे वे पैसे चुकाये और फ्लैट हासिल किया.
वे भुला दी गयी हैं. अब उन किताबों पर उनका कोई अधिकार नहीं रहा, जिनकी रचना से लेकर प्रकाशन तक में उनका इतना योगदान रहा. मैला आंचल के पहले प्रकाशक ने प्रकाशन से हाथ खींच लिया, कहा कि पहले पूरा पैसा जमा करो. लतिका जी ने दो हजार दिये तब किताब छपी. नेपाल के बीपी कोइराला को किताब की पहली प्रति भेंट की गयी. उसका विमोचन सिफ्टन सेंटर में ही सुशीला कोइराला ने किया.

इसके बाद, जब उसे राजकमल प्रकाशन ने छापा तो उस पर देश भर में चर्चा होने लगी. लतिका जी बताती हैं कि रेणु दिन में कभी नहीं
लिखते, घूमते रहते और गपशप करते. हमेशा रात में लिखते, मुसहरी लगा कर. इसी में उनका हेल्थ खराब हुआ. लिख लेते तो कहते-सारा काम छोड़ कर सुनो. बीच में टोकाटाकी मंजूर नहीं थी उन्हें. कितना भी काम हो वे नहीं मानते. अगर कह दिया कि अभी काम है तो गुस्सा जाते, कहते हम नहीं बोलेंगे जाओ. फिर उस दिन खाना भी नहीं खाते. जब तीसरी कसम फिल्म बन रही थी तो रेणु मुंबई गये. उनकी बीमारी का टेलीग्राम पाकर वे अकेली मुंबई गयीं. मगर रेणु ठीक थे. वहां उन्होंने फिल्म का प्रेस शो देखा. तीसरी कसम पूरी हुई. लतिका जी ने पटना के वीणा सिनेमा में रेणु जी के साथ फ़िल्म देखी. उसके बाद कभी नहीं देखी तीसरी कसम.
रेणु के निधन के बाद उनके परिवारवालों से नाता लगभग टूट ही गया. उनकी एक बेटी कभी आ जाती है मिलने. गांववाली पत्नी भी पटना आती हैं तो आ जाती हैं मिलने, पर लगाव कभी नहीं हुआ. नर्सिंग का काम छोड़ने के बाद कई स्कूलों में पढ़ाती रही हैं. अब घर पर खाली हैं. आय का कोई जरिया नहीं है. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद 700 रुपये प्रतिमाह देता है, पर वह भी साल भर-छह महीने में कभी एक बार. पूछने पर कि इतने कम में कैसे काम चलता है, वे हंसने लगती हैं-चल ही जाता है.
अब वे कहीं आती-जाती नहीं हैं. किताबें पढ़ती रहती हैं, रेणु की भी. सबसे अधिक मैला आंचल पसंद है और उसका पात्र डॉ प्रशांत. अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में अनुदित रेणु की किताबें हैं लतिका जी के पास. खाली समय में बैठ कर उनको सहेजती हैं, जिल्दें लगाती हैं.
लतिका जी ने अपने जीवन के बेहतरीन साल रेणु को दिये. अब 80 पार की अपनी उम्र में वे न सिर्फ़ अकेली हैं, बल्कि लगभग शक्तिहीन भी. उनकी सुधि लेनेवाला कोई नहीं है. रेणु के पुराने मित्र भी अब नहीं आते.
एक ऐसी औरत के लिए जिसने हिंदी साहित्य की अमर कृतियों के लेखन और प्रकाशन में इतनी बड़ी भूमिका निभायी, सरकार के पास नियमित रूप से देने के लिए 700 रुपये तक नहीं हैं. हाल ही में
पटना फिल्म महोत्सव में तीसरी कसम दिखायी गयी. किसी ने लतिका जी को पूछा तक नहीं. शायद सब भूल चुके हैं उन्हें, वे सब जिन्होंने रेणु और उनके लेखन से अपना भविष्य बना लिया. एक लेखक और उसकी विरासत के लिए हमारे समाज में इतनी संवेदना भी नहीं बची है.

May 19, 2007 at 6:09 pm 7 comments

फ्रांस : सरकोजी की जीत का मतलब

हरि किशोर सिंह
फ़्रांस में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव पर पूरे विश्व की नजर थी. सिर्फ इसलिए नहीं कि फ्रांस के इतिहास में सत्ता के सर्वोच्च् पद पर पहली बार किसी महिला के स्थापित होने की संभावना थी, बल्कि इसलिए भी नजर थी कि फ्रांस इस दफा अनुदारपंथियों के चंगुल से छुटकारा पा सकेगा या नहीं. 1958 में पांचवें गणतंत्र के गठन के बाद फांसवां मित्तरां के अलावा कोई उदारवादी प्रगतिशील, समाजवादी नेता इस पद पर आसीन नहीं हो पाया था. मित्तरां के बाद बीते 12 वर्ष से इस पद पर अनुदार (कंजरवेटिव) जॉक शिराक का आधिपत्य रहा. वे तीसरी बार भी राष्ट्रपति बनने की इच्छा रखते थे. लेकिन इसके लिए पर्याप्त् माहौल के अभाव में उन्होंने गृह मंत्री सरकोजी के लिए मैदान खुला छोड़ दिया था. इस प्रकार निकोलस सरकोजी के लिए पूरे दक्षिणपंथ के समर्थन का खुला द्वार मिला, जिससे द्वितीय मतदान में उन्हें अपने समाजवादी प्रतिद्वंद्वी सेगल रोयाल को प्रभावशाली बहुमत से पराजित करने का अवसर मिल गया.
हंगेरियन पिता और ग्रीक-यहूदी मां के पुत्र 51 वर्षीय सरकोजी अपने दृढ़ विचार और अविलंब कार्रवाई के लिए प्रसिद्ध रहे हैं. जर्मन फासीवाद से आक्रांत उनके पिता 1941 में हंगरी से पलायन कर फ्रांस में आ बसे थे. लेकिन पुत्र सरकोजी आव्रजन के संबंध में कठोर नीति के लिए काफी मशहूर रहे हैं. पिछले वर्षोंा में पेरिस के उपनगर में नस्लभेद के प्रश्न पर हुए दंगों को भी उन्होंने गृह मंत्री की हैसियत से काफी कठोरता से नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त् की थी. इस कारण इन इलाकों में दंगे की आशंका से प्रशासन भयभीत था. इसलिए भारी संख्या में दंगा दमन दल और सेना की टुक़़डियों की भारी तैनाती की गयी थी. इस चुनाव में लगभग 85 फीसदी मतदाताआें ने हिस्सा लिया था और चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद पेरिस सहित फ्रांस के विभिन्न शहरों में जश्न के माहौल से स्पष्ट है कि निकोलस सरकोजी का राष्ट्रपति काल अपने दक्षिणपंथी रुझान के लिए प्रसिद्धि प्राप्त् करने के लिए सचेष्ट रहेगा. निकोलस सरकोजी फ्रांस की राष्ट्रीय अस्मिता की आव्रजक नीति में कठोरता, कर में छूट और सामाजिक सुरक्षा के मद में दी जाने वाली सुविधाआें में भारी कटौती, नयी कार्य संस्कृति और भारी भरकम फ्रांस की प्रशासकीय ढांचे में प्रभावशाली सुधार पर हर प्रकार के प्रयास के लिए पहल करने में जरा भी नहीं हिचकेंगे.
विदेश नीति के संदर्भ में यूरोपीय संगठन की एकता और अमेरिका से दोस्ताना संबंधों की प्रगाढ़ता होगी. साथ ही फ्रेंच भाषी उत्तरी और पश्चिमी अफ्रीकी देशों से गहरे आर्थिक संबंधों को ठोस रूप देने का भी उनका प्रयास रहेगा. विजय की घोषणा के बाद उन्होंने अपने संक्षिप्त् भाषण में वाशिंगटन के प्रति मित्रता का उद्गार व्यक्त करने में जरा भी कोताही नहीं की. उन्होंने स्पष्ट तौर पर घोषणा की कि अब अमेरिका फ्रांस को अपना एक विश्वसनीय दोस्त के रूप में देख सकेगा. उनका स्पष्ट संकेत राष्ट्रपति जॉक शिराक द्वारा इराक पर अमेरिकी आक्रमण के विरोध की ओर था. मगर उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग के प्रति अमेरिकी नेतृत्व से अपेक्षा के संबंध में भी अपनी भावना उजागर की है. स्पष्ट है कि अब फ्रांस पर्यावरण के संबंध में क्योटो घोषणा पत्र को लागू कराने में प्रयासरत रहेगा. फिर भी अंतरराष्ट्रीय मंचों विशेषतौर पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के स्तर पर फ्रांस जो स्वतंत्र रूप से निर्णय लिया करता था, अब अमेरिकी नीति से प्रभावित रहेगा.
विकासशील देशों के लिए निकोलस सरकोजी का राष्ट्रपति बनना बहुत शुभ नहीं कही जा सकता. भारत और चीन को व्यापारिक क्षेत्र में नयी व्यवस्था के अंतर्गत काफी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि चुनाव अभियान के दौरान निकोलस ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि विजय की स्थिति में उनकी सरकार चीन और भारत के माल के खिलाफ आयात कर में भारी वृद्धि कर अपने देश की उत्पादित वस्तुआें का बचाव करेंगे. उनका कहना है कि ये देश फ्रांस के बाजार में अपने देश की उत्पादित वस्तुआें को सस्ते दर पर निर्यात करते हैं, अत: फ्रांस सरकार को यह अधिकार है कि वह स्वदेशी माल की रक्षा में करे.
निश्चय ही यह विश्व व्यापार में खुलेपन के लिए एक स्पष्ट चुनौती होगी, जिसका भारत और चीन को संयुक्त रूप से सामना करना पड़ेगा. अत: भारत को नये राष्ट्रपति की रीति नीति के प्रति सावधानी बरतनी पड़ेगी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता के प्रति फ्रांस की पिछली सरकार काफी उत्साहित थी. अब देखना है कि नयी सरकार इस संबंध में क्या नीति अपनाती है. इसी प्रकार भारत की आणविक क्लब की सदस्यता का सवाल है, इस संदर्भ में जॉक शिराक भारत के एक अति उत्साही समर्थक माने जाते थे. देखना है कि नयी सरकार का इस संबंध में क्या रुख होता है.
निकोलस सरकोजी की चुनावी सफलता से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि जर्मनी के पिछले चुनाव में दक्षिणपंथियों की सफलता से अनुदारपंथियों की सफलता की जो शुरुआत हुई थी, वह अब फ्रांस की राजनीति में प्रभावशाली तौर पर अपनी जड़ें जमा चुकी है. शीघ्र ही ब्रिटेन में भी नेतृत्व परिवर्तन होनेवाला है. अभी तक जॉर्ज ब्राउन का 10, डाउनिंग स्ट्रीट में जाना तय माना जा रहा है. उनकी भी लेबर पार्टी में बहुत उदारवादी छवि नहीं है. ब्रिटेन में स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम ने कंजरवेटिव पार्टी को काफी प्रोत्साहित किया है. लेबर पार्टी की त्रासदी देखने लायक है. फिलहाल फ्रांस में संसदीय चुनाव अगले छह सप्तहों में होनेवाले हैं. अगर उन चुनावों में भी अनुदारपंथियों का बोलबाला रहा तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि जर्मनी से दक्षिणपंथी शुरुआत का असर यूरोपीय राजनीति पर और भी व्यापक होगा.
विरोध पक्ष की नेता सेगल रोयाल ने भी चुनाव में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी थी. इसलिए समाजवादियों में आयी हताशा स्वाभाविक है. इस चुनाव परिणाम ने वामपंथियों की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है. यूरोप में आयी समृद्धि के असर से वामपंथी विचारधारा के प्रति आम जनता के आकर्षण में कमी आयी है. इस दृष्टि से यूरोप के समाजवादियों के लिए वर्तमान परिस्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है. उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा के २१ वीं सदी की चुनौतियों के अनुकूल नीति अपनानी होगी.
मारग्रेट थैचर के नेतृत्व से लगातार विफलता पाने पर ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने अपने नये नेता टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में न्यू लेबर के सिद्धांत को अपना कर अरसे के बाद 10, डाउनिंग स्ट्रीट पर अपना आधिपत्य जमाया था. वे तीन बार आम चुनाव में लेबर पार्टी को सफलता की राह पर ले गये. परंतु इराक के संदर्भ में अमेरिकापरस्त नीति के कारण उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट आयी और पार्टी के अंदर उन पर पद त्याग करने का दबाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. उन्हें अपना पद छोड़ने की घोषणा करनी पड़ी और अब वे 5 जून को अपने पद से मुक्त हो रहे हैं. लेबर पार्टी के नये नेता चांसलर ऑफ एक्सचेकर जॉर्ज ब्राउन के लिए अपनी पार्टी की गिरती लोकप्रियता को न केवल विराम लगाना होगा, बल्कि उसे ब्रिटिश जनमानस में पुन: इस तरह प्रतिस्थापित करना होगा कि उसे फिर से शासन की पार्टी के तौर पर ब्रिटिश जनता के समक्ष पेश किया जा सके.
यूरोपीय समाजवादियों की इस त्रासदी और यूरोपीय जनता के रुझान से विकासशील देशों के जनतांत्रिक तत्वों को भी सबक लेना होगा. भारत जैसे देश में अभी 24 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने पर मजबूर हो रहे हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में गरीबी तथा जीवन यापन के लिए रोजगार के अवसर की कमी से उत्पन्न समस्याआें के समाधान में व्यवस्था की विफलता ने ही हिंसात्मक आंदोलन को जन्म दिया है. नेपाल में जनतांत्रिक, वामपंथी एवं माओवादी तत्वों का आपसी समझौता इस दिशा में आशा की एक किरण के तौर पर दिखायी पड़ रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि नेपाल में चल रहे प्रयास को सफलता मिलेगी. जहां तक फ्रांस की नयी सरकार का प्रश्न है, विकासशील दुनिया को इंतजार करना पड़ेगा कि वह अपने पत्ते किस प्रकार खोलता है.

लेखक पूर्व विदेश राज्यमंत्री हैं.
प्रभात खबर से साभार.

May 18, 2007 at 1:09 am Leave a comment

फ्रांस : सरकोजी की जीत का मतलब

हरि किशोर सिंह
फ़्रांस में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव पर पूरे विश्व की नजर थी. सिर्फ इसलिए नहीं कि फ्रांस के इतिहास में सत्ता के सर्वोच्च् पद पर पहली बार किसी महिला के स्थापित होने की संभावना थी, बल्कि इसलिए भी नजर थी कि फ्रांस इस दफा अनुदारपंथियों के चंगुल से छुटकारा पा सकेगा या नहीं. 1958 में पांचवें गणतंत्र के गठन के बाद फांसवां मित्तरां के अलावा कोई उदारवादी प्रगतिशील, समाजवादी नेता इस पद पर आसीन नहीं हो पाया था. मित्तरां के बाद बीते 12 वर्ष से इस पद पर अनुदार (कंजरवेटिव) जॉक शिराक का आधिपत्य रहा. वे तीसरी बार भी राष्ट्रपति बनने की इच्छा रखते थे. लेकिन इसके लिए पर्याप्त् माहौल के अभाव में उन्होंने गृह मंत्री सरकोजी के लिए मैदान खुला छोड़ दिया था. इस प्रकार निकोलस सरकोजी के लिए पूरे दक्षिणपंथ के समर्थन का खुला द्वार मिला, जिससे द्वितीय मतदान में उन्हें अपने समाजवादी प्रतिद्वंद्वी सेगल रोयाल को प्रभावशाली बहुमत से पराजित करने का अवसर मिल गया.
हंगेरियन पिता और ग्रीक-यहूदी मां के पुत्र 51 वर्षीय सरकोजी अपने दृढ़ विचार और अविलंब कार्रवाई के लिए प्रसिद्ध रहे हैं. जर्मन फासीवाद से आक्रांत उनके पिता 1941 में हंगरी से पलायन कर फ्रांस में आ बसे थे. लेकिन पुत्र सरकोजी आव्रजन के संबंध में कठोर नीति के लिए काफी मशहूर रहे हैं. पिछले वर्षोंा में पेरिस के उपनगर में नस्लभेद के प्रश्न पर हुए दंगों को भी उन्होंने गृह मंत्री की हैसियत से काफी कठोरता से नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त् की थी. इस कारण इन इलाकों में दंगे की आशंका से प्रशासन भयभीत था. इसलिए भारी संख्या में दंगा दमन दल और सेना की टुक़़डियों की भारी तैनाती की गयी थी. इस चुनाव में लगभग 85 फीसदी मतदाताआें ने हिस्सा लिया था और चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद पेरिस सहित फ्रांस के विभिन्न शहरों में जश्न के माहौल से स्पष्ट है कि निकोलस सरकोजी का राष्ट्रपति काल अपने दक्षिणपंथी रुझान के लिए प्रसिद्धि प्राप्त् करने के लिए सचेष्ट रहेगा. निकोलस सरकोजी फ्रांस की राष्ट्रीय अस्मिता की आव्रजक नीति में कठोरता, कर में छूट और सामाजिक सुरक्षा के मद में दी जाने वाली सुविधाआें में भारी कटौती, नयी कार्य संस्कृति और भारी भरकम फ्रांस की प्रशासकीय ढांचे में प्रभावशाली सुधार पर हर प्रकार के प्रयास के लिए पहल करने में जरा भी नहीं हिचकेंगे.
विदेश नीति के संदर्भ में यूरोपीय संगठन की एकता और अमेरिका से दोस्ताना संबंधों की प्रगाढ़ता होगी. साथ ही फ्रेंच भाषी उत्तरी और पश्चिमी अफ्रीकी देशों से गहरे आर्थिक संबंधों को ठोस रूप देने का भी उनका प्रयास रहेगा. विजय की घोषणा के बाद उन्होंने अपने संक्षिप्त् भाषण में वाशिंगटन के प्रति मित्रता का उद्गार व्यक्त करने में जरा भी कोताही नहीं की. उन्होंने स्पष्ट तौर पर घोषणा की कि अब अमेरिका फ्रांस को अपना एक विश्वसनीय दोस्त के रूप में देख सकेगा. उनका स्पष्ट संकेत राष्ट्रपति जॉक शिराक द्वारा इराक पर अमेरिकी आक्रमण के विरोध की ओर था. मगर उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग के प्रति अमेरिकी नेतृत्व से अपेक्षा के संबंध में भी अपनी भावना उजागर की है. स्पष्ट है कि अब फ्रांस पर्यावरण के संबंध में क्योटो घोषणा पत्र को लागू कराने में प्रयासरत रहेगा. फिर भी अंतरराष्ट्रीय मंचों विशेषतौर पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के स्तर पर फ्रांस जो स्वतंत्र रूप से निर्णय लिया करता था, अब अमेरिकी नीति से प्रभावित रहेगा.
विकासशील देशों के लिए निकोलस सरकोजी का राष्ट्रपति बनना बहुत शुभ नहीं कही जा सकता. भारत और चीन को व्यापारिक क्षेत्र में नयी व्यवस्था के अंतर्गत काफी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि चुनाव अभियान के दौरान निकोलस ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि विजय की स्थिति में उनकी सरकार चीन और भारत के माल के खिलाफ आयात कर में भारी वृद्धि कर अपने देश की उत्पादित वस्तुआें का बचाव करेंगे. उनका कहना है कि ये देश फ्रांस के बाजार में अपने देश की उत्पादित वस्तुआें को सस्ते दर पर निर्यात करते हैं, अत: फ्रांस सरकार को यह अधिकार है कि वह स्वदेशी माल की रक्षा में करे.
निश्चय ही यह विश्व व्यापार में खुलेपन के लिए एक स्पष्ट चुनौती होगी, जिसका भारत और चीन को संयुक्त रूप से सामना करना पड़ेगा. अत: भारत को नये राष्ट्रपति की रीति नीति के प्रति सावधानी बरतनी पड़ेगी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता के प्रति फ्रांस की पिछली सरकार काफी उत्साहित थी. अब देखना है कि नयी सरकार इस संबंध में क्या नीति अपनाती है. इसी प्रकार भारत की आणविक क्लब की सदस्यता का सवाल है, इस संदर्भ में जॉक शिराक भारत के एक अति उत्साही समर्थक माने जाते थे. देखना है कि नयी सरकार का इस संबंध में क्या रुख होता है.
निकोलस सरकोजी की चुनावी सफलता से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि जर्मनी के पिछले चुनाव में दक्षिणपंथियों की सफलता से अनुदारपंथियों की सफलता की जो शुरुआत हुई थी, वह अब फ्रांस की राजनीति में प्रभावशाली तौर पर अपनी जड़ें जमा चुकी है. शीघ्र ही ब्रिटेन में भी नेतृत्व परिवर्तन होनेवाला है. अभी तक जॉर्ज ब्राउन का 10, डाउनिंग स्ट्रीट में जाना तय माना जा रहा है. उनकी भी लेबर पार्टी में बहुत उदारवादी छवि नहीं है. ब्रिटेन में स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम ने कंजरवेटिव पार्टी को काफी प्रोत्साहित किया है. लेबर पार्टी की त्रासदी देखने लायक है. फिलहाल फ्रांस में संसदीय चुनाव अगले छह सप्तहों में होनेवाले हैं. अगर उन चुनावों में भी अनुदारपंथियों का बोलबाला रहा तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि जर्मनी से दक्षिणपंथी शुरुआत का असर यूरोपीय राजनीति पर और भी व्यापक होगा.
विरोध पक्ष की नेता सेगल रोयाल ने भी चुनाव में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी थी. इसलिए समाजवादियों में आयी हताशा स्वाभाविक है. इस चुनाव परिणाम ने वामपंथियों की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है. यूरोप में आयी समृद्धि के असर से वामपंथी विचारधारा के प्रति आम जनता के आकर्षण में कमी आयी है. इस दृष्टि से यूरोप के समाजवादियों के लिए वर्तमान परिस्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है. उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा के २१ वीं सदी की चुनौतियों के अनुकूल नीति अपनानी होगी.
मारग्रेट थैचर के नेतृत्व से लगातार विफलता पाने पर ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने अपने नये नेता टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में न्यू लेबर के सिद्धांत को अपना कर अरसे के बाद 10, डाउनिंग स्ट्रीट पर अपना आधिपत्य जमाया था. वे तीन बार आम चुनाव में लेबर पार्टी को सफलता की राह पर ले गये. परंतु इराक के संदर्भ में अमेरिकापरस्त नीति के कारण उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट आयी और पार्टी के अंदर उन पर पद त्याग करने का दबाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. उन्हें अपना पद छोड़ने की घोषणा करनी पड़ी और अब वे 5 जून को अपने पद से मुक्त हो रहे हैं. लेबर पार्टी के नये नेता चांसलर ऑफ एक्सचेकर जॉर्ज ब्राउन के लिए अपनी पार्टी की गिरती लोकप्रियता को न केवल विराम लगाना होगा, बल्कि उसे ब्रिटिश जनमानस में पुन: इस तरह प्रतिस्थापित करना होगा कि उसे फिर से शासन की पार्टी के तौर पर ब्रिटिश जनता के समक्ष पेश किया जा सके.
यूरोपीय समाजवादियों की इस त्रासदी और यूरोपीय जनता के रुझान से विकासशील देशों के जनतांत्रिक तत्वों को भी सबक लेना होगा. भारत जैसे देश में अभी 24 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने पर मजबूर हो रहे हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में गरीबी तथा जीवन यापन के लिए रोजगार के अवसर की कमी से उत्पन्न समस्याआें के समाधान में व्यवस्था की विफलता ने ही हिंसात्मक आंदोलन को जन्म दिया है. नेपाल में जनतांत्रिक, वामपंथी एवं माओवादी तत्वों का आपसी समझौता इस दिशा में आशा की एक किरण के तौर पर दिखायी पड़ रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि नेपाल में चल रहे प्रयास को सफलता मिलेगी. जहां तक फ्रांस की नयी सरकार का प्रश्न है, विकासशील दुनिया को इंतजार करना पड़ेगा कि वह अपने पत्ते किस प्रकार खोलता है.

लेखक पूर्व विदेश राज्यमंत्री हैं.
प्रभात खबर से साभार.

May 17, 2007 at 7:51 pm Leave a comment

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